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Jantar Mantar Protest: क्या शहर से दूर होंगे धरना-प्रदर्शन? जानिए जंतर-मंतर की पूरी कहानी
Jantar Mantar Protest: दिल्ली में जंतर-मंतर के बाद प्रदर्शन के वैकल्पिक स्थलों पर बहस तेज है...
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Jantar Mantar Protest: दिल्ली में जंतर-मंतर रोड को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने के फैसले के बाद जन प्रदर्शनों के लिए जगह तय करने की प्रशासनिक नीति चर्चा में है। दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन के लिए रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और सीबीडी ग्राउंड को वैकल्पिक स्थल निर्धारित किया है। दिल्ली में जंतर-मंतर लंबे समय से धरना प्रदर्शन का प्रमुख केंद्र रहा है। संसद और केंद्रीय सरकारी कार्यालयों के नजदीक होने के कारण प्रदर्शनकारियों के लिए यह महत्वपूर्ण स्थान रहा है।
1988 के किसान आंदोलन के बाद बदला दिल्ली में प्रदर्शन का केंद्र
दिल्ली में जन प्रदर्शनों के स्थलों में बदलाव का इतिहास तीन दशक से भी पुराना है। आजादी के बाद बोट क्लब और इंडिया गेट के आसपास का क्षेत्र बड़े राजनीतिक प्रदर्शनों का प्रमुख केंद्र रहा। अक्टूबर 1988 में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में बोट क्लब पर विशाल किसान आंदोलन हुआ था। देश के विभिन्न हिस्सों से आए किसानों ने अपनी मांगों को लेकर कई दिनों तक यहां प्रदर्शन किया। इस आंदोलन के बाद बोट क्लब पर प्रदर्शनों को लेकर पाबंदियां बढ़ीं और जंतर-मंतर धीरे-धीरे विरोध प्रदर्शनों का प्रमुख केंद्र बन गया।
अक्टूबर 2017 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों को रोकने और उन्हें रामलीला मैदान में स्थानांतरित करने का आदेश दिया। जुलाई 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित मामले पर विचार किया और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार तथा सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन की जरूरत पर जोर दिया।
बाकी शहरों के क्या हैं प्रमुख प्रदर्शन स्थल
- मुंबई में आजाद मैदान लंबे समय से राजनीतिक रैलियों, सामाजिक आंदोलनों और विभिन्न संगठनों के धरने का प्रमुख स्थल रहा है। इसके अलावा दादर स्थित शिवाजी पार्क भी रैलियों और प्रदर्शनों की जगह रहा है।
- उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में लंबे समय तक विधान भवन के ठीक सामने धरना स्थल बना रहा जहां लोग अपनी आवाज उठाने के लिए प्रदर्शन करते थे। बाद में यहां से धरना स्थल हटा दिया गया। अब लखनऊ में ईको गार्डन विभिन्न संगठनों के धरना-प्रदर्शनों का प्रमुख स्थल है। ईको गार्डन में प्रदर्शन आयोजित किए जाने से प्रशासन को बड़े जमावड़ों का प्रबंधन करने में सुविधा मिल सकती है।
- बिहार की राजधानी पटना में गर्दनीबाग लंबे समय से धरना-प्रदर्शनों के लिए इस्तेमाल होता रहा है। विभिन्न कर्मचारी संगठनों, छात्र समूहों और राजनीतिक संगठनों ने यहां अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन किए हैं। अक्टूबर 2026 में पटना प्रशासन की ओर से गर्दनीबाग के बाहर धरना-प्रदर्शन करने पर सख्त कार्रवाई की चेतावनी दिए जाने की खबर सामने आई। रिपोर्टों में यातायात और आम लोगों को होने वाली परेशानी को प्रशासन की चिंताओं में शामिल बताया गया।
- .पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में राज्य सचिवालय 'नबान्न' तक मार्च निकालना विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक संगठनों के लिए सरकार का ध्यान आकर्षित करने का एक तरीका रहा है। अगस्त 2025 में आरजी कर मामले से जुड़े विरोध के दौरान पुलिस ने नबान्न अभियान की अनुमति नहीं दी थी। अधिकारियों ने सुरक्षा और अनुमति संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए प्रदर्शनकारियों को संतरागाछी बस स्टैंड और रानी राशमणि एवेन्यू जैसे वैकल्पिक स्थान सुझाए थे।
प्रदर्शन के अधिकार और अदालतों के फैसले
प्रदर्शन स्थलों को लेकर विवादों में संवैधानिक अधिकारों और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन का प्रश्न भी शामिल है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्वक तथा बिना हथियार एकत्र होने का अधिकार देता है। इन अधिकारों पर संविधान में निर्धारित आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
हालांकि, ये अधिकार निरपेक्ष नहीं हैं। संविधान के अनुच्छेद 19(2) और 19(3) के तहत निर्धारित आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा से जुड़ी परिस्थितियों में प्रशासन प्रदर्शन के स्थान, समय और तरीके को नियंत्रित कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ मामले में जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों से संबंधित विवाद पर विचार किया था। वहीं, 2020 में अमित साहनी बनाम पुलिस आयुक्त मामले में शाहीन बाग प्रदर्शन के संदर्भ में अदालत ने सार्वजनिक रास्तों पर अनिश्चितकाल तक कब्जा करने के खिलाफ टिप्पणी की थी।
इन मामलों में सार्वजनिक व्यवस्था और नागरिकों के अधिकारों से जुड़े प्रश्नों पर विचार किया गया। किसी विशेष प्रदर्शन पर लागू प्रतिबंध की वैधता संबंधित आदेशों, परिस्थितियों और कानूनी प्रावधानों पर निर्भर करती है।
आवाज पहुंचाने का तरीका
लोकतंत्र में जन प्रदर्शन केवल असहमति जताने का माध्यम नहीं, बल्कि सरकार को जवाबदेह बनाने का एक महत्वपूर्ण तरीका भी हैं। ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या प्रदर्शनकारियों को संसद, मंत्रालयों और सरकार के प्रमुख कार्यालयों के नजदीक अपनी आवाज उठाने का अवसर मिलना चाहिए, या प्रशासनिक सुविधा, सुरक्षा और यातायात के नाम पर उन्हें शहर के दूरस्थ इलाकों में भेजा जा सकता है?
हालांकि, किसी स्थान को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने का अर्थ अपने आप यह नहीं है कि वहां हर प्रकार का शांतिपूर्ण विरोध कानूनी रूप से असंभव हो गया है। इसके लिए संबंधित आदेश, लागू प्रतिबंधों और अनुमति संबंधी नियमों को अलग से देखना जरूरी है।


