ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सड़क से SC तक: क्या मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर बन रहा है देशव्यापी आंदोलन?

Gyanesh Kumar Controversy: विपक्षी गठबंधन ने इसे बाकायदा एक राष्ट्रीय राजनीतिक अभियान में बदल दिया है और 6 अक्टूबर को विपक्षी सांसदों का चुनाव आयोग मुख्यालय तक मार्च इस अभियान का अगला बड़ा चरण है।

Yogesh Mishra
Published on: 6 Oct 2026 11:55 AM IST
Gyanesh Kumar Controversy
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Gyanesh Kumar Controversy

Gyanesh Kumar Controversy: भारत में शायद बहुत कम अवसर ऐसे आए हैं जब किसी पदासीन मुख्य चुनाव आयुक्त का नाम स्वयं एक बड़े राजनीतिक आंदोलन का केंद्रीय मुद्दा बन गया हो। चुनाव आयोग पर आरोप पहले भी लगते रहे हैं।ईवीएम पर सवाल उठते रहे हैं।मतदाता सूचियों में गड़बड़ी को लेकर राजनीतिक दल आयोग के दरवाजे पर धरना देते रहे हैं।

चुनाव के दौरान आयोग के फैसलों पर सरकार तथा विपक्ष दोनों नाराज होते रहे हैं। लेकिन अक्टूबर 2026 में जो स्थिति बनी है, उसमें विवाद केवल चुनाव आयोग नाम की संस्था तक सीमित नहीं रह गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार स्वयं विपक्षी दलों, छात्र संगठनों और कुछ नागरिक समूहों के निशाने पर आ गए हैं। उनसे इस्तीफा मांगने के लिए दिल्ली से मुंबई, लखनऊ से पटना और कोलकाता से हैदराबाद तक प्रदर्शन हुए हैं।

विपक्षी गठबंधन ने इसे बाकायदा एक राष्ट्रीय राजनीतिक अभियान में बदल दिया है और 6 अक्टूबर को विपक्षी सांसदों का चुनाव आयोग मुख्यालय तक मार्च इस अभियान का अगला बड़ा चरण है। दिल्ली पुलिस ने इसके मद्देनजर चुनाव आयोग मुख्यालय और जंतर-मंतर क्षेत्र में सुरक्षा बढ़ा दी है।

आखिर कैसे आये ज्ञानेश कुमार विवाद के केंद्र में

इस पूरे विवाद की जड़ मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision — SIR है। चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखने, मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट अथवा अन्य अयोग्य प्रविष्टियों को हटाने और पात्र मतदाताओं को सूची में सुनिश्चित करने के लिए यह प्रक्रिया आवश्यक है। विपक्ष का आरोप ठीक इसके उलट है।

उसका कहना है कि बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाए गए और प्रक्रिया में पर्याप्त पारदर्शिता नहीं रही। इस विवाद ने तब और गंभीर रूप लिया जब The Indian Express की एक जांच में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में कम-से-कम 14 अवसरों पर आयोग के भीतर ऐसे फैसलों और प्रक्रियाओं पर लिखित आपत्ति दर्ज की जिनके बारे में उनका कहना था कि उन्हें जानकारी नहीं दी गई थी अथवा प्रक्रिया उचित नहीं थी। रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रीय स्तर पर SIR के दौरान 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की प्रारंभिक मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटे।

चुनाव आयोग ने 14 नोटों के अस्तित्व को नकारा नहीं। लेकिन कहा कि अलग-अलग विचार और सुझाव आयोग की सामान्य निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हैं और उसके निर्णय सर्वसम्मति से हुए।

यहीं से विवाद ने नया रूप लिया। अब सवाल सिर्फ यह नहीं रह गया कि मतदाता सूची में किसका नाम कटा और किसका जुड़ा। विपक्ष ने सवाल उठाना शुरू किया कि क्या तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के नाम से ऐसे फैसले हुए जिन पर तीनों सदस्यों की वास्तविक सहमति थी? Form 6 का मामला इसी बहस का सबसे संवेदनशील हिस्सा बन गया। Form 6 नए मतदाता के रूप में नाम दर्ज कराने के लिए इस्तेमाल होता है।

