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₹60 करोड़ का चुनावी बॉन्ड खरीदने वाली NCC को मिला ₹3,389 करोड़ का ठेका, उठे सवाल
Daudhan Dam Contract को लेकर सवाल उठे हैं। NCC ने BJP को ₹60 करोड़ Electoral Bonds के जरिए दिए थे और बाद में ₹3,389 करोड़ का ठेका मिला। जानें पूरा मामला।
Daudhan Dam Contract controversy: भारत की पहली बड़ी नदी जोड़ो परियोजना केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के तहत मध्य प्रदेश के छतरपुर में बनने वाले दाऊधन बांध के ठेके को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। करीब ₹44,605 करोड़ की केन-बेतवा परियोजना के केंद्र में मौजूद इस बांध के निर्माण का ₹3,389 करोड़ का EPC ठेका हैदराबाद स्थित Nagarjuna Construction Company Limited (NCC) को मिला है।
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस कंपनी को इतना बड़ा बांध निर्माण ठेका मिला, उसने 2019 और 2022 में चुनावी बॉन्ड के जरिए ₹60 करोड़ सिर्फ BJP को दान किए थे। उपलब्ध चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार NCC ने किसी अन्य राजनीतिक दल को चुनावी बॉन्ड के जरिए चंदा नहीं दिया।
हालांकि, चुनावी बॉन्ड के जरिए दिए गए चंदे और दाऊधन बांध के ठेके के बीच किसी सीधे quid pro quo का प्रमाण सामने नहीं आया है। इस संभावित संबंध की जांच की मांग जरूर उठी है।
₹60 करोड़ का BJP को चंदा, फिर मिला ₹3,389 करोड़ का ठेका
Article-14.com की रिपोर्ट के अनुसार, दस्तावेजों के मुताबिक NCC ने अक्टूबर 2019 में ₹20 करोड़ और अक्टूबर 2022 में ₹40 करोड़ के चुनावी बॉन्ड BJP को दिए। कंपनी ने किसी दूसरे राजनीतिक दल को इन चुनावी बॉन्ड के जरिए चंदा नहीं दिया।
इसके करीब दो साल बाद, 28 नवंबर 2024 को केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट अथॉरिटी ने NCC को दाऊधन बांध के EPC कॉन्ट्रैक्ट के लिए सफल बोलीदाता के रूप में सूचित किया। यह ठेका करीब ₹3,389 करोड़, GST को छोड़कर, का बताया गया है।
यही घटनाक्रम अब विपक्ष और पूर्व नौकरशाहों के सवालों के केंद्र में है।
सवाल: बांध निर्माण का अनुभव सीमित, फिर इतना बड़ा ठेका कैसे?
दाऊधन बांध की EPC निविदा अगस्त 2023 में जारी हुई थी। इसमें प्रमुख बोलीदाता के पास पिछले 10 वर्षों में कम से कम दो साल का बड़े सिविल स्ट्रक्चर के निर्माण का अनुभव मांगा गया था। साथ ही कम से कम 40 मीटर या उससे अधिक ऊंचे कंक्रीट बांध और 35 मीटर या उससे अधिक ऊंचे अर्थ, रॉकफिल या कंपोजिट बांध के निर्माण का अनुभव भी निर्धारित किया गया था।
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि NCC की वेबसाइट, 2024 की एक इंफ्रास्ट्रक्चर इंडस्ट्री रिपोर्ट और 2025 की CRISIL रिपोर्ट में दाऊधन से पहले NCC के नाम पर कोई स्वतंत्र रूप से निर्मित बड़ा बांध दर्ज नहीं था।
