UP Politics: अखिलेश यादव से राजा भैया तक... बागेश्वर बाबा की कथा के पीछे क्या है राजनीति?

Dhirendra Shastri Controversy: राम-कृष्ण विवाद के बाद धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री चर्चा में हैं। अखिलेश यादव का विरोध, राजा भैया की कथा और भाजपा नेताओं से संपर्क के बीच जानिए 2027 यूपी चुनाव का पूरा राजनीतिक गणित।

Yogesh Mishra
Published on: 7 Nov 2026 8:58 PM IST
Dhirendra Krishna Shastri | Ram Krishna Controversy | UP Assembly Election 2027 | Newstrack Hindi
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Dhirendra Krishna Shastri | Ram Krishna Controversy | UP Assembly Election 2027 | Newstrack Hindi

Dhirendra Shastri Controversy: मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के एक धार्मिक स्थल से निकले युवा कथावाचक धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री आज केवल हनुमान कथा सुनाने वाले धार्मिक व्यक्तित्व नहीं रह गए हैं। उनके आयोजनों में जुटने वाली भारी भीड़, हिंदू राष्ट्र की स्थापना की मांग, धर्मांतरण के विरोध में अभियान, जातिगत एकता के आह्वान और देश के बड़े राजनीतिक नेताओं से संपर्क ने उन्हें धार्मिक तथा राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया है। लेकिन 29 अक्टूबर, 2026 को मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के करैरा में रामकथा के दौरान भगवान राम और भगवान कृष्ण को लेकर की गई उनकी टिप्पणी ने एक ऐसा विवाद पैदा कर दिया है, जिसका असर उत्तर प्रदेश के 2027 विधानसभा चुनाव की राजनीतिक बहस तक पहुँच गया है।

कथा के दौरान धीरेंद्र शास्त्री ने भगवान राम के सीधे खड़े होने और भगवान कृष्ण की त्रिभंग मुद्रा की तुलना की। उन्होंने कृष्ण के बांसुरी बजाने, गोवर्धन पर्वत उठाने तथा राम के धनुष धारण करने और हनुमान के पर्वत उठाने की कथाओं का उल्लेख किया। उनके कथन में 'हमारे राम' और 'तुम्हारे कृष्ण' का भेद दिखाई दिया। विशेष रूप से कृष्ण को 'टेढ़ा' कहने पर ब्रज क्षेत्र के कुछ संतों और यादव समाज के संगठनों ने आपत्ति जताई। विरोध करने वालों का तर्क था कि धार्मिक परंपरा में राम और कृष्ण दोनों भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं। दोनों को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करना अनुचित है।

विवाद बढ़ने पर धीरेंद्र शास्त्री ने 2 नवंबर को स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि उन्होंने भक्ति के भाव में भगवान कृष्ण को उलाहना दिया था। उनका उद्देश्य राम और कृष्ण में भेद करना नहीं था। उन्होंने स्वयं को कृष्ण भक्त बताते हुए कहा कि यदि किसी की भावनाओं को ठेस पहुँची है तो वह क्षमाप्रार्थी हैं। इस प्रकार उन्होंने अपनी टिप्पणी के लिए खेद प्रकट किया। लेकिन विवाद समाप्त नहीं हुआ।

इसके अगले चरण में भगवान राम के पिता को लेकर उनकी एक अन्य टिप्पणी वाला वीडियो चर्चा में आया। इसमें शास्त्री राम के पाँच पिता होने की बात कहकर एक धार्मिक व्याख्या प्रस्तुत करते दिखाई दिए। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने 3 नवंबर को दूसरा वीडियो साझा करते हुए शास्त्री पर धार्मिक सौहार्द बिगाड़ने का आरोप लगाया। 4 और 5 नवंबर तक उनका विरोध प्रस्तावित कथाओं की प्रशासनिक अनुमति रद्द करने की मांग में बदल गया।

अखिलेश यादव का विरोध: धार्मिक आस्था, यादव पहचान और 2027 की राजनीति

अखिलेश यादव ने इस विवाद में भगवान श्रीकृष्ण के सम्मान और सनातन समाज की एकता का मुद्दा उठाया। उन्होंने शास्त्री की टिप्पणी को आपत्तिजनक बताते हुए कहा कि आस्थावान समाज राम और कृष्ण के बीच ऐसी तुलना स्वीकार नहीं कर सकता। उन्होंने शास्त्री के आयोजनों के बहिष्कार और उन पर प्रतिबंध की मांग की तथा उत्तर प्रदेश के अंबेडकरनगर, कुंडा, गोंडा, झांसी, लखनऊ और आगरा में प्रस्तावित कार्यक्रमों का विशेष उल्लेख किया।

इस प्रतिक्रिया के धार्मिक और राजनीतिक दोनों आयाम हैं। भगवान कृष्ण का संबंध भारतीय धार्मिक परंपरा के व्यापक समाज से है। लेकिन यादव समुदाय अपनी सांस्कृतिक और वंशगत पहचान को विशेष रूप से कृष्ण से जोड़ता रहा है। समाजवादी पार्टी का राजनीतिक विकास भी मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व तथा यादव-मुस्लिम सामाजिक गठजोड़ से जुड़ा रहा है। इसके बावजूद पूरे यादव समाज को एक समान राजनीतिक मत वाला समुदाय समझना गलत होगा।