सुप्रीम कोर्ट में 5 अक्टूबर को हुई सुनवाई ने विवाद को और राजनीतिक ऊर्जा दे दी। अदालत ने ज्ञानेश कुमार को तत्काल निलंबित करने का अंतरिम आदेश देने से इनकार किया और स्पष्ट किया कि केवल अखबारी रिपोर्टों के आधार पर ऐसा आदेश नहीं दिया जा सकता। लेकिन अदालत ने केंद्र और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया और रिकॉर्ड देखने की बात कही।

मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने Form 6 में कथित संशोधन को मंजूरी नहीं दी थी और यदि रिकॉर्ड से कोई निर्णय कानून के विपरीत अथवा आवश्यक सामूहिक प्रक्रिया के बिना लिया हुआ पाया जाता है तो अदालत उसकी समीक्षा कर सकती है। यानी विपक्ष को तत्काल मांगी गई राहत नहीं मिली। लेकिन विवाद न्यायिक परीक्षण के दायरे में जरूर आ गया।

इसी Form 6 को लेकर राहुल गांधी ने ज्ञानेश कुमार पर अवैध और एकतरफा बदलाव करने का आरोप लगाया। चुनाव आयोग ने इसे ‘भ्रामक’ बताते हुए जवाब दिया और कहा कि बिहार SIR संबंधी आदेश आयोग द्वारा सर्वसम्मति से अनुमोदित था। इसलिए इस बिंदु पर यह कहना अभी तथ्यात्मक रूप से गलत होगा कि अदालत ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष के आरोपों को सिद्ध कर दिया है।

अदालत ने फिलहाल ऐसा कोई निष्कर्ष नहीं दिया है। उसने रिकॉर्ड और जवाब मांगे हैं। यही इस पूरे राजनीतिक संघर्ष का एक महत्वपूर्ण अंतर है—विपक्ष आरोप को स्थापित तथ्य के रूप में पेश कर रहा है, जबकि न्यायिक प्रक्रिया अभी आरोपों और आयोग के रिकॉर्ड की जांच के चरण में है।

कांग्रेस का आंदोलन अब देशव्यापी अभियान

ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सबसे संगठित राजनीतिक अभियान कांग्रेस ने शुरू किया। 25 सितंबर को कांग्रेस ने दिल्ली, जम्मू, पटना, हैदराबाद, चंडीगढ़, देहरादून, मणिपुर, कोलकाता, लखनऊ और भुवनेश्वर सहित कई स्थानों पर प्रदर्शन किए। पटना और चंडीगढ़ में पुलिस ने पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया। मणिपुर में आंसू गैस छोड़े जाने की खबर आई। कई जगह कांग्रेस कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया। इसके बाद दिल्ली, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और दूसरे राज्यों में प्रदर्शन का दूसरा दौर दिखाई दिया।

कांग्रेस अब इसे छिटपुट प्रदर्शनों तक सीमित नहीं रखना चाहती। 5 अक्टूबर को पार्टी ने ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ अभियान की घोषणा की। घोषित कार्यक्रम के अनुसार 10 से 20 अक्टूबर के बीच ब्लॉक स्तर तक साइकिल और मोटरसाइकिल रैलियां तथा अन्य विरोध कार्यक्रम आयोजित किए जाने हैं। इसका अर्थ है कि ज्ञानेश कुमार और SIR का विवाद दिल्ली के राष्ट्रीय नेतृत्व के स्तर से नीचे संगठनात्मक इकाइयों तक ले जाने की रणनीति बन चुकी है।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी इस मुद्दे को केवल चुनाव आयोग से जवाब मांगने तक सीमित नहीं रखा है। INDIA गठबंधन की बैठक में तय कार्यक्रम के अनुसार 2 से 8 अक्टूबर तक ‘लोकतंत्र बचाओ’ मार्च, 6 अक्टूबर को विपक्षी सांसदों का चुनाव आयोग तक मार्च, इसके बाद राष्ट्रपति से मिलने की कोशिश और 1 नवंबर को दिल्ली में बड़ी रैली की योजना है। अक्टूबर-नवंबर में दिल्ली, हैदराबाद, कोलकाता और बेंगलुरु सहित विभिन्न शहरों में बड़ी रैलियों पर भी चर्चा हुई है।

INDIA गठबंधन की बैठक में कांग्रेस, सपा, तृणमूल कांग्रेस, एनसीपी (शरद पवार), शिवसेना (यूबीटी), राजद, माकपा, भाकपा, नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी, झामुमो, भाकपा-माले, आईयूएमएल सहित अनेक दल शामिल रहे।

