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Gyanesh Kumar Ka Jivan Parichay: ज्ञानेश कुमार कौन हैं? केरल-कश्मीर-अयोध्या से चुनाव आयोग तक का सफर
Gyanesh Kumar Ka Jivan Parichay: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का प्रशासनिक सफर जानिए—IIT कानपुर, केरल कैडर, अनुच्छेद 370, अयोध्या ट्रस्ट, चुनाव आयुक्त से CEC बनने तक और SIR को लेकर उठे सवालों की पूरी कहानी।
Gyanesh Kumar Ka Jivan Parichay Chief Election Commissioner Profile Wikipedia
Gyanesh Kumar Ka Jivan Parichay: आईआईटी कानपुर से पढ़ाई, केरल में प्रशासनिक शुरुआत, कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाने की प्रक्रिया से जुड़ी भूमिका और अयोध्या में राम जन्मभूमि ट्रस्ट के गठन की जिम्मेदारी। सेवानिवृत्ति के कुछ ही समय बाद चुनाव आयुक्त और फिर देश के मुख्य चुनाव आयुक्त बने ज्ञानेश कुमार का करीब साढ़े तीन दशक का प्रशासनिक सफर कई बेहद महत्वपूर्ण सरकारी फैसलों से जुड़ा रहा है। अब चुनाव आयोग के भीतर विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर उठे सवालों के बीच एक बार फिर उनका नाम राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है।
ज्ञानेश कुमार ने 19 फरवरी 2025 को देश के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में पदभार संभाला था। इससे पहले वह चुनाव आयुक्त के रूप में करीब 11 महीने काम कर चुके थे। उनका प्रशासनिक करियर 1988 बैच के आईएएस अधिकारी के रूप में शुरू हुआ। वह केरल कैडर के अधिकारी रहे हैं।
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ज्ञानेश कुमार की पहचान सिर्फ चुनाव आयोग तक सीमित नहीं है। उनके लंबे प्रशासनिक करियर के कई पड़ाव ऐसे रहे हैं, जिनका सीधा संबंध मोदी सरकार के दौर के महत्वपूर्ण और संवेदनशील फैसलों से रहा। कश्मीर में अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को हटाने की प्रक्रिया से लेकर जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन और अयोध्या में राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन तक वह केंद्र सरकार के बेहद महत्वपूर्ण कामों से जुड़े रहे।
आईआईटी कानपुर से आईएएस के केरल कैडर तक
ज्ञानेश कुमार ने आईआईटी कानपुर से सिविल इंजीनियरिंग में बीटेक किया है। इसके अलावा उन्होंने भारत में बिजनेस फाइनेंस की पढ़ाई की और अमेरिका के हार्वर्ड विश्वविद्यालय से पर्यावरण अर्थशास्त्र की पढ़ाई की। ज्ञानेश कुमार की शुरुआती नियुक्ति केरल में हुई जहाँ उन्होंने सहायक कलेक्टर और सब-कलेक्टर जैसे पदों पर काम किया। बाद में वह केरल सरकार के कई विभागों में रहे। कोच्चि नगर निगम के नगर आयुक्त, केरल राज्य सहकारी बैंक के प्रबंध निदेशक, एर्नाकुलम के जिला कलेक्टर और कई अन्य जिम्मेदारियां उन्होंने संभालीं। वह नई दिल्ली स्थित केरल हाउस में रेजिडेंट कमिश्नर भी रहे। इसके अलावा उन्होंने लोक निर्माण, वित्त, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति सहित कई विभागों में काम किया।
2012 से 2016 के बीच दिल्ली में केरल हाउस के रेजिडेंट कमिश्नर के रूप में उनका कार्यकाल महत्वपूर्ण रहा और इसके बाद उनके करियर का वह दौर शुरू हुआ, जिसने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।
2016 में कश्मीर की जिम्मेदारी
मई 2016 में ज्ञानेश कुमार को केंद्रीय गृह मंत्रालय में जम्मू कश्मीर मामलों से जुड़े विभाग में संयुक्त सचिव बनाया गया। यह वह दौर था जब कश्मीर घाटी में एक बार फिर उग्रवाद और हिंसा बढ़ रही थी। उस समय जम्मू-कश्मीर में पीडीपी और भाजपा की गठबंधन सरकार थी।
