India Future 2047: भारत 2047 में कैसा होगा? आजादी के 100 साल बाद विकसित भारत की पूरी तस्वीर

India Future 2047: जानिए विकसित भारत के लक्ष्य, अर्थव्यवस्था, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, AI, महिला भागीदारी, शहर, कृषि, ऊर्जा, जलवायु, रक्षा और वैश्विक भूमिका से जुड़ी संभावित तस्वीर।

Yogesh Mishra
Published on: 28 Sept 2026 7:37 PM IST
India Future 2047 Vision Developed Explained in Hindi
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India Future 2047 Vision Developed Explained in Hindi

India Future 2047: 15 अगस्त 2047 को भारत अपनी आजादी के सौ वर्ष पूरे करेगा। उस दिन से जुड़ी सबसे बड़ी कल्पना सिर्फ यह नहीं है कि देश कितना बड़ा होगा, बल्कि यह है कि आम भारतीय की जिंदगी कैसी होगी। क्या भारत सचमुच विकसित देश बन चुका होगा? क्या हर युवा को अच्छा रोजगार मिलेगा? क्या सरकारी स्कूल और अस्पताल इतने बेहतर होंगे कि लोगों को मजबूरी में निजी व्यवस्था पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा? क्या शहर रहने लायक होंगे? क्या किसान की आय मौसम और मंडी के उतार-चढ़ाव से कम प्रभावित होगी? और क्या भारत दुनिया की सत्ता-संरचना को केवल प्रभावित करेगा या उसके नियम बनाने में भी बड़ी भूमिका निभाएगा?

भारत सरकार ने 2047 को सामने रखकर ‘विकसित भारत’ का लक्ष्य रखा है। 2026 में नीति आयोग ने प्रकाशित अपने दीर्घकालिक अध्ययन में 2047 तक करीब 30 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था और विकसित देश बनने की दिशा का विस्तृत परिदृश्य रखा है। इस अध्ययन में आर्थिक विकास के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, शहरीकरण, उद्योग, परिवहन, ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन को भी एक साथ देखा गया है। नीति आयोग खुद इसे भविष्य की निश्चित भविष्यवाणी नहीं, बल्कि अलग-अलग नीतियों और आर्थिक परिस्थितियों पर आधारित परिदृश्यों के रूप में प्रस्तुत करता है।

विश्व बैंक का आकलन इस चुनौती को और स्पष्ट करता है। उसके अनुसार भारत को 2047 तक उच्च आय वाली अर्थव्यवस्था बनने की अपनी महत्वाकांक्षा हासिल करने के लिए अगले करीब दो दशकों में औसतन 7.8 प्रतिशत सालाना आर्थिक वृद्धि बनाए रखने की जरूरत होगी। यानी 2047 का विकसित भारत संभव है, लेकिन वह अपने आप नहीं बनेगा। उसके लिए लगातार तेज आर्थिक वृद्धि के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, महिलाओं की भागीदारी, उद्योग और संस्थागत सुधारों में बड़ा बदलाव करना होगा।

इसलिए 2047 को देखने का सबसे सही तरीका भविष्यवाणी करना नहीं, बल्कि आज की प्रवृत्तियों और उपलब्ध योजनाओं के आधार पर यह समझना है कि भारत किन रास्तों पर जा सकता है।

2047 का भारत: सबसे बड़ी ताकत उसका आकार होगा

अगर भारत अगले दो दशकों में तेज आर्थिक वृद्धि, राजनीतिक और सामाजिक स्थिरता, बुनियादी ढांचे का विस्तार तथा शिक्षा और स्वास्थ्य में लगातार निवेश बनाए रखता है तो 2047 में वह दुनिया के सबसे बड़े आर्थिक और रणनीतिक केंद्रों में शामिल हो सकता है।

भारत के पास उस समय एक विशाल घरेलू बाजार, बड़ी श्रमशक्ति, परमाणु क्षमता, अंतरिक्ष कार्यक्रम, तेजी से बढ़ता डिजिटल ढांचा, हिंद महासागर में महत्वपूर्ण भौगोलिक स्थिति और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से जुड़े कारोबारी तथा प्रवासी भारतीय नेटवर्क होंगे। यही संयोजन भारत को अमेरिका, चीन और यूरोप से अलग तरह की ताकत दे सकता है।