उत्तर प्रदेश के 2022 विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने 111 सीटें जीती थीं, जबकि 2017 में उसे 47 सीटें मिली थीं। 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में समाजवादी पार्टी ने 37 और उसके सहयोगी कांग्रेस ने छह सीटें जीतीं। इस पृष्ठभूमि में 2027 के लिए समाजवादी पार्टी की राजनीति में 'पीडीए' अर्थात पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व महत्वपूर्ण है। अखिलेश यादव की धार्मिक बयान पर प्रतिक्रिया को इस व्यापक राजनीतिक संदर्भ से अलग नहीं देखा जा सकता। हालांकि यह दावा करना कि उन्होंने केवल चुनावी लाभ के लिए विरोध किया, उनकी मंशा के बारे में अप्रमाणित निष्कर्ष होगा।

भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने भी अखिलेश यादव के विरोध पर सवाल उठाए। पार्टी प्रवक्ताओं ने उनसे मथुरा की कृष्ण जन्मभूमि और राम मंदिर के बारे में अपनी स्थिति स्पष्ट करने को कहा। इस प्रकार एक कथावाचक के बयान से शुरू हुआ विवाद धार्मिक अभिव्यक्ति, सामाजिक पहचान और दलों की वैचारिक स्थिति पर बहस में बदल गया।

यूपी में कथाओं का कैलेंडर: राजा भैया से भाजपा विधायकों तक

उत्तर प्रदेश में नवंबर और दिसंबर 2026 के लिए प्रस्तावित धीरेंद्र शास्त्री की कथाओं की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उनके आयोजकों की राजनीतिक पहचान है। इन आयोजनों को धार्मिक कार्यक्रम बताया जा रहा है। लेकिन इनमें स्थानीय राजनीतिक नेताओं की भूमिका स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। आगामी विधानसभा चुनाव से पहले इन आयोजनों का राजनीतिक महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि कथा का मंच केवल धार्मिक प्रवचन का स्थान नहीं होता। उसके आयोजन से जुड़े नेता को स्थानीय स्तर पर सार्वजनिक संपर्क, कार्यकर्ताओं के साथ समन्वय और धार्मिक-सामाजिक संगठनों के साथ संवाद का अवसर भी मिलता है। हालांकि इनमें से किसी उद्देश्य को आयोजकों की घोषित या प्रमाणित चुनावी मंशा मानना उचित नहीं होगा।

सबसे अधिक चर्चा प्रतापगढ़ जिले की कुंडा विधानसभा सीट की है। यहाँ जनसत्ता दल (लोकतांत्रिक) के अध्यक्ष और विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया धीरेंद्र शास्त्री की रामकथा का आयोजन करा रहे हैं। इसके लिए बेंती स्थित राजभवन परिसर की हवाई पट्टी के निकट योगीराज देवरहा बाबा कथा मंडपम का स्थान निर्धारित बताया गया है। कार्यक्रम की प्रमुख तिथियाँ 17 से 19 नवंबर हैं, जबकि अक्टूबर में प्रसारित कुछ घोषणाओं में 17 से 20 नवंबर का उल्लेख मिलता है।

राजा भैया ने स्पष्ट किया है कि कार्यक्रम का आयोजक जनसत्ता दल (लोकतांत्रिक) परिवार है। उन्होंने इसे आम लोगों का आयोजन बताते हुए कथा में सम्मिलित होने का निमंत्रण दिया। अक्टूबर में स्वयं धीरेंद्र शास्त्री ने भी कुंडा में रामकथा के साथ दिव्य दरबार लगाने की घोषणा की थी। उन्होंने राजा भैया की शस्त्र पूजा की परंपरा का उल्लेख करते हुए उनकी प्रशंसा की थी। 5 नवंबर को उन्नाव में आयोजित एक अन्य धार्मिक कार्यक्रम के दौरान राजा भैया ने फिर कुंडा की कथा का निमंत्रण दिया और हिंदुत्व तथा सनातन परंपरा के महत्व पर अपने विचार व्यक्त किए।

कुंडा की कथा राजनीतिक दृष्टि से इसलिए उल्लेखनीय है क्योंकि राजा भैया की पार्टी भाजपा या सपा का हिस्सा नहीं है और उसका अपना क्षेत्रीय राजनीतिक आधार है। कुंडा में उनका प्रभाव कई चुनावों से स्थापित है। इसीलिए यहाँ कथा आयोजित होने का अर्थ स्वतः भाजपा के पक्ष में आयोजन होना नहीं है। उलटे यह उदाहरण बताता है कि धीरेंद्र शास्त्री की कथाओं का आयोजन केवल भाजपा नेताओं तक सीमित नहीं है।

दूसरा प्रमुख कार्यक्रम गोंडा में 4 से 6 दिसंबर के बीच प्रस्तावित है। इसे कटरा बाजार विधानसभा क्षेत्र के भाजपा विधायक बावन सिंह से जोड़ा जा रहा है। इसी प्रकार झांसी में 11 से 13 दिसंबर तक हनुमंत कथा प्रस्तावित है। यहाँ भाजपा विधायक रवि शर्मा की भूमिका अधिक स्पष्ट है। उन्होंने अक्टूबर के प्रारंभ में बाकायदा कार्यक्रम की घोषणा की थी। उन्होंने कहा था कि आयोजन का उद्देश्य लोगों की सुख-समृद्धि की कामना के साथ सनातन संस्कृति तथा सामाजिक एकता का संदेश देना है। झांसी में इससे पहले 4 से 10 दिसंबर तक पंडित प्रदीप मिश्रा की शिव महापुराण कथा भी प्रस्तावित है।