कंपनी के जल क्षेत्र के पोर्टफोलियो में पानी की आपूर्ति, सिंचाई पाइपलाइन, सड़क और भवन परियोजनाएं शामिल थीं। दाऊधन से पहले उसका प्रमुख बांध-संबंधी काम आंध्र प्रदेश की एक ₹366.70 करोड़ की सिंचाई परियोजना थी, जिसे उसने संयुक्त उपक्रम में किया था। रिपोर्ट के मुताबिक दाऊधन की निविदा में पिछले योग्य बांध प्रोजेक्ट का न्यूनतम मूल्य ₹700 करोड़ होना था।
पहले टेंडर में नहीं आई कोई बोली
दाऊधन बांध के ठेके की प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में है। अगस्त 2023 में टेंडर जारी होने पर शुरुआत में किसी कंपनी ने बोली नहीं लगाई। इसके बाद लागत, इंजीनियरिंग चुनौतियों और पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में निर्माण को लेकर चिंताओं के बीच टेंडर की समयसीमा दो बार बढ़ाई गई।
बाद में छह कंपनियों ने बोली लगाई। रिपोर्ट में NCC, Dilip Buildcon, HSCL-RVNL JV, Larsen & Toubro और अन्य कंपनियों के नाम दिए गए हैं। एक संयुक्त उपक्रम को बांध निर्माण अनुभव की कमी के कारण अयोग्य घोषित किए जाने की बात भी रिपोर्ट में कही गई है। NCC सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी के रूप में सामने आई।
हालांकि, मंत्रालय और National Water Development Agency ने यह सार्वजनिक नहीं किया कि बोलियों का मूल्यांकन किस तरह किया गया और NCC को अंतिम रूप से क्यों चुना गया।
पूर्व वित्त सचिव ने कहा- कनेक्शन की जांच जरूरी
पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने मामले में संभावित संबंध की जांच की जरूरत बताई। उनके अनुसार किसी राजनीतिक दल को चुनावी बॉन्ड के जरिए दिया गया चंदा और सरकारी ठेका अपने आप में सीधा संबंध साबित नहीं करता, लेकिन यह जांचना जरूरी है कि क्या बोली की शर्तें किसी कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए तय की गई थीं या मूल्यांकन में कोई पक्षपात हुआ।
उन्होंने कहा कि यदि ऐसे किसी पक्षपात या अवैध लाभ का प्रमाण मिलता है, तभी चुनावी बॉन्ड का चंदा संभावित quid pro quo स्थापित करने में मदद कर सकता है।
पूर्व आर्थिक मामलों के सचिव ईएएस शर्मा ने भी NCC के बांध निर्माण अनुभव को लेकर सवाल उठाए और कहा कि कंपनी का अनुभव मुख्य रूप से बड़ी सिंचाई परियोजनाओं के कुछ हिस्सों के निष्पादन तक सीमित रहा है, इसलिए इतने बड़े दाऊधन प्रोजेक्ट का ठेका मिलना जांच का विषय है।
2018 और 2022 में NCC पर टैक्स विभाग की कार्रवाई
रिपोर्ट के अनुसार NCC के परिसरों पर आयकर विभाग ने 2018 और 2022 में तलाशी ली थी। कंपनी द्वारा चुनावी बॉन्ड खरीदने का सिलसिला 2019 से शुरू हुआ।
मार्च 2018 में आयकर विभाग की कार्रवाई के बाद अक्टूबर 2019 में कंपनी ने पहली बार ₹20 करोड़ के चुनावी बॉन्ड खरीदे, जिन्हें BJP को दिया गया। अक्टूबर 2022 में कंपनी ने फिर ₹40 करोड़ के बॉन्ड BJP को दिए। नवंबर 2022 में कंपनी के परिसरों में आयकर विभाग की एक और तलाशी की जानकारी सामने आई।
इन घटनाओं के बीच किसी आपराधिक लेन-देन या अवैध quid pro quo का निष्कर्ष इस सामग्री से नहीं निकाला जा सकता। यही कारण है कि मामले में पारदर्शी जांच और टेंडर प्रक्रिया की सार्वजनिक जानकारी की मांग महत्वपूर्ण हो जाती है।
BJP शासित राज्यों में भी मिले बड़े प्रोजेक्ट