लेकिन भारत का विशाल आकार उसकी कमजोरी भी बन सकता है। अगर करोड़ों युवाओं को अच्छी शिक्षा और रोजगार नहीं मिला तो बड़ी आबादी आर्थिक ताकत के बजाय बेरोजगारी और सामाजिक दबाव का कारण बन सकती है। अगर शहरों का विकास बिना योजना के हुआ तो भीड़, महंगा आवास, पानी की कमी, प्रदूषण और यातायात आर्थिक विकास का फायदा कम कर सकते हैं। अगर महिलाओं की रोजगार में भागीदारी पर्याप्त नहीं बढ़ी तो देश अपनी बड़ी मानव क्षमता का एक हिस्सा इस्तेमाल ही नहीं कर पाएगा।

इसलिए 2047 का असली सवाल यह नहीं होगा कि भारत कितना बड़ा हो गया। असली सवाल होगा कि भारत अपने विशाल आकार को कितनी अच्छी तरह चला पाता है।

अर्थव्यवस्था: क्या भारत 30 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बन सकता है?

नीति आयोग के 2026 के अध्ययन में 2047 तक भारत की अर्थव्यवस्था को करीब 30 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंचाने का परिदृश्य रखा गया है। उसके अलग-अलग आर्थिक मॉडल 2047 के आसपास 30 से 31 लाख करोड़ डॉलर के स्तर तक पहुंचने की तस्वीर दिखाते हैं। यह एक लक्ष्य और मॉडल आधारित परिदृश्य है, निश्चित परिणाम नहीं।

इस स्तर तक पहुंचने के लिए लंबे समय तक तेज वृद्धि, बड़े निवेश, उत्पादकता में सुधार, बेहतर मानव पूंजी और आर्थिक गतिविधियों में महिलाओं की कहीं अधिक भागीदारी जरूरी होगी। विश्व बैंक का 7.8 प्रतिशत औसत वृद्धि वाला आकलन बताता है कि चुनौती कितनी बड़ी है।

लेकिन 2047 की अर्थव्यवस्था का महत्व केवल उसके आकार में नहीं होगा। उसकी संरचना भी बदलेगी। भारत को इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, रक्षा उपकरण, दवा, रसायन, विद्युत वाहन, बैटरी, अर्धचालक, अंतरिक्ष उपकरण, जैव-प्रौद्योगिकी और स्वच्छ ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ाना होगा।

अभी भारत की अर्थव्यवस्था में सेवाओं का बड़ा योगदान है, लेकिन करोड़ों लोगों के लिए पर्याप्त उत्पादक रोजगार पैदा करने के लिए विनिर्माण और निर्माण क्षेत्र का विस्तार भी जरूरी है। अगर आधुनिक सेवाओं और बड़े पैमाने के उद्योग दोनों साथ बढ़े तो भारत का विशाल घरेलू बाजार उसकी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बन सकता है।

बड़ा देश और अमीर नागरिक, दोनों एक चीज नहीं हैं

भारत की सबसे बड़ी आर्थिक भूल यह होगी कि कुल सकल घरेलू उत्पाद को ही विकसित होने का प्रमाण मान लिया जाए। डेढ़ अरब से अधिक आबादी वाले देश में बहुत बड़ी अर्थव्यवस्था का मतलब यह जरूरी नहीं कि हर नागरिक समृद्ध हो।

विकसित भारत का वास्तविक पैमाना नागरिक की आय, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, सार्वजनिक परिवहन, स्वच्छता, सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक सुरक्षा से तय होगा।

किसी परिवार की एक गंभीर बीमारी उसकी पूरी बचत खत्म न कर दे, नौकरी जाने पर परिवार अचानक गरीबी में न लौटे, किसान की आय केवल एक फसल और मौसम पर निर्भर न रहे और मध्यमवर्ग को अच्छी शिक्षा तथा स्वास्थ्य के लिए अपनी आय का बहुत बड़ा हिस्सा निजी सेवाओं पर खर्च न करना पड़े, तब आर्थिक विकास का असर वास्तव में दिखाई देगा।

इसलिए 2047 की सफलता का सवाल केवल यह नहीं होगा कि भारत की अर्थव्यवस्था कितने लाख करोड़ डॉलर की है। सवाल यह होगा कि उस आर्थिक ताकत का कितना हिस्सा सामान्य नागरिक की जिंदगी को सुरक्षित और बेहतर बनाता है।