राहुल गांधी, खरगे, ममता, अखिलेश—बड़े नेता सीधे मैदान में

इस आंदोलन की राजनीतिक गंभीरता समझने के लिए नेताओं की भाषा और भागीदारी महत्वपूर्ण है। राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त से इस्तीफा मांगा है और आरोप लगाया है कि भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था पर हमला हुआ है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने चुनाव आयोग पर सरकार के प्रभाव में काम करने का आरोप लगाया है। ये विपक्ष के आरोप हैं। चुनाव आयोग इन्हें स्वीकार नहीं करता।

तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी ने भी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है।युवा प्रदर्शनकारियों तथा Cockroach Janta Party के आंदोलन को खुला समर्थन दिया है। ममता का इसमें आना खास महत्व रखता है, क्योंकि इससे आंदोलन कांग्रेस और वामपंथी संगठनों की सीमा से बाहर निकलता दिखाई देता है।

समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इससे भी पहले कहा था कि ज्ञानेश कुमार के रहते आगे चुनाव नहीं कराए जाने चाहिए। उन्होंने आयोग के अंदर दो अन्य चुनाव आयुक्तों की कथित लिखित आपत्तियों का हवाला देते हुए आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। 6 अक्टूबर के विपक्षी मार्च से पहले सपा सांसद धर्मेंद्र यादव ने भी विरोध का समर्थन किया है।

प्रियंका गांधी ने इससे कहीं अधिक कठोर भाषा इस्तेमाल करते हुए ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग की है। यह ध्यान रखना जरूरी है कि ऐसी मांगें राजनीतिक वक्तव्य हैं, किसी अदालत द्वारा ज्ञानेश कुमार के अपराधी पाए जाने का निष्कर्ष नहीं।

लखनऊ में कांग्रेस और सपा दोनों सड़क पर

उत्तर प्रदेश में मामला विशेष रूप से दिलचस्प है क्योंकि यहां कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों अलग-अलग प्रदर्शनों में उतर चुकी हैं। 25 सितंबर को लखनऊ में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय, कांग्रेस विधानमंडल दल की नेता आराधना मिश्रा और पार्टी के दूसरे नेताओं के नेतृत्व में प्रदर्शन हुआ। कार्यकर्ता पार्टी कार्यालय से विधानसभा और मुख्यमंत्री आवास की दिशा में बढ़े और पुलिस से टकराव तथा हिरासत की स्थिति बनी।

इसके कुछ दिन बाद लखनऊ में सपा और कांग्रेस दोनों ने विरोध किया। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने नगर निगम मुख्यालय से राज्य चुनाव आयोग कार्यालय की ओर मार्च किया, जबकि सपा कार्यकर्ताओं ने हजरतगंज में प्रदर्शन किया। ज्ञानेश कुमार का पुतला जलाने और पुतले पर कालिख लगाने जैसी घटनाएं भी हुईं। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच धक्का-मुक्की हुई और कई लोगों को हिरासत में लिया गया। इस तरह उत्तर प्रदेश में मुद्दा केवल राष्ट्रीय नेताओं के बयान तक सीमित नहीं है। बल्कि राज्य संगठन सड़क पर उतर चुके हैं।

दिल्ली बनी आंदोलन का सबसे टकराव वाला केंद्र

सबसे तीखा टकराव दिल्ली में दिखाई दिया। जंतर-मंतर के आसपास छात्र संगठनों, राजनीतिक दलों और नागरिक समूहों के प्रदर्शन को रोकने के लिए बड़ी संख्या में पुलिस और अर्धसैनिक बल लगाए गए। रिपोर्टों के अनुसार एक चरण में लगभग 5,000 सुरक्षा कर्मी तैनात किए गए। कई मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश-निकास द्वार बंद किए गए। मध्य दिल्ली के कुछ हिस्सों में इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध लगाया गया। AAP नेता आतिशी, सौरभ भारद्वाज और संजीव झा, माकपा की वृंदा करात, AISA की नेहा बोरा, राजद के मनोज झा और कई दूसरे नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया। पुलिस ने बाद में प्रदर्शन से संबंधित तीन FIR भी दर्ज कीं।

