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97 वोटरों की कहानी ने खोली ECI की पोल? गोवा में ERO ने योग्य माना, फिर भी वोटर लिस्ट से गायब रहे नाम
Goa’s 97 Missing Voters: गोवा में 97 मतदाताओं को ERO ने योग्य माना, लेकिन अंतिम SIR वोटर लिस्ट में नाम नहीं जुड़ सके। ECINet के केंद्रीकरण और दिल्ली से सॉफ्टवेयर नियंत्रण को लेकर उठे सवाल।
Image Source- Social Media
Goa’s 97 Missing Voters: दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में जहां 90 करोड़ से ज्यादा मतदाता हैं, वहां 97 वोटरों के नाम शायद संख्या के लिहाज से बहुत बड़े न लगें, लेकिन गोवा के इन 97 वोटरों की कहानी अब राष्ट्रीय महत्व का सवाल बन गई है। वजह है निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) के कामकाज और मतदाता सूची (Electoral Roll) तैयार करने की प्रक्रिया पर उठ रहे सवाल।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, तीन सदस्यीय निर्वाचन आयोग में दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में आयोग द्वारा उठाए गए कदमों पर 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्ति दर्ज कराई। इन आपत्तियों में उन्हें जानकारी से दूर रखने से लेकर नए मतदाताओं को जोड़ने और नाम हटाने तक के मुद्दे शामिल थे।
दोनों चुनाव आयुक्तों ने खास तौर पर ईसीआईनेट (ECINet) के केंद्रीकरण और राज्य स्तर पर काम करने वाले जमीनी अधिकारियों की भूमिका कम होने को लेकर चेतावनी दी थी। अब गोवा की 97 वोटरों की कहानी में इसी आशंका का एक उदाहरण सामने आया है।
क्यों चर्चा में हैं 97 वोटरों के नाम?
17 फरवरी को, गोवा में विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision) के तहत अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने से सिर्फ चार दिन पहले, राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने दिल्ली स्थित निर्वाचन आयोग को एक ईमेल भेजा। यह सात दिनों में उनका आठवां ईमेल था।
इस ईमेल के साथ 97 मतदाताओं की सूची भेजी गई थी। इन सभी मामलों में गोवा के अपने निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (Electoral Registration Officers) यानी ईआरओ ने सुनवाई की थी, दस्तावेज देखे थे और सुप्रीम कोर्ट की ओर से तय प्रक्रिया के तहत उन्हें पात्र पाया था।
इन मतदाताओं के नाम पहले मतदाता सूची से हटाए जाने का फैसला लिया गया था, लेकिन ईआरओ ने बाद में दस्तावेज और आपत्तियां देखने के बाद माना कि उन फैसलों को पलटना जरूरी है।
समस्या यह थी कि ईआरओ के पास ऐसा करने का अधिकार सॉफ्टवेयर में मौजूद नहीं था। ईसीआईनेट (ECINet) में इन फैसलों को वापस लेने यानी रोलबैक करने की सुविधा उपलब्ध नहीं थी। इस सुविधा की अनुमति दिल्ली में निर्वाचन आयोग के आईटी विभाग के नियंत्रण में थी।
आयोग के अपने अधिकारी ने भी उठाया सवाल
18 फरवरी को निर्वाचन आयोग के उप चुनाव आयुक्त ने आईटी महानिदेशक सीमा खन्ना को लिखा कि आईटी सिस्टम सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार जरूरी कार्रवाई को रोक नहीं सकता। उन्होंने कहा कि ईआरओ और एईआरओ की ओर से लिए गए फैसले के मुताबिक अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित करने के लिए जरूरी सुविधा उपलब्ध कराई जाए।
इसके अगले दिन यानी 21 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित हुई। इंडियन एक्सप्रेस ने इन 97 नामों की जांच की और रिपोर्ट के मुताबिक 20 सितंबर तक ये सभी 97 नाम अंतिम सूची से गायब थे।
जब गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी संजय गोयल से पूछा गया कि पात्र पाए जाने के बावजूद कई मतदाताओं के नाम अंतिम विशेष गहन पुनरीक्षण सूची में क्यों नहीं आए, तो उन्होंने कहा कि जिन मतदाताओं के नाम तार्किक विसंगतियों (Logical Discrepancies) के कारण चिन्हित किए गए थे, उनमें शामिल किए जाने वाले मामलों की जानकारी निर्वाचन आयोग को दी गई थी।
उन्होंने यह भी कहा कि नाम शामिल नहीं करने का फैसला उनका नहीं था और ईसीआईनेट में ईआरओ स्तर पर मतदाताओं को दोबारा शामिल करने का कोई सिस्टम होना चाहिए।
97 वोटर क्या साबित करते हैं?