जनसंख्या: भारत युवा रहेगा, लेकिन हमेशा युवा नहीं रहेगा

संयुक्त राष्ट्र के नवीनतम जनसंख्या अनुमानों के अनुसार भारत की आबादी 2054 तक बढ़ती रहने की संभावना है। इसका मतलब है कि 2047 में भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश बना रह सकता है, हालांकि ठीक उस समय आबादी कितनी होगी, यह जन्मदर और दूसरी जनसांख्यिकीय परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। संयुक्त राष्ट्र के 2024 अनुमानों में भारत उन देशों में है जिनकी आबादी 2054 तक बढ़ने की संभावना है। लेकिन केवल आबादी का आकार महत्वपूर्ण नहीं होगा। उसकी उम्र का ढांचा ज्यादा महत्वपूर्ण होगा।

आज का युवा भारत 2047 तक उम्रदराज होने की दिशा में काफी आगे बढ़ चुका होगा। दक्षिणी और कुछ पश्चिमी राज्यों में वृद्ध आबादी का हिस्सा तेजी से बढ़ सकता है, जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में अपेक्षाकृत बड़ी युवा आबादी बनी रह सकती है।

इसका मतलब है कि भारत के भीतर एक साथ दो अलग जनसांख्यिकीय स्थितियां दिखाई देंगी। कुछ राज्यों को वृद्ध लोगों की देखभाल और कम होती कामगार संख्या की चिंता होगी, जबकि दूसरे राज्यों को बड़ी युवा आबादी के लिए शिक्षा और रोजगार पैदा करना होगा।

इससे राज्यों के बीच और राज्यों के भीतर लोगों का आना-जाना भी बढ़ सकता है। भविष्य की जनसंख्या नीति इसलिए सिर्फ आबादी की संख्या का प्रश्न नहीं होगी, बल्कि उम्र, रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा और आंतरिक प्रवास का प्रश्न भी होगी।

रोजगार: 2047 के भारत का सबसे बड़ा सवाल

भारत के विकसित होने की सबसे निर्णायक कसौटी रोजगार होगी। 2026 के श्रम बल आंकड़े बताते हैं कि 15 वर्ष और उससे अधिक उम्र की आबादी के लिए श्रम बल भागीदारी दर में उतार-चढ़ाव बना हुआ है। मई 2026 में यह दर 54.4 प्रतिशत थी और जुलाई में 55.4 प्रतिशत दर्ज की गई। लेकिन सिर्फ रोजगार की संख्या पर्याप्त नहीं होगी। भारत को बेहतर उत्पादकता और बेहतर आय वाले रोजगार चाहिए होंगे।

2047 तक सामान्य लेखांकन, दस्तावेज तैयार करने, ग्राहक सेवा, नियमित डेटा विश्लेषण और कुछ तरह के प्रोग्रामिंग कार्यों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल बहुत बढ़ सकता है। दूसरी ओर स्वास्थ्य, वृद्धजन देखभाल, शिक्षा, निर्माण, हरित ऊर्जा, उन्नत विनिर्माण, पर्यटन, अनुसंधान, डिजाइन, सुरक्षा और स्थानीय सेवाओं में नए काम पैदा होंगे। सबसे बड़ा खतरा यह होगा कि एक तरफ करोड़ों लोग नौकरी तलाश रहे हों और दूसरी तरफ उद्योगों को जरूरी कौशल वाले कर्मचारी न मिलें। इसलिए भारत की चुनौती सिर्फ रोजगार पैदा करना नहीं, बल्कि शिक्षा और कौशल को उद्योग की जरूरत के साथ जोड़ना होगी।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता: अवसर भी और रोजगार की बड़ी परीक्षा भी

2047 तक कृत्रिम बुद्धिमत्ता बिजली और इंटरनेट की तरह रोजमर्रा की जिंदगी की आधारभूत तकनीक बन सकती है। अस्पतालों में रोग की पहचान, खेतों में फसल की निगरानी, स्कूलों में व्यक्तिगत शिक्षण, बैंकों में जोखिम का आकलन, शहरों में यातायात नियंत्रण और कारखानों में मशीनों का संचालन इसके सामान्य इस्तेमाल हो सकते हैं।

