करोड़ों का बजट, फिर भी जमीन पर बैठकर पढ़ेंगे लाखों बच्चे, यूपी समेत 4 राज्यों में फर्नीचर संकट

New Delhi: यूपी, हरियाणा, पंजाब और उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों में फर्नीचर की कमी से लाखों बच्चे प्रभावित हैं। बजट स्वीकृति के बावजूद खरीद और आपूर्ति में देरी बनी हुई है।

Newstrack Network
Published on: 9 Oct 2026 8:28 PM IST
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New Delhi: सरकारी विद्यालयों को आधुनिक बनाने, बच्चों को बेहतर सुविधाएं देने और शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए हर साल हजारों करोड़ रुपये की योजनाएं बनाई जाती हैं। कहीं स्मार्ट स्कूल खोले जा रहे हैं, कहीं डिजिटल कक्षाएं विकसित की जा रही हैं और कहीं विद्यालयों को टाटपट्टी मुक्त बनाने की घोषणाएं हो रही हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और उत्तराखंड के सरकारी विद्यालयों की स्थिति को लेकर सामने आई एक रिपोर्ट इन घोषणाओं के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल उठाती है। रिपोर्ट के अनुसार चारों राज्यों में लगभग 55 लाख बच्चों के लिए पर्याप्त फर्नीचर उपलब्ध नहीं है। इनमें सबसे अधिक संख्या उत्तर प्रदेश के बच्चों की है। सर्दियां शुरू होने वाली हैं, लेकिन बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को इस बार भी जमीन या टाटपट्टी पर बैठकर पढ़ाई करनी पड़ सकती है। कई जगह बजट स्वीकृत हो चुका है, कहीं धनराशि जारी करने की जानकारी है, लेकिन फर्नीचर खरीदने और विद्यालयों तक पहुंचाने की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी है।

इस समस्या की गंभीरता केवल इस बात में नहीं है कि बच्चों को मेज और कुर्सियां उपलब्ध नहीं कराई गई हैं। बड़ा प्रश्न यह है कि जब सरकारों ने फर्नीचर की आवश्यकता स्वीकार कर ली, उसके लिए बजट का प्रावधान भी किया और विद्यालयों को टाटपट्टी मुक्त बनाने की समयसीमा तक घोषित कर दी, तब बच्चों को सुविधा मिलने में इतनी देरी क्यों हो रही है। चारों राज्यों की स्थितियां अलग-अलग हैं, लेकिन समस्या का एक साझा पहलू सामने आता है। सरकारी निर्णय और उसका लाभ बच्चों तक पहुंचने के बीच लंबा अंतर बना हुआ है। उत्तर प्रदेश में लगभग 1,200 करोड़ रुपये के बजट की स्वीकृति के बावजूद खरीद अधूरी बताई गई है। हरियाणा में 200 करोड़ रुपये की फर्नीचर खरीद प्रक्रिया महीनों से लंबित है। उत्तराखंड में धनराशि जारी होने के बाद भी करीब दस हजार बच्चों को फर्नीचर नहीं मिला है। पंजाब में कुछ विद्यालयों में पुराने और क्षतिग्रस्त फर्नीचर की समस्या बनी हुई है।

उत्तर प्रदेश : 45 हजार स्कूलों में फर्नीचर नहीं, करीब 50 लाख बच्चे प्रभावित

उत्तर प्रदेश में सरकारी प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति इस रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में लगभग 1.33 लाख से अधिक बेसिक विद्यालय हैं, जिनमें करीब 1.25 करोड़ विद्यार्थी पढ़ते हैं। इनमें कक्षा एक से पांच तक के लगभग 45 हजार प्राथमिक विद्यालयों में पर्याप्त फर्नीचर उपलब्ध नहीं है। इन विद्यालयों में पढ़ने वाले लगभग 50 लाख बच्चों को जमीन पर बैठकर पढ़ाई करनी पड़ती है या उनके लिए पर्याप्त मेज-कुर्सियों की व्यवस्था नहीं है। इतनी बड़ी संख्या में बच्चों का प्रभावित होना बताता है कि यह समस्या कुछ विद्यालयों तक सीमित नहीं है, बल्कि प्राथमिक शिक्षा की बुनियादी सुविधाओं से जुड़ा व्यापक प्रश्न है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बेसिक शिक्षा विभाग की ओर से विद्यालयों में फर्नीचर उपलब्ध कराने के लिए 1,200 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत किए जाने की जानकारी दी गई है। रिपोर्ट में इस स्वीकृति को वित्तवर्ष 2025-26 से जोड़ा गया है। हालांकि अक्टूबर 2026 तक इस धनराशि में से कितनी रकम वास्तव में जारी हुई, कितनी खर्च की गई और कितने विद्यालयों के लिए खरीद आदेश जारी हुए, इसका विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं है। इसलिए बजट स्वीकृत होने और पूरी धनराशि खर्च के लिए उपलब्ध हो जाने को एक ही स्थिति नहीं माना जा सकता। इसके बावजूद यदि इतने बड़े बजट के बाद भी लाखों बच्चों को फर्नीचर नहीं मिल पाया है, तो खरीद और वितरण की प्रक्रिया की समीक्षा आवश्यक है।

