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India पर अल नीनो का बड़ा खतरा! सूखे और लू की आशंका 10% से बढ़कर 35% हुई, किसानों की बढ़ेगी मुश्किलें?
El Nino Effect on India 2027: भारत के लिए चिंता की बात यह है कि यहां सूखे और लू की संयुक्त घटनाओं का दायरा पहले ही बढ़ रहा है। ऐसे में आने वाले समय में खेती और ग्रामीण इलाकों पर इसका असर देखने को मिल सकता है।
El Nino Effect on India 2027
El Nino Effect on India 2027: प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) में तेजी से मजबूत हो रहा अल नीनो (El Niño) भारत के किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए नई चुनौती बन सकता है। विश्व मौसम संगठन (WMO) के ताजा आकलन के मुताबिक, फरवरी 2027 तक अल नीनो बने रहने की संभावना करीब 100 फीसदी है। इसके चलते तापमान बढ़ने, बारिश के पैटर्न में बदलाव और पानी की कमी का खतरा बढ़ सकता है।
भारत के लिए चिंता की बात यह है कि यहां सूखे और लू (Drought and Heatwave) की संयुक्त घटनाओं का दायरा पहले ही बढ़ रहा है। ऐसे में आने वाले समय में खेती और ग्रामीण इलाकों पर इसका असर देखने को मिल सकता है।
सूखे और लू का खतरा 10% से बढ़कर 35% हुआ
भारत में सूखे और लू की एक साथ पड़ने वाली घटनाएं अब बड़ी चिंता बन रही हैं। इस बढ़ते खतरे का सीधा असर खेती और ग्रामीण आजीविका (Rural Livelihood) पर पड़ सकता है। रिसर्च के मुताबिक, जिन वर्षों में सूखे और लू की गंभीर संयुक्त घटनाएं हुईं, उन वर्षों में देश में चावल की पैदावार (Rice Production) में 12.1 फीसदी तक की गिरावट दर्ज की गई।
वहीं, गेहूं की फसल में दाना भरने के दौरान तापमान में सिर्फ 1 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी होने पर पैदावार 3 से 4 फीसदी तक घट सकती है। ऐसे में मजबूत अल नीनो के बीच अगर बारिश कम होती है और गर्मी बढ़ती है, तो किसानों की फसल पर दोहरी मार पड़ सकती है। इसका असर केवल खेती तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि खेतिहर मजदूरों की कमाई, पशुपालन और गांवों में पानी की उपलब्धता पर भी दबाव बढ़ सकता है।
अल नीनो क्या है और क्यों बढ़ाता है सूखे का खतरा?
अल नीनो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से ज्यादा होने की मौसमी घटना है। इसका असर दुनिया के मौसम और बारिश के पैटर्न (Rainfall Pattern) पर पड़ता है। भारत में अल नीनो के दौरान मानसूनी बारिश कमजोर पड़ने की आशंका बढ़ जाती है।
हालांकि, यह जरूरी नहीं है कि हर अल नीनो के दौरान भारत में सूखा पड़े। इसका वास्तविक असर समुद्र के तापमान, मानसून की स्थिति और दूसरे मौसमी कारकों पर निर्भर करता है। इस बार चिंता इसलिए ज्यादा है, क्योंकि अल नीनो के मजबूत होने के साथ दुनिया के कई हिस्सों में तापमान बढ़ने की आशंका है।
गर्मी और सूखे का एक साथ पड़ना स्थिति को और गंभीर बना सकता है। जब मिट्टी में नमी कम होती है, तो पानी के वाष्पीकरण की प्रक्रिया घट जाती है। इससे जमीन और उसके आसपास की हवा गर्म होने लगती है। दूसरी तरफ, तापमान बढ़ने से वातावरण में नमी की मांग बढ़ती है, जिसके कारण मिट्टी और तेजी से सूख सकती है। इस तरह गर्मी और सूखा एक-दूसरे के असर को बढ़ाते हैं।
राजस्थान-गुजरात ही नहीं, पूर्वी और दक्षिणी भारत भी खतरे में
फरवरी 2026 में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि सूखे और लू की संयुक्त घटनाओं का खतरा अब उन इलाकों तक भी फैल रहा है, जहां पहले अपेक्षाकृत ज्यादा बारिश होती थी। इसका मतलब है कि अब केवल राजस्थान, गुजरात और दूसरे सूखा प्रभावित इलाकों को ही नहीं, बल्कि पूर्वी और दक्षिणी भारत के कृषि क्षेत्रों को भी ऐसी परिस्थितियों के लिए तैयार रहना होगा।
ऐसे इलाकों में बारिश की कमी और तापमान में बढ़ोतरी का असर खेती के साथ-साथ पानी के स्रोतों पर भी पड़ सकता है। इसलिए ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता और खेती की सुरक्षा को लेकर पहले से तैयारी करना जरूरी हो गया है।
गांवों में नल कनेक्शन बढ़े, लेकिन पानी की सुरक्षा कितनी?