भारत की खास ताकत उसका डिजिटल सार्वजनिक ढांचा है। डिजिटल भुगतान, डिजिटल पहचान और सार्वजनिक डिजिटल प्रणालियों के अनुभव को भविष्य में स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, वित्त और रोजगार के क्षेत्र में और आगे बढ़ाया जा सकता है। लेकिन सिर्फ विदेशी कृत्रिम बुद्धिमत्ता मॉडल इस्तेमाल करने से भारत तकनीकी शक्ति नहीं बनेगा। उसे कंप्यूटिंग क्षमता, अर्धचालक, डेटा केंद्र, वैज्ञानिक अनुसंधान, स्वदेशी मॉडल और भारतीय भाषाओं की तकनीक में निवेश करना होगा। भारत की भाषाई विविधता यहां चुनौती के साथ अवसर भी है। अगर भारतीय भाषाओं में मजबूत कृत्रिम बुद्धिमत्ता विकसित होती है तो भारत के अलावा एशिया और अफ्रीका के दूसरे बहुभाषी समाज भी उसका इस्तेमाल कर सकते हैं।

शिक्षा: 2047 का भारत स्कूलों की संख्या से नहीं, सीखने की गुणवत्ता से पहचाना जाएगा

2047 तक भारत में स्कूल और विश्वविद्यालय आज की तुलना में कहीं अधिक हो सकते हैं। लेकिन विकसित भारत के लिए सिर्फ नामांकन बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा।

असली सवाल होगा कि बच्चा पांचवीं या आठवीं कक्षा तक पहुंचने के बाद ठीक से पढ़ सकता है या नहीं, गणना कर सकता है या नहीं, तर्क समझ सकता है या नहीं और नई जानकारी का इस्तेमाल कर सकता है या नहीं।

उच्च शिक्षा में भी डिग्री की संख्या से ज्यादा गुणवत्ता महत्वपूर्ण होगी। विश्वस्तरीय अनुसंधान विश्वविद्यालय, उद्योग से जुड़े पाठ्यक्रम, व्यावसायिक शिक्षा और लगातार कौशल सीखने की व्यवस्था जरूरी होगी। 2047 का रोजगार बाजार आज की तरह नहीं होगा जिसमें एक डिग्री लेकर कोई व्यक्ति दशकों तक लगभग एक ही तरह का काम करता रहे। लोगों को जीवन में कई बार नया कौशल सीखना पड़ सकता है। इसलिए भविष्य की शिक्षा जन्म से लेकर कामकाजी जीवन के आखिरी हिस्से तक लगातार सीखने की व्यवस्था बन सकती है।

स्वास्थ्य: भारतीय ज्यादा लंबा जिएगा, लेकिन बीमारी का स्वरूप बदलेगा

2047 तक भारत में जीवन प्रत्याशा बढ़ने की संभावना है। इसका अर्थ यह भी है कि देश को वृद्ध आबादी और उससे जुड़ी बीमारियों के लिए तैयार होना पड़ेगा।

भविष्य की स्वास्थ्य चुनौती केवल संक्रमण और मातृ-शिशु स्वास्थ्य तक सीमित नहीं होगी। मधुमेह, कैंसर, हृदय रोग, मोटापा, मानसिक स्वास्थ्य और उम्र से जुड़ी बीमारियां अधिक महत्वपूर्ण हो सकती हैं।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित जांच, दूरचिकित्सा, सस्ती जांच तकनीक और घर पर स्वास्थ्य निगरानी ग्रामीण भारत में विशेषज्ञ चिकित्सा की पहुंच बढ़ा सकती हैं।

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सवाल इलाज की कीमत का होगा। विकसित भारत में गंभीर बीमारी का अर्थ परिवार की पूरी बचत खत्म होना नहीं होना चाहिए। इसके लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था, स्वास्थ्य बीमा और निजी चिकित्सा के बीच बेहतर संतुलन जरूरी होगा।

महिलाएं: 2047 की सबसे बड़ी आर्थिक क्रांति यहां हो सकती है

अगर भारत 2047 तक उच्च आय वाली अर्थव्यवस्था बनता है तो उसके पीछे महिलाओं की बढ़ी हुई आर्थिक भागीदारी एक महत्वपूर्ण कारण हो सकती है।

महिलाओं को रोजगार में बराबर भागीदार बनाने के लिए केवल नौकरियां पैदा करना पर्याप्त नहीं होगा। सुरक्षित परिवहन, कामकाजी महिलाओं के लिए बच्चों की देखभाल, छात्रावास, बेहतर कार्यस्थल, मातृत्व सहायता, संपत्ति अधिकार और सामाजिक सोच में बदलाव भी जरूरी होंगे। अगर करोड़ों महिलाएं कामकाजी अर्थव्यवस्था से जुड़ती हैं तो इसका असर केवल सकल घरेलू उत्पाद पर नहीं पड़ेगा। परिवार की आय, बच्चों की शिक्षा, पोषण और महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता पर भी इसका असर होगा। इसलिए 2047 का विकसित भारत महिलाओं की जिंदगी में दिखाई देने वाले बदलाव से भी पहचाना जाएगा।

