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'जान जोखिम में डालकर आया हूं', बोले महतो, जानिए कैसे अभिजीत दीपके से एक कदम निकले आगे
JPSC-JSSC परीक्षा में गड़बड़ी के विरोध में रांची में छात्रों का विधानसभा मार्च। 9 दिन के अनशन के बावजूद देवेंद्र नाथ महतो एंबुलेंस और स्ट्रेचर से पहुंचे। अभिजीत दीपके से क्यों हुई तुलना?
Devendra Nath Mahto: झारखंड की राजधानी रांची में सोमवार को छात्रों का आंदोलन उस समय और तेज हो गया, जब हजारों छात्र जेपीएससी-जेएसएससी परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी और अनियमितताओं के विरोध में विधानसभा मार्च के लिए सड़कों पर उतर आए। इस मार्च में सबसे ज्यादा चर्चा छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो की रही। नौ दिन से अनशन पर बैठे महतो ने खराब स्वास्थ्य के बावजूद आंदोलनकारियों का साथ नहीं छोड़ा।
महतो की हालत इतनी कमजोर थी कि उन्हें पहले एंबुलेंस और बाद में स्ट्रेचर के सहारे मार्च में आगे ले जाया गया। इसके बावजूद उनका आंदोलन में शामिल होना छात्रों के बीच जोश बढ़ाने वाला साबित हुआ। इसी घटनाक्रम के बाद उनकी तुलना दिल्ली में हुए कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के आंदोलन के दौरान अभिजीत दीपके के रुख से भी की जा रही है। महतो 9 दिन की भूख हड़ताल के बावजूद विधानसभा घेराओ मार्च में हिस्सा लिया जबकि अभिजीत दीपके 3 दिन के अनशन में इतना कमजोर हो गए थे की वह संसद मार्च में भाग नहीं ले पाए। इसी कारण से कहा जा रहा है कि देवेन्द्र नाथ महतो अभिजीत दीपके से एक कदम आगे निकल गए।
बैरिकेडिंग तोड़कर आगे बढ़े हजारों छात्र
जेपीएससी और जेएसएससी परीक्षाओं में कथित धांधली और अनियमितताओं के खिलाफ छात्रों ने पुराने विधानसभा परिसर के पास से नई विधानसभा की ओर मार्च शुरू किया। प्रदर्शनकारियों ने रास्ते में पुलिस की ओर से लगाए गए कई बैरिकेड पार कर लिए।
छात्र शहीद मैदान के पास पहुंचकर सड़क पर बैठ गए। उन्हें आगे बढ़ने से रोकने के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच धक्का-मुक्की भी हुई। हालांकि, छात्र संगठनों के वॉलेंटियर लगातार भीड़ को नियंत्रित करने और स्थिति को संभालने की कोशिश करते रहे।
9 दिन से अनशन, फिर भी मार्च में पहुंचे देवेंद्र नाथ महतो
देवेंद्र नाथ महतो पिछले नौ दिनों से अनशन पर हैं। आंदोलन की शुरुआत में उन्होंने चार दिनों तक पानी भी नहीं लिया था। ऐसे में लंबे अनशन के बाद उनका स्वास्थ्य काफी कमजोर बताया जा रहा है।
इसके बावजूद महतो विधानसभा मार्च में शामिल होने पहुंचे। हाथ में पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन की तस्वीर लिए वह मंच से कुछ कदम पैदल चले। इसके बाद उनकी हालत को देखते हुए उन्हें एंबुलेंस में बैठाया गया।
कुछ दूरी तक एंबुलेंस से जाने के बाद आंदोलनकारियों ने स्ट्रेचर को अपने कंधों पर उठा लिया। इसी तरह महतो को लेकर छात्र आगे बढ़ते रहे। महतो को इस हालत में आंदोलन के बीच देखकर प्रदर्शनकारियों में उत्साह बढ़ गया और उनके समर्थन में जमकर नारेबाजी हुई।
'जान जोखिम में डालकर आया हूं', बोले महतो
देवेंद्र नाथ महतो ने कहा कि उन्होंने अपनी जान को जोखिम में डालकर विधानसभा मार्च में हिस्सा लिया है। उनका कहना था कि आंदोलन के दौरान कभी भी स्थिति बिगड़ सकती है, भगदड़ मच सकती है या पुलिस की ओर से आंसू गैस के गोले छोड़े जा सकते हैं।
उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में स्वस्थ व्यक्ति तो भाग सकता है, लेकिन उनकी मौजूदा हालत ऐसी नहीं है कि वह तेजी से वहां से निकल सकें। इसके बावजूद वह छात्रों को अकेला छोड़ना नहीं चाहते थे।
महतो ने शिबू सोरेन का जिक्र करते हुए कहा कि अगर वह आज जिंदा होते तो आंदोलनकारी छात्रों के साथ खड़े होते, क्योंकि उन्होंने खुद पूरी जिंदगी आंदोलनों में संघर्ष किया है।
अभिजीत दीपके का 3 दिन की भूख हड़ताल वाला बयान फिर चर्चा में
महतो के विधानसभा मार्च में शामिल होने के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में दिल्ली के आंदोलन का भी जिक्र होने लगा। दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के दौरान संसद मार्च में अभिजीत दीपके खुद प्रदर्शनकारियों के साथ आगे नहीं जा पाए थे।
20 मार्च को हुए संसद मार्च के दौरान दीपके जंतर-मंतर पर ही एक ट्रक पर मौजूद रहे थे। इसे लेकर उनकी आलोचना भी हुई थी। बाद में एक इंटरव्यू में दीपके ने इसका कारण अपनी तीन दिन की भूख हड़ताल को बताया।
दीपके के मुताबिक, लगातार तीन दिन तक अनशन करने के कारण उन्हें चक्कर आने लगे थे। उनके साथियों ने उन्हें ट्रक पर रहने की सलाह दी, ताकि वह वहीं से प्रदर्शनकारियों को गाइड कर सकें। उन्होंने यह भी कहा था कि अगर वह अनशन पर नहीं होते तो खुद जमीन पर उतरकर संसद मार्च की अगुआई करते।
दो आंदोलन, दो तस्वीरें
यहीं से दोनों आंदोलनों की तुलना दिलचस्प हो जाती है। एक तरफ अभिजीत दीपके ने तीन दिन की भूख हड़ताल के बाद शारीरिक कमजोरी का हवाला देते हुए संसद मार्च में सीधे शामिल नहीं होने की बात कही थी। दूसरी तरफ देवेंद्र नाथ महतो नौ दिन के अनशन के बाद भी विधानसभा मार्च में पहुंचे।
हालांकि, दोनों नेताओं की स्वास्थ्य स्थिति, आंदोलन का स्वरूप और परिस्थितियां अलग थीं, इसलिए सीधे तौर पर दोनों की क्षमता की तुलना करना उचित नहीं होगा। लेकिन आंदोलन के प्रतीकात्मक पक्ष से देखें तो महतो का एंबुलेंस और स्ट्रेचर के सहारे मार्च में शामिल होना छात्रों के लिए बड़ा मनोबल बढ़ाने वाला दृश्य जरूर रहा।
रांची में सोमवार का विधानसभा मार्च अब झारखंड के छात्र आंदोलन के सबसे अहम पड़ावों में शामिल हो गया है। जेपीएससी-जेएसएससी परीक्षाओं को लेकर छात्रों की नाराजगी और सरकार पर बढ़ते दबाव के बीच आने वाले दिनों में आंदोलन किस दिशा में जाता है, इस पर सबकी नजर रहेगी।


