Newstrack Special: भारत के 6 राज्यों में हैं 72 विशेष सीटें, कौन बन सकता है इनका मतदाता?

Who Can Vote in Graduate Constituency: भारत में स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र क्या हैं? जानिए किन राज्यों में ये सीटें हैं, कौन वोट डाल सकता है, पात्रता के नियम क्या हैं और संविधान के अनुच्छेद 171 में इसकी व्यवस्था क्यों की गई है।

Yogesh Mishra
Published on: 31 Oct 2026 1:53 PM IST
Who Can Vote in Graduate Constituency | Who Can Vote in Teacher Constituency | Newstrack Hindi
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Who Can Vote in Graduate Constituency | Who Can Vote in Teacher Constituency | Newstrack Hindi

Who Can Vote in Graduate Constituency: भारत के लोकतंत्र का एक बुनियादी सिद्धांत है कि हर पात्र नागरिक के वोट का मूल्य बराबर होता है। लोकसभा और विधानसभा चुनावों में अमीर-गरीब, पढ़े-लिखे और कम पढ़े-लिखे, शिक्षक, किसान, मजदूर और व्यापारी सभी को समान रूप से वोट देने का अधिकार है। लेकिन इसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कुछ ऐसे निर्वाचन क्षेत्र भी हैं, जहाँ हर नागरिक वोट नहीं डाल सकता। यहाँ मतदान का अधिकार केवल तय योग्यता रखने वाले स्नातकों या शिक्षकों को मिलता है। इन्हें स्नातक निर्वाचन क्षेत्र और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र कहा जाता है।

देश के छह राज्यों - उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में ऐसी व्यवस्था है। इन राज्यों की विधान परिषदों में स्नातकों के लिए कुल 36 और शिक्षकों के लिए 36 सीटें निर्धारित हैं। यानी कुल 72 सदस्य ऐसे विशेष मतदाता समूहों द्वारा चुने जाते हैं।

इस व्यवस्था को संवैधानिक आधार 26 जनवरी, 1950 को मिला, जब भारतीय संविधान लागू हुआ। हालाँकि इसकी ऐतिहासिक जड़ें ब्रिटिश शासन के समय की चुनाव व्यवस्था में मिलती हैं।

सवाल यह है कि जब शिक्षक और स्नातक सामान्य चुनावों में भी वोट डालते हैं, तो उन्हें विधान परिषद के चुनाव में अलग से मतदान का अधिकार क्यों दिया गया है? संविधान बनाने वालों ने इस व्यवस्था को क्यों स्वीकार किया? और आज जब देश में उच्च शिक्षा का काफी विस्तार हो चुका है, तब क्या इन विशेष निर्वाचन क्षेत्रों की जरूरत पहले जैसी ही है?

स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र क्या होते हैं?

भारत के कुछ राज्यों में विधानसभा के साथ विधान परिषद भी होती है। विधानसभा को राज्य विधानमंडल का निचला सदन और विधान परिषद को उच्च सदन कहा जाता है। इनकी तुलना कुछ हद तक संसद की लोकसभा और राज्यसभा से की जा सकती है। हालाँकि दोनों की शक्तियाँ और सदस्यों को चुनने का तरीका पूरी तरह एक जैसा नहीं है।

विधानसभा के सदस्य सीधे आम मतदाताओं द्वारा चुने जाते हैं। इसके विपरीत विधान परिषद के सदस्यों का चुनाव अलग-अलग तरीकों से होता है। कुछ सदस्य विधानसभा के विधायक चुनते हैं, कुछ का चुनाव नगर निकायों और स्थानीय संस्थाओं के प्रतिनिधि करते हैं। कुछ सदस्य स्नातक मतदाताओं और कुछ शिक्षक मतदाताओं द्वारा चुने जाते हैं। इसके अलावा कुछ सदस्यों को राज्यपाल मनोनीत करते हैं।

इस व्यवस्था के पीछे सोच यह थी कि विधान परिषद केवल विधानसभा की दूसरी प्रति न बने। उसमें आम राजनीतिक प्रतिनिधियों के साथ शिक्षा और स्थानीय स्वशासन से जुड़े लोगों की भागीदारी भी हो।

यहाँ एक बात समझना जरूरी है। स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से चुना गया सदस्य केवल स्नातकों के लिए काम नहीं करता। इसी तरह शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से चुना गया सदस्य सिर्फ शिक्षकों के मुद्दे नहीं उठाता। दोनों विधान परिषद के पूर्ण सदस्य होते हैं और राज्य से जुड़े सभी विधायी मामलों में हिस्सा ले सकते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि उन्हें चुनने वाले मतदाता एक विशेष योग्यता रखते हैं।

किन राज्यों में कितनी सीटें हैं?