गृह मंत्रालय में उनकी भूमिका और महत्वपूर्ण होती गई। 2018 से 2021 के बीच वह अतिरिक्त सचिव के पद पर भी रहे। इसी अवधि में केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर को लेकर अपने सबसे बड़े संवैधानिक और प्रशासनिक फैसलों में से एक लिया।
अनुच्छेद 370 हटाने और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन में भूमिका
अगस्त 2019 में केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधानों को खत्म कर दिया। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख, में बांटने का फैसला किया गया।
इस फैसले को लागू करने के लिए जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक लाया गया था। ज्ञानेश कुमार उस प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों में शामिल थे। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने इस विधेयक की तैयारी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 के बाद की स्थिति को संभालना भी केंद्र सरकार के सामने बड़ी चुनौती थी। इसी दौर में गृह मंत्रालय के भीतर ज्ञानेश कुमार की भूमिका महत्वपूर्ण रही।
कश्मीर के बाद अयोध्या की जिम्मेदारी
नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में विवादित भूमि पर राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ करते हुए केंद्र सरकार को ट्रस्ट बनाने का निर्देश दिया। इसके बाद फरवरी 2020 में केंद्र सरकार ने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन की घोषणा की। ट्रस्ट को राम मंदिर निर्माण की देखरेख की जिम्मेदारी मिली।
उस समय गृह मंत्रालय में अयोध्या से संबंधित काम देखने वाली व्यवस्था में ज्ञानेश कुमार की महत्वपूर्ण भूमिका थी। 2020 में उन्हें जम्मू-कश्मीर और लद्दाख मामलों के साथ अयोध्या से संबंधित काम भी देखने की जिम्मेदारी दी गई थी। सरकारी रिकॉर्ड में भी जम्मू-कश्मीर और लद्दाख मामलों तथा अयोध्या डेस्क से जुड़ी उनकी भूमिका दर्ज है।
इस तरह उनके करियर के दो बड़े प्रशासनिक पड़ाव, जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 के बाद की व्यवस्था और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की संस्थागत प्रक्रिया, केंद्र सरकार के बेहद महत्वपूर्ण फैसलों से जुड़े रहे।
2020 में लगा झटका, फिर हुई वापसी
ज्ञानेश कुमार के करियर में 2020 में एक ऐसा दौर भी आया जब वह 1988 बैच के उन 24 अधिकारियों में शामिल नहीं किए गए जिन्हें उस समय सचिव पद के लिए पैनल में शामिल किया गया था। हालांकि इसके कुछ ही समय बाद उन्हें फिर महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली।
फरवरी 2021 में वह संसदीय कार्य मंत्रालय के सचिव बनाए गए। इसके बाद मई 2022 में उन्हें सहकारिता मंत्रालय का सचिव बनाया गया।।सहकारिता मंत्रालय में भी उन्होंने महत्वपूर्ण नीतिगत कामों को संभाला। उनके कार्यकाल के दौरान बहु-राज्य सहकारी समितियां कानून में संशोधन किया गया, जिसका उद्देश्य सहकारी क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़े प्रावधानों को मजबूत करना था।
जनवरी 2024 में सेवानिवृत्ति, मार्च में चुनाव आयुक्त
ज्ञानेश कुमार 31 जनवरी 2024 को सरकारी सेवा से रिटायर हुए। लेकिन रिटायरमेंट के डेढ़ महीने के भीतर ही उन्हें चुनाव आयुक्त नियुक्त कर दिया गया। 15 मार्च 2024 को उनकी नियुक्ति की घोषणा हुई। इसके अगले ही दिन चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव 2024 के कार्यक्रम की घोषणा की।
2024 का चुनाव उनके लिए चुनाव आयोग में पहला बड़ा अनुभव था। इसके बाद उन्होंने जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद हुए पहले विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया में भी भूमिका निभाई। इसके अलावा हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड और दिल्ली के विधानसभा चुनाव भी उनके चुनाव आयुक्त रहने के दौरान हुए।
