कांग्रेस-RJD से BJP तक, Gen Z की चिंता क्यों? बदलते युवा मिजाज ने कैसे बदल दी सियासत की दिशा

Gen Z की बढ़ती राजनीतिक ताकत ने BJP, कांग्रेस और RJD समेत सभी दलों की रणनीति बदल दी है। जानिए 2029 लोकसभा चुनाव से पहले युवा वोट और मुद्दों के क्या मायने हैं।

Alakha Singh
Published on: 21 Aug 2026 9:48 PM IST (Updated on: 21 Aug 2026 9:55 PM IST)
कांग्रेस-RJD से BJP तक, Gen Z की चिंता क्यों? बदलते युवा मिजाज ने कैसे बदल दी सियासत की दिशा
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Gen Z voters India Political Analysis: भारत की राजनीति में एक नया वोट बैंक तेजी से अपनी जगह बना रहा है: Gen Z. यह वह पीढ़ी है जो पारंपरिक राजनीतिक भाषणों से ज्यादा सोशल मीडिया, रील्स, डिजिटल कैंपेन और सीधे संवाद से प्रभावित होती है। यही वजह है कि सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, लगभग हर राजनीतिक दल अब युवाओं के सवालों को लेकर ज्यादा मुखर दिखाई दे रहा है।

Gen Z के तेवरों ने राजनीतिक दलों को एक अहम संदेश दिया है: युवा सिर्फ चुनाव के समय वोट देने वाला वर्ग नहीं है, बल्कि वह चुनावी एजेंडा तय करने की क्षमता भी रखता है। हाल के महीनों में शिक्षा, रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं, पेपर लीक, सरकारी भर्तियों और युवाओं के भविष्य से जुड़े सवाल जिस तरह राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आए हैं, उसने इस बदलाव को और स्पष्ट कर दिया है।

Gen Z कौन हैं?

एक अनुमान के अनुसार भारत में वर्तमान में युवा आबादी 40.7 करोड़ का आंकड़े छू रही है जिसमें 14–30 वर्ष की आबादी और Gen Z को लगभग एक ही मान लिया गया है। लेकिन तकनीकी रूप से Gen Z वे युवा हैं जिनका जन्म एक विशेष काल खंड में हुआ है। आमतौर पर इसे 1997–2012 के आसपास जन्म लेने वाले लोगों को Gen Z कहा जाता है।

Gen Z सिर्फ नौकरी नहीं चाहता

Gen Z के मुद्दों को सिर्फ: नौकरी, परीक्षा और शिक्षा तक सीमित नहीं करना चाहिए। इसमें महंगाई, डिजिटल स्वतंत्रता, सामाजिक पहचान, मानसिक स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन, उद्यमिता, कौशल विकास और राजनीतिक जवाबदेही जैसे मुद्दे भी शामिल हो सकते हैं।

चौंका रहा बेरोजगार युवाओं का आंकड़ा!

यह आंकड़ा अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की State of Working India 2026 रिपोर्ट में के अनुसार, 2023 में 20 से 29 साल की उम्र के करीब 1.1 करोड़ (11 मिलियन) युवा भारतीय ग्रेजुएट बेरोजगार थे। युवाओं का एक बड़ा हिस्सा रोजगार, शिक्षा या ट्रेनिंग से भी बाहर है। नीति आयोग की Reimagining Skilling for Viksit Bharat@2047 रिपोर्ट के अनुसार, 15 से 29 वर्ष की उम्र के करीब 8.7 करोड़ युवा NEET (न शिक्षा, न रोजगार, न ट्रेनिंग) श्रेणी में हैं। हालांकि, ऐसी आबादी में करीब 88% युवा बिना वेतन वाले घरेलू कामों में लगे हुए हैं।

क्यों बढ़ी Gen Z की राजनीतिक अहमियत?

भारत की आबादी का बड़ा हिस्सा युवा है। संयुक्त राष्ट्र के जनसंख्या अनुमानों के मुताबिक देश में 14 से 30 वर्ष की आयु के लोगों की संख्या करीब 40 करोड़ से अधिक है। हालांकि इस पूरे आयु वर्ग को तकनीकी रूप से Gen Z कहना सही नहीं होगा, लेकिन यह आंकड़ा भारत की युवा आबादी के राजनीतिक वजन को जरूर दिखाता है।

यही वह पीढ़ी है जो आने वाले वर्षों में पहली बार या शुरुआती चरण में बड़ी संख्या में मतदान करेगी।

2029 तक कितने युवा पहली बार वोटर बनेंगे?