शहर: 2047 तक भारत तेजी से शहरी देश बन चुका होगा

विश्व बैंक के अनुसार भारत की शहरी आबादी 2050 तक लगभग दोगुनी होकर 95.1 करोड़ तक पहुंच सकती है। 2070 तक 14.4 करोड़ से अधिक नए घरों की जरूरत पड़ने का अनुमान है। रिपोर्ट के अनुसार भारतीय शहरों को नए, टिकाऊ और जलवायु के अनुकूल बुनियादी ढांचे के लिए 2050 तक 2.4 लाख करोड़ डॉलर से अधिक निवेश की जरूरत हो सकती है।

इसका मतलब है कि 2047 का भारत आज की तुलना में कहीं अधिक शहरी होगा। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और हैदराबाद के साथ लखनऊ, जयपुर, इंदौर, सूरत, नागपुर, पटना, भुवनेश्वर, कोयंबटूर और ऐसे अनेक शहर बड़े आर्थिक केंद्र बन सकते हैं। लेकिन शहरों का भविष्य सिर्फ ऊंची इमारतों से तय नहीं होगा। पानी, सीवर, कचरा प्रबंधन, सार्वजनिक परिवहन, सस्ता आवास और प्रदूषण नियंत्रण कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण होंगे। विश्व बैंक के अनुसार कई भारतीय शहरों के केंद्र आसपास के इलाकों की तुलना में पहले ही 3 से 4 डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म हो सकते हैं। इसका मतलब है कि भविष्य का शहर सिर्फ स्मार्ट नहीं, गर्मी और बाढ़ जैसी परिस्थितियों को झेलने लायक भी होना चाहिए।

पानी: 2047 की सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक

भारत में दुनिया की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा रहता है, लेकिन मीठे पानी के संसाधन सीमित हैं। जैसे-जैसे शहर, उद्योग और खेती की जरूरत बढ़ेगी, पानी की मांग भी बढ़ेगी। 2047 तक भूजल का बेहतर प्रबंधन, वर्षाजल संचयन, गंदे पानी का दोबारा इस्तेमाल, कम पानी वाली सिंचाई और शहरों में पानी की बर्बादी रोकना जरूरी होगा। भविष्य में पानी केवल पर्यावरण का विषय नहीं रहेगा। यह कृषि, उद्योग, शहरों और राज्यों के बीच आर्थिक तथा प्रशासनिक सवाल बन सकता है।

कृषि: किसान कम हो सकते हैं, खेती नहीं

2047 का भारत आज जैसा कृषि प्रधान समाज नहीं होगा, लेकिन कृषि की जरूरत खत्म नहीं होगी। आय बढ़ने के साथ लोगों के भोजन में दाल, दूध, फल, सब्जियों और दूसरे उच्च मूल्य वाले खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ सकती है।

नीति आयोग के कृषि अध्ययन में 2047-48 तक खाद्यान्न की मांग बढ़ने के अलग-अलग परिदृश्य दिए गए हैं और यह माना गया है कि सीमित कृषि भूमि के कारण उत्पादन बढ़ाने के लिए उत्पादकता में सुधार जरूरी होगा। खेती में सेंसर, उपग्रह, ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मौसम की जानकारी, बेहतर बीज और कम पानी वाली सिंचाई जैसी तकनीकें सामान्य हो सकती हैं।

लेकिन खेती के भविष्य की असली कसौटी ड्रोन या ट्रैक्टर की संख्या नहीं होगी। किसान की आय होगी। छोटे किसानों को बेहतर बाजार, भंडारण, खाद्य प्रसंस्करण और किसान उत्पादक संगठनों से जोड़ना जरूरी होगा। खेती का ढांचा धीरे-धीरे केवल अनाज उत्पादन से आगे बढ़कर पोषण और अधिक मूल्य वाले खाद्य पदार्थों की ओर जा सकता है।