4 अक्टूबर को दिल्ली में फिर टकराव हुआ। AAP कार्यकर्ताओं और छात्र समूहों ने बैरिकेड तोड़ने की कोशिश की और हिरासत में लिए गए लोगों को ले जा रही बसों को रोकने का प्रयास किया। पुलिस के अनुसार लगभग 110 लोग हिरासत में लिए गए और 15 पुलिसकर्मी घायल हुए। प्रदर्शनकारियों ने दूसरी ओर पुलिस पर बल प्रयोग और दुर्व्यवहार के आरोप लगाए।

दिल्ली के प्रदर्शनों का एक दूसरा पहलू भी उभरा। महिला पत्रकारों और प्रदर्शनकारियों ने कुछ पुलिसकर्मियों पर दुर्व्यवहार के आरोप लगाए, जिसके बाद Press Club of India ने पत्रकारों के साथ कथित व्यवहार और इंटरनेट प्रतिबंध पर चिंता जताई। इस कारण मूल चुनावी विवाद के साथ-साथ विरोध करने के अधिकार, पुलिस कार्रवाई और प्रेस की स्वतंत्रता की बहस भी जुड़ गई।

मुंबई में बिल्कुल अलग दृश्य

दिल्ली के मुकाबले मुंबई में आंदोलन का चरित्र अलग दिखाई दिया। Cockroach Janta Party के नेतृत्व वाले प्रदर्शन में शिवाजी पार्क में हजारों लोग जुटे। पुलिस के अनुमान से एक प्रदर्शन में लगभग 9,000 से 10,000 लोग मौजूद थे। अभिनेता नसीरुद्दीन शाह, शबाना आजमी, गायक विशाल ददलानी और फिल्म निर्देशक विशाल भारद्वाज जैसी सांस्कृतिक हस्तियां भी आंदोलन से जुड़े कार्यक्रम में दिखाई दीं।

इसके बाद 4 अक्टूबर को उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे एक साथ सड़क पर उतरे। शिवसेना (यूबीटी) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने अपना-अपना पार्टी झंडा इस्तेमाल न कर केवल तिरंगा लेकर मार्च करने का फैसला किया। यह प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण था। दोनों दलों ने आंदोलन को पार्टी बनाम पार्टी के बजाय चुनावी निष्पक्षता के सवाल के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की।

महाराष्ट्र की राजनीति में इसका एक और पहलू है। Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार भाजपा नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने दिल्ली जैसी कठोर पुलिस कार्रवाई से बचने की रणनीति अपनाई। यानी एक ही राष्ट्रीय मुद्दे पर दिल्ली और मुंबई में प्रशासनिक प्रतिक्रिया बिल्कुल अलग दिखाई दी।

कोलकाता में कांग्रेस, वाम और तृणमूल—अलग रास्ते, एक मांग

पश्चिम बंगाल में राजनीतिक रूप से एक-दूसरे के कट्टर प्रतिद्वंद्वी दल भी ज्ञानेश कुमार के मुद्दे पर समान मांग करते दिखाई दे रहे हैं। कांग्रेस ने कोलकाता में रैली निकालकर ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी तक की मांग की। दूसरी ओर CPI(M) के नेतृत्व वाले वाम मोर्चे ने अलग मार्च निकाला जिसमें CPI(M), CPI, RSP और Forward Bloc शामिल थे। वाम दलों ने ज्ञानेश कुमार को हटाने, SIR रोकने और कथित रूप से हटाए गए पात्र मतदाताओं के नाम बहाल करने की मांग की।

दिलचस्प यह है कि इन्हीं दलों की राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी ममता बनर्जी भी ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग कर रही हैं। इसलिए बंगाल में इसे सामान्य सत्ता-विपक्ष विभाजन से समझना मुश्किल है। चुनाव आयोग के सवाल पर तृणमूल, कांग्रेस और वाम दल अलग-अलग मंचों से लगभग समान दिशा में दबाव बना रहे हैं।

पटना से चंडीगढ़, हैदराबाद से मणिपुर तक

राष्ट्रीय विस्तार की दृष्टि से यह शायद आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। बिहार में कांग्रेस और वाम दल प्रदर्शन कर चुके हैं और पटना में पुलिस ने पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया। चंडीगढ़ में भी प्रदर्शनकारियों पर पानी की बौछारें चलीं और पंजाब कांग्रेस के नेताओं को हिरासत में लिया गया। हैदराबाद में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन और पुतला दहन किया।

