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आज अकेला हूं, कल काफिला होगा... 4 साल बाद सच हुई बात, दीपांशु ने कैसे तोड़ा 72 साल का रिकॉर्ड?
Dipanshu Shaukeen DUSU Victory: 2022 में फ्रेशर्स पार्टी में कहा था, “आज अकेला चल रहा हूं, एक दिन पीछे काफिला होगा।” चार साल बाद दीपांशु शौकीन ने डूसू उपाध्यक्ष का चुनाव निर्दलीय जीतकर 72 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया।
Image Source- Social Media
Dipanshu Shaukeen DUSU Victory: साल 2022 की बात है। शहीद भगत सिंह कॉलेज इवनिंग (Shaheed Bhagat Singh College Evening) में फ्रेशर्स पार्टी चल रही थी। स्टेज पर एक फ्रेशर पहुंचा और उसने माइक संभालते हुए कहा, “आज अकेला चल रहा हूं, एक दिन पीछे काफिला होगा।”
उस लड़के के इस डायलॉग पर जमकर तालियां बजीं। उसका वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। लेकिन उस वक्त उस लड़के की कोई खास पहचान नहीं थी। वह कॉलेज का एक सामान्य फ्रेशर था। शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि कुछ साल बाद यही लड़का दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ यानी डूसू (DUSU) की राजनीति में एक ऐसा रिकॉर्ड बना देगा, जिसकी चर्चा लंबे समय तक होगी।
चार साल बाद 2026 में उसी लड़के ने अपनी कही बात को सच कर दिखाया। शहीद भगत सिंह कॉलेज के उस फ्रेशर दीपांशु शौकीन ने 19 सितंबर 2026 से दिल्ली यूनिवर्सिटी के उपाध्यक्ष यानी वाइस प्रेसिडेंट (Vice President) का पद संभाल लिया है। उनकी जीत इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीतकर 72 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया।
निर्दलीय लड़कर रचा इतिहास
दिल्ली यूनिवर्सिटी में छात्र राजनीति पर लंबे समय से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी एबीवीपी (ABVP) और कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई (NSUI) का दबदबा रहा है। ऐसे माहौल में दीपांशु शौकीन का निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर उपाध्यक्ष पद जीतना अपने आप में बड़ा घटनाक्रम है।
दीपांशु से पहले दिल्ली यूनिवर्सिटी में कोई भी निर्दलीय उम्मीदवार उपाध्यक्ष के पद पर चुनाव नहीं जीत पाया था। हालांकि अध्यक्ष पद पर राजीव गोस्वामी ने 1991 में और मनोज चौधरी ने 2009 में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत हासिल की थी।
इस बार उपाध्यक्ष पद पर दीपांशु शौकीन को कुल 30,615 वोट मिले। उनके मुकाबले दूसरे नंबर पर रहे एबीवीपी के ईशू मौर्य को 16,910 वोट मिले, जबकि एनएसयूआई के वीर चतरथ को सिर्फ 4,313 वोट मिले।
यानी दीपांशु ने दोनों प्रमुख छात्र संगठनों के उम्मीदवारों से काफी अंतर से जीत दर्ज की। अब सवाल यही है कि जिस दिल्ली यूनिवर्सिटी में एबीवीपी और एनएसयूआई का दबदबा माना जाता है, वहां एक निर्दलीय उम्मीदवार इतनी बड़ी जीत कैसे हासिल कर गया। इस कहानी के पीछे कई ऐसे फैक्टर हैं, जिन्होंने दीपांशु को दूसरे उम्मीदवारों से अलग पहचान दी।
चार साल की मेहनत और फिर बागी तेवर
दीपांशु शौकीन की कहानी अचानक शुरू नहीं हुई। वह फर्स्ट ईयर से ही कॉलेज की हर एक्टिविटी और खेलकूद में आगे रहते थे। इसी दौरान वह एनएसयूआई से जुड़ गए। लेकिन तभी कोरोना महामारी आ गई और डूसू चुनाव पर ब्रेक लग गया।
2019 के बाद सीधे 2023 में डूसू चुनाव हुआ। उस चुनाव में एनएसयूआई ने हितेश गुलिया को अध्यक्ष पद का उम्मीदवार बनाया। दीपांशु ने उनके लिए जमकर कैंपेन किया। हालांकि चुनावी नतीजे उनके पक्ष में नहीं आए।
इसके बाद 2024 में दीपांशु ने रौनक खत्री के साथ कंधे से कंधा मिलाकर प्रचार किया। इस बार नतीजे उनके पक्ष में रहे और इसी दौरान छात्रों के बीच दीपांशु की अपनी पहचान भी मजबूत होती चली गई।