लखनऊ में 17 से 21 दिसंबर और आगरा में 23 से 25 दिसंबर के बीच धीरेंद्र शास्त्री के कार्यक्रम प्रस्तावित बताए गए हैं। अंबेडकरनगर का भी प्रस्तावित आयोजनों में उल्लेख हुआ है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भूमिका और उनका रुख

इस पूरे प्रकरण में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का उल्लेख सावधानी से करना आवश्यक है। 27 अक्टूबर, 2026 के आसपास झांसी सदर के विधायक रवि शर्मा ने अपनी पत्नी सुनीता शर्मा के साथ लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की। उन्होंने दिसंबर में झांसी में प्रस्तावित शिव महापुराण तथा धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की हनुमंत कथा में मुख्यमंत्री को आमंत्रित किया।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि योगी आदित्यनाथ स्वयं धार्मिक संस्था गोरक्षपीठ के महंत हैं। मुख्यमंत्री और एक बड़े धार्मिक पीठ के प्रमुख के रूप में उनकी दोहरी सार्वजनिक भूमिका है। इस कारण उत्तर प्रदेश में धार्मिक आयोजनों तथा राजनीतिक शक्ति के संबंधों को लेकर होने वाली चर्चाओं में उनका नाम स्वाभाविक रूप से आता है। लेकिन संस्थागत निकटता, व्यक्तिगत धार्मिक आस्था और किसी कथावाचक के विशिष्ट बयान का समर्थन एक समान नहीं हैं।

अखिलेश ने आयोजकों को भी क्यों घेरा?

5 नवंबर को अखिलेश यादव ने अपना विरोध केवल धीरेंद्र शास्त्री तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने ऐसे कथावाचकों को आमंत्रित करने वाले आयोजकों और प्रायोजकों की जिम्मेदारी पर सवाल उठाया। उनका तर्क था कि विवादित बयान देने वाला व्यक्ति कार्यक्रम समाप्त होने के बाद चला जाएगा। लेकिन आयोजन करने वाले नेताओं को उसी समाज में रहना है, जहाँ उन बयानों पर नाराजगी पैदा हुई है। उन्होंने आशंका जताई कि जनता कथावाचक के बयानों को आयोजकों की मौन सहमति भी मान सकती है।

इस वक्तव्य का राजनीतिक महत्व है। यह पहली बार नहीं है जब समाजवादी पार्टी ने किसी धार्मिक व्यक्तित्व या आयोजन की आलोचना की हो। लेकिन इस बार अखिलेश यादव ने धार्मिक भावनाओं को आहत करने का आरोप लगाते हुए आयोजकों की राजनीतिक जवाबदेही को भी सामने रखा है। इसका सीधा संबंध कुंडा के राजा भैया तथा गोंडा और झांसी के उन जनप्रतिनिधियों से जुड़ता है जिनके नाम प्रस्तावित कथाओं में सामने आए हैं। हालांकि अखिलेश की चेतावनी को जनता की वास्तविक प्रतिक्रिया का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

धार्मिक मंच से राष्ट्रीय पहचान तक: कैसे हुआ धीरेंद्र शास्त्री का उत्थान?

धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का उदय भारतीय धार्मिक जगत में पिछले कुछ वर्षों के सबसे चर्चित घटनाक्रमों में शामिल है। मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के गढ़ा गाँव स्थित बागेश्वर धाम से उनकी पहचान बनी। उन्होंने पारिवारिक धार्मिक परंपरा और हनुमान भक्ति से जुड़े आयोजन को बड़े सार्वजनिक मंच में परिवर्तित किया। उनके कार्यक्रमों में एक विशेष आकर्षण 'दिव्य दरबार' रहा, जहाँ वह श्रद्धालुओं की समस्याएँ पूछने से पहले ही उन्हें जान लेने तथा समाधान बताने के दावे करते रहे हैं।

उनकी लोकप्रियता के विस्तार में तीन चीजों की विशेष भूमिका दिखाई देती है। पहली, धार्मिक कथा की परंपरागत शैली से अलग प्रभावशाली मंचीय प्रस्तुति। दूसरी, समस्याओं के समाधान और 'पर्ची' की कथित अलौकिक प्रक्रिया। और तीसरी, टेलीविजन तथा सोशल मीडिया के माध्यम से इन आयोजनों का व्यापक प्रचार। उनके अनुयायी इन प्रक्रियाओं को आस्था से जोड़ते हैं, जबकि तर्कवादी संगठन चमत्कार संबंधी दावों के स्वतंत्र वैज्ञानिक प्रमाण की मांग करते रहे हैं। उनके कथित अलौकिक दावों को प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता।

जनवरी 2023 के आसपास नागपुर से जुड़ा विवाद उनके सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। महाराष्ट्र के तर्कवादी कार्यकर्ता श्याम मानव और अंधश्रद्धा निर्मूलन से जुड़े लोगों ने शास्त्री के दावों पर प्रश्न उठाए। नागपुर में उनके कार्यक्रम की अवधि को लेकर भी विवाद हुआ। शास्त्री तथा उनके समर्थकों ने आरोपों का खंडन किया। इस प्रकरण ने उन्हें स्थानीय धार्मिक प्रसिद्धि से राष्ट्रीय चर्चा तक पहुँचा दिया। यह कहना अधिक सही होगा कि विवाद ने उनकी पहचान का विस्तार किया। उनके कथित चमत्कारों की वैज्ञानिक पुष्टि नहीं की।