देश के छह राज्यों में विधान परिषदें काम कर रही हैं। इन सभी में स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की सीटें निर्धारित हैं।

उत्तर प्रदेश की विधान परिषद में कुल 100 सदस्य हैं। इनमें आठ सदस्य स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों और आठ सदस्य शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों से चुने जाते हैं। यानी इन दोनों श्रेणियों की कुल 16 सीटें हैं।

बिहार की 75 सदस्यीय विधान परिषद में स्नातकों और शिक्षकों के लिए छह-छह सीटें हैं। इस तरह दोनों श्रेणियों की कुल 12 सीटें होती हैं।

महाराष्ट्र की विधान परिषद में कुल 78 सदस्य हैं। इनमें सात स्नातक और सात शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों से चुने जाते हैं। यानी कुल 14 सीटें इन दोनों वर्गों के लिए हैं।

कर्नाटक की 75 सदस्यीय विधान परिषद में भी सात स्नातक और सात शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र हैं। यहाँ भी दोनों श्रेणियों की कुल 14 सीटें हैं।

आंध्र प्रदेश की विधान परिषद में कुल 58 सदस्य हैं। इनमें पाँच सदस्य स्नातक और पाँच शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों से चुने जाते हैं। दोनों की कुल संख्या दस है।

तेलंगाना की 40 सदस्यीय विधान परिषद में तीन स्नातक और तीन शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र हैं। इस तरह यहाँ दोनों श्रेणियों की कुल छह सीटें हैं।

इन सभी राज्यों को मिलाकर स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की 36 और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की भी 36 सीटें हैं। यानी कुल 72 सीटों के चुनाव में केवल विशेष मतदाता सूची में दर्ज स्नातक और शिक्षक ही वोट डाल सकते हैं।

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी राज्य में इन सीटों की कुल संख्या और किसी एक चुनाव में खाली होने वाली सीटों की संख्या अलग-अलग होती है। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश में आठ स्नातक और आठ शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र हैं। लेकिन सभी सीटों पर एक साथ चुनाव नहीं होता। सदस्यों का कार्यकाल अलग-अलग समय पर पूरा होने के कारण चुनाव भी अलग-अलग समय पर होते हैं।

इस व्यवस्था की शुरुआत कब और कैसे हुई?

स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों का इतिहास समझने के लिए आजादी से पहले की चुनाव व्यवस्था को देखना होगा। ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में आज की तरह हर वयस्क नागरिक को वोट देने का अधिकार नहीं था। मतदान का अधिकार संपत्ति, कर, शिक्षा, पेशे और दूसरी शर्तों से जुड़ा हुआ था। अलग-अलग समय पर व्यापारिक संगठनों, विश्वविद्यालयों, जमीन से जुड़े प्रभावशाली समूहों और दूसरे विशेष वर्गों को भी प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था की गई।

विशेष वर्गों को अलग प्रतिनिधित्व देने का विचार 1909 के भारतीय परिषद अधिनियम के समय साफ तौर पर दिखाई देने लगा था। उस समय नगरपालिकाओं, जिला बोर्डों, विश्वविद्यालयों और व्यापारिक संगठनों जैसे समूहों को प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था की गई थी।

इसके बाद 1919 और 1935 के भारत सरकार अधिनियमों के जरिए प्रांतीय विधान व्यवस्थाओं में कई बदलाव किए गए। खासकर 1935 के अधिनियम ने कुछ प्रांतों में विधानसभा के साथ विधान परिषद बनाने का रास्ता तैयार किया। मद्रास, बंबई, बंगाल, संयुक्त प्रांत, बिहार और असम जैसे प्रांतों में दो सदनों वाली विधान व्यवस्था की गई थी। संयुक्त प्रांत आगे चलकर उत्तर प्रदेश बना। वहाँ विधान परिषद की व्यवस्था भी इसी औपनिवेशिक संवैधानिक ढाँचे से जुड़ी थी।

