Election Commission में घमासान से उठे बड़े सवाल, ECINet से Form-6 तक क्यों घिरी चुनावी व्यवस्था?

Election Commission Rift: ECINet, Form-6 और वोटर लिस्ट को लेकर चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों से चुनावी प्रक्रिया के संचालन पर सवाल उठे हैं। जानिए पूरा मामला।

Alakha Singh
Published on: 23 Sept 2026 11:16 PM IST
Election Commission में घमासान से उठे बड़े सवाल, ECINet से Form-6 तक क्यों घिरी चुनावी व्यवस्था?
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Election Commission Rift: चुनाव आयोग के भीतर मतभेद कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार मामला सिर्फ किसी एक फैसले पर असहमति तक सीमित नहीं दिख रहा। The Indian Express की 23 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आंतरिक रिकॉर्ड में मतदाता सूची, नए मतदाताओं के पंजीकरण, नाम जोड़ने-हटाने और चुनाव आयोग के डिजिटल सिस्टम ECINet के संचालन को लेकर गंभीर आपत्तियां दर्ज की हैं।

मामले की गंभीरता इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि ये सवाल सीधे उस प्रक्रिया से जुड़े हैं जिसके जरिए मतदाता सूची तैयार और अपडेट होती है। हालांकि, चुनाव आयोग ने इन रिपोर्टों के बाद कहा है कि SIR से जुड़े सभी अंतिम फैसले तीनों आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए और मतभेद को लेकर सामने आई व्याख्या सही नहीं है।

Goa में 97 मतदाताओं का मामला क्या है?

रिपोर्ट के मुताबिक, गोवा में 97 लोगों ने Electoral Registration Officer यानी ERO के सामने जरूरी दस्तावेज पेश किए। ERO ने उन्हें पात्र माना, लेकिन कथित तौर पर केंद्रीय स्तर पर नियंत्रित सॉफ्टवेयर में उन फैसलों को दर्ज करने में दिक्कत आई। इससे एक बड़ा प्रशासनिक सवाल सामने आया कि अगर कानून के तहत नियुक्त स्थानीय अधिकारी किसी मतदाता को पात्र मानता है, लेकिन डिजिटल सिस्टम उस फैसले को दर्ज करने की अनुमति ही न दे, तो अंतिम नियंत्रण किसके पास रहता है?

यही वह बिंदु है जिस पर दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों को रिपोर्ट में सत्ता के केंद्रीकरण और डिजिटल नियंत्रण से जोड़कर देखा गया है।

ECINet पर क्यों उठे सवाल?

22 जनवरी 2026 को चुनाव आयोग ने ECINet लॉन्च किया था। इसका उद्देश्य आयोग के 40 से अधिक ऐप और पोर्टल को एक साझा तकनीकी प्लेटफॉर्म के तहत लाना था। लॉन्च के समय इसे चुनाव प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने वाली तकनीकी व्यवस्था के रूप में पेश किया गया था।

लेकिन अब इसी डिजिटल ढांचे के भीतर अधिकारियों की पहुंच और अधिकारों को लेकर सवाल उठे हैं। Indian Express के अनुसार, संधू और जोशी ने वोटर डेटा से जुड़े सॉफ्टवेयर की पहुंच और केंद्रीकरण को लेकर आपत्तियां दर्ज कीं और इस मुद्दे पर कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन तक पत्राचार किया।

Form-6 में बदलाव बना दूसरा बड़ा विवाद

सबसे अहम विवाद नए मतदाताओं के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 को लेकर है। रिपोर्ट के अनुसार ECINet के ऑनलाइन संस्करण में ऐसा अतिरिक्त घोषणा-पत्र जोड़ा गया जिसमें आवेदक से पूछा गया कि उसका या उसके माता-पिता/दादा-दादी का नाम पिछली Special Intensive Revision (SIR) की मतदाता सूची में था या नहीं।

दिलचस्प बात यह है कि ऑनलाइन फॉर्म में यह हिस्सा औपचारिक तौर पर 'non-mandatory' दिखाया गया, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार आवेदक इस सवाल का जवाब दिए बिना आवेदन आगे जमा नहीं कर सकता था। डाउनलोड किए जाने वाले Form-6 के संस्करण में भी यह अतिरिक्त हिस्सा दिखाई नहीं देता था।

दो चुनाव आयुक्तों ने क्या आपत्ति जताई?

रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने 16 मई को इस बदलाव पर आपत्ति दर्ज की। उनका तर्क था कि Form-6 एक वैधानिक फॉर्म है और इसे केवल SIR के आदेश या दिशा-निर्देश के जरिए बदला नहीं जा सकता। इसके लिए Registration of Electors Rules, 1960 में संशोधन की जरूरत होगी।

19 मई को चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने भी जोशी के रुख से सहमति जताई। बाद में 13 अगस्त को संधू ने फिर लिखा कि दोनों आयुक्तों की स्पष्ट आपत्तियों के बावजूद पोर्टल पर कथित बदलाव हटाया नहीं गया था। उन्होंने इसे तत्काल हटाने की बात कही ताकि पात्र युवा और पहली बार वोट देने वाले मतदाताओं को परेशानी न हो।

SIR का असर अगली पीढ़ी तक?