देहरादून में उत्तराखंड कांग्रेस ने चुनाव कार्यालय का घेराव किया। मणिपुर में मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय के बाहर प्रदर्शन हुआ। जम्मू, भुवनेश्वर, जयपुर और भोपाल में भी विरोध दर्ज हुआ।

इसका मतलब यह नहीं कि हर शहर में समान आकार का जन आंदोलन खड़ा हो चुका है। कहीं प्रदर्शन हजारों का है, कहीं मुख्यतः पार्टी कार्यकर्ताओं का, कहीं छात्र संगठन नेतृत्व कर रहे हैं और कहीं विरोध प्रतीकात्मक है। लेकिन भौगोलिक विस्तार अब इतना हो चुका है कि इसे दिल्ली-मुंबई तक सीमित आंदोलन कहना सही नहीं होगा।

Cockroach Janta Party और युवा आंदोलन ने बदल दिया स्वरूप

इस आंदोलन का सबसे असामान्य तत्व Cockroach Janta Party यानी CJP और उसके नेता अभिजीत दीपके का उभार है। CJP ने 2 अक्टूबर से आंदोलन शुरू किया और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे तक अभियान जारी रखने की घोषणा की। मुंबई के बाद संगठन ने गोवा, बेंगलुरु, कोलकाता और दूसरे शहरों में मोर्चे की योजना बताई है। यदि ज्ञानेश कुमार इस्तीफा नहीं देते हैं तो 10 अक्टूबर को दिल्ली में ‘Jantar Mantar 2.0’ नाम से नया प्रदर्शन करने की घोषणा की गई है।

यहां एक दिलचस्प राजनीतिक तनाव भी मौजूद है। CJP, कांग्रेस और AAP सभी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन आंदोलन का नेतृत्व किसके हाथ में है और कौन युवा असंतोष का प्रतिनिधित्व करता है, इसे लेकर उनके बीच मतभेद भी सामने आए हैं। इसलिए इसे पूर्णतः संगठित विपक्षी मोर्चा समझना भी ठीक नहीं होगा। मुद्दा साझा है, लेकिन आंदोलन के भीतर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भी है।

INDIA गठबंधन की गोलबंदी कितनी बड़ी है?

30 सितंबर-1 अक्टूबर के आसपास हुई विपक्षी बैठक इस विवाद का राजनीतिक turning point कही जा सकती है। करीब 20 विपक्षी दलों ने साझा कार्यक्रम पर चर्चा की। फैसला हुआ कि केवल संसद या प्रेस कॉन्फ्रेंस में बयान देकर मामला समाप्त नहीं किया जाएगा। जिला स्तर से राष्ट्रीय राजधानी तक आंदोलन चलाया जाएगा। 6 अक्टूबर को दोनों सदनों के विपक्षी सांसदों का चुनाव आयोग तक मार्च इसी रणनीति का हिस्सा है। अक्टूबर के दूसरे सप्ताह में राष्ट्रपति से मिलने की योजना और 1 नवंबर को दिल्ली में बड़ी रैली प्रस्तावित है।

यानी विपक्ष पहली बार इस विवाद को तीन स्तरों पर एक साथ लड़ने की कोशिश कर रहा है—सड़क पर राजनीतिक आंदोलन, अदालत में कानूनी चुनौती और सोशल मीडिया पर जनमत की लड़ाई।

भाजपा क्या कह रही है?

इस कहानी का दूसरा पक्ष उतना ही महत्वपूर्ण है। भाजपा विपक्ष के आरोपों को स्वीकार नहीं करती और पूरे आंदोलन को राजनीतिक अभियान मानती है। भाजपा नेताओं ने सवाल उठाया है कि यदि विपक्ष वास्तव में चुनाव प्रक्रिया को अविश्वसनीय मानता है तो केवल ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा कैसे उसकी सभी आपत्तियों का समाधान कर देगा। पार्टी ने विपक्ष के “लोकतंत्र बचाओ” अभियान पर पलटवार करते हुए इसे राजनीतिक स्वार्थ और विपक्षी दलों की चुनावी रणनीति से जोड़ा है।

चुनाव आयोग का पक्ष भी स्पष्ट है। आयोग का कहना है कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना है। आयोग ने दो चुनाव आयुक्तों के नोटों को निर्णय प्रक्रिया के दौरान आने वाले सुझाव और अलग विचार बताया है तथा कहा है कि अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से हुए। Rahul Gandhi के Form 6 संबंधी आरोप को भी आयोग ने “misleading” कहा है।