इसके बाद छतरपुर, रायपुर, पटना और अन्य शहरों के आयोजनों ने उनकी प्रसिद्धि को बढ़ाया। उनके मंच पर बड़े राजनेता दिखाई देने लगे और धार्मिक प्रवचनों में हिंदू राष्ट्र, धर्मांतरण, घरवापसी तथा सांस्कृतिक पहचान जैसे विषय प्रमुख होने लगे। 2023 में मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार ने उन्हें 'वाई श्रेणी' की सुरक्षा भी उपलब्ध कराई। इस प्रकार वह धार्मिक कथा से आगे बढ़कर सामाजिक और वैचारिक बहस में सक्रिय सार्वजनिक व्यक्तित्व बन गए।

उनके बढ़ते कद का एक महत्वपूर्ण उदाहरण 23 फरवरी, 2025 का कार्यक्रम था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी छतरपुर स्थित बागेश्वर धाम पहुँचे और वहाँ प्रस्तावित बागेश्वर धाम मेडिकल एंड साइंस रिसर्च इंस्टीट्यूट की आधारशिला रखी। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में धीरेंद्र शास्त्री को 'छोटा भाई' कहा। किसी धार्मिक संस्थान के कार्यक्रम में प्रधानमंत्री की उपस्थिति और इतने बड़े स्वास्थ्य परियोजना की आधारशिला ने बागेश्वर धाम की राष्ट्रीय दृश्यता को नया आयाम दिया। यह शास्त्री के सार्वजनिक प्रभाव के विस्तार का महत्वपूर्ण प्रमाण है। लेकिन इससे उनके द्वारा समर्थित किसी राजनीतिक दल के लिए वोटों की संख्या निर्धारित नहीं की जा सकती।

जब चुनावी मैदान में उतरे नेताओं ने धीरेंद्र शास्त्री को अपने यहाँ बुलाया

धीरेंद्र शास्त्री के राजनीतिक प्रभाव को समझने के लिए 2023 के मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव, 2024 के लोकसभा चुनाव तथा 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव के पहले हुए आयोजनों का अध्ययन विशेष रूप से उपयोगी है। इन घटनाओं से एक दिलचस्प तथ्य सामने आता है। जिन नेताओं ने उन्हें अपने यहाँ आमंत्रित किया, उनके चुनावी परिणाम एक जैसे नहीं रहे। कुछ जीते, कुछ हारे और कुछ नेताओं के लिए उनकी कथा तथा चुनाव परिणाम के बीच कोई प्रत्यक्ष संबंध स्थापित नहीं किया जा सकता।

छिंदवाड़ा: कमलनाथ और नकुलनाथ की कथा, एक चुनाव में जीत और दूसरे में हार

धीरेंद्र शास्त्री की राजनीतिक पहुँच का महत्वपूर्ण उदाहरण मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ और उनके बेटे नकुलनाथ से जुड़ा है। अगस्त, 2023 में विधानसभा चुनाव से लगभग तीन महीने पहले छिंदवाड़ा के सिमरिया में 5 से 7 अगस्त के बीच रामकथा का आयोजन हुआ। मुख्य यजमान तत्कालीन कांग्रेस सांसद नकुलनाथ थे। कमलनाथ ने शास्त्री का स्वागत और आरती की। आयोजन के लिए विशाल पंडाल बनाया गया और बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुँचे। कमलनाथ ने शास्त्री के साथ अपने संबंध को हनुमानजी के प्रति आस्था से जुड़ा बताया।

राजनीतिक संदर्भ महत्वपूर्ण था। उस समय कमलनाथ मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष थे और भाजपा की हिंदुत्व केंद्रित राजनीति के जवाब में कांग्रेस की धार्मिक पहचान को भी सामने रख रहे थे। इस कथा को उनकी उसी रणनीति के संदर्भ में देखा गया। स्वयं शास्त्री ने कार्यक्रम के दौरान राजनीति से दूर रहने की बात कही थी।

अब परिणाम देखिए। नवंबर 2023 के विधानसभा चुनाव में छिंदवाड़ा सीट से कमलनाथ ने भाजपा के विवेक बंटी साहू को 36,594 वोटों से हराया। कमलनाथ को 1,32,302 और साहू को 95,708 वोट मिले। लेकिन मध्य प्रदेश में कांग्रेस सत्ता हासिल नहीं कर सकी। भाजपा ने 230 में से 163 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस को 66 सीटें मिलीं।

इसके बाद अप्रैल 2024 में छिंदवाड़ा लोकसभा सीट पर मतदान हुआ। अगस्त 2023 में शास्त्री की कथा के मुख्य यजमान रहे नकुलनाथ भाजपा के विवेक बंटी साहू से 1,13,618 वोटों से हार गए। इस चुनाव में साहू को 6,44,738 और नकुलनाथ को 5,31,120 वोट मिले। इस प्रकार एक ही राजनीतिक परिवार से जुड़े आयोजन के बाद पिता ने विधानसभा चुनाव जीता, जबकि बेटे को लोकसभा चुनाव में पराजय मिली। यह उदाहरण बताता है कि कथा आयोजित कराने और चुनाव जीतने के बीच कोई निश्चित संबंध स्थापित नहीं किया जा सकता।