उत्तर प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा का संचालन व्यापक प्रशासनिक ढांचे के माध्यम से होता है। विद्यालयों की जरूरतों का आकलन, बच्चों की संख्या के अनुसार फर्नीचर का निर्धारण, खरीद प्रक्रिया, गुणवत्ता की जांच और अंतिम आपूर्ति जैसे कई चरण होते हैं। इन चरणों के बीच समन्वय नहीं होने पर बजट उपलब्ध रहने के बावजूद विद्यालयों में सामान पहुंचने में देरी हो सकती है। लेकिन प्रशासनिक प्रक्रिया की जटिलता बच्चों की बुनियादी आवश्यकताओं को लंबे समय तक अधूरा रखने का पर्याप्त कारण नहीं हो सकती।

कक्षा एक से पांच तक के बच्चों के लिए फर्नीचर की आवश्यकता भी अलग होती है। छोटे बच्चों की ऊंचाई और आयु के अनुसार मेज तथा बैठने की व्यवस्था होनी चाहिए। यदि विद्यालय में उपलब्ध फर्नीचर बच्चों के आकार के अनुरूप नहीं है, तो उसकी उपयोगिता सीमित हो सकती है। इसलिए फर्नीचर खरीदते समय केवल डेस्क की संख्या पूरी करना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी सुनिश्चित करना होगा कि बच्चे आराम से बैठ सकें, कॉपी पर लिख सकें और पुस्तकें रखकर पढ़ाई कर सकें।

उत्तर प्रदेश के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब विद्यालयवार वास्तविक आवश्यकता की पहचान और समयबद्ध आपूर्ति की है। यदि लगभग 45 हजार विद्यालयों में फर्नीचर की कमी का अनुमान सही है, तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि किन जिलों में सबसे अधिक बच्चे प्रभावित हैं, किन विद्यालयों में बिल्कुल फर्नीचर नहीं है और कहां उपलब्ध फर्नीचर की संख्या कम है। बिना ऐसे विवरण के यह तय करना कठिन होगा कि खरीद और वितरण में किसे प्राथमिकता दी जाए।

हरियाणा : टाटपट्टी मुक्त विद्यालयों की घोषणा, लेकिन खरीद प्रक्रिया अधूरी

हरियाणा सरकार ने सरकारी विद्यालयों को टाटपट्टी मुक्त बनाने का लक्ष्य घोषित किया था। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने एक नवंबर तक प्रदेश के सरकारी विद्यालयों में बच्चों के लिए फर्नीचर उपलब्ध कराने की बात कही थी। इसके लिए शिक्षा विभाग को ड्यूल डेस्क खरीदने के उद्देश्य से लगभग 200 करोड़ रुपये की स्वीकृति मिलने की जानकारी दी गई है। लेकिन उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार खरीद की प्रक्रिया लंबे समय से अधूरी है और लगभग 3.80 लाख बच्चों के लिए पर्याप्त फर्नीचर उपलब्ध नहीं हो सका है।

रिपोर्ट में हरियाणा के लगभग 14 हजार विद्यालयों का उल्लेख है। हालांकि यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यह राज्य के विद्यालयों की व्यापक संख्या है, न कि आवश्यक रूप से उन सभी विद्यालयों की संख्या जहां फर्नीचर बिल्कुल उपलब्ध नहीं है। प्रभावित बच्चों की संख्या लगभग 3.80 लाख बताई गई है। इन बच्चों को आगामी सर्दियों में भी जमीन पर बैठकर पढ़ना पड़ सकता है।