यही कारण है कि इस विवाद में फिलहाल दो बिल्कुल विपरीत कथाएं चल रही हैं। विपक्ष कह रहा है कि यह मताधिकार और चुनावी निष्पक्षता का सवाल है। भाजपा और चुनाव आयोग का पक्ष है कि चुनावी प्रक्रिया की वैध प्रशासनिक कवायद को राजनीतिक आरोपों के जरिए संदिग्ध बनाया जा रहा है।

केरल से खुला ज्ञानेश कुमार का एक और मोर्चा

इसी राजनीतिक तूफान के बीच केरल सरकार ने 2006 के एक पुराने मामले की पुनः जांच का आदेश देकर विवाद में एक और अध्याय जोड़ दिया है। यह मामला उस समय का है जब ज्ञानेश कुमार केरल के लोक निर्माण विभाग में सचिव थे। मलेशियाई इंजीनियर Lee See Been की आत्महत्या के बाद सामने आए कथित suicide note में ज्ञानेश कुमार का नाम आने और भुगतान मंजूर करने के बदले रिश्वत मांगने के आरोप की जांच हुई थी। अब केरल गृह विभाग ने Vigilance and Anti-Corruption Bureau को मामले की फिर जांच करने का आदेश दिया है।

यहां भी सावधानी जरूरी है। जांच दोबारा खुलना अपराध सिद्ध होना नहीं है। फिलहाल इसे एक पुराने आरोप की पुनः जांच के रूप में ही देखा जाना चाहिए। लेकिन राजनीतिक दृष्टि से इसका समय ज्ञानेश कुमार के लिए असुविधाजनक है क्योंकि SIR और चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली को लेकर पहले से चल रहे विवाद के बीच उनके नौकरशाही कार्यकाल का पुराना मामला भी सार्वजनिक विमर्श में लौट आया है।

सोशल मीडिया पर मामला कितना बड़ा है?

सोशल मीडिया पर इसकी मौजूदगी अब सामान्य राजनीतिक चर्चा से काफी आगे निकल चुकी है। उपलब्ध स्वतंत्र trend-tracking snapshots इसका संकेत देते हैं। 5 अक्टूबर को दिल्ली के X trends के एक snapshot में “CEC Gyanesh Kumar” दूसरे स्थान पर दिखाई दिया और NSUI पहले स्थान पर था। मुंबई के एक अन्य snapshot में “CEC Gyanesh Kumar” पहले स्थान पर दर्ज हुआ। राष्ट्रीय trend archive में उसी दिन “Form 6”, “सुप्रीम कोर्ट”, “CJI Surya Kant” और “CEC Gyanesh Kumar” जैसे परस्पर जुड़े विषय एक ही समय राजनीतिक trends में मौजूद थे।

ये third-party snapshots हैं, X के आधिकारिक समग्र राष्ट्रीय आंकड़े नहीं, इसलिए इन्हें पूरे देश के सोशल मीडिया का वैज्ञानिक माप नहीं माना जाना चाहिए। फिर भी वे यह जरूर दिखाते हैं कि मुद्दा राजनीतिक कार्यकर्ताओं के सीमित दायरे से निकलकर बड़े ऑनलाइन विमर्श में प्रवेश कर चुका है।

सोशल मीडिया इस आंदोलन में केवल प्रचार माध्यम भी नहीं है। दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर पर तैनात कुछ कर्मियों के नाम-पट्टे दिखाई न देने के बारे में कहा कि सोशल मीडिया पर व्यक्तिगत पहचान के आधार पर पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों को निशाना बनाए जाने की आशंका थी। इससे पता चलता है कि ऑनलाइन विमर्श का दबाव जमीन पर प्रशासनिक व्यवहार को भी प्रभावित कर रहा है।

दूसरी ओर सोशल मीडिया पर गलत अथवा गलत संदर्भ में वीडियो प्रसारित होने का खतरा भी दिखाई दिया है। एक वायरल वीडियो को मुंबई के आंदोलन का बताकर प्रसारित किया गया जबकि fact-check में उसे दूसरे प्रदर्शन से जुड़ा बताया गया। इसलिए वायरल वीडियो की संख्या को वास्तविक प्रदर्शन के आकार का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा।

6 अक्टूबर क्यों महत्वपूर्ण है?