राघौगढ़: जयवर्धन सिंह से संपर्क और 2023 की जीत

मध्य प्रदेश के राघौगढ़ क्षेत्र में भी धीरेंद्र शास्त्री का आयोजन हुआ था। यह विधानसभा क्षेत्र पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के परिवार से जुड़ा है। कांग्रेस नेता जयवर्धन सिंह के क्षेत्र में शास्त्री का आतिथ्य किए जाने का उल्लेख 2023 की समकालीन राजनीतिक रिपोर्टों में मिलता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि कांग्रेस के कुछ नेताओं ने भी उनकी लोकप्रियता और धार्मिक पहुँच को महत्व दिया। हालांकि उपलब्ध रिपोर्टों से यह निर्णायक रूप से स्थापित नहीं होता कि आयोजन के सभी वित्तीय खर्चों के मुख्य यजमान व्यक्तिगत रूप से जयवर्धन सिंह ही थे।

नवंबर 2023 के विधानसभा चुनाव में जयवर्धन सिंह ने राघौगढ़ सीट पर भाजपा के हीरेंद्र सिंह बंटी पीलाघाटा को 4,505 वोटों से हराया। जयवर्धन को 95,738 और उनके प्रतिद्वंद्वी को 91,233 वोट मिले। यहाँ कांग्रेस उम्मीदवार की जीत हुई। लेकिन उसे शास्त्री के आयोजन का प्रमाणित चुनावी परिणाम कहना संभव नहीं है।

छतरपुर: जिन आलोक चतुर्वेदी को प्रारंभिक संरक्षक बताया गया, वे चुनाव हार गए

धीरेंद्र शास्त्री के उदय की चर्चा छतरपुर के कांग्रेस नेता और पूर्व विधायक आलोक चतुर्वेदी 'पज्जन भैया' के बिना अधूरी रहेगी। राजनीतिक रिपोर्टों में चतुर्वेदी को शास्त्री के प्रारंभिक प्रभावशाली संरक्षकों में गिना गया है। उनकी भूमिका धार्मिक आयोजन और राजनीतिक संपर्कों के विस्तार से संबंधित बताई गई है। हालांकि इस संबंध का अर्थ हर कार्यक्रम का मुख्य यजमान होना नहीं है।

2023 के विधानसभा चुनाव में आलोक चतुर्वेदी छतरपुर सीट से कांग्रेस प्रत्याशी थे। उन्हें भाजपा की ललिता यादव ने 6,967 वोटों से पराजित किया। ललिता यादव को 77,687 तथा आलोक चतुर्वेदी को 70,720 वोट मिले। शास्त्री से शुरुआती राजनीतिक निकटता रखने वाले एक नेता की यह चुनावी पराजय भी धार्मिक संपर्क और चुनावी सफलता के बीच सीमित संबंध को रेखांकित करती है।

दतिया: नरोट्टम मिश्रा की निकटता और चुनावी हार

मध्य प्रदेश के तत्कालीन गृह मंत्री डॉ. नरोट्टम मिश्रा भी धीरेंद्र शास्त्री के प्रमुख राजनीतिक समर्थकों में गिने जाते थे। वह बागेश्वर धाम के आयोजनों में शामिल होते रहे और शास्त्री के समर्थन में सार्वजनिक रूप से बोलते रहे। उनके साथ शास्त्री के संबंध का उल्लेख 2023 और 2025 की राजनीतिक रिपोर्टों में मिलता है।

लेकिन नवंबर 2023 में दतिया विधानसभा सीट से नरोट्टम मिश्रा चुनाव हार गए। कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने उन्हें 7,742 मतों से पराजित किया। राजेंद्र भारती को 88,977 और मिश्रा को 81,235 वोट मिले। यह उदाहरण सीधे चुनाव लड़ने वाले एक ऐसे नेता का है जिसकी शास्त्री से सार्वजनिक निकटता दर्ज है। फिर भी निकटता को कथा के मुख्य यजमान की भूमिका के बराबर नहीं माना जा सकता।

छत्तीसगढ़: रमन सिंह जीते, प्रबल प्रताप सिंह जूदेव हारे

जनवरी 2023 में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में धीरेंद्र शास्त्री का दिव्य दरबार और धार्मिक आयोजन हुआ था। उस समय राज्य में कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार थी। पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता डॉ. रमन सिंह कार्यक्रम में पहुँचे। शास्त्री के धर्मांतरण विरोधी विचार भी राज्य की राजनीतिक बहस में चर्चा का विषय बने। बाद में नवंबर 2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने छत्तीसगढ़ में सरकार बनाई। रमन सिंह स्वयं राजनांदगाँव विधानसभा क्षेत्र से 45,084 वोटों के अंतर से जीते। लेकिन इस व्यापक परिणाम का श्रेय किसी एक कथावाचक या आयोजन को देना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।

छत्तीसगढ़ में भाजपा नेता प्रबल प्रताप सिंह जूदेव का नाम भी शास्त्री को कथा के लिए आमंत्रित करने के प्रयास से जुड़ा था। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था कि शास्त्री के धार्मिक और राजनीतिक विचार उनके विचारों के अनुरूप हैं। लेकिन उपलब्ध साक्ष्यों में उनके यहाँ प्रस्तावित कथा वास्तव में संपन्न होने की स्वतंत्र पुष्टि स्पष्ट नहीं है। नवंबर 2023 के विधानसभा चुनाव में जूदेव कोटा सीट से कांग्रेस के अटल श्रीवास्तव से 7,957 वोटों से हार गए। इसलिए उनका उदाहरण राजनीतिक आमंत्रण और चुनाव परिणाम का है, सत्यापित सम्पन्न कथा और उसके मुख्य यजमान का नहीं।