आजादी के बाद संविधान निर्माताओं के सामने सवाल था कि क्या विधान परिषदों को खत्म कर दिया जाए या उन्हें नए लोकतांत्रिक ढाँचे में जारी रखा जाए। संविधान सभा में इस पर चर्चा हुई। अंततः यह तय किया गया कि राज्यों को विधान परिषद रखने का अधिकार होगा। साथ ही उसके गठन और सदस्यों के चुनाव के नियम स्वतंत्र भारत के संविधान के अनुसार तय किए गए।

संविधान सभा में विधान परिषद की संरचना से जुड़े प्रारूप अनुच्छेद 150 पर 2 जून, 30 जुलाई और 19 अगस्त, 1949 को चर्चा हुई। बाद में यही प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 171 का हिस्सा बना। इस अनुच्छेद ने स्नातकों और शिक्षकों के लिए अलग मतदाता समूह बनाने का संवैधानिक आधार दिया। इसलिए मौजूदा व्यवस्था का संवैधानिक जन्म 26 जनवरी, 1950 को माना जाता है, जबकि इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि उससे कई दशक पुरानी है।

स्नातकों और शिक्षकों को अलग प्रतिनिधित्व देने की वजह क्या थी?

इस व्यवस्था को स्वीकार करने के पीछे मुख्य सोच यह थी कि विधान परिषद में विधानसभा से कुछ अलग तरह के अनुभव और विचार भी पहुँचने चाहिए। शिक्षकों को शिक्षा व्यवस्था का प्रत्यक्ष अनुभव रखने वाला वर्ग माना गया। स्कूलों और कॉलेजों की समस्याएँ, पढ़ाई की गुणवत्ता, शिक्षकों की सेवा शर्तें और शिक्षा संस्थानों की कार्यप्रणाली जैसे मुद्दों पर उनका अनुभव उपयोगी हो सकता था।

स्नातकों को अलग प्रतिनिधित्व देने के पीछे तर्क था कि उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों को भी सार्वजनिक नीतियों और कानून बनाने की प्रक्रिया में अपना प्रतिनिधि चुनने का अवसर मिले। जब संविधान लागू हुआ, तब भारत में उच्च शिक्षा बहुत सीमित लोगों तक पहुँचती थी। स्नातक होना एक बड़ी उपलब्धि और सामाजिक रूप से विशेष पहचान की बात मानी जाती थी। ऐसे में उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों को अलग मतदाता समूह देना उस समय की परिस्थितियों में समझा जा सकता है।

लेकिन इस व्यवस्था के साथ एक सवाल भी जुड़ा है। अगर शिक्षा या पेशे के आधार पर किसी वर्ग को अलग प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है, तो किसान, मजदूर, नर्स, इंजीनियर और दूसरे पेशों से जुड़े लोगों को ऐसा अधिकार क्यों नहीं मिलना चाहिए? यही इस व्यवस्था पर होने वाली बहस का मुख्य आधार है।

इसके समर्थकों का कहना है कि विधान परिषद में अलग-अलग अनुभव वाले लोगों की मौजूदगी से चर्चा और कानून बनाने की प्रक्रिया बेहतर हो सकती है। वहीं आलोचकों का तर्क है कि आधुनिक लोकतंत्र में सभी नागरिकों को समान मताधिकार मिलने के बाद शिक्षा के आधार पर अलग मतदान की व्यवस्था पर दोबारा विचार होना चाहिए।

संविधान का अनुच्छेद 171 क्या कहता है?