6 अक्टूबर का विपक्षी मार्च इस पूरे आंदोलन की अगली बड़ी परीक्षा है। INDIA गठबंधन के सांसद संसद के मकर द्वार पर एकत्र होकर निर्वाचन सदन की ओर मार्च करने वाले हैं। दिल्ली पुलिस ने चुनाव आयोग मुख्यालय और जंतर-मंतर क्षेत्र में सुरक्षा बढ़ा दी है। यह पहली बार होगा जब विभिन्न विपक्षी दलों के सांसद इतनी संगठित संख्या में सीधे चुनाव आयोग मुख्यालय की ओर बढ़ेंगे।

इसके बाद 10 अक्टूबर को CJP का प्रस्तावित ‘Jantar Mantar 2.0’ कांग्रेस का 10 से 20 अक्टूबर तक ब्लॉक स्तर का अभियान, विपक्ष की राष्ट्रपति से मिलने की योजना और 1 नवंबर की प्रस्तावित बड़ी दिल्ली रैली हैं। यानी वर्तमान कार्यक्रम को देखें तो यह आंदोलन कुछ दिनों की प्रतिक्रिया के बजाय कम-से-कम अगले कई सप्ताह चलाने की राजनीतिक तैयारी दिखाई देता हैं।

असली लड़ाई ज्ञानेश कुमार से बड़ी क्यों हो गई है?

इस पूरे घटनाक्रम को केवल “ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें या न दें” में समेटना शायद इसकी राजनीतिक गंभीरता को कम करके देखना होगा। इसके भीतर भारत की चुनाव प्रणाली से जुड़े कई पुराने और नए विवाद एक जगह आकर मिल गए हैं—EVM पर विपक्ष की पुरानी आपत्तियां, मतदाता सूची से नाम हटने का प्रश्न, SIR की प्रक्रिया, चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की व्यवस्था, आयोग के भीतर सामूहिक निर्णय लेने की प्रक्रिया और सबसे महत्वपूर्ण, चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था पर मतदाताओं तथा राजनीतिक दलों का भरोसा।

यही कारण है कि विपक्ष अब बैलेट पेपर से मतदान की मांग भी दोबारा उठा रहा है। INDIA गठबंधन की बैठक में खरगे ने इस मांग को सामने रखा। वाम दल 2023 के उस कानून को भी वापस लेने की मांग कर रहे हैं जिसने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की व्यवस्था बदली थी। इस तरह आंदोलन धीरे-धीरे एक व्यक्ति से आगे बढ़कर चुनाव व्यवस्था के ढांचे पर बहस में बदल रहा है।

लेकिन इसके समानांतर एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि अभी किसी न्यायिक निर्णय ने यह स्थापित नहीं किया है कि ज्ञानेश कुमार ने चुनावी धांधली की, मतदाता सूची में जानबूझकर किसी दल को लाभ पहुंचाने के लिए हेरफेर किया अथवा कानून तोड़ा। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें तत्काल निलंबित करने से इनकार किया है। अदालत ने रिकॉर्ड और जवाब मांगे हैं और कहा है कि आरोपों की कानूनी जांच होगी। इसलिए राजनीतिक आंदोलन की तीव्रता और कानूनी रूप से सिद्ध तथ्य को अलग रखना आवश्यक है।

चुनाव आयोग के इतिहास में असामान्य स्थिति

भारत में चुनाव आयोग हमेशा राजनीतिक आरोपों से मुक्त संस्था नहीं रहा। टी.एन. शेषन के दौर से लेकर बाद के अनेक मुख्य चुनाव आयुक्तों के समय सरकार और विपक्ष से टकराव हुए हैं। EVM को लेकर भी दो दशकों से राजनीतिक विवाद चलता रहा है। लेकिन वर्तमान परिस्थिति में एक अंतर स्पष्ट दिखाई देता है—इस बार मुख्य चुनाव आयुक्त का नाम स्वयं नारों, पोस्टरों, पुतला दहन, सोशल मीडिया trends और विपक्षी दलों के राष्ट्रीय कार्यक्रम के केंद्र में है।