उद्योग: भारत को सिर्फ सेवा क्षेत्र नहीं, बड़ा उत्पादन केंद्र भी बनना होगा

भारत के लिए 2047 तक बड़े विनिर्माण देश बनना महत्वपूर्ण होगा। केवल सूचना तकनीक, बैंकिंग और पेशेवर सेवाएं करोड़ों लोगों के लिए पर्याप्त रोजगार नहीं पैदा कर सकतीं। कपड़ा, खाद्य प्रसंस्करण और निर्माण जैसे श्रम आधारित उद्योगों के साथ इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उपकरण, अर्धचालक, मशीनरी, औषधि, बैटरी और स्वच्छ ऊर्जा उपकरणों में बड़े पैमाने पर उत्पादन जरूरी होगा।

नीति आयोग के औद्योगिक परिदृश्य में इस विस्तार का पैमाना बहुत बड़ा है। इस्पात और सीमेंट जैसे क्षेत्रों की मांग में भारी बढ़ोतरी की संभावना जताई गई है। लेकिन इसके साथ कम प्रदूषण और कम कार्बन उत्सर्जन वाली तकनीक अपनाना भी जरूरी होगा। भारत के सामने चुनौती यह होगी कि वह तेज औद्योगिकीकरण करे, लेकिन ऐसी औद्योगिक व्यवस्था बनाए जो जलवायु परिवर्तन के दौर में भी टिकाऊ हो।

ऊर्जा: भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था को सबसे ज्यादा ऊर्जा चाहिए होगी

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार भारत की बिजली की मांग तेजी से बढ़ रही है। 2024 में भारत के बिजली क्षेत्र के निवेश का करीब 83 प्रतिशत हिस्सा स्वच्छ ऊर्जा में गया और गैर-जीवाश्म स्रोतों की हिस्सेदारी बिजली उत्पादन क्षमता में 44 प्रतिशत तक पहुंच गई थी।

लेकिन भारत की ऊर्जा जरूरतें भी तेजी से बढ़ेंगी। अधिक घर, अधिक वाहन, वातानुकूलन, उद्योग, इस्पात, सीमेंट और डिजिटल ढांचा सब ज्यादा बिजली मांगेंगे।

2047 तक भारत पूरी तरह जीवाश्म ईंधन से मुक्त होगा, यह मान लेना उचित नहीं है। भारत का घोषित शुद्ध-शून्य उत्सर्जन लक्ष्य 2070 है। लेकिन बिजली व्यवस्था में सौर, पवन, परमाणु ऊर्जा, बैटरी और दूसरी कम-कार्बन तकनीकों की भूमिका आज से बहुत बड़ी हो सकती है।

ऊर्जा सुरक्षा इसलिए सिर्फ आर्थिक विषय नहीं होगी। तेल और गैस के आयात पर निर्भरता कम करना भारत की विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा रहेगा।

जलवायु परिवर्तन: अमीर भारत को भी मौसम से बचने पर खर्च करना होगा

2047 तक जलवायु परिवर्तन भारत के विकास का अलग विषय नहीं रहेगा। भीषण गर्मी काम के घंटों को प्रभावित कर सकती है, बिजली की मांग बढ़ा सकती है, फसल उत्पादन पर असर डाल सकती है और शहरों में स्वास्थ्य संकट पैदा कर सकती है। समुद्र के बढ़ते स्तर से तटीय शहरों पर दबाव बढ़ सकता है। अनियमित बारिश, अचानक बाढ़ और लंबे सूखे का असर खेती और जल प्रबंधन पर पड़ सकता है। इसलिए भविष्य का भारत केवल ज्यादा सड़क, ज्यादा बिजली और ज्यादा उत्पादन वाला देश नहीं होगा। उसे ऐसे घर, बिजली नेटवर्क, सड़कें, जल व्यवस्था और कृषि तकनीक भी बनानी होगी जो बदलते मौसम का सामना कर सकें।

परिवहन: कारों से ज्यादा महत्वपूर्ण होगा सार्वजनिक परिवहन

2047 तक भारत में एक्सप्रेसवे, माल गलियारे, मेट्रो, क्षेत्रीय रेल और तेज रेल नेटवर्क का विस्तार हो सकता है। निजी वाहनों की संख्या भी बढ़ेगी।

लेकिन अगर हर नया परिवार पेट्रोल या डीजल की कार पर निर्भर हुआ तो शहरों की सड़कें और हवा दोनों दबाव में आ जाएंगी। इसलिए सार्वजनिक परिवहन और विद्युत वाहनों का विस्तार महत्वपूर्ण होगा। लंबी दूरी के माल परिवहन में रेल की हिस्सेदारी बढ़ाना भी जरूरी होगा। इससे ईंधन की खपत और परिवहन लागत दोनों कम हो सकती हैं। भविष्य में कुछ क्षेत्रों में स्वचालित वाहन भी सामान्य हो सकते हैं, लेकिन भारत की घनी और विविध यातायात व्यवस्था के कारण यहां उनका इस्तेमाल दूसरे देशों से अलग तरीके से विकसित हो सकता है।