संविधान का अनुच्छेद 171 विधान परिषद की सदस्य संख्या और उसके गठन का तरीका तय करता है। इसके अनुसार विधान परिषद के लगभग एक-तिहाई सदस्य स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों द्वारा चुने जाते हैं। लगभग एक-तिहाई सदस्य राज्य विधानसभा के निर्वाचित विधायक चुनते हैं। करीब एक-बारहवाँ हिस्सा स्नातक मतदाता और एक-बारहवाँ हिस्सा शिक्षक मतदाता चुनते हैं। बाकी सदस्य राज्यपाल मनोनीत करते हैं।

यहाँ संविधान में इस्तेमाल किया गया 'लगभग' शब्द महत्त्वपूर्ण है। इसका मतलब है कि हर राज्य में इन सभी वर्गों के लिए सीटों की संख्या बिल्कुल गणितीय अनुपात में होना जरूरी नहीं है। संविधान का निर्देश है कि संख्या तय करते समय इन अनुपातों के जितना संभव हो सके, उतना करीब रहा जाए।

राज्यपाल जिन सदस्यों को मनोनीत करते हैं, उनके लिए भी संविधान ने कुछ खास क्षेत्रों का उल्लेख किया है। इनमें साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारी आंदोलन और समाज सेवा शामिल हैं। इन क्षेत्रों में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले लोगों को मनोनीत किया जा सकता है। इस तरह विधान परिषद में स्थानीय निकायों, विधायकों, स्नातकों, शिक्षकों और अलग-अलग क्षेत्रों के अनुभवी लोगों को जगह देने की कोशिश की गई है।

स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में कौन वोट डाल सकता है?

स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में वोट डालने के लिए केवल स्नातक होना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए कुछ कानूनी शर्तें भी पूरी करनी होती हैं। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 27 के अनुसार संबंधित व्यक्ति उस निर्वाचन क्षेत्र का सामान्य निवासी होना चाहिए। इसके अलावा उसे निर्धारित अर्हता तिथि से कम से कम तीन वर्ष पहले किसी भारतीय विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री या कानून में मान्य समकक्ष योग्यता हासिल कर लेनी चाहिए।

उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति ने 2025 में स्नातक की परीक्षा पास की है। वह केवल अपनी डिग्री के आधार पर 2026 में होने वाले स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव में वोट नहीं डाल सकता। उसे निर्धारित अर्हता तिथि तक स्नातक बने हुए तीन साल पूरे करने होंगे।

इसके अलावा उसे स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की अलग मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराना होता है। सामान्य विधानसभा चुनाव की मतदाता सूची में नाम होना इस चुनाव में वोट डालने के लिए पर्याप्त नहीं है।

इसके लिए निर्धारित प्रपत्र 18 भरना होता है। आवेदन के साथ शैक्षिक योग्यता और निवास से जुड़े दस्तावेज भी देने पड़ सकते हैं। इसका मतलब है कि किसी निर्वाचन क्षेत्र में लाखों स्नातक रहने के बावजूद उनमें से केवल वही लोग वोट डाल पाएँगे, जिन्होंने जरूरी शर्तें पूरी करके अपना नाम विशेष मतदाता सूची में दर्ज कराया है।

शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में कौन वोट दे सकता है?

शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के लिए पात्रता की शर्तें अलग हैं।लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 27 के अनुसार व्यक्ति को संबंधित निर्वाचन क्षेत्र का सामान्य निवासी होना चाहिए। इसके साथ ही अर्हता तिथि से ठीक पहले के छह वर्षों में कुल मिलाकर कम से कम तीन साल तक ऐसे शैक्षणिक संस्थान में पढ़ाने का अनुभव होना चाहिए, जिसका स्तर माध्यमिक विद्यालय से नीचे न हो।

यह जरूरी नहीं है कि अध्यापन के ये तीन साल लगातार पूरे हुए हों। पिछले छह वर्षों में कुल तीन साल का निर्धारित शिक्षण अनुभव होना चाहिए। साथ ही शिक्षक की नियुक्ति और जिस संस्थान में उसने पढ़ाया है, उसकी पात्रता भी संबंधित नियमों के अनुसार होनी चाहिए। केवल निजी ट्यूशन पढ़ाने या अनौपचारिक रूप से किसी को पढ़ाने से आमतौर पर इस निर्वाचन क्षेत्र में वोट देने की पात्रता नहीं मिलती। शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए प्रपत्र 19 का इस्तेमाल किया जाता है। इसके लिए अध्यापन अनुभव और संबंधित संस्थान से जुड़े दस्तावेज देने पड़ सकते हैं।

क्या कोई व्यक्ति स्नातक और शिक्षक, दोनों निर्वाचन क्षेत्रों में वोट दे सकता है?