फर्नीचर खरीद की प्रक्रिया लगभग छह से सात महीने से लंबित होने की जानकारी दी गई है। निविदा संबंधी औपचारिकताएं पूरी नहीं होने के कारण आपूर्ति शुरू नहीं हो सकी है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि संबंधित कंपनियों को अंतिम मंजूरी मिलने के बाद ड्यूल डेस्क की आपूर्ति करने में लगभग 135 दिन लग सकते हैं। यदि यह समयसीमा लागू होती है, तो अनेक विद्यालयों में फरवरी 2027 से पहले फर्नीचर पहुंचना कठिन हो सकता है। हालांकि वास्तविक आपूर्ति कब शुरू होगी और कितने विद्यालयों तक किस तारीख को पहुंचेगी, यह अंतिम खरीद आदेशों पर निर्भर करेगा।

हरियाणा के शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव विजय दाहिया ने खरीद प्रक्रिया में कुछ अड़चनें आने और समय लगने की बात स्वीकार की है। इससे स्पष्ट है कि सरकार द्वारा घोषित लक्ष्य और खरीद की वास्तविक प्रगति के बीच अंतर बना हुआ है।

यह स्थिति प्रशासनिक योजना के एक महत्वपूर्ण पहलू की ओर संकेत करती है। यदि सरकार किसी निश्चित तारीख तक सभी विद्यालयों को फर्नीचर उपलब्ध कराने का लक्ष्य घोषित करती है, तो खरीद की मंजूरी, निविदा, निर्माण और वितरण की समयसीमा उसी के अनुरूप निर्धारित होनी चाहिए। यदि केवल आपूर्ति में चार महीने से अधिक समय लग सकता है, तो खरीद प्रक्रिया को अंतिम समय तक लंबित रखना निर्धारित लक्ष्य को प्रभावित करेगा।

उत्तराखंड : 1.60 करोड़ रुपये जारी, फिर भी 9,800 बच्चों को फर्नीचर नहीं

उत्तराखंड में सरकारी विद्यालयों की संख्या और विद्यार्थियों का अनुपात उत्तर प्रदेश की तुलना में कम है, लेकिन वहां भी फर्नीचर की कमी सामने आई है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार राज्य के सभी 13 जिलों के विद्यालयों के लिए लगभग एक करोड़ 60 लाख रुपये की धनराशि जारी की गई है। इसके बावजूद करीब 9,800 बच्चों के लिए पर्याप्त फर्नीचर उपलब्ध नहीं हो पाया है।

रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड में कक्षा एक से आठ तक के 13,377 सरकारी विद्यालय हैं, जिनमें 3,25,366 विद्यार्थी पढ़ते हैं। इनमें लगभग 9,800 बच्चों के लिए फर्नीचर की कमी बताई गई है। यह संख्या राज्य के कुल विद्यार्थियों की तुलना में कम दिखाई दे सकती है, लेकिन जिन विद्यालयों में बच्चों को जमीन पर बैठना पड़ता है, उनके लिए समस्या उतनी ही महत्वपूर्ण है।

उत्तराखंड में इस कमी को दूर करने के लिए आसपास के बंद हो चुके विद्यालयों से उपयोगी फर्नीचर दूसरे स्कूलों में स्थानांतरित करने की योजना का उल्लेख किया गया है। यह व्यवस्था तत्काल राहत दे सकती है। यदि किसी बंद विद्यालय में मेज-कुर्सियां अच्छी स्थिति में रखी हैं, तो उनका उपयोग दूसरे विद्यालयों में किया जाना संसाधनों के बेहतर प्रबंधन का उदाहरण हो सकता है। हालांकि यह सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि स्थानांतरित किया जाने वाला फर्नीचर सुरक्षित, मजबूत और बच्चों की आयु के अनुरूप हो।

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में विद्यालयों तक सामान पहुंचाने की अलग चुनौतियां भी हैं। दूरस्थ गांवों में परिवहन और आपूर्ति की व्यवस्था मैदानी क्षेत्रों जैसी नहीं होती। इसलिए फर्नीचर की खरीद के साथ उसे अंतिम विद्यालय तक पहुंचाने की योजना भी आवश्यक है। यदि धनराशि जारी होने के बाद भी विद्यालयों तक सामान नहीं पहुंचता, तो उसका उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता।