एक आँकड़े के अनुसार, साल 2029 के लोकसभा चुनाव में देश के अंदर करीब 38 करोड़ युवा (Gen Z यानी 18 से 32 साल की उम्र वाले) वोटर बनने की कतार में होंगे, जिनमें करोड़ों युवा ऐसे होंगे जो पहली बार या अपनी शुरुआती उम्र में मतदान करेंगे। जनसंख्या के इस बड़े बदलाव के कारण 2029 में यह युवा पीढ़ी भारत का सबसे बड़ा वयस्क और मतदाता समूह (Voting Bloc) बन जाएगा।

आंदोलन ने सत्ता और विपक्ष दोनों को दिया संदेश

युवाओं से जुड़े आंदोलनों और अभियानों ने राजनीतिक दलों को यह समझने पर मजबूर किया है कि Gen Z को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। CJP जैसे नए राजनीतिक प्रयोगों ने शिक्षा, रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे मुद्दों को डिजिटल माध्यम से व्यापक चर्चा में पहुंचाया है। इन अभियानों की राजनीतिक वैधता और उनके पीछे की ताकत पर बहस अलग मुद्दा है, लेकिन यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि युवाओं के सवाल अब सोशल मीडिया से निकलकर सड़कों और राजनीतिक मंचों तक पहुंच रहे हैं।

यही कारण है कि सत्ता पक्ष को भी युवाओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की जरूरत महसूस हो रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का युवाओं के साथ सोशल मीडिया के जरिए संवाद हो या RSS प्रमुख मोहन भागवत का आंदोलनकारी युवाओं को अपने बच्चों जैसा बताना: इन संकेतों को सिर्फ सामान्य राजनीतिक बयान मानना मुश्किल है। संदेश साफ है: भाजपा युवा असंतोष को विपक्ष के हाथ में जाने देने के लिए तैयार नहीं है।

BJP के सामने चुनौती: नाराजगी को विपक्ष की पूंजी बनने से रोकना

भाजपा के लिए यह चुनौती इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि केंद्र में लंबे समय से सत्ता में रहने के कारण युवाओं के बीच सरकार के प्रदर्शन का सीधा मूल्यांकन हो रहा है।

किसी भी परीक्षा में देरी, भर्ती विवाद या पेपर लीक सिर्फ प्रशासनिक समस्या नहीं रह जाता। सोशल मीडिया के दौर में वह कुछ ही घंटों में सरकार की राजनीतिक जवाबदेही का सवाल बन सकता है।

यही Gen Z की ताकत है।

पुरानी राजनीति में किसी मुद्दे को राष्ट्रीय बहस बनने में कई दिन लग सकते थे। अब एक वीडियो, पोस्ट या वायरल अभियान कुछ घंटों में हजारों-लाखों युवाओं को एक मुद्दे पर जोड़ सकता है। भाजपा इसलिए केवल सरकारी योजनाओं के जरिए युवाओं तक पहुंचने की कोशिश नहीं कर रही, बल्कि संवाद की भाषा और माध्यम भी बदल रही है।

विपक्ष को मिला नया मुद्दा, लेकिन चुनौती भी बड़ी

कांग्रेस, RJD और दूसरे विपक्षी दलों के लिए युवाओं के मुद्दे सरकार को घेरने का स्वाभाविक हथियार बन गए हैं। राहुल गांधी का छात्रों और युवाओं से लगातार संवाद, तेजस्वी यादव का शिक्षा और रोजगार के मुद्दों पर सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरना और प्रशांत किशोर का बिहार में रोजगार तथा शिक्षा के सवालों को राजनीतिक अभियान का हिस्सा बनाना इसी बदलाव के संकेत हैं।

बिहार जैसे राज्य में इसका महत्व और बढ़ जाता है, जहां सरकारी नौकरी लंबे समय से युवाओं की राजनीति का केंद्रीय मुद्दा रही है। लेकिन विपक्ष के सामने भी सवाल कम नहीं हैं।

सिर्फ सरकार की आलोचना करने से Gen Z लंबे समय तक साथ नहीं रहेगा। युवा मतदाता अब पूछ सकता है: आपकी सरकार आएगी तो परीक्षा व्यवस्था कैसे बदलेगी? भर्ती कैलेंडर कैसे लागू होगा? पेपर लीक कैसे रोका जाएगा? रोजगार कैसे पैदा होगा?

यानी विपक्ष के सामने पहली बार केवल आंदोलन में शामिल होने की नहीं, बल्कि समाधान देने की चुनौती भी है।

झारखंड से बिहार तक दिखा असर

झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं और नौकरियों को लेकर छात्रों का दबाव सरकार के सामने बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना। सरकार का कई मांगों पर सकारात्मक रुख इस बात का संकेत है कि युवा आंदोलनों को अब केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर टाला नहीं जा सकता।

बिहार में भी शिक्षा और रोजगार का मुद्दा लगातार राजनीतिक बहस के केंद्र में है। यहां एक दिलचस्प बदलाव दिखाई देता है। पहले राजनीतिक दल युवाओं को अपने भाषणों में संबोधित करते थे। अब वे युवाओं के बीच जाकर उनके मुद्दे सुनने और उनकी भाषा में बात करने को मजबूर हैं।

यानी राजनीति युवाओं को अपने हिसाब से बदलने के बजाय युवाओं के हिसाब से खुद को बदलने लगी है।