अगर कोई व्यक्ति दोनों निर्वाचन क्षेत्रों की पात्रता पूरी करता है और दोनों की मतदाता सूचियों में उसका नाम दर्ज है, तो वह दोनों चुनावों में वोट डाल सकता है।

मान लीजिए कोई व्यक्ति कई साल पहले स्नातक हो चुका है और पिछले छह वर्षों में कम से कम तीन साल किसी पात्र माध्यमिक विद्यालय में शिक्षक के रूप में काम कर चुका है। अगर वह संबंधित निर्वाचन क्षेत्र का सामान्य निवासी भी है और बाकी शर्तें पूरी करता है, तो वह स्नातक और शिक्षक, दोनों निर्वाचन क्षेत्रों का मतदाता बन सकता है।

इसके अलावा, अगर उसका नाम सामान्य विधानसभा मतदाता सूची में भी दर्ज है, तो वह विधानसभा चुनाव में भी वोट डाल सकता है। इस तरह एक ही व्यक्ति को तीन अलग-अलग चुनावों में मतदान का अवसर मिल सकता है। लेकिन ये तीनों वोट अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों और अलग-अलग चुनावों से जुड़े होते हैं।

क्या चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवार का स्नातक या शिक्षक होना जरूरी है?

स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवार का स्वयं स्नातक होना जरूरी नहीं है। इसी तरह शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए उसका शिक्षक होना भी अनिवार्य नहीं है। स्नातक या शिक्षक होने की शर्त मतदाता बनने के लिए है, उम्मीदवार बनने के लिए नहीं।

विधान परिषद का चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति को संविधान और चुनाव कानूनों में तय सामान्य योग्यताएँ पूरी करनी होती हैं। इनमें भारतीय नागरिकता और कम से कम 30 वर्ष की उम्र जैसी शर्तें शामिल हैं। इसके अलावा संबंधित राज्य में मतदाता के रूप में पंजीकरण और नामांकन से जुड़े नियमों का पालन भी जरूरी है। इसका मतलब है कि स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के मतदाता किसी ऐसे व्यक्ति को भी अपना प्रतिनिधि चुन सकते हैं, जिसके पास स्नातक की डिग्री नहीं है। इसी तरह शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के मतदाता ऐसे उम्मीदवार को चुन सकते हैं, जिसने कभी शिक्षक के रूप में काम नहीं किया हो। क्योंकि संविधान ने इन निर्वाचन क्षेत्रों की विशेषता उम्मीदवार की पहचान में नहीं, बल्कि उन्हें चुनने वाले मतदाताओं की योग्यता में रखी है।

इन चुनावों में वोट कैसे डाले जाते हैं?

स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के चुनाव सामान्य विधानसभा चुनावों से अलग तरीके से होते हैं। इनमें आनुपातिक प्रतिनिधित्व की एकल संक्रमणीय मत प्रणाली अपनाई जाती है। इसे अंग्रेजी में सिंगल ट्रांसफरेबल वोट कहा जाता है। इस व्यवस्था में मतदाता उम्मीदवारों को अपनी पसंद के अनुसार क्रम देते हैं। जिस उम्मीदवार को वह सबसे ज्यादा पसंद करता है, उसके सामने अंक 1 लिखता है। दूसरी पसंद के उम्मीदवार के सामने 2 और इसी तरह आगे के उम्मीदवारों के लिए भी अपनी प्राथमिकता दर्ज कर सकता है।

मतगणना के दौरान एक तय संख्या में वोट हासिल करना जरूरी होता है। इसे चुनावी कोटा कहा जाता है। अगर किसी उम्मीदवार को पहली प्राथमिकता के आधार पर ही जरूरी वोट मिल जाते हैं, तो वह निर्वाचित हो सकता है। अगर ऐसा नहीं होता, तो चुनाव नियमों के अनुसार कम वोट पाने वाले उम्मीदवारों के मतों और आगे दर्ज की गई प्राथमिकताओं को गिनती में शामिल किया जाता है।

इन चुनावों में आमतौर पर कागज के मतपत्र का इस्तेमाल होता है, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का नहीं। मतपत्र पर अपनी पसंद का क्रम दर्ज करने के लिए निर्वाचन आयोग के निर्देशों का पालन करना जरूरी होता है। इस प्रणाली का उद्देश्य मतदाता को केवल एक उम्मीदवार चुनने तक सीमित न रखना है। वह अपनी पसंद के कई उम्मीदवारों को प्राथमिकता के क्रम में रख सकता है।

विधान परिषद का कार्यकाल कितना होता है?