इन 97 मामलों को उन चिंताओं के उदाहरण के तौर पर देखा जा रहा है, जिन्हें दोनों चुनाव आयुक्त पिछले करीब एक साल से उठाते रहे हैं। कानून के मुताबिक प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची तैयार करने की जिम्मेदारी उसके निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी यानी ईआरओ की होती है। आम तौर पर यह जिम्मेदारी उप मंडल अधिकारी के पास होती है। ईआरओ दावों और आपत्तियों की सुनवाई करता है और हर नाम को लेकर फैसला लेता है।
लेकिन जनवरी से देश की हर मतदाता सूची ईसीआईनेट प्लेटफॉर्म पर मौजूद है। निर्वाचन आयोग ने अपने अलग-अलग सिस्टम को एक साथ लाने के लिए ईसीआईनेट शुरू किया है। इसका मतदाता सूची प्रबंधन मॉड्यूल ईरोनेट (ERONet) है। इस सिस्टम पर कोई ईआरओ क्या कर सकता है, यह दिल्ली में निर्वाचन आयोग के आईटी विभाग की ओर से तय की गई अनुमतियों पर निर्भर करता है।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट्स के मुताबिक, नवंबर से अगस्त के बीच चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने अपनी टिप्पणियों में कहा कि सॉफ्टवेयर का केंद्रीकृत नियंत्रण मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया को उन ईआरओ के हाथों से निकाल रहा है, जिन्हें कानून ने यह जिम्मेदारी दी है। मई में विवेक जोशी ने मतदाता सूची के डेटाबेस के धीरे-धीरे केंद्रीकरण यानी ग्रैजुअल सेंट्रलाइजेशन (Gradual Centralisation) का जिक्र किया था।
अगस्त में सुखबीर सिंह संधू ने कहा था कि ईआरओ, जिला निर्वाचन अधिकारियों यानी डीईओ और मुख्य निर्वाचन अधिकारियों यानी सीईओ के पास ईरोनेट पोर्टल का उचित और पूरा एक्सेस नहीं है। उन्होंने यह भी कहा था कि आईटी महानिदेशक को कानून के तहत मिलने वाली स्वतंत्रता और अधिकार के मुताबिक काम करने से वैधानिक अधिकारियों को रोकने का अधिकार नहीं है।
जब ईआरओ का फैसला भी काम नहीं आया
निर्वाचन आयोग की ओर से मतदाता सूची में गड़बड़ी के आरोपों के जवाब में यह कहा जाता रहा है कि किसी एक व्यक्ति के लिए मतदाता सूची में मनमाने तरीके से बदलाव करना संभव नहीं है। हजारों ईआरओ अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों की मतदाता सूची तैयार करते हैं।
लेकिन गोवा के इन 97 मामलों में सवाल यही है कि जब ईआरओ ने खुद मतदाता की सुनवाई की, दस्तावेज देखे और उसे पात्र पाया, तब भी उसका नाम अंतिम सूची में क्यों नहीं आया।
यहां ईआरओ ने मतदाता की सुनवाई की, दस्तावेज देखे और उसके पक्ष में फैसला लिया। लेकिन वह फैसला सिस्टम में दर्ज होकर अंतिम सूची में शामिल नहीं हो सका, क्योंकि उसे बदलने की सुविधा दिल्ली स्थित आईटी व्यवस्था के नियंत्रण में थी।
इंडियन एक्सप्रेस ने निर्वाचन आयोग की आईटी महानिदेशक सीमा खन्ना से पूछा कि अंतिम सूची प्रकाशित होने से पहले गोवा के लिए रोलबैक सुविधा क्यों नहीं दी गई। रिपोर्ट के मुताबिक इस सवाल का कोई जवाब नहीं मिला।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
तार्किक विसंगति यानी लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी (Logical Discrepancy) का मतलब यह नहीं है कि संबंधित व्यक्ति मतदाता नहीं है। यह उस तरह की असमानता है जिसे निर्वाचन आयोग का सॉफ्टवेयर किसी मतदाता को पिछली विशेष गहन पुनरीक्षण सूची में उसके माता-पिता या दादा-दादी से जोड़ते समय पहचानता है।
इसमें माता-पिता के नाम में अंतर, माता-पिता और बच्चे के बीच उम्र का अंतर 15 साल से कम या 50 साल से ज्यादा होना, पुरानी और नई मतदाता सूची में उम्र का सही तरीके से आगे नहीं बढ़ना, मतदाता की ओर से कोई दस्तावेज जमा नहीं करना या सिर्फ आधार जमा करना जैसी स्थितियां शामिल हो सकती हैं।