डिजिटल भारत: दुनिया में भारत की अलग पहचान

2047 में भारत की एक बड़ी ताकत उसका डिजिटल सार्वजनिक ढांचा हो सकता है। आज डिजिटल भुगतान जिस पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है, उसी तरह भविष्य में स्वास्थ्य रिकॉर्ड, शिक्षा प्रमाणपत्र, बीमा, ऋण, कृषि सेवाएं और सरकारी योजनाएं एक-दूसरे से जुड़े डिजिटल ढांचे पर चल सकती हैं। लेकिन डिजिटल जीवन के साथ नई चुनौतियां भी आएंगी। नागरिकों की निजी जानकारी की सुरक्षा, साइबर हमले, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के गलत इस्तेमाल और सरकारी तथा निजी संस्थाओं के पास जमा विशाल डेटा की सुरक्षा महत्वपूर्ण सवाल होंगे। भारत को तकनीकी क्षमता बढ़ाने के साथ नागरिक की गोपनीयता और स्वतंत्रता की रक्षा का संतुलन भी बनाना होगा।

अंतरिक्ष: चंद्रमा से आगे की अर्थव्यवस्था

2047 तक भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम केवल वैज्ञानिक प्रतिष्ठा का विषय नहीं रहेगा। उपग्रह संचार, पृथ्वी की निगरानी, मौसम, कृषि, रक्षा, नेविगेशन और निजी प्रक्षेपण उद्योग एक बड़ा आर्थिक क्षेत्र बन सकते हैं।

पुन: इस्तेमाल किए जा सकने वाले प्रक्षेपण यान, छोटे उपग्रह, निजी अंतरिक्ष कंपनियां और मानव अंतरिक्ष उड़ान भविष्य के अंतरिक्ष उद्योग का हिस्सा हो सकती हैं।

यदि भारत वैज्ञानिक अनुसंधान, निजी क्षेत्र और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को साथ लेकर चलता है तो 2047 तक वह वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के प्रमुख केंद्रों में शामिल हो सकता है।

रक्षा: 2047 की सेना ज्यादा तकनीकी और बहु-क्षेत्रीय होगी

2047 की भारतीय सेना आज की तुलना में बहुत अलग तकनीकी वातावरण में काम कर सकती है। जमीन, समुद्र और हवा के साथ साइबर और अंतरिक्ष क्षेत्र भी युद्ध की तैयारी का हिस्सा होंगे। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मानवरहित विमान, ड्रोन, लंबी दूरी की मिसाइल, साइबर युद्ध, अंतरिक्ष निगरानी और स्वचालित प्रणालियों का महत्व बढ़ेगा। 2025 में भारत का सैन्य खर्च 92.1 अरब डॉलर था और वह दुनिया में पांचवें स्थान पर रहा। SIPRI 2047 में अगर अर्थव्यवस्था काफी बड़ी होती है तो रक्षा के लिए उपलब्ध संसाधन भी आज की तुलना में बहुत अधिक हो सकते हैं। हिंद महासागर में भारत की स्थिति के कारण नौसेना का महत्व भी बढ़ेगा। भारत की ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार और रणनीतिक हित इस क्षेत्र से गहराई से जुड़े रहेंगे।

भारत और चीन: प्रतिस्पर्धा का नया दौर

2047 तक भारत और चीन दोनों एशिया की सबसे महत्वपूर्ण शक्तियों में रह सकते हैं, लेकिन उनकी जनसांख्यिकीय स्थितियां काफी अलग होंगी। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार भारत की आबादी 2054 तक बढ़ सकती है, जबकि चीन की आबादी घटने के दौर में है। चीन की औद्योगिक क्षमता और लंबे समय से जमा पूंजी भारत के लिए बड़ी चुनौती बनी रहेगी। दूसरी तरफ भारत के पास बड़ा घरेलू बाजार, लोकतांत्रिक व्यवस्था, युवा आबादी और दुनिया के कई हिस्सों से जुड़े आर्थिक संबंध होंगे।दोनों देशों की प्रतिस्पर्धा केवल सीमा तक सीमित नहीं रहेगी। तकनीक, समुद्री क्षेत्र, विनिर्माण, व्यापार, अफ्रीका, दक्षिण एशिया और वैश्विक संस्थाओं में प्रभाव भी इसका हिस्सा होंगे।