विधान परिषद विधानसभा की तरह पाँच साल बाद भंग नहीं होती। यह एक स्थायी सदन है। हालाँकि इसके सदस्य हमेशा के लिए पद पर नहीं रहते। विधान परिषद के सदस्य का कार्यकाल छह साल होता है। हर दो साल में लगभग एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त हो जाते हैं। उनकी खाली हुई सीटों पर नए चुनाव कराए जाते हैं।

इसी वजह से स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की सभी सीटों पर एक साथ चुनाव नहीं होते। अलग-अलग सदस्यों का कार्यकाल अलग समय पर पूरा होता है, इसलिए चुनाव भी अलग-अलग समय पर होते हैं।

उत्तर प्रदेश इसका उदाहरण है। वहाँ स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की कुल 16 सीटें हैं, लेकिन अक्टूबर 2026 में इनमें से केवल पाँच स्नातक और छह शिक्षक सीटों पर चुनाव हुआ।

अक्टूबर 2026 में चार राज्यों की 28 सीटों पर चुनाव क्यों हुए?

इन विशेष निर्वाचन क्षेत्रों की चर्चा की एक वजह अक्टूबर 2026 में हुए विधान परिषद चुनाव भी हैं। निर्वाचन आयोग ने सितंबर 2026 में उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक की कुल 28 स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की सीटों के लिए चुनाव कार्यक्रम घोषित किया था। मतदान 23 अक्टूबर, 2026 को हुआ और मतगणना 27 अक्टूबर से शुरू हुई।

इनमें उत्तर प्रदेश की 11 सीटें थीं। पाँच स्नातक और छह शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव हुआ। बिहार की आठ सीटों में चार स्नातक और चार शिक्षक सीटें शामिल थीं।

महाराष्ट्र की पाँच सीटों में तीन स्नातक और दो शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र थे। वहीं कर्नाटक की चार सीटों में दो स्नातक और दो शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र शामिल थे।

उत्तर प्रदेश में जिन स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव हुआ, उनमें लखनऊ, वाराणसी, आगरा, मेरठ और इलाहाबाद-झाँसी शामिल थे। शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में लखनऊ, वाराणसी, आगरा, मेरठ, बरेली-मुरादाबाद और गोरखपुर-फैजाबाद शामिल थे। इन चुनावों का महत्त्व केवल चार राज्यों की राजनीति तक सीमित नहीं है। इनके जरिए यह भी समझने का अवसर मिलता है कि विशेष मतदाता समूहों की भारतीय लोकतंत्र में आज क्या भूमिका है।

क्या हर राज्य में विधान परिषद बनाई जा सकती है?

भारत के हर राज्य में विधान परिषद होना जरूरी नहीं है। लेकिन संविधान के तहत किसी राज्य में विधान परिषद बनाई जा सकती है या मौजूदा परिषद को समाप्त किया जा सकता है। संविधान का अनुच्छेद 169 इसकी प्रक्रिया बताता है। इसके अनुसार सबसे पहले संबंधित राज्य की विधानसभा को विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित करना होता है। इसके बाद संसद कानून बनाकर उस राज्य में विधान परिषद बनाने या उसे समाप्त करने का फैसला कर सकती है।

इसका मतलब है कि केवल राज्य सरकार की घोषणा से विधान परिषद नहीं बन सकती। इसके लिए संवैधानिक प्रक्रिया पूरी करना जरूरी है। देश में कुछ राज्यों की विधान परिषदें पहले समाप्त भी की जा चुकी हैं। पश्चिम बंगाल, पंजाब और तमिलनाडु में पहले विधान परिषदें थीं, लेकिन बाद में उन्हें खत्म कर दिया गया। आंध्र प्रदेश में भी विधान परिषद समाप्त होने के बाद दोबारा बनाई गई थी।

इसलिए आज जिन छह राज्यों में विधान परिषदें हैं, उनकी संख्या हमेशा ऐसी ही रहेगी, यह जरूरी नहीं है। संवैधानिक प्रक्रिया के तहत भविष्य में किसी दूसरे राज्य में भी विधान परिषद बनाई जा सकती है या किसी मौजूदा राज्य की परिषद समाप्त की जा सकती है।

क्या विधान परिषद के पास विधानसभा जितनी शक्तियाँ होती हैं?

