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Delhi Cursed CM Bungalow: 'मनहूस' मुख्यमंत्री बंगले का अंत...जहां सत्ता मिली, लेकिन कुर्सी नहीं बची, अब बनेगा आपदा मुख्यालय
Delhi Cursed CM Bungalow: दिल्ली का चर्चित 33 शाम नाथ मार्ग मुख्यमंत्री आवास अब इतिहास बनने जा रहा है। वर्षों तक 'मनहूस' और 'शापित' कहे जाने वाले इस बंगले की जगह आधुनिक आपदा प्रबंधन मुख्यालय बनेगा।
Delhi Cursed CM Bungalow To Be Demolished for DDMA Project 2026
Delhi Cursed CM Bungalow: दिल्ली सिर्फ सत्ता का गढ़ नहीं, बल्कि अपने रोचक इतिहास,अनसुलझे रहस्यों और अनगिनत किस्सों का भी शहर रहा है। यहां मौजूद कई ऐतिहासिक इमारतें सदियों से लोगों की जिज्ञासा और रहस्य का हिस्सा रही हैं। कुछ इमारतों के बारे में ऐसी कहानियां प्रचलित हैं कि वहां दिन के उजाले में भी जाने से लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इन्हीं रहस्यमयी इमारतों की कड़ी में एक नाम उस बंगले का भी शामिल है, जो कभी दिल्ली की सत्ता का सबसे बड़ा पता हुआ करता था। सिविल लाइंस स्थित 33 शाम नाथ मार्ग का मुख्यमंत्री आवास वर्षों तक राजनीतिक गलियारों में 'मनहूस' और 'शापित' बंगले के रूप में चर्चा में रहा। कहा जाता है कि यहां रहने वाले कई मुख्यमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके, जबकि कुछ नेताओं ने तो मुख्यमंत्री बनने के बावजूद इस बंगले में रहने से ही इनकार कर दिया। अब करीब एक सदी पुरानी इस इमारत को ध्वस्त कर उसकी जगह अत्याधुनिक आपदा प्रबंधन मुख्यालय बनाने की तैयारी है।
करीब 100 साल पुराना है यह बंगला
सिविल लाइंस क्षेत्र में स्थित यह बंगला 1920 के दशक में ब्रिटिश शासन के दौरान बनाया गया था। उस दौर में अंग्रेज अधिकारियों के लिए तैयार की गई यह विशाल कोठी स्वतंत्रता के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री आवास के रूप में इस्तेमाल होने लगी। औपनिवेशिक वास्तुकला शैली में बने इस भवन को लंबे समय तक दिल्ली की सत्ता का केंद्र माना जाता रहा। लेकिन समय के साथ इस इमारत की पहचान राजनीतिक घटनाओं और विवादों से ज्यादा जुड़ने लगी।
क्यों कहा जाने लगा 'शापित' मुख्यमंत्री आवास?
दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री चौधरी ब्रह्म प्रकाश इस बंगले में रहे थे, लेकिन उनका कार्यकाल पूरा नहीं हो सका। बाद में मदन लाल खुराना और साहिब सिंह वर्मा जैसे नेता भी यहां रहे, लेकिन वे भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। इन घटनाओं ने धीरे-धीरे इस धारणा को जन्म दिया कि यह बंगला सत्ता तो देता है, लेकिन स्थिरता नहीं। राजनीतिक गलियारों में इसे 'मनहूस बंगला' कहा जाने लगा।
जब मुख्यमंत्रियों ने खुद बना ली दूरी
बंगले को लेकर अंधविश्वास इतना बढ़ गया कि बाद के कई मुख्यमंत्रियों ने यहां रहने से ही इनकार कर दिया। दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री सुषमा स्वराज, साहिब सिंह वर्मा और शीला दीक्षित ने मुख्यमंत्री बनने के बावजूद इस आवास को नहीं चुना। उन्होंने अपने निजी या वैकल्पिक सरकारी आवासों में रहना ज्यादा सुरक्षित समझा। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह शायद देश का ऐसा दुर्लभ सरकारी आवास है, जिससे मुख्यमंत्री खुद दूरी बनाते रहे।
दीपचंद बंधु की मौत ने बढ़ाया रहस्य
साल 2003 में दिल्ली सरकार के मंत्री दीपचंद बंधु ने तमाम अंधविश्वासों को खारिज करते हुए इस बंगले में रहने का फैसला किया।
लेकिन कुछ समय बाद वे मेनिनजाइटिस जैसी गंभीर बीमारी की चपेट में आ गए। इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। इस दुखद घटना के बाद बंगले को लेकर फैली आशंकाएं और गहरी हो गईं। लोगों के बीच यह घटना लंबे समय तक चर्चा का विषय बनी रही।
वास्तु दोष की भी होती रही चर्चा
इस बंगले को लेकर वर्षों से वास्तु विशेषज्ञों और अंधविश्वास में विश्वास रखने वाले लोगों के बीच भी चर्चा होती रही है। कई लोगों का दावा रहा कि इमारत का डिजाइन और विशेष रूप से इसकी एंटी-क्लॉकवाइज सर्पिल सीढ़ियां वास्तु के हिसाब से शुभ नहीं हैं।
केजरीवाल का नया आवास और 'शीश महल' विवाद
जब 2015 में अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने इस पुराने बंगले में रहने के बजाय पास स्थित 6 फ्लैगस्टाफ रोड को आधिकारिक आवास बनाया। बाद में इस आवास के नवीनीकरण और साज-सज्जा पर हुए खर्च को लेकर बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हुआ। विपक्ष ने इसे 'शीश महल' का नाम दिया और यह मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंच गया।
इस तरह मुख्यमंत्री आवास से जुड़ा विवादों का सिलसिला नए पते पर भी खत्म नहीं हुआ।
अब बनेगा आधुनिक आपदा प्रबंधन मुख्यालय
दिल्ली सरकार अब इस पूरी जगह को नए उद्देश्य के लिए विकसित करने जा रही है। यहां दिल्ली आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) का आधुनिक मुख्यालय और अत्याधुनिक इमरजेंसी ऑपरेशन सेंटर (EOC) बनाया जाएगा।
यह केंद्र भूकंप, आग, बाढ़, भवन दुर्घटना, प्रदूषण संकट और अन्य आपात स्थितियों के दौरान त्वरित प्रतिक्रिया देने का काम करेगा। अलग-अलग एजेंसियों के बीच समन्वय को बेहतर बनाने के लिए भी यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि तेजी से बढ़ती आबादी और शहरी चुनौतियों के बीच दिल्ली को ऐसे एकीकृत आपदा प्रबंधन केंद्र की लंबे समय से जरूरत थी।
एक ऐतिहासिक भवन के अंत के साथ नई शुरुआत की तैयारी
33 शाम नाथ मार्ग का यह बंगला महज ईंट-पत्थरों की इमारत नहीं था। यह दिल्ली की राजनीति के कई उतार-चढ़ाव, सत्ता परिवर्तन, विवादों और अंधविश्वासों का गवाह भी रहा है। अब इसे ध्वस्त कर नई पहचान दी जा रही है। इसी के साथ दिल्ली की राजनीतिक स्मृतियों का एक अध्याय भी समाप्त हो रहा है। सबसे खास बात यह है कि जिस जगह को वर्षों तक 'मनहूस' कहकर खाली छोड़ दिया गया, वही जगह अब भविष्य में हजारों लोगों की सुरक्षा और आपदा प्रबंधन का केंद्र बनने जा रही है। जिसे इस ऐतिहासिक बंगले की सबसे बड़ी सकारात्मक शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है।