दूसरा अंतर आंदोलन की सामाजिक संरचना है। इसमें केवल राजनीतिक दल नहीं हैं। छात्र संगठन, युवा समूह, नागरिक कार्यकर्ता, फिल्म और सांस्कृतिक क्षेत्र की कुछ हस्तियां तथा CJP जैसा नया युवा मंच भी मौजूद है। हालांकि इनके बीच आपसी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और नेतृत्व को लेकर तनाव भी है। इसलिए अभी इसे पूर्णतः स्वतःस्फूर्त जन आंदोलन कहना जितना जल्दबाजी होगी, उतना ही इसे केवल कांग्रेस या INDIA गठबंधन का कार्यक्रम कहना भी तस्वीर को अधूरा करेगा।

तीसरा और शायद सबसे महत्वपूर्ण अंतर चुनाव आयोग के भीतर से सामने आई असहमति की रिपोर्ट है। यदि विवाद केवल विपक्ष बनाम चुनाव आयोग होता तो भाजपा इसे सामान्य राजनीतिक आरोप कहकर अधिक आसानी से खारिज कर सकती थी। लेकिन दो चुनाव आयुक्तों द्वारा दर्ज कथित आपत्तियों और अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा रिकॉर्ड मांगने से बहस संस्थागत प्रक्रिया तक पहुंच गई है। आयोग का कहना है कि असहमति और सुझाव निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा थे और अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए। अब यही दावा न्यायिक जांच और सार्वजनिक बहस की कसौटी पर है।

एक व्यक्ति का विवाद या चुनावी संस्थाओं में भरोसे की लड़ाई?

6 अक्टूबर, 2026 की सुबह तक जो तस्वीर बनती है, उसमें ज्ञानेश कुमार संभवतः देश के सबसे अधिक राजनीतिक विवाद में घिरे संवैधानिक पदाधिकारियों में से एक बन चुके हैं। उनके इस्तीफे की मांग अब किसी एक पार्टी या दिल्ली की प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सीमित नहीं है। दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, पटना, कोलकाता, हैदराबाद, चंडीगढ़, जयपुर, भोपाल, देहरादून, जम्मू, मणिपुर और दूसरे स्थानों पर अलग-अलग स्तर के प्रदर्शन हो चुके हैं। विपक्ष के बड़े दल साझा कार्यक्रम बना चुके हैं। युवा और छात्र समूह समानांतर आंदोलन चला रहे हैं।

सोशल मीडिया पर “CEC Gyanesh Kumar”, “Form 6” और इससे जुड़े विषय उल्लेखनीय रूप से दिखाई दे रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से जवाब और रिकॉर्ड मांगा है। दूसरी ओर चुनाव आयोग आरोपों को भ्रामक बताते हुए अपनी प्रक्रियाओं और फैसलों का बचाव कर रहा है और भाजपा विपक्ष के आंदोलन को राजनीतिक अभियान बता रही है।

इसलिए इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शायद ज्ञानेश कुमार का व्यक्तिगत भविष्य भी नहीं है। असली सवाल यह बनता जा रहा है कि क्या भारत का मतदाता चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर उतना ही भरोसा करता है जितना किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था को चलाने के लिए आवश्यक है? किसी चुनाव आयोग के लिए केवल निष्पक्ष होना पर्याप्त नहीं होता, उसका निष्पक्ष दिखाई देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

दूसरी ओर केवल राजनीतिक आरोपों के आधार पर संवैधानिक संस्था अथवा उसके पदाधिकारी को दोषी मान लेना भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का विकल्प नहीं हो सकता। इसी कारण अब सबसे निर्णायक भूमिका दस्तावेजों, आयोग के आंतरिक रिकॉर्ड और सुप्रीम कोर्ट की आगे की सुनवाई की होगी।

फिलहाल सड़क पर संघर्ष बढ़ रहा है, अदालत में मामला खुल चुका है, राजनीतिक दल संगठित हो रहे हैं और सोशल मीडिया ने इसे राष्ट्रीय बहस में बदल दिया है। ज्ञानेश कुमार अब केवल मुख्य चुनाव आयुक्त का नाम नहीं रह गए हैं, वे उस बड़ी बहस के केंद्र में आ गए हैं जिसमें भारत यह पूछ रहा है कि मतदाता सूची कौन बनाता है, उसमें किसका नाम रहता है, किसका हटता है, फैसले किस प्रक्रिया से होते हैं और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुनाव कराने वाली संस्था पर जनता के भरोसे की रक्षा आखिर कैसे की जाए।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

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Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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