बिहार में धीरेंद्र शास्त्री: 2023 से 2025 तक

बिहार में धीरेंद्र शास्त्री की पहली बड़ी राजनीतिक चर्चा मई 2023 में पटना के नौबतपुर में आयोजित पाँच दिवसीय हनुमंत कथा के दौरान हुई। 13 से 17 मई तक चले आयोजन से पहले भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने उनका स्वागत किया। इनमें गिरिराज सिंह, मनोज तिवारी और अन्य नेता शामिल थे। आयोजन समिति के अध्यक्ष कृष्ण कुमार सारस्वत थे। भाजपा के अनेक नेता मंच या कार्यक्रम में उपस्थित हुए।

तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शास्त्री की हिंदू राष्ट्र संबंधी मांग पर सवाल उठाए। राष्ट्रीय जनता दल के नेताओं ने भी विरोध किया। शास्त्री ने बिहार में हिंदू राष्ट्र की अवधारणा पर अपने विचार व्यक्त किए। इस आयोजन का राजनीतिक महत्व था। लेकिन यह किसी एक विधानसभा प्रत्याशी के लिए चुनाव के दौरान आयोजित कथा नहीं थी। मई। 2023 और बिहार के अगले विधानसभा चुनाव के बीच लगभग ढाई वर्ष का अंतर था। इसलिए नौबतपुर की भीड़ को किसी प्रत्याशी की जीत या हार से सीधे जोड़ना संभव नहीं है।

मार्च, 2025 में बिहार विधानसभा चुनाव से पहले धीरेंद्र शास्त्री फिर गोपालगंज पहुँचे। 6 से 10 मार्च के बीच रामनगर मठ में हनुमंत कथा आयोजित की गई। यहाँ उन्होंने कहा कि वह किसी दल के प्रचारक नहीं। बल्कि हिंदुत्व की विचारधारा से जुड़े हैं। उनकी टिप्पणियों पर राजद तथा भाजपा नेताओं के बीच बहस हुई। आयोजन में भारी भीड़ के कारण अव्यवस्था की खबरें भी आईं और कथा के एक चरण को रोकना पड़ा।

गोपालगंज का उदाहरण भी बताता है कि चुनावी वर्ष में शास्त्री के आयोजन राजनीतिक चर्चा को जन्म दे सकते हैं। लेकिन उपलब्ध प्रमाण किसी विशिष्ट प्रत्याशी के मुख्य यजमान होने और उसके बाद प्राप्त चुनावी परिणाम का भरोसेमंद सीधा संबंध स्थापित नहीं करते।

जिन नेताओं का नाम सामने आया, उनकी जीत-हार का वास्तविक हिसाब

अब तक जाँचे गए प्रमुख मामलों को एक साथ देखने पर तस्वीर यह बनती है कि अगस्त 2023 में शास्त्री की कथा के आयोजक परिवार से कमलनाथ नवंबर में विधानसभा चुनाव जीते। लेकिन मुख्य यजमान नकुलनाथ अगले वर्ष लोकसभा चुनाव हार गए। राघौगढ़ में शास्त्री का आतिथ्य करने वाले राजनीतिक परिवार से जुड़े जयवर्धन सिंह विधानसभा चुनाव जीते। छतरपुर में उनके प्रारंभिक संरक्षक बताए गए आलोक चतुर्वेदी हार गए। दतिया में सार्वजनिक समर्थक नरोट्टम मिश्रा हार गए। छत्तीसगढ़ में कार्यक्रम में शामिल रमन सिंह जीते, जबकि शास्त्री को आमंत्रित करने की इच्छा व्यक्त करने वाले प्रबल प्रताप सिंह जूदेव हार गए।

यह कुल छह राजनीतिक नामों का अध्ययन है, न कि सभी कथाओं के मुख्य यजमानों की प्रमाणित सूची। इनमें कमलनाथ–नकुलनाथ का आयोजन स्पष्ट रूप से सत्यापित है। बाकी मामलों में कहीं आतिथ्य, कहीं राजनीतिक संरक्षण, कहीं कार्यक्रम में उपस्थिति और कहीं आयोजन का प्रस्ताव दर्ज है। सभी को एक समान श्रेणी में रखकर जीत-हार का प्रतिशत निकालना भ्रामक होगा।

इतना अवश्य स्पष्ट होता है कि शास्त्री के धार्मिक प्रभाव से चुनावी सफलता की गारंटी नहीं मिलती। राजनीतिक परिणामों पर संगठन, उम्मीदवार की स्वीकार्यता, सामाजिक समीकरण, सरकारी योजनाएँ, स्थानीय नाराजगी, गठबंधन और चुनाव के व्यापक वातावरण जैसे अनेक कारक प्रभाव डालते हैं। किसी कथा में एकत्र लोगों की संख्या को उसी क्षेत्र में किसी पार्टी के मतदाताओं की संख्या नहीं माना जा सकता।

शास्त्री की राजनीति: किसी एक पार्टी तक सीमित नहीं

धीरेंद्र शास्त्री की सार्वजनिक यात्रा का एक उल्लेखनीय पहलू उनके और राजनीतिक दलों के बीच संबंधों की जटिलता है। उन्हें प्रायः भाजपा के निकट माना जाता है। उनकी हिंदू राष्ट्र संबंधी मांग तथा धर्मांतरण विरोधी अभियान भाजपा के कई नेताओं के वैचारिक रुख से मेल खाते हैं। लेकिन 2023 के मध्य प्रदेश चुनाव के पहले कांग्रेस के कमलनाथ ने उन्हें अपने क्षेत्र में आमंत्रित किया। कांग्रेस के ही जयवर्धन सिंह के क्षेत्र में उनका आतिथ्य हुआ। छतरपुर के कांग्रेस नेता आलोक चतुर्वेदी का नाम उनके प्रारंभिक संरक्षकों में आता है।