ग्रामीण भारत में पानी की उपलब्धता (Water Availability) पहले से ही एक बड़ी चुनौती है। केंद्र सरकार के जल जीवन मिशन (Jal Jeevan Mission) के तहत ग्रामीण परिवारों तक नल से पानी पहुंचाने के लिए बड़े स्तर पर काम किया गया है। अगस्त 2019 में जब यह मिशन शुरू हुआ था, तब करीब 17 फीसदी ग्रामीण परिवारों के पास ही नल कनेक्शन था। जल शक्ति मंत्रालय के मुताबिक, दिसंबर 2025 तक यह कवरेज बढ़कर 81 फीसदी से ज्यादा हो गया।
लेकिन घरों तक नल कनेक्शन पहुंचना और नियमित रूप से पर्याप्त व साफ पानी मिलना दो अलग-अलग बातें हैं। सरकार के 2024 के फंक्शनैलिटी असेसमेंट में 2.37 लाख से ज्यादा ग्रामीण परिवारों को शामिल किया गया था। इस आकलन में सामने आया कि 86.5 फीसदी घरों में नल कनेक्शन काम कर रहे थे, जबकि 80.2 फीसदी परिवारों को पर्याप्त मात्रा में पानी मिल रहा था।
वहीं, 83.6 फीसदी घरों में तय समय के अनुसार पानी की सप्लाई हो रही थी और 76 फीसदी परिवारों को निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुरूप पानी मिल रहा था। ये आंकड़े बताते हैं कि नल कनेक्शन का दायरा बढ़ने के बावजूद नियमित और साफ पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना अभी भी जरूरी है। अल नीनो के कारण पानी की कमी बढ़ती है तो ग्रामीण परिवारों के सामने यह चुनौती और गंभीर हो सकती है।
अल नीनो से निपटने के लिए गांवों में क्या तैयारी जरूरी?
अल नीनो के संभावित असर को देखते हुए खेती और पानी की सुरक्षा (Water Security) के लिए पहले से तैयारी करना जरूरी है। इसके लिए सबसे पहले गांवों में मौजूद पानी के स्रोतों की स्थिति का आकलन करना होगा। हर जल संकट वाले पंचायत क्षेत्र में भूजल स्तर, उपलब्ध पानी और सालभर की जरूरत को ध्यान में रखकर वाटर सिक्योरिटी प्लान तैयार किया जा सकता है।
इसके साथ ही पुराने तालाबों, जोहड़ों और दूसरे पारंपरिक जल स्रोतों को दोबारा उपयोगी बनाना भी जरूरी है। इससे पानी को सुरक्षित रखने और जरूरत के समय उसका इस्तेमाल करने में मदद मिल सकती है।
मनरेगा जैसी योजनाओं के तहत होने वाले जल संरक्षण कार्यों का आकलन भी केवल खर्च या बनाए गए ढांचों के आधार पर नहीं होना चाहिए। यह देखना जरूरी है कि इन कार्यों से वास्तव में कितना पानी संरक्षित हुआ और स्थानीय जल स्रोतों को कितना फायदा मिला।
खेती से लेकर ग्रामीण रोजगार तक पड़ सकता है असर
कुल मिलाकर, मजबूत होता अल नीनो भारत के लिए सिर्फ कमजोर मानसून का खतरा नहीं है। इसका असर खेती, भूजल, ग्रामीण रोजगार, पशुपालन और खाद्य सुरक्षा (Food Security) पर एक साथ पड़ सकता है। चावल और गेहूं की पैदावार से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि गर्मी और सूखे का मेल किसानों के लिए कितना नुकसानदायक हो सकता है।
सूखे और लू की संयुक्त घटनाओं का बढ़ता दायरा यह संकेत देता है कि ग्रामीण भारत को केवल बारिश की कमी से निपटने की तैयारी नहीं करनी होगी, बल्कि लंबे समय तक चलने वाली गर्मी और पानी के संकट को ध्यान में रखकर भी योजनाएं बनानी होंगी।


