Ethanol Production: 1 लीटर एथेनॉल बनाने में लगता है 10,000 लीटर तक पानी! सच्चाई जानकर हैरान रह जाएंगे

Ethanol Production: 1 लीटर एथेनॉल बनाने में 10,000 लीटर तक पानी खर्च हो सकता है। जानें कैसे चावल, मक्का और गन्ने से एथेनॉल बनाने की कृषि प्रक्रिया भारत के भूजल स्तर के लिए संकट बन रही है।

Shivam Shrivastava
Published on: 21 Jun 2026 4:22 PM IST (Updated on: 21 Jun 2026 4:22 PM IST)
Ethanol Production: 1 लीटर एथेनॉल बनाने में लगता है 10,000 लीटर तक पानी! सच्चाई जानकर हैरान रह जाएंगे
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Ethanol Production: भारत आज कल विदेशों से आने वाले कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता खत्म करने की कोशिश में है। इसके लिए ऊर्जा क्षेत्र में बायोफ्यूल, खास तौर पर एथेनॉल के उत्पादन को काफी तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है। पर इस पूरी प्रक्रिया के साथ एक बहुत बड़ी चुनौती भी सामने आ रही है और वह है पानी की बेतहाशा खपत।

सुनने में भले ही लगे कि फैक्ट्री के अंदर एथेनॉल बनाते समय कुछ ही लीटर पानी लगता होगा, लेकिन सच्चाई इससे कोसों दूर है। इसका असली 'वॉटर फुटप्रिंट' बहुत विशाल है क्योंकि असल खर्च उन फसलों को उगाने में होता है जिनसे यह ईंधन तैयार किया जाता है। एक लीटर एथेनॉल बनाने के पीछे 2800 से लेकर 10790 लीटर तक पानी खर्च हो सकता है, जो पूरी तरह से इस बात पर टिका है कि कच्चा माल कौन सा इस्तेमाल हुआ है।

फसल के हिसाब से तय होती है पानी की जरूरत

अगर हम कच्चे माल की बात करें तो चावल से एथेनॉल बनाना सबसे महंगा सौदा साबित होता है, कम से कम पानी के नजरिए से। सिर्फ एक लीटर एथेनॉल तैयार करने के लिए करीब ढाई से तीन किलो चावल की जरूरत पड़ती है और इस चावल को उगाने में लगभग 10790 लीटर पानी लग जाता है।

वहीं दूसरी तरफ, भारत सरकार के एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम में मक्के को भी एक अहम विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि मक्के की खेती से लेकर एथेनॉल बनने तक के पूरे सफर को देखें, तो इसमें भी करीब 4670 लीटर पानी की खपत हो ही जाती है। यह चावल से थोड़ा बेहतर जरूर है, लेकिन पानी का खर्च फिर भी काफी ज्यादा है।

इसके अलावा गन्ने का इस्तेमाल भी पारंपरिक रूप से होता आया है। गन्ने की किस्म और इलाके के मौसम के हिसाब से देखा जाए तो इससे एक लीटर ईंधन बनाने में 2860 से लेकर 3630 लीटर तक पानी लगता है, जो चावल और मक्के के मुकाबले थोड़ा राहत भरा आंकड़ा है।

कारखानों से ज्यादा खेतों में खपता है पानी

अक्सर लोगों को यह गलतफहमी होती है कि एथेनॉल बनाने वाली फैक्ट्रियां बहुत ज्यादा पानी बर्बाद करती हैं। जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। डिस्टिलरी प्लांट के अंदर तो एक लीटर एथेनॉल की प्रोसेसिंग में बमुश्किल तीन से पांच लीटर पानी ही इस्तेमाल होता है।

पानी का जो भी बड़ा हिस्सा खर्च होता है, वह फसल के कारखाने तक पहुंचने से बहुत पहले खेतों में ही लग चुका होता है। इस पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए 'वर्चुअल वॉटर' का कंसेप्ट जानना जरूरी है। किसी भी खास फसल को तैयार करने में जो पानी लगता है, जैसे सिंचाई, मिट्टी की नमी और बारिश का पानी, उसे वर्चुअल वॉटर कहते हैं।

यही कारण है कि एथेनॉल का असली वॉटर फुटप्रिंट सिर्फ मशीनरी या इंडस्ट्रियल काम तक सीमित नहीं है, बल्कि खेती की पूरी प्रक्रिया इसका असल पैमाना है।

लगातार गिरता भूजल स्तर और भविष्य की चिंताएं

पानी की यह भारी भरकम खपत कोई छोटी समस्या नहीं है। नीति आयोग समेत कई बड़े नीति निर्धारक संस्थानों और पर्यावरण जानकारों ने इसे लेकर गहरी चिंता जाहिर की है। उनका मानना है कि अगर एथेनॉल बनाने के लिए इसी तरह से ज्यादा पानी पीने वाली फसलों की बड़े पैमाने पर खेती होती रही, तो हमारे जमीन के नीचे मौजूद पानी के भंडार पर भयानक दबाव पड़ेगा।

देश के कई राज्यों में भूजल का स्तर पहले ही खतरे के निशान की तरफ बढ़ रहा है। ऐसे में चावल और गन्ने जैसी फसलों पर लगातार निर्भर रहना लंबी अवधि में हमारे पर्यावरण और जल सुरक्षा के लिए एक बड़ा संकट खड़ा कर सकता है।

Shivam Shrivastava
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Shivam Shrivastava

शिवम उत्तर प्रदेश के एक युवा और उभरते पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में लगभग 4 वर्षों का अनुभव प्राप्त है। वे राजनीति, अपराध, स्वास्थ्य और हाइपरलोकल खबरों की गहरी समझ रखते हैं और समसामयिक मुद्दों पर सटीक व प्रभावशाली रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं। उनकी विशेष रुचि डाटा-ड्रिवन पत्रकारिता और विश्लेषणात्मक रिपोर्टिंग में है, जिससे उनकी खबरें अधिक तथ्यात्मक और विश्वसनीय बनती हैं। वे जमीनी स्तर की रिपोर्टिंग के साथ-साथ डिजिटल मीडिया के बदलते स्वरूप को भी समझते हैं। लेखन और रिसर्च में उनकी मजबूत पकड़ उन्हें एक सक्षम और जिम्मेदार पत्रकार के रूप में स्थापित करती है।

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