चुनाव आयोग में वरिष्ठतम चुनाव आयुक्त होने के कारण उनका मुख्य चुनाव आयुक्त बनना तय माना जा रहा था। आखिरकार 19 फरवरी 2025 को उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाल लिया।
मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के बाद बदला अंदाज
मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में उनके कार्यकाल की शुरुआत प्रशासनिक अनुशासन पर जोर देने से हुई। उनके शुरुआती आदेशों में निर्वाचन सदन के कर्मचारियों के लिए बायोमेट्रिक उपस्थिति को सख्ती से लागू करना शामिल था।
उनकी कार्यशैली को लेकर चुनाव आयोग के भीतर बैठकों में तीखी बहस होने की खबरें भी सामने आईं। उनके कार्यकाल में चुनाव आयोग का सार्वजनिक संवाद भी ज्यादा दिखाई देने लगा। खास तौर पर मतदाता सूची, चुनावी आंकड़ों और चुनाव प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक दलों के आरोपों पर आयोग ने अपने सामाजिक माध्यमों के जरिए लगातार जवाब दिए।
एसआईआर ने ज्ञानेश कुमार को फिर बहस के केंद्र में ला दिया
मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल का सबसे बड़ा विवाद विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर सामने आया। यह प्रक्रिया पहले बिहार में शुरू हुई और बाद में चुनाव आयोग ने इसे देश के दूसरे हिस्सों तक विस्तार दिया। इसका उद्देश्य मतदाता सूची की जांच और उसे अपडेट करना बताया गया।
इसी प्रक्रिया के दौरान विपक्षी दलों ने मतदाता सूची से नाम हटाए जाने और जोड़े जाने को लेकर गंभीर सवाल उठाए। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसे लेकर चुनाव आयोग पर 'वोट चोरी' के आरोप लगाए। अगस्त 2025 में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने राहुल गांधी से इन आरोपों के समर्थन में शपथपत्र के साथ प्रमाण देने या अपने आरोप वापस लेने को कहा था।
चुनाव आयोग ने इन आरोपों को खारिज किया और कहा कि मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना उसका संवैधानिक दायित्व है। दूसरी ओर विपक्षी दलों ने आयोग की कार्रवाई और एसआईआर की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। दोनों पक्षों के दावों के बीच यह मुद्दा लंबे समय तक राजनीतिक बहस का विषय बना रहा।
अब चुनाव आयोग के भीतर ही उठे सवाल
23 सितंबर 2026 को ज्ञानेश कुमार एक नए विवाद के केंद्र में हैं। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में चुनाव आयोग के नाम से जारी कुछ फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट के अनुसार इन आपत्तियों में मतदाता जोड़ने और हटाने, फॉर्म 6 में बदलाव, मतदाता आंकड़ों के प्रबंधन और चुनावी आंकड़ों को दिल्ली में अधिक केंद्रीकृत किए जाने जैसे मुद्दे शामिल थे।
रिपोर्ट के अनुसार दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ मामलों में यह सवाल उठाया कि निर्णय उनकी जानकारी या मंजूरी के बिना कैसे लिए गए। एक मामले में चुनावी आंकड़ों से जुड़े काम के अधिकारों के बंटवारे को लेकर दोनों ने अलग-अलग कैबिनेट सचिव को भी पत्र लिखा।
हालांकि चुनाव आयोग के सूत्रों ने इन रिपोर्टों के बाद इन मतभेदों की व्याख्या अलग तरीके से की है। आयोग के सूत्रों ने 23 सितंबर को कहा कि एसआईआर सहित आयोग के सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से और सर्वसम्मति से लिए गए हैं। यानी एक तरफ रिपोर्टों में दर्ज आपत्तियों का उल्लेख है, वहीं आयोग का आधिकारिक पक्ष यह है कि अंतिम फैसलों में तीनों आयुक्तों की सहमति थी।
आगे इस विवाद में दर्ज आपत्तियों, आयोग की कार्यप्रणाली और एसआईआर से जुड़े फैसलों की सार्वजनिक जानकारी कितनी स्पष्ट होती है, यह इस बहस की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण पहलू होगा।