29 जनवरी को विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने तार्किक विसंगतियों के कारण चिन्हित लोगों के नाम ग्राम पंचायत भवनों, सार्वजनिक स्थानों, तालुका और उप मंडल कार्यालयों तथा शहरी वार्ड कार्यालयों में प्रदर्शित करने का निर्देश दिया था।
अदालत ने कहा था कि विसंगति का संक्षिप्त कारण भी बताया जाए और प्रभावित लोगों को दस्तावेज या आपत्ति दाखिल करने के लिए 10 दिन का समय दिया जाए। इसके बाद उनकी सुनवाई भी की जाए।
यह आदेश तमिलनाडु से जुड़ा था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जहां भी विशेष गहन पुनरीक्षण चल रहा है, वहां इन प्रक्रियात्मक निर्देशों का पालन सुनिश्चित किया जाए। 31 जनवरी को निर्वाचन आयोग ने इसे लागू करने के लिए पत्र जारी किया।
गोवा में सामने आए 649 लोग
गोवा ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश को लागू किया। तार्किक विसंगतियों वाले मतदाताओं की सूची सार्वजनिक की गई। मुख्य निर्वाचन अधिकारी के ईमेल के मुताबिक इसके बाद 649 मतदाता दस्तावेज या आपत्तियां लेकर सामने आए। ईआरओ और सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों यानी एईआरओ ने इन मामलों की जांच की।
इनमें 97 मामलों में अधिकारियों ने पाया कि संबंधित मतदाता अंतिम मतदाता सूची में शामिल किए जाने के योग्य हो गए हैं। मुख्य निर्वाचन अधिकारी के शब्दों में पहले लिया गया फैसला वापस लिया जाना जरूरी था।
लेकिन इसके बाद सबसे बड़ी दिक्कत सामने आई। ईसीआईनेट में पहले ही उन मतदाताओं को तार्किक विसंगति के आधार पर चिन्हित करने का फैसला दर्ज हो चुका था और ईआरओ के पास उसे वापस लेने का विकल्प ही नहीं था।
7 दिन में 8 बार गुहार
गोवा में रोलबैक सुविधा उपलब्ध कराने की मांग 22 जनवरी से ही की जा रही थी। 11 फरवरी को गोवा इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी और निर्वाचन आयोग के सॉफ्टवेयर विक्रेता टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज यानी टीसीएस को लिखा कि रोलबैक या रिवर्जन सुविधा और दस्तावेज दोबारा अपलोड करने का विकल्प अभी तक सिस्टम में उपलब्ध नहीं कराया गया है।
एजेंसी ने कहा कि ईसीआई और टीसीएस के संबंधित अधिकारियों को कई ईमेल के जरिए इसकी जानकारी दी जा चुकी है। इसके बाद मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने उसी दिन यह मामला दिल्ली में गोवा के प्रभारी वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त ज्ञानेश भारती को भेज दिया और सीमा खन्ना को भी इसकी जानकारी दी गई।
13 फरवरी को गोवा की ओर से कहा गया कि मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय की ओर से भेजे गए ईमेल और पत्रों का जवाब अभी तक नहीं मिला है। इसमें यह भी बताया गया कि ऐसे 97 मामले हैं, जिनमें रोलबैक विकल्प की जरूरत है, क्योंकि संबंधित मतदाताओं ने दस्तावेज और आपत्तियां देने के बाद अंतिम सूची में शामिल होने की पात्रता हासिल कर ली है।
14 फरवरी को दो अलग-अलग ईमेल भेजे गए। इनमें दोबारा जल्द से जल्द रोलबैक या रिवर्ट बैक की सुविधा और दस्तावेज दोबारा अपलोड करने का विकल्प देने का अनुरोध किया गया।
इसी दिन गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी संजय गोयल ने वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त ज्ञानेश भारती को औपचारिक पत्र भी भेजा। इसमें कहा गया कि पिछले दो दिनों में भेजे गए ईमेल का कोई जवाब नहीं मिला है।