रिपोर्ट में NCC के बढ़ते ऑर्डर बुक का भी उल्लेख है। 2019-20 में कंपनी का ऑर्डर बुक करीब ₹26,572 करोड़ था, जो 2025-26 में बढ़कर ₹83,004 करोड़ हो गया: छह वर्षों में तीन गुने से ज्यादा।
अक्टूबर-दिसंबर 2022 के दौरान गुजरात में कंपनी को करीब ₹707.30 करोड़ का लिफ्ट इरिगेशन प्रोजेक्ट और कर्नाटक में ₹334.31 करोड़ का पेयजल तथा ₹378.62 करोड़ का ट्रांसमिशन प्रोजेक्ट मिला।
इसके बाद महाराष्ट्र में ₹6,300 करोड़ के ट्विन टनल प्रोजेक्ट, करीब ₹8,398 करोड़ के स्मार्ट मीटर प्रोजेक्ट और 2025 में मुंबई मेट्रो लाइन-6 के लिए ₹2,269 करोड़ का ऑर्डर मिलने का उल्लेख है।
दाऊधन बांध से डूबेंगे जंगल, विस्थापन का भी संकट
दाऊधन बांध सिर्फ ठेके को लेकर ही विवाद में नहीं है। परियोजना का पर्यावरण और विस्थापन संबंधी प्रभाव भी बड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार परियोजना से पन्ना टाइगर रिजर्व का बड़ा हिस्सा प्रभावित होगा, लाखों पेड़ों के डूबने की आशंका है और 22 गांवों से हजारों लोगों के विस्थापन का मुद्दा सामने आया है। इनमें बड़ी संख्या आदिवासी समुदाय की है। दस गांवों के पूरी तरह डूबने की बात भी रिपोर्ट में कही गई है।
विस्थापित होने वाले ग्रामीण लंबे समय से पुनर्वास, मुआवजे और वन कानूनों के अनुपालन को लेकर विरोध कर रहे हैं।
जुलाई 2026 में फिर तेज हुआ विरोध
जुलाई 2026 में छतरपुर जिले में परियोजना के खिलाफ ग्रामीणों का आंदोलन फिर तेज हुआ। रिपोर्ट के मुताबिक 19 जुलाई को पुलिस ने तड़के कार्रवाई कर प्रदर्शन स्थल खाली कराया और कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया। इससे पहले अप्रैल में भी परियोजना के विरोध में पुलिस कार्रवाई का उल्लेख किया गया है।
प्रदर्शनकारी पुनर्वास और महिलाओं-बच्चों के लिए मुआवजे की मांग कर रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जब तक न्याय नहीं मिलता, आंदोलन जारी रहेगा।
अब सबसे बड़ा सवाल क्या है?
पूरे मामले में तीन सवाल सबसे अहम हैं:
पहला, क्या NCC दाऊधन बांध की तकनीकी और अनुभव संबंधी सभी निविदा शर्तों को पूरी तरह पूरा करती थी?
दूसरा, ₹60 करोड़ के BJP चुनावी बॉन्ड चंदे और बाद में मिले ₹3,389 करोड़ के ठेके के बीच कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध था या नहीं?
तीसरा, सरकार और संबंधित एजेंसियां बोली मूल्यांकन और NCC के चयन से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक क्यों नहीं कर रही हैं?
इन सवालों के जवाब सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि यह महज एक कारोबारी ठेका था या इसके पीछे किसी प्रकार का राजनीतिक प्रभाव या पक्षपात था।
फिलहाल उपलब्ध सामग्री आरोपों और सवालों को सामने रखती है, लेकिन चुनावी बॉन्ड के ₹60 करोड़ और दाऊधन बांध के ठेके के बीच प्रत्यक्ष quid pro quo साबित नहीं करती। NCC और संबंधित सरकारी विभागों से इस संबंध में जवाब मांगे जाने का भी उल्लेख है, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार उन्हें कोई जवाब प्राप्त नहीं हुआ था।