दूसरी ओर भाजपा के शिवराज सिंह चौहान, नरोट्टम मिश्रा, रमन सिंह और बिहार के कई नेताओं के साथ उनके सार्वजनिक संपर्क रहे हैं। फरवरी 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बागेश्वर धाम पहुँचना उनके बढ़ते राष्ट्रीय महत्व का संकेत था। अब नवंबर 2026 में कुंडा में राजा भैया उनकी कथा आयोजित करा रहे हैं, जो स्वयं एक अलग क्षेत्रीय राजनीतिक दल के अध्यक्ष हैं।

इस प्रकार शास्त्री की धार्मिक लोकप्रियता का राजनीतिक उपयोग विभिन्न दलों के नेताओं ने अलग-अलग परिस्थितियों में करने का प्रयास किया है। इसका अर्थ यह नहीं कि वे उन सभी दलों के राजनीतिक सहयोगी रहे हैं। किसी नेता का कथा आयोजित करना धार्मिक आस्था, सामाजिक संपर्क, स्थानीय प्रतिष्ठा या चुनावी रणनीति से जुड़ा हो सकता है। प्रत्येक मामले में इन उद्देश्यों के प्रमाण अलग-अलग देखने होंगे।

धार्मिक लोकप्रियता के साथ विवादों का विस्तार

धीरेंद्र शास्त्री के सार्वजनिक जीवन में लोकप्रियता जितनी तेजी से बढ़ी है, विवाद भी उतनी ही नियमितता से सामने आए हैं। नागपुर में उनके चमत्कार संबंधी दावों पर प्रश्न उठे। धर्मांतरण तथा हिंदू राष्ट्र के उनके विचारों पर वैचारिक विरोध हुआ। महिलाओं और सामाजिक समुदायों से जुड़ी कुछ टिप्पणियों पर भी उन्हें आलोचना का सामना करना पड़ा। नवंबर, 2026 का राम-कृष्ण विवाद इसलिए विशेष महत्व रखता है क्योंकि इसमें विरोध केवल राजनीतिक विपक्ष तक सीमित नहीं रहा। बल्कि धार्मिक परंपरा के भीतर से भी प्रतिक्रियाएँ सामने आईं।

अयोध्या के संत समाज में भी एक समान राय नहीं रही। दिवाकराचार्य महाराज ने उनकी टिप्पणी की आलोचना करते हुए इसे हिंदू समाज की एकता के विरुद्ध बताया, जबकि संत सीताराम दास ने इसे धार्मिक भाव और लीला के संदर्भ में समझने की बात कही। यह मतभेद बताता है कि शास्त्री के बयान पर धार्मिक समाज के भीतर एक से अधिक व्याख्याएँ मौजूद हैं।

उनके आलोचक धार्मिक अभिव्यक्ति में संयम और सामाजिक जिम्मेदारी की मांग करते हैं। समर्थक कहते हैं कि कथा के विनोद, उलाहना और भक्तिभाव को छोटे वीडियो के आधार पर गलत समझा गया। शास्त्री स्वयं इस विवाद में माफी मांग चुके हैं। इसलिए यह कहना कि पूरा संत समाज उनके विरुद्ध हो गया है, उपलब्ध तथ्यों से समर्थित नहीं है।

क्या यह धीरेंद्र शास्त्री के पतन की शुरुआत है?

धीरेंद्र शास्त्री की यात्रा को 'उत्थान और पतन' की कहानी के रूप में देखना आकर्षक हो सकता है। लेकिन उपलब्ध साक्ष्य अभी उनके सार्वजनिक प्रभाव में निर्णायक गिरावट स्थापित नहीं करते। एक ओर उनके विरुद्ध राजनीतिक और धार्मिक आलोचना बढ़ी है, दूसरी ओर नवंबर-दिसंबर में उत्तर प्रदेश के अनेक कार्यक्रम प्रस्तावित हैं और राजनीतिक नेता उन्हें आमंत्रित कर रहे हैं। आलोचना का विस्तार और लोकप्रियता का वास्तविक क्षरण अलग-अलग बातें हैं।

उनके सार्वजनिक जीवन में परिवर्तन को तीन चरणों में समझा जा सकता है। प्रारंभिक चरण में उनकी पहचान मुख्यतः स्थानीय धार्मिक पीठ, हनुमान भक्ति और दिव्य दरबार से बनी। दूसरे चरण में 2023 के बाद राष्ट्रीय मीडिया, बड़े धार्मिक आयोजन और राजनीतिक नेताओं के संपर्क से उनका प्रभाव बढ़ा। तीसरे चरण में उनकी धार्मिक लोकप्रियता के साथ सार्वजनिक बयानों की जवाबदेही, वैचारिक विवाद और राजनीतिक प्रतिरोध भी बढ़ने लगे।

नवंबर 2026 के घटनाक्रम से तीसरे चरण की जटिलता अधिक स्पष्ट हुई है। अब उनके शब्दों पर केवल राजनीतिक विरोधी ही नहीं, धार्मिक आचार्य और श्रद्धालु समुदाय भी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। ऐसे में भविष्य में उनकी लोकप्रियता, आयोजनों की संख्या या जनता के भरोसे पर क्या असर पड़ेगा, इसके लिए समय के साथ स्वतंत्र प्रमाणों की आवश्यकता होगी।

क्या 2027 में कथाओं की भीड़ वोट में बदल सकती है?