उस वक्त तक दीपांशु छात्रों के बीच अपनी जगह बना चुके थे। इसी दौरान वह बुद्धिस्ट स्टडीज (Buddhist Studies) में पोस्ट ग्रेजुएशन यानी पीजी (PG) भी कर रहे थे।
टिकट नहीं मिला तो बदल गई कहानी
साल 2025 में दीपांशु ने एनएसयूआई से टिकट मांगा, लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिला। उन्हें उम्र और फाइनेंस फैक्टर का हवाला देकर पीछे कर दिया गया। 2026 में उन्होंने एक बार फिर टिकट के लिए दावेदारी की। लेकिन इस बार भी एनएसयूआई ने उन्हें टिकट नहीं दिया।
एक पॉडकास्ट में दीपांशु ने आरोप लगाया कि टिकट कमेटी की ओर से उनसे कहा जाता था कि उनके साथ गाड़ियां दिखाई नहीं दे रही हैं और वह पैसा खर्च करके चुनावी माहौल नहीं बना रहे हैं।
यहीं से पूरी कहानी ने करवट ली। परिवार और दोस्तों ने उन्हें समझाया और इसके बाद दीपांशु ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया।
दिलचस्प बात यह रही कि उनके समर्थन में एनएसयूआई से जुड़े कई छात्र और उनके पुराने समर्थक भी दिखाई देने लगे। यानी जिस संगठन से टिकट नहीं मिला, उसी से जुड़े कुछ पुराने साथी उनके साथ खड़े नजर आए।
दीपांशु ने भी यूनिवर्सिटी में किए अपने पुराने कामों को छात्रों के बीच याद दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। रौनक खत्री भले ही एनएसयूआई के लिए प्रचार कर रहे थे, लेकिन दीपांशु ने उनके साथ रहते हुए किए गए कामों को सोशल मीडिया पर समय-समय पर सामने रखा।
रौनक के वीडियो वाली अंतिमा भी दीपांशु के साथ
इस कहानी में एक दिलचस्प ट्विस्ट भी देखने को मिला। करोड़ीमल कॉलेज की जिस अंतिमा बहन के लिए वोट मांगने वाला वीडियो बनाकर रौनक खत्री सोशल मीडिया पर वायरल हुए थे, वही अंतिमा भी बाद में दीपांशु के समर्थन में दिखाई दीं।
यानी दीपांशु का चुनावी अभियान सिर्फ उनके अपने पुराने समर्थकों तक सीमित नहीं रहा। उनके साथ ऐसे छात्र और चेहरे भी जुड़ते गए, जो पहले अलग-अलग छात्र राजनीति के हिस्से में नजर आते थे।
बस कंडक्टर के बेटे की आम आदमी वाली छवि
दीपांशु शौकीन की एक बड़ी पहचान उनकी आम आदमी वाली छवि भी रही। दिल्ली के पीरागढ़ी में रहने वाले दीपांशु का परिवार बेहद साधारण है।
उनके पिता दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन यानी डीटीसी (DTC) में बस कंडक्टर हैं, जबकि उनकी मां आंगनवाड़ी में काम करती हैं। परिवार में न कोई राजनीतिक रसूख था और न ही पैसे की ताकत। यही बात दीपांशु को डूसू की उस छवि से अलग करती थी, जहां छात्र संघ चुनावों में पैसे और पावर के इस्तेमाल की चर्चा अक्सर होती रही है।
जिस चुनाव में बड़े नाम, बड़े संगठन और बड़े खर्च की चर्चा होती है, उसी चुनाव में एक बस कंडक्टर का बेटा बिना किसी बड़े संगठन के टिकट के मैदान में उतर गया।
दीपांशु ने खुद को आम छात्रों से जोड़ते हुए कहा कि डिफेंडर से आने वाले छात्र नेता मेट्रो, बस और ई-रिक्शा से आने वाले छात्रों की परेशानियां नहीं समझ सकते।
हालांकि उनके प्रचार अभियान में महंगी गाड़ियां भी दिखाई दीं। जब इस पर सवाल हुआ तो दीपांशु ने जवाब दिया कि वे गाड़ियां उनके दोस्तों की हैं। उनका कहना था कि जब जो गाड़ी आ जाती है, उसी में वह चले जाते हैं। उनके मुताबिक कुछ देर में प्रचार के लिए निकलना होता है, लेकिन पहले से यह पता नहीं होता कि कौन सी गाड़ी आएगी।
सत्य निकेतन हादसा और नंगे पैर प्रचार
दीपांशु की चुनावी रणनीति में सत्य निकेतन का हादसा भी एक अहम मोड़ बना। डूसू चुनाव का प्रचार जोरों पर था। इसी दौरान 6 सितंबर को सत्य निकेतन में पीजी और हॉस्टल की एक बिल्डिंग गिर गई। इस हादसे में सात लोगों की जान चली गई।
साउथ कैंपस के पास हुए इस हादसे के बाद कई छात्र नेता मौके पर पहुंचे। उस वक्त टिकटों का बंटवारा नहीं हुआ था। इसलिए दीपांशु और रौनक खत्री भी वहां रेस्क्यू और मलबा हटाने के काम में एक साथ नजर आए।
