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‘शिंदे ने खुद को मुख्य नेता कैसे बना लिया?’ SC में कपिल सिब्बल की दलील, EC को भी नहीं छोड़ा
Kapil Sibal Slams Eknath Shinde: महाराष्ट्र की शिवसेना से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्बल ने एकनाथ शिंदे के 'मुख्य नेता' पद पर सवाल उठाए। उन्होंने 1999 के शिवसेना संविधान का हवाला देते हुए पूछा कि शिंदे ने यह पद किस नियम के तहत हासिल किया।
Kapil Sibal Slams Eknath Shinde: सुप्रीम कोर्ट के भीतर महाराष्ट्र के राजनीतिक संग्राम को लेकर जारी बेहद अहम सुनवाई के दौरान उद्धव ठाकरे गुट के वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने तीखी और जोरदार बहस की। उन्होंने राज्य के उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के 'मुख्य नेता' पद पर बने रहने की वैधता पर सीधे तौर पर गंभीर प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दिया। कपिल सिब्बल ने वर्ष 1999 के शिवसेना संविधान की मूल प्रतियां दिखाते हुए अदालत के समक्ष कहा कि उस पूरे विधान में 'मुख्य नेता' नाम के किसी पद का कोई अस्तित्व ही नहीं है। उन्होंने कोर्ट में सवाल दागा कि आखिर एकनाथ शिंदे ने किस नियम, परंपरा या संवैधानिक आधार पर खुद को इस बड़े पद से नवाज लिया। सिब्बल का साफ कहना था कि यह सब केवल पार्टी में हुई बगावत और दलबदल के बाद तैयार की गई पूरी तरह से मनगढ़ंत और अवैध गतिविधि है।
चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और अधिकार क्षेत्र
कपिल सिब्बल ने भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की 3 सदस्यीय पीठ के सामने ये दलीलें रखीं। अंतिम सुनवाई के तीसरे दिन उन्होंने निर्वाचन आयोग की भूमिका पर भी बेहद तीखे सवाल दागे। उन्होंने तर्क दिया कि चुनाव आयोग केवल एक निष्पक्ष मध्यस्थ की तरह काम करता है। आयोग यह तय करने का अधिकार नहीं रखता कि किसी पार्टी का संविधान लोकतांत्रिक है या अलोकतांत्रिक। सिब्बल ने आगे कहा कि यदि कुछ देर के लिए यह मान भी लें कि संविधान अलोकतांत्रिक था, तो इसका परिणाम केवल पार्टी की मान्यता रद्द होने के रूप में सामने आ सकता था। मगर इस बात का अनुचित लाभ बागी शिंदे गुट को कैसे मिल सकता है और उन्हें मूल पार्टी का चुनाव चिन्ह कैसे दिया जा सकता है, यह एक बहुत बड़ा सवाल है।
धारा 29A और राजनीतिक दलों का पंजीकरण
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए सिब्बल ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 29ए का विशेष रूप से उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग के पास यह शक्ति नहीं है कि वह पहले से पंजीकृत किसी राजनीतिक दल के आंतरिक संविधान को अचानक अलोकतांत्रिक बताकर अमान्य करार दे। धारा 29ए मुख्य रूप से केवल नए राजनीतिक दलों के पंजीकरण से संबंधित है, जिसमें पार्टियों से समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के प्रति निष्ठा की घोषणा करने की अपेक्षा रखी जाती है। यह प्रावधान आयोग को वर्षों बाद किसी पार्टी के विधान को रद्द करने का कोई अधिकार नहीं प्रदान करता।
संवैधानिक नैतिकता और न्यायाधीशों की टिप्पणी
इस दौरान पीठ के सदस्य जस्टिस बागची ने कहा कि अनुच्छेद 19(4) में प्रयुक्त 'लोक व्यवस्था' और 'नैतिकता' जैसे शब्द काफी व्यापक हैं। इस पर सिब्बल ने उत्तर दिया कि वह केवल विशुद्ध संवैधानिक पहलू की ओर ध्यान खींच रहे हैं। इसके जवाब में जस्टिस बागची ने स्पष्ट किया कि नैतिकता में संवैधानिक नैतिकता का विषय भी स्वतः सम्मिलित होता है, जिसका अध्ययन अदालत के लिए अत्यंत आवश्यक हो जाता है।
संगठनात्मक बहुमत की जगह विधायकों की गिनती
ठाकरे गुट ने अदालत में कहा कि चुनाव आयोग ने असली शिवसेना तय करते समय संगठन के समर्थन को दरकिनार कर दिया और केवल विधानमंडल दल की संख्या को प्राथमिकता देकर भारी गलती की। वर्ष 2010 की गाइडलाइंस का पैरा 15 यह स्वीकार करता है कि पार्टी में नियुक्तियां संविधान के अनुसार होती हैं। ऐसे में पार्टी संविधान की अनदेखी करना पूरी तरह अनुचित है। लोकतंत्र में केवल विधायकों के बल पर मूल दल का फैसला करना गलत है।