उत्तर प्रदेश के 2027 विधानसभा चुनाव के संदर्भ में धीरेंद्र शास्त्री की कथाओं का प्रश्न केवल धार्मिक नहीं। बल्कि सामाजिक संपर्क और सार्वजनिक विमर्श का भी है। कार्यक्रमों में हजारों लोगों का आना स्थानीय आयोजकों को व्यापक दृश्यता दे सकता है। कथा के आयोजन में स्थानीय कार्यकर्ता, सामाजिक संगठन, व्यापारी और धार्मिक संस्थाएँ शामिल हो सकती हैं। इससे राजनीतिक नेताओं की सार्वजनिक पहचान और संपर्कों में वृद्धि संभव है।

लेकिन तीन सीमाएँ समझना आवश्यक है। पहली, धार्मिक आयोजन में हिस्सा लेने वाला व्यक्ति आवश्यक नहीं कि आयोजक नेता का समर्थक भी हो। दूसरी, एक ही कथा में विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक पृष्ठभूमियों के लोग उपस्थित हो सकते हैं। तीसरी, चुनाव में मतदान का निर्णय कथा के अतिरिक्त अनेक स्थानीय और राष्ट्रीय मुद्दों से प्रभावित होता है।

उत्तर प्रदेश में धीरेंद्र शास्त्री की प्रस्तावित कथाओं को लेकर भी दो अलग राजनीतिक तर्क सामने हैं। भाजपा से जुड़े कुछ जनप्रतिनिधि इन आयोजनों को सनातन संस्कृति और सामाजिक एकता के कार्यक्रम बता रहे हैं। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने विवादित टिप्पणियों और सामाजिक सौहार्द के आधार पर इन आयोजनों पर आपत्ति की है। दोनों पक्षों की सार्वजनिक स्थिति दर्ज है। लेकिन यह निर्धारित करने के लिए कि इन कथाओं से किस दल को कितने वोट मिलेंगे, अभी कोई विश्वसनीय माप उपलब्ध नहीं है।

इसलिए 2027 का वास्तविक सवाल यह नहीं है कि धीरेंद्र शास्त्री किसे चुनाव जिता सकते हैं। ज्यादा सार्थक सवाल यह है कि धार्मिक आयोजनों का राजनीतिक इस्तेमाल किस हद तक होता है, राजनीतिक दल सार्वजनिक धर्म और सामाजिक पहचान के सवालों का कैसे जवाब देते हैं और मतदाता धार्मिक श्रद्धा तथा चुनावी प्रतिनिधित्व के बीच कितना अंतर करते हैं।

कथा का मंच, राजनीतिक संपर्क और लोकतंत्र की कसौटी

धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की सार्वजनिक यात्रा भारतीय समाज में धर्म, मीडिया और राजनीति के बदलते संबंधों की एक महत्वपूर्ण मिसाल है। मध्य प्रदेश के एक स्थानीय धार्मिक केंद्र से उन्होंने व्यापक राष्ट्रीय पहचान बनाई। लाखों लोगों तक पहुँचने वाले आयोजनों ने उन्हें ऐसा सार्वजनिक मंच दिया, जहाँ धार्मिक कथाओं के साथ राष्ट्र, संस्कृति, जाति, धर्मांतरण और राजनीति के प्रश्न भी उठने लगे। विभिन्न दलों के नेताओं ने उनकी लोकप्रियता को महत्व दिया, लेकिन उनके निकट रहे राजनीतिक व्यक्तियों की जीत और हार दोनों के उदाहरण सामने हैं।

नवंबर 2026 का राम-कृष्ण विवाद इस यात्रा में एक नया अध्याय है। अखिलेश यादव ने शास्त्री के बयानों के साथ उनके आयोजकों की जिम्मेदारी का प्रश्न उठाया है। राजा भैया अपने क्षेत्र में उनकी कथा आयोजित करा रहे हैं। भाजपा विधायक रवि शर्मा ने झांसी की कथा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को आमंत्रित किया है। धार्मिक समाज के भीतर भी इस विवाद पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ हैं। इन सबके बीच धीरेंद्र शास्त्री अपनी टिप्पणी के लिए क्षमा मांग चुके हैं।

इन घटनाओं के आधार पर यह कहना न तो प्रमाणित होगा कि उनका धार्मिक प्रभाव समाप्त हो रहा है और न ही यह कि उनकी कथाएँ किसी पार्टी की चुनावी सफलता सुनिश्चित कर सकती हैं। फिलहाल इतना निश्चित है कि धार्मिक कथा के मंच और चुनावी राजनीति के बीच बढ़ते संपर्क ने धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री को उत्तर प्रदेश की राजनीतिक बहस का एक महत्वपूर्ण विषय बना दिया है।

इस कहानी का केंद्रीय तथ्य यही है कि कथा में जुटी भीड़ लोकप्रियता का संकेत हो सकती है। लेकिन चुनावी जनादेश का विकल्प नहीं। और धार्मिक प्रभाव कितना भी व्यापक क्यों न हो, सार्वजनिक जीवन में दिए गए कथनों पर सवाल उठने तथा उनका उत्तर देने की जिम्मेदारी बनी रहती है।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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