पंजाब : पांच प्रतिशत विद्यालयों में फर्नीचर की कमी, स्मार्ट स्कूल की स्थिति पर सवाल

पंजाब में फर्नीचर की कमी की समस्या कुछ अलग रूप में सामने आई है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार राज्य के लगभग पांच प्रतिशत सरकारी विद्यालयों में पर्याप्त मेज-कुर्सियां नहीं हैं। रिपोर्ट में कुल सरकारी विद्यालयों की संख्या 27,233 और विद्यार्थियों की संख्या 59.04 लाख बताई गई है। हालांकि इन आंकड़ों के शैक्षणिक वर्ष और विद्यालयों की श्रेणियों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। इसलिए इन्हें उपलब्ध रिपोर्ट के आंकड़ों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

पंजाब में अनेक विद्यालयों में पुराना फर्नीचर बदलने की आवश्यकता भी बताई गई है। पिछले वर्ष आई बाढ़ के कारण लगभग 3,200 सरकारी विद्यालयों और उनमें उपलब्ध सामान को नुकसान पहुंचने की जानकारी दी गई है। इस कारण कुछ विद्यालयों में पहले से उपलब्ध फर्नीचर भी प्रभावित हुआ। बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा के बाद विद्यालयों में केवल भवन की मरम्मत ही पर्याप्त नहीं होती। बच्चों की पढ़ाई के लिए आवश्यक फर्नीचर, पुस्तकें, शैक्षणिक सामग्री और अन्य उपकरणों की उपलब्धता भी सुनिश्चित करनी होती है।

डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट पंजाब के प्रधान दिग्विजय पाल शर्मा ने विद्यालयों में फर्नीचर की कमी को लेकर चिंता जताई है। दूसरी ओर शिक्षा मंत्री हरजोत सिंह बैंस का कहना है कि कुछ विद्यालयों में कमियां हैं और उन्हें दूर करने की प्रक्रिया चल रही है। इन दोनों पक्षों के बीच वास्तविक स्थिति का आकलन विद्यालयवार उपलब्ध सुविधाओं के आधार पर किया जा सकता है।

पंजाब के फाजिल्का जिले में बस्ती हजूर सिंह वाली स्थित सरकारी प्राइमरी स्मार्ट स्कूल की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक बताई गई है। उपलब्ध समाचार के अनुसार वहां बच्चों को बिना छत वाले कमरों में पढ़ना पड़ रहा है। यदि यह स्थिति वर्तमान में भी बनी हुई है, तो मामला केवल फर्नीचर की कमी का नहीं, बल्कि विद्यालय भवन की सुरक्षा और बच्चों को उपयुक्त शैक्षणिक वातावरण उपलब्ध कराने का भी है।

स्मार्ट स्कूल की अवधारणा का उद्देश्य आधुनिक सुविधाओं के माध्यम से शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना है। लेकिन किसी विद्यालय में सुरक्षित भवन, पर्याप्त फर्नीचर और आवश्यक बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं, तो केवल स्मार्ट स्कूल का दर्जा मिलने से बच्चों की वास्तविक परिस्थितियां नहीं बदलतीं।

फर्श पर बैठकर पढ़ने से बच्चों की पढ़ाई पर क्या असर पड़ता है?

विद्यालयों में फर्नीचर की कमी को सामान्य असुविधा समझना उचित नहीं होगा। बच्चों को प्रतिदिन कई घंटे पढ़ाई करनी होती है। इस दौरान उन्हें बैठने, लिखने, पुस्तकें पढ़ने और शिक्षक द्वारा दिए गए कार्य पूरे करने के लिए उपयुक्त स्थान चाहिए। यदि मेज उपलब्ध नहीं है, तो बच्चों को कॉपी जमीन पर रखकर या गोद में रखकर लिखना पड़ सकता है। लंबे समय तक ऐसी स्थिति में पढ़ाई करना असुविधाजनक हो सकता है।

सर्दियों में समस्या और बढ़ सकती है। उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में दिसंबर और जनवरी के दौरान तापमान काफी नीचे चला जाता है। ऐसे मौसम में ठंडे फर्श पर बैठना बच्चों के लिए असहज हो सकता है, विशेष रूप से उन विद्यालयों में जहां कमरों में पर्याप्त धूप या अन्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। हालांकि केवल जमीन पर बैठने से किसी विशेष बीमारी का होना निश्चित नहीं है, लेकिन बच्चों की सुविधा, एकाग्रता और शारीरिक स्थिति के लिए उपयुक्त बैठने की व्यवस्था महत्वपूर्ण है।