विधान परिषद राज्य विधानमंडल का हिस्सा जरूर है, लेकिन उसकी शक्तियाँ विधानसभा के बराबर नहीं हैं।

विधानसभा के सदस्य सीधे जनता द्वारा चुने जाते हैं। राज्य सरकार की राजनीतिक जवाबदेही भी विधानसभा के प्रति होती है। विधान परिषद सरकार के कामकाज पर चर्चा कर सकती है, सवाल पूछ सकती है और कानून बनाने की प्रक्रिया में हिस्सा ले सकती है। लेकिन वह विधानसभा की तरह विश्वास मत के जरिए सरकार को सत्ता से नहीं हटा सकती। साधारण विधेयकों पर विधान परिषद चर्चा कर सकती है और उन्हें कुछ समय के लिए रोक भी सकती है। लेकिन वह विधानसभा के फैसले को अनिश्चितकाल तक नहीं रोक सकती। धन विधेयक के मामले में उसकी भूमिका और सीमित है। वह निर्धारित समय के भीतर अपनी सिफारिशें विधानसभा को भेज सकती है, लेकिन उसे धन विधेयक पर अंतिम फैसला लेने का अधिकार नहीं है। इसलिए विधान परिषद को राज्यसभा के पूरी तरह बराबर समझना सही नहीं होगा। दोनों उच्च सदन जरूर हैं, लेकिन उनकी संवैधानिक शक्तियों में बड़ा अंतर है।

आज इन विशेष निर्वाचन क्षेत्रों की जरूरत कितनी है?

इस व्यवस्था पर सबसे बड़ी बहस यही है कि आज के भारत में स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों का औचित्य कितना बचा है। जब संविधान लागू हुआ था, तब देश में साक्षरता का स्तर बहुत कम था। उच्च शिक्षा तक पहुँच भी सीमित थी। उस समय स्नातक लोगों की संख्या आज की तुलना में काफी कम थी। इसलिए उन्हें अलग प्रतिनिधित्व देने का विचार तत्कालीन परिस्थितियों में समझा जा सकता है। लेकिन अब देश की स्थिति बदल चुकी है। विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की संख्या बढ़ी है। अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमियों से आने वाले लोग उच्च शिक्षा हासिल कर रहे हैं। शिक्षक भी लोकसभा और विधानसभा के सामान्य चुनावों में दूसरे नागरिकों की तरह वोट डालते हैं।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या केवल स्नातक होने के आधार पर किसी व्यक्ति को एक अतिरिक्त विशेष निर्वाचन क्षेत्र में वोट देने का अवसर मिलना चाहिए?

इस व्यवस्था के समर्थकों का कहना है कि विधान परिषद में शिक्षा व्यवस्था से जुड़े लोगों की मौजूदगी जरूरी है। शिक्षक अपने अनुभव के आधार पर स्कूलों की समस्याएँ, शिक्षकों की सेवा शर्तें, शिक्षा की गुणवत्ता और शैक्षणिक संस्थानों से जुड़े मुद्दे बेहतर तरीके से उठा सकते हैं।

दूसरी ओर, आलोचकों का सवाल है कि अगर पेशे या अनुभव के आधार पर अलग प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है, तो किसान, मजदूर, स्वास्थ्यकर्मी और दूसरे वर्गों को भी ऐसा अवसर क्यों नहीं मिलना चाहिए?

यह भी देखना जरूरी है कि इन निर्वाचन क्षेत्रों से चुने गए सदस्य शिक्षा और सार्वजनिक नीति से जुड़े मुद्दों पर वास्तव में कितना काम करते हैं। क्या वे व्यापक जनहित के सवाल उठाते हैं या उनकी राजनीति सीमित मतदाता समूहों और संगठनों तक सिमट जाती है?

इन सवालों का जवाब केवल संवैधानिक सिद्धांतों से नहीं मिल सकता। इसके लिए विधान परिषदों की कार्यवाही, सदस्यों द्वारा पूछे गए सवालों, विधायी योगदान और उनके कामकाज का अध्ययन करना होगा।

इन सीटों पर राजनीतिक दलों की दिलचस्पी क्यों रहती है?