लेकिन निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरने के बाद दीपांशु ने अपने दोस्त मटका मैन के नाम से चर्चित रौनक खत्री की तरह ही कुछ अलग करने का फैसला किया।
12 सितंबर को मतदान से कुछ दिन पहले दीपांशु दोबारा सत्य निकेतन पहुंचे। इस बार उनके हाथ में मलबा हटाने का औजार नहीं, बल्कि कैमरा था। उन्होंने घटनास्थल से वीडियो बनाया और कहा कि पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए वह सत्याग्रह शुरू कर रहे हैं।
दीपांशु ने ऐलान किया कि जब तक पीड़ितों को न्याय नहीं मिलता, तब तक वह जूते और चप्पल नहीं पहनेंगे। इसका मतलब यह था कि चुनावी प्रचार जारी रहेगा, लेकिन वह नंगे पैर प्रचार करेंगे।
इसके बाद चुनाव खत्म होने तक दीपांशु नंगे पैर ही प्रचार करते रहे। दिन-रात प्रचार के लिए घूमने की वजह से उनके पैरों में छाले पड़ गए। दर्द हुआ और पैरों पर पट्टियां भी बांधी गईं, लेकिन प्रचार नहीं रुका। यानी कैमरे के सामने जिस सत्याग्रह का ऐलान किया गया था, उसे उन्होंने चुनाव खत्म होने तक निभाया।
जीत के बाद भी अधूरा है सत्याग्रह
अब दीपांशु चुनाव जीत चुके हैं। ऐसे में उनके सामने उस वादे को निभाने की चुनौती है, जो उन्होंने चुनाव जीतने से पहले छात्रों के सामने किया था। एक इंटरव्यू में दीपांशु ने कहा था कि चुनाव जीतने के बाद डूसू ऑफिस जाने से पहले वह वाइस चांसलर ऑफिस के सामने धरने पर बैठेंगे।
उनका कहना था कि बाकी लोग सत्य निकेतन हादसे को भूल गए हैं, लेकिन वह पीड़ितों को न्याय दिलाने की मांग से पीछे नहीं हटेंगे।
यानी जिस मुद्दे को लेकर उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान नंगे पैर चलने का फैसला किया था, अब उसी मुद्दे को लेकर उनकी अगली लड़ाई वाइस चांसलर ऑफिस के सामने धरने से शुरू होने की बात कही गई है।
दिल्ली कनेक्शन भी आया काम
दीपांशु शौकीन की जीत के पीछे एक और फैक्टर दिल्ली से उनका जुड़ाव बताया जा रहा है। इस बार डूसू के चार प्रमुख पदों में से तीन पर दिल्ली के रहने वाले मूलनिवासी छात्रों ने जीत दर्ज की है। दीपांशु के अलावा अध्यक्ष पद पर यश डबास कंझावला से हैं, जबकि सचिव पद पर रिया चावड़ी बदरपुर से हैं।
दीपांशु जाट समाज से भी आते हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति में जाट छात्रों की मौजूदगी और प्रभाव की चर्चा लंबे समय से होती रही है। हालांकि दीपांशु की जीत में इस फैक्टर का कितना असर रहा, इसे सिर्फ वोट के आंकड़ों के आधार पर अलग से साबित करना मुश्किल है।
इसके अलावा राजस्थान के निर्दलीय विधायक रविंद्र भाटी का समर्थन और हरियाणा के कुछ गायकों का दीपांशु के साथ आना भी उनके चुनावी अभियान में देखने को मिला।
अब सामने है 2022 का वो काफिला
चार साल पहले शहीद भगत सिंह कॉलेज इवनिंग की फ्रेशर्स पार्टी में मंच पर खड़े होकर दीपांशु शौकीन ने कहा था कि आज वह अकेले चल रहे हैं, लेकिन एक दिन उनके पीछे काफिला होगा। उस वक्त वह सिर्फ एक फ्रेशर थे। न कोई बड़ा राजनीतिक नाम, न किसी बड़े संगठन का टिकट और न ही कोई बड़ा राजनीतिक परिवार।
2026 में तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। वही दीपांशु अब दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ के उपाध्यक्ष हैं। उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर 30,615 वोट हासिल किए और एबीवीपी तथा एनएसयूआई के उम्मीदवारों को पीछे छोड़ दिया।
उनकी जीत के साथ डूसू की छात्र राजनीति में एक नया अध्याय भी जुड़ गया है। चार साल पहले मंच से कही गई एक लाइन अब उनके राजनीतिक सफर की सबसे चर्चित लाइन बन चुकी है।
तब वह अकेले चल रहे थे और आज उनके पीछे हजारों वोटों का समर्थन खड़ा है। सवाल अब यह है कि डूसू के उपाध्यक्ष के तौर पर दीपांशु शौकीन अपने चुनावी वादों और सत्य निकेतन के पीड़ितों को न्याय दिलाने की लड़ाई को किस तरह आगे बढ़ाते हैं।