छोटे बच्चों के लिए लिखने की सही ऊंचाई और शरीर को पर्याप्त सहारा मिलना भी आवश्यक है। यदि बच्चे लगातार झुककर लिखते हैं या कॉपी रखने के लिए उपयुक्त सतह नहीं मिलती, तो उन्हें थकान और असुविधा हो सकती है। दिव्यांग बच्चों और विशेष शारीरिक जरूरतों वाले विद्यार्थियों के लिए उपयुक्त फर्नीचर का महत्व और अधिक है।

शिक्षा का अधिकार केवल विद्यालय में प्रवेश दिलाने तक सीमित नहीं है। बच्चों को ऐसा वातावरण उपलब्ध कराना भी जरूरी है जिसमें वे सम्मानजनक और सुविधाजनक परिस्थितियों में पढ़ सकें। इसलिए फर्नीचर की उपलब्धता को विद्यालय की बुनियादी आवश्यकताओं में शामिल किया जाना चाहिए।

बजट स्वीकृत होने के बाद भी फर्नीचर क्यों नहीं पहुंचता?

चार राज्यों की स्थिति से एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रश्न सामने आता है। सरकारें विद्यालयों के लिए बजट स्वीकृत करती हैं, लेकिन वास्तविक सुविधा बच्चों तक पहुंचने में कई महीने लग जाते हैं। इसका एक कारण यह है कि बजट स्वीकृति, धनराशि जारी करना, खरीद आदेश देना और सामान की आपूर्ति अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। इन चरणों के बीच देरी होने पर पूरी योजना प्रभावित हो सकती है।

फर्नीचर की खरीद के लिए पहले विद्यालयों की वास्तविक आवश्यकता निर्धारित करनी होती है। इसके बाद फर्नीचर के आकार, गुणवत्ता, सामग्री और कीमत के मानक तय किए जाते हैं। निविदा प्रक्रिया पूरी होने के बाद आपूर्तिकर्ताओं को निर्माण और वितरण के लिए समय दिया जाता है। अंत में विद्यालयों को सामान प्राप्त होने और उसकी गुणवत्ता की पुष्टि आवश्यक होती है।

इन सभी प्रक्रियाओं का उद्देश्य सार्वजनिक धन का सही उपयोग सुनिश्चित करना है। लेकिन यदि आवश्यक स्वीकृतियां समय पर नहीं मिलतीं या निविदा प्रक्रिया बार-बार लंबित होती है, तो बच्चों को सुविधाएं मिलने में देरी हो सकती है। इसलिए खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता और समयबद्धता, दोनों का महत्व है।

उत्तर प्रदेश में 1,200 करोड़ रुपये के बजट और हरियाणा में 200 करोड़ रुपये की खरीद योजना के संदर्भ में यह जानकारी महत्वपूर्ण होगी कि कितने विद्यालयों के लिए खरीद आदेश जारी हुए हैं, कितने डेस्क की आपूर्ति हो चुकी है और कितने विद्यालय अभी प्रतीक्षा में हैं। केवल बजट की घोषणा या स्वीकृति के आधार पर योजना की सफलता का आकलन नहीं किया जा सकता।

आधुनिक शिक्षा की योजनाओं के बीच बुनियादी सुविधाओं का सवाल

पिछले कुछ वर्षों में सरकारी विद्यालयों में डिजिटल शिक्षा, स्मार्ट कक्षाओं और तकनीकी उपकरणों पर विशेष जोर दिया गया है। यह शिक्षा व्यवस्था के विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन इसके साथ विद्यालयों में सुरक्षित भवन, पर्याप्त कक्षाएं, पेयजल, शौचालय, बिजली और फर्नीचर जैसी बुनियादी सुविधाएं भी आवश्यक हैं।

किसी विद्यालय में स्मार्ट बोर्ड या कंप्यूटर उपलब्ध होना उपयोगी है, लेकिन यदि बच्चों के लिए बैठने और लिखने की उचित व्यवस्था नहीं है, तो शैक्षणिक वातावरण अधूरा रह जाता है। इसी प्रकार फर्नीचर उपलब्ध होने के बाद भी शिक्षकों की कमी, खराब भवन या अन्य आवश्यक सुविधाओं का अभाव हो, तो शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।

