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'नाम जोड़ने पर रोक नहीं लगेगी', SIR मामले में हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग को सुनाई खरी-खरी
Goa SIR Case: गोवा में SIR के दौरान वोटर लिस्ट से हटाए गए एक परिवार के छह सदस्यों को हाई कोर्ट से राहत मिली है। अदालत ने चुनाव आयोग को 10 दिनों में नाम जोड़ने का आदेश दिया और स्टे की मांग खारिज कर दी।
Election Commission of India
Goa SIR Case: मतदाता सूची (Voter List) से नाम हटाने और जोड़ने को लेकर देशभर में जारी सियासी बहस के बीच बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) की गोवा पीठ ने निर्वाचन आयोग (Election Commission) को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने गोवा में एक परिवार के छह सदस्यों के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने के मामले में आयोग को उन्हें दोबारा शामिल करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि इन मतदाताओं के नाम सूची में जोड़ने की प्रक्रिया 10 दिनों के भीतर पूरी की जाए। खास बात यह रही कि आयोग की ओर से आदेश पर रोक लगाने की मांग भी अदालत ने खारिज कर दी।
चार दिनों तक चली सुनवाई के बाद गुरुवार (5 नवंबर) को जस्टिस वाल्मीकि मेनेजेस और जस्टिस अमित जामसांडेकर की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया। मामला गोवा के सांताक्रूज विधानसभा क्षेत्र का है, जहां हाल ही में हुए विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision-SIR) के दौरान एक परिवार के छह सदस्यों के नाम अंतिम मतदाता सूची से हटा दिए गए थे। प्रभावित मतदाताओं ने नाम हटाने और उनके फॉर्म 8 (Form 8) आवेदनों को खारिज किए जाने के खिलाफ हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
10 दिनों के भीतर वोटर लिस्ट में जोड़ने होंगे नाम
अदालत ने याचिकाकर्ताओं की मांग स्वीकार करते हुए सांताक्रूज निर्वाचन क्षेत्र के बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) को निर्देश दिया कि वह आदेश की तारीख से 10 दिनों के भीतर परिवार के सभी छह सदस्यों के नाम मतदाता सूची में शामिल करें।
सुनवाई के दौरान निर्वाचन आयोग ने दलील दी थी कि SIR से जुड़ा मामला सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में लंबित है, इसलिए हाई कोर्ट को फिलहाल इस याचिका पर सुनवाई टाल देनी चाहिए। हालांकि, खंडपीठ ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट का मानना था कि गोवा में पुनरीक्षण की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और मौजूदा मामला दूसरी जगहों पर SIR को लेकर चल रही चुनौतियों से अलग है।
ECI ने मांगा स्टे, कोर्ट ने साफ कर दिया इनकार
फैसला सुनाए जाने के बाद निर्वाचन आयोग के वकील गौरीश अग्नि ने आदेश पर रोक लगाने की मांग की। लेकिन अदालत ने इस अनुरोध को ठुकरा दिया। पीठ ने स्पष्ट कहा कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने के आदेश पर रोक नहीं लगाई जा सकती। आयोग चाहे तो इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकता है।
अदालत का यह रुख इसलिए भी अहम है, क्योंकि आयोग ने सुनवाई टालने के लिए सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का हवाला दिया था, जिसमें हाई कोर्ट को SIR से संबंधित रिट याचिकाओं की कार्यवाही फिलहाल स्थगित रखने के लिए कहा गया था। आयोग का तर्क था कि गोवा में दाखिल याचिका पूरी पुनरीक्षण प्रक्रिया और मतदाताओं के नाम हटाए जाने से संबंधित है।
हालांकि, हाई कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि गोवा का मामला अलग है, क्योंकि वहां SIR की प्रक्रिया पहले ही पूरी हो चुकी है। पीठ ने यह भी कहा कि अपील के स्तर पर आवेदनों का खारिज होना वास्तव में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने का ही नतीजा है।
फॉर्म 8 को लेकर निर्वाचन आयोग की व्यवस्था पर सवाल
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने निर्वाचन आयोग की स्वचालित प्रणाली (Automated System) पर भी सवाल उठाए। यह व्यवस्था फॉर्म 8 के तहत पते में बदलाव के लिए दिए गए आवेदनों को यांत्रिक तरीके से खारिज कर रही थी। अदालत ने इस प्रक्रिया को लेकर चिंता जताई और कहा कि इस तरह की स्वचालित अस्वीकृतियां समावेशी मतदाता सूची (Inclusive Voter List) के उद्देश्य को कमजोर कर सकती हैं।
पीठ ने टिप्पणी की कि मतदाताओं से उनके पुराने निवास स्थान के लिए एन्यूमरेशन फॉर्म (Enumeration Form) पर हस्ताक्षर करवाना उन्हें गलत घोषणा करने की स्थिति में डालने जैसा है। अदालत ने सवाल उठाया कि यदि कोई व्यक्ति वास्तव में अपना निवास स्थान बदल चुका है, तो उसके आवेदन को सीधे खारिज करने के बजाय कुछ समय के लिए लंबित क्यों नहीं रखा जा सकता?
कोर्ट का सुझाव था कि ऐसे आवेदनों को होल्ड पर रखा जाए, ताकि स्थान बदलने वाले मतदाताओं को अपने मताधिकार (Right to Vote) से वंचित न होना पड़े।
'जनभावना' के आधार पर नहीं चल सकती कानूनी प्रक्रिया
सुनवाई के दौरान अदालत ने निर्वाचन आयोग की ओर से अपनी संशोधन प्रक्रिया को सही ठहराने के लिए जनभावना का हवाला दिए जाने पर भी आपत्ति जताई। पीठ ने स्पष्ट किया कि कानूनी प्रक्रिया बाहरी जनधारणा या लोगों की भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि वैधानिक प्रावधानों (Statutory Provisions) के अनुसार संचालित होनी चाहिए।
इस फैसले में हाई कोर्ट ने न केवल एक परिवार के छह सदस्यों को मतदाता सूची में दोबारा शामिल करने का निर्देश दिया, बल्कि फॉर्म 8 के आवेदनों को स्वचालित तरीके से खारिज करने की व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं।