Gen Z की सबसे बड़ी ताकत सोशल मीडिया

Gen Z की राजनीतिक शक्ति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उसका डिजिटल व्यवहार है। यह पीढ़ी टीवी डिबेट या अखबार की सुर्खियों से आगे बढ़कर Instagram, YouTube, X और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर राजनीतिक जानकारी हासिल करती है।

इसका परिणाम यह है कि राजनीतिक नैरेटिव पर अब सिर्फ राजनीतिक दलों या बड़े मीडिया संस्थानों का नियंत्रण नहीं है। एक छात्र का वीडियो, किसी परीक्षा अभ्यर्थी की कहानी या किसी भर्ती विवाद का स्क्रीनशॉट राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।

यही कारण है कि राजनीतिक दल सोशल मीडिया पर अपनी मौजूदगी बढ़ा रहे हैं। अब चुनावी रणनीति में रैली के साथ-साथ रील भी महत्वपूर्ण है।

Gen Z को सिर्फ वोट बैंक समझना बड़ी गलती होगी

राजनीतिक दलों की सबसे बड़ी भूल यह होगी कि वे Gen Z को केवल एक बड़ा वोट बैंक मान लें। इस पीढ़ी की राजनीति पारंपरिक वोट बैंक राजनीति से कुछ अलग दिखाई देती है। यह किसी एक दल के साथ स्थायी रूप से जुड़ने के बजाय मुद्दे के आधार पर प्रतिक्रिया दे सकती है।

आज रोजगार महत्वपूर्ण है तो युवा उसी पर सरकार से सवाल करेगा। कल परीक्षा व्यवस्था मुद्दा बन सकती है तो उसका राजनीतिक रुख उसी के आधार पर बदल सकता है।

इसलिए Gen Z को साधने के लिए केवल चुनावी घोषणाएं काफी नहीं होंगी। विश्वसनीयता, पारदर्शिता और डिलीवरी: तीनों जरूरी होंगे।

2029 से पहले शुरू हो चुका है बड़ा राजनीतिक प्रयोग

2029 का लोकसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन उसकी राजनीति की जमीन तैयार होना शुरू हो चुकी है। सत्ता पक्ष यह समझने की कोशिश कर रहा है कि युवाओं की नाराजगी को कैसे अवसर में बदला जाए। विपक्ष यह देख रहा है कि इसी नाराजगी को सरकार के खिलाफ राजनीतिक आंदोलन में कैसे बदला जाए।

दोनों के बीच फर्क सिर्फ रणनीति का है।

भाजपा के पास सरकार की योजनाओं और संसाधनों के जरिए युवाओं तक पहुंचने की क्षमता है। विपक्ष के पास सरकार की कमियों को मुद्दा बनाने का हथियार है। लेकिन दोनों के सामने एक समान चुनौती है: Gen Z को सिर्फ भाषण नहीं, परिणाम चाहिए।

असली लड़ाई युवा वोट की नहीं, युवा भरोसे की है

भारत की राजनीति में आने वाले वर्षों की सबसे बड़ी लड़ाई शायद यह नहीं होगी कि किस दल को युवा वोट देंगे। असली सवाल यह होगा कि किस राजनीतिक दल पर युवा भरोसा करेगा।

CJP जैसे नए राजनीतिक प्रयोगों की सफलता या असफलता अपनी जगह है। कांग्रेस, RJD, BJP, AAP या दूसरे दलों की रणनीति भी अपनी जगह है। लेकिन इन सबके बीच एक बड़ा राजनीतिक बदलाव साफ दिखाई दे रहा है—युवाओं के सवाल अब हाशिये का मुद्दा नहीं रहे।

नौकरी, परीक्षा, भर्ती, शिक्षा और अवसर की राजनीति अब सत्ता की राजनीति का हिस्सा बन चुकी है।

और यही Gen Z का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश है।

जिस दल ने युवा असंतोष को केवल विरोध समझा, वह उसे खो सकता है। जिसने उसे समझकर समाधान देने की कोशिश की, वही 2029 की राजनीति में बढ़त बना सकता है।

इसलिए आज कांग्रेस से लेकर RJD और भाजपा तक, हर दल Gen Z की चिंता कर रहा है। वजह सिर्फ इतनी नहीं कि युवा संख्या में ज्यादा हैं। वजह यह है कि युवा अब अपनी आवाज को राजनीतिक दबाव में बदलना सीख चुका है।

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Alakha Singh

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Alakha Singh is a journalist with having more than one decade of experience in digital media. Alakha Singh has covered Loksabha Elections 2014 and 2019 closely with the several state assembly elections. He has expertise in SEO oriented content writing on various topics and issues. At HT Digital Alakha Singh has been recognised as one of the top performer of the team for many years continuously. Earlier he worked with HT Digital for more than 8 years and 2.5 years with Amar Ujala web. In initial days of his career Alakha Singh also worked as a reporter (stringer) with NBT Gurgaon. He pursued P.G. Diploma from South Campus, University of Delhi in 2013 and MAMC from Kurukshetra University in 2014. He Belongs to District Banda of Uttar Pradesh.

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