स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों का एक राजनीतिक पक्ष भी है। इनकी मतदाता सूचियाँ सामान्य विधानसभा क्षेत्रों की तुलना में छोटी हो सकती हैं। मतदाताओं की शैक्षिक और पेशेवर योग्यता भी पहले से तय होती है। इसलिए इन चुनावों में शिक्षक संगठनों, शैक्षणिक संस्थानों, स्नातक समूहों और स्थानीय सामाजिक नेटवर्क की भूमिका अहम हो सकती है। राजनीतिक दल इन सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारते हैं या किसी समर्थित उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार करते हैं। कई जगह स्वतंत्र उम्मीदवार भी चुनाव लड़ते हैं। शिक्षक संगठनों और स्थानीय प्रभावशाली समूहों का समर्थन उम्मीदवारों के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकता है।

इन सीटों का राजनीतिक महत्त्व इसलिए भी है क्योंकि विधान परिषद में हर सदस्य किसी न किसी दल के संख्याबल को प्रभावित कर सकता है। इसलिए चुनाव का असर केवल शिक्षकों या स्नातकों के प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं रहता। इससे राजनीतिक दलों की रणनीति और सदन में उनकी स्थिति भी प्रभावित हो सकती है।

हालाँकि इन चुनावों के नतीजों को पूरे राज्य के सामान्य चुनावी रुझान का संकेत नहीं माना जा सकता। इनका मतदाता वर्ग अलग होता है और स्थानीय मुद्दे भी अलग हो सकते हैं। इसलिए इनके परिणामों से पूरे प्रदेश की राजनीतिक पसंद के बारे में निष्कर्ष निकालते समय सावधानी बरतनी चाहिए।

क्या आधुनिक लोकतंत्र में विशेष निर्वाचन क्षेत्रों की जरूरत बनी हुई है?

स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र भारतीय संवैधानिक व्यवस्था की एक खास पहचान हैं। इनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ब्रिटिश शासन के दौरान विशेष वर्गों को प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था से जुड़ी है। लेकिन आज इनका कानूनी आधार स्वतंत्र भारत के संविधान का अनुच्छेद 171 है।

29 अक्टूबर, 2026 तक देश के छह राज्यों में स्नातकों और शिक्षकों के लिए कुल 72 विधान परिषद सीटें हैं। इनमें 36 सीटें स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों और 36 सीटें शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के लिए हैं। इन सीटों पर वही लोग वोट डाल सकते हैं जो तय शैक्षिक या अध्यापन संबंधी शर्तें पूरी करते हैं और संबंधित विशेष मतदाता सूची में पंजीकृत हैं।

इस व्यवस्था को समझते समय दो बातें याद रखना जरूरी है। पहली, संविधान निर्माताओं ने विधान परिषद को विधानसभा से अलग पहचान देने और अलग-अलग अनुभव वाले लोगों को प्रतिनिधित्व देने के लिए विशेष मतदाता समूहों की व्यवस्था की थी। दूसरी, संविधान लागू होने के बाद भारतीय समाज, शिक्षा और राजनीति में बहुत बदलाव आ चुका है।

इसलिए आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र क्यों बनाए गए थे। असली सवाल यह है कि क्या वे आज भी अपने मूल उद्देश्य को पूरा कर रहे हैं?

अगर इनसे शिक्षा और सार्वजनिक नीति से जुड़े अनुभवी लोगों को विधान परिषद में प्रभावी प्रतिनिधित्व मिलता है, तो इनके पक्ष में मजबूत तर्क मौजूद है। लेकिन अगर इनका इस्तेमाल केवल सीमित मतदाता समूहों की चुनावी राजनीति और दलगत रणनीति तक रह गया है, तो इनके औचित्य पर दोबारा विचार करना भी जरूरी है।

किसी व्यवस्था का पुराना इतिहास अपने आप में उसके हमेशा बने रहने की वजह नहीं हो सकता। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि वह अपनी संस्थाओं का सम्मान करे, लेकिन समय और समाज की बदलती जरूरतों के हिसाब से उनकी उपयोगिता पर सवाल उठाने से भी न हिचके।

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Yogesh Mishra

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Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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