यहीं से विवाद का राजनीतिक और संवैधानिक महत्व और बढ़ जाता है। Form-6 में माता-पिता या दादा-दादी के पुराने SIR रिकॉर्ड से जुड़ा सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी व्यक्ति का मतदाता बनने का अधिकार उसकी अपनी पात्रता पर निर्भर करता है।

ऐसे में सवाल यह है कि अगर किसी व्यक्ति के माता-पिता का नाम पिछली SIR सूची में नहीं था या बाद में उनके नाम को लेकर विवाद हुआ, तो क्या उसका असर अगली पीढ़ी के नए मतदाता के पंजीकरण पर पड़ना चाहिए? यह वही चिंता है जिसे दोनों आयुक्तों की आपत्तियों के संदर्भ में रिपोर्ट में उठाया गया है।

इस बार का विवाद पहले के मामलों से अलग क्यों?

चुनाव आयोग में इससे पहले भी सार्वजनिक रूप से दर्ज मतभेद सामने आए हैं। 2009 में तत्कालीन CEC एन. गोपालस्वामी ने चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफारिश राष्ट्रपति को भेजी थी। तत्कालीन केंद्र सरकार ने इसे स्वीकार नहीं किया और बाद में चावला CEC बने।

2019 में चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने Model Code of Conduct से जुड़े मामलों में अपनी असहमति को अंतिम आदेशों में दर्ज किए जाने की मांग की थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन BJP अध्यक्ष अमित शाह को MCC मामलों में मिली क्लीन चिट पर उनकी अलग राय थी। 21 मई 2019 को आयोग ने 2-1 से तय किया था कि असहमति फाइल में दर्ज होगी, लेकिन अंतिम आदेश में नहीं।

लेकिन मौजूदा विवाद की प्रकृति अलग बताई जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार संधू और जोशी केवल उन फैसलों से असहमत नहीं हैं जिन पर उनकी राय अल्पमत में रही; उन्होंने कथित तौर पर कुछ मामलों में फैसलों, आदेशों और प्रक्रिया की जानकारी तथा परामर्श में अपनी भूमिका को लेकर सवाल उठाए हैं।

आयोग ने क्या कहा?

इन रिपोर्टों के सामने आने के बाद चुनाव आयोग ने मतभेद की व्याख्या को खारिज करते हुए कहा कि SIR से जुड़े अंतिम निर्णय तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए थे। यानी एक तरफ आंतरिक रिकॉर्ड में दर्ज आपत्तियों की रिपोर्ट है, दूसरी तरफ आयोग का आधिकारिक पक्ष है कि अंतिम निर्णयों में तीनों सदस्यों की सहमति थी।

यही विरोधाभास अब पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।

असली सवाल: वोटर लिस्ट का नियंत्रण किसके पास?

पूरे घटनाक्रम से कम से कम चार बुनियादी सवाल सामने आते हैं:

क्या ERO जैसे वैधानिक अधिकारियों के फैसले तकनीकी सिस्टम के कारण प्रभावहीन हो सकते हैं?

क्या मतदाता पंजीकरण के वैधानिक Form-6 में बदलाव बिना नियम संशोधन के किया जा सकता है?

क्या SIR में माता-पिता के रिकॉर्ड को नए मतदाता के आवेदन से जोड़ना कानूनी रूप से उचित प्रक्रिया है?

और सबसे अहम कि क्या लगभग एक अरब मतदाताओं की डिजिटल व्यवस्था में तकनीकी नियंत्रण का पर्याप्त विकेंद्रीकरण और संस्थागत निगरानी मौजूद है?

इन सवालों का अंतिम जवाब जांच, दस्तावेजों और लागू कानून की व्याख्या पर निर्भर करेगा। लेकिन दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों, ECINet को लेकर उठे सवाल और आयोग के आधिकारिक खंडन ने चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और संस्थागत कामकाज को लेकर बहस जरूर तेज कर दी है।

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Alakha Singh is a journalist with having more than one decade of experience in digital media. Alakha Singh has covered Loksabha Elections 2014 and 2019 closely with the several state assembly elections. He has expertise in SEO oriented content writing on various topics and issues. At HT Digital Alakha Singh has been recognised as one of the top performer of the team for many years continuously. Earlier he worked with HT Digital for more than 8 years and 2.5 years with Amar Ujala web. In initial days of his career Alakha Singh also worked as a reporter (stringer) with NBT Gurgaon. He pursued P.G. Diploma from South Campus, University of Delhi in 2013 and MAMC from Kurukshetra University in 2014. He Belongs to District Banda of Uttar Pradesh.

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