15 फरवरी को गोवा की ओर से कहा गया कि रोलबैक विकल्प तत्काल जरूरी है और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का समय पर पालन कराने के लिए ईआरओ और एईआरओ को तुरंत कार्रवाई करने की सुविधा मिलनी चाहिए।
16 फरवरी को फिर कहा गया कि मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय की ओर से भेजे गए ईमेल और पत्रों का जवाब अभी तक नहीं मिला है।
17 फरवरी को 97 मामलों की पूरी सूची भेजी गई और कहा गया कि इन मामलों में ईआरओ और एईआरओ के पहले लिए गए फैसले वापस लिए जाने हैं, क्योंकि संबंधित मतदाता अंतिम मतदाता सूची में शामिल होने के पात्र पाए गए हैं।
18 फरवरी को दिल्ली में मतदाता सूची का काम देखने वाले उप चुनाव आयुक्त संजय कुमार ने सीमा खन्ना को लिखा कि ईआरओ और एईआरओ को कानून की धारा 21 और 21ए के तहत सुधारात्मक कार्रवाई करने की शक्तियां हैं। उन्होंने साफ कहा कि आईटी सिस्टम सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के मुताबिक जरूरी कार्रवाई को रोक नहीं सकता और ईआरओ के फैसले के अनुसार मतदाता सूची प्रकाशित करने के लिए जरूरी सुविधा उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
लेकिन 21 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित हुई और रिपोर्ट के मुताबिक इन 97 मतदाताओं के नाम उसमें शामिल नहीं थे।
97 में से 65 एक ही सीट के
इन 97 मतदाताओं में 65 लोग तलेइगाओ विधानसभा सीट से हैं। इस सीट का प्रतिनिधित्व बीजेपी की जेनिफर मोनसेराटे करती थीं, जिनका इस साल जुलाई में निधन हो गया। बाकी मतदाता सेंट क्रूज, कुम्बरजुआ, प्रियोल, मडगांव, बेनाउलिम और वेलिम विधानसभा सीटों से हैं।
इन लोगों के लिए मतदाता सूची से नाम बाहर होना सिर्फ वोट देने के अधिकार का सवाल नहीं है। गोवा में कई सरकारी योजनाओं में पात्रता तय करने के लिए मतदाता सूची का इस्तेमाल किया जाता है।
वोट नहीं तो सरकारी योजना भी नहीं
गोवा मेडिक्लेम योजना इसका एक उदाहरण है। इस योजना के तहत सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध नहीं होने वाले सुपर स्पेशियलिटी इलाज के लिए आर्थिक मदद दी जाती है।
इसमें डायलिसिस, एंजियोप्लास्टी, ओपन हार्ट सर्जरी, अंग प्रत्यारोपण, कीमोथेरेपी और कॉक्लियर इंप्लांट जैसे इलाज शामिल हैं। यह योजना राज्य के मतदाताओं के लिए उपलब्ध है।
ऐसे में जब इन 97 लोगों के नाम अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं हुए तो जमीनी स्तर पर काम करने वाले चुनाव अधिकारियों ने उन्हें दोबारा आवेदन करने के लिए कहा। इसके लिए उन्हें नए मतदाताओं के लिए इस्तेमाल होने वाला फॉर्म 6 भरने को कहा गया।
गोवा के इन 97 मतदाताओं की कहानी इसलिए अहम हो जाती है क्योंकि मामला सिर्फ 97 नामों का नहीं है। यह उस सवाल से जुड़ जाता है कि मतदाता सूची (Electoral Roll) तैयार करने का अंतिम नियंत्रण किसके पास है और अगर कानून के तहत जिम्मेदार ईआरओ किसी मतदाता को योग्य मानता है, तो क्या केंद्रीयकृत तकनीकी व्यवस्था उस फैसले को लागू करने से रोक सकती है।
इसी सवाल को लेकर चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से पिछले महीनों में दर्ज कराई गई आपत्तियों और गोवा के इन 97 मामलों के बीच समानता दिखाई देती है। एक तरफ कानून के तहत जमीनी स्तर पर ईआरओ को मतदाता सूची तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई है और दूसरी तरफ ईसीआईनेट जैसे केंद्रीय सिस्टम में तकनीकी अनुमति का नियंत्रण दिल्ली में है। गोवा के इन मामलों ने इसी टकराव को सामने ला दिया है।