इसलिए विद्यालयों के आधुनिकीकरण का मूल्यांकन केवल उपकरणों की संख्या या योजनाओं पर हुए खर्च से नहीं होना चाहिए। यह देखना अधिक महत्वपूर्ण है कि विद्यालय में पढ़ने वाले प्रत्येक बच्चे को वास्तव में कौन-कौन सी सुविधाएं उपलब्ध हैं।

चार राज्यों के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती

उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और उत्तराखंड के सामने अब फर्नीचर की कमी दूर करने के लिए अलग-अलग स्तर पर कार्रवाई की आवश्यकता है। उत्तर प्रदेश में सबसे पहले लगभग 45 हजार प्रभावित विद्यालयों की वास्तविक आवश्यकता का अद्यतन विवरण तैयार करना महत्वपूर्ण होगा। हरियाणा में लंबित खरीद प्रक्रिया पूरी कर आपूर्ति की विश्वसनीय समयसीमा निर्धारित करनी होगी। उत्तराखंड में उपलब्ध संसाधनों के पुनर्वितरण और नई खरीद के बीच समन्वय आवश्यक है। पंजाब में पुराने तथा क्षतिग्रस्त फर्नीचर को बदलने के साथ भवन संबंधी समस्याओं का समाधान भी जरूरी होगा।

इस पूरी प्रक्रिया में विद्यालयवार जानकारी सार्वजनिक करने से जवाबदेही बढ़ सकती है। यदि प्रत्येक जिले के लिए यह स्पष्ट हो कि कितने विद्यालयों में फर्नीचर की कमी है, कितने डेस्क स्वीकृत हुए हैं और कितने विद्यालयों तक सामान पहुंच चुका है, तो योजना की प्रगति का आकलन आसान होगा।

यह भी आवश्यक है कि फर्नीचर खरीदते समय बच्चों की संख्या के साथ उनकी आयु और शारीरिक जरूरतों को ध्यान में रखा जाए। केवल किसी विद्यालय को निश्चित संख्या में डेस्क उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं होगा, यदि वे वहां पढ़ने वाले बच्चों के उपयोग के अनुरूप नहीं हैं।

शिक्षा पर खर्च का वास्तविक परिणाम बच्चों तक पहुंचना चाहिए

चार राज्यों के सरकारी विद्यालयों में फर्नीचर की कमी से जुड़ी यह रिपोर्ट शिक्षा व्यवस्था के एक बुनियादी प्रश्न को सामने लाती है। सरकारी योजनाओं की सफलता केवल उनके लिए स्वीकृत बजट से नहीं, बल्कि बच्चों तक पहुंचने वाली वास्तविक सुविधाओं से तय होती है। उत्तर प्रदेश में करीब 50 लाख, हरियाणा में 3.80 लाख और उत्तराखंड में लगभग 9,800 बच्चों के लिए फर्नीचर की कमी के दावे अपने आप में गंभीर हैं। पंजाब में भी कुछ विद्यालयों की स्थिति चिंता पैदा करती है। हालांकि चारों राज्यों के लिए बताए गए लगभग 55 लाख बच्चों के संयुक्त आंकड़े की आधिकारिक पुष्टि अभी आवश्यक है।

सर्दियां शुरू होने से पहले इन विद्यालयों में फर्नीचर पहुंचाने की चुनौती और महत्वपूर्ण हो गई है। जिन बच्चों को रोजाना कई घंटे विद्यालय में बिताने होते हैं, उनके लिए बैठने की उपयुक्त व्यवस्था कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि पढ़ाई की सामान्य आवश्यकता है।

सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि जब फर्नीचर की कमी पहले से पहचानी जा चुकी है और उसके लिए धनराशि का प्रावधान भी किया गया है, तब लाखों बच्चों को जमीन पर बैठकर पढ़ाई क्यों करनी पड़ रही है। इस प्रश्न का उत्तर केवल नई घोषणाओं से नहीं मिलेगा। इसके लिए खरीद प्रक्रिया पूरी करना, समय पर आपूर्ति सुनिश्चित करना और विद्यालय स्तर पर सुविधाओं की वास्तविक उपलब्धता की निगरानी करना आवश्यक होगा। शिक्षा पर सार्वजनिक खर्च का उद्देश्य तभी पूरा माना जा सकेगा जब उसका लाभ विद्यालयों में पढ़ रहे बच्चों तक पहुंचे।

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