अमेरिका और भारत: साझेदारी, लेकिन अपनी स्वतंत्र दिशा

2047 में भारत और अमेरिका के बीच रक्षा तकनीक, अर्धचालक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष, शिक्षा और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग महत्वपूर्ण हो सकता है। लेकिन भारत की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण तत्व अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखना भी रहा है। इसलिए भारत के लिए अमेरिका के साथ गहरे संबंधों के साथ रूस, पश्चिम एशिया, यूरोप, अफ्रीका और वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ अपने हितों के अनुसार संबंध बनाए रखना भी महत्वपूर्ण रहेगा। अगर भारत इस संतुलन को सफलतापूर्वक संभालता है तो उसकी विदेश नीति किसी एक शक्ति-गुट पर पूरी तरह निर्भर होने के बजाय कई केंद्रों के साथ अपने हितों के आधार पर संबंध बनाने वाली हो सकती है।

संयुक्त राष्ट्र और विश्व व्यवस्था में भारत की भूमिका

2047 तक संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार का सवाल और महत्वपूर्ण हो सकता है। भारत की बड़ी आबादी, आर्थिक आकार, परमाणु क्षमता और वैश्विक राजनीतिक भूमिका उसे वैश्विक संस्थाओं में ज्यादा प्रतिनिधित्व का दावा करने का आधार देते हैं। लेकिन वैश्विक शक्ति केवल सुरक्षा परिषद की सीट से नहीं आती। व्यापार नियम, जलवायु वार्ता, तकनीकी मानक, डिजिटल शासन, विकास वित्त और वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ संबंधों में भारत की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। 2047 का सवाल यह होगा कि भारत मौजूदा वैश्विक व्यवस्था में ज्यादा जगह मांगता है या नई व्यवस्था के नियम बनाने में सक्रिय भूमिका निभाता है।

रुपया: क्या वह दुनिया की बड़ी मुद्रा बन सकता है?

2047 तक रुपये का अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल आज की तुलना में काफी बढ़ सकता है, खासकर उन देशों के साथ जिनसे भारत का व्यापार बड़ा होगा। लेकिन डॉलर जैसी वैश्विक आरक्षित मुद्रा बनना कहीं ज्यादा कठिन काम है। इसके लिए सिर्फ बड़ी अर्थव्यवस्था पर्याप्त नहीं होती। गहरे और भरोसेमंद वित्तीय बाजार, स्थिर मुद्रास्फीति, मजबूत संस्थाएं और दुनिया भर के निवेशकों का लंबे समय का विश्वास भी जरूरी होता है। इसलिए ज्यादा व्यावहारिक संभावना यह है कि 2047 में रुपया अंतरराष्ट्रीय व्यापार में आज से कहीं अधिक इस्तेमाल हो, लेकिन डॉलर की जगह लेने के बजाय एक बड़ी वैश्विक मुद्रा के रूप में अपनी भूमिका मजबूत करे।

लोकतंत्र: भारत की सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ी परीक्षा

2047 में करीब डेढ़ अरब से अधिक लोगों का लोकतांत्रिक ढांचा यदि मजबूत और प्रभावी बना रहता है तो यह अपने आप में एक असाधारण उपलब्धि होगी। लेकिन विकसित लोकतंत्र केवल चुनाव कराने से नहीं बनता। अदालतों में न्याय कितनी जल्दी मिलता है, पुलिस कितनी जवाबदेह है, संसद और विधानसभाओं में कानूनों पर कितनी गंभीर चर्चा होती है, स्थानीय सरकारें कितनी सक्षम हैं और नागरिकों का संस्थाओं पर कितना भरोसा है, ये सब महत्वपूर्ण होंगे। आर्थिक विकास के लिए भी संस्थाओं की गुणवत्ता जरूरी होगी। उद्योग को सड़क और बिजली के साथ भरोसेमंद कानून चाहिए। निवेशक को बाजार के साथ नियमों की स्थिरता चाहिए। नागरिक को आय के साथ न्याय चाहिए। यही कारण है कि 2047 का विकसित भारत केवल आर्थिक परियोजना नहीं, बल्कि संस्थागत सुधार की भी परियोजना होगा।

संघवाद: 2047 का भारत राज्यों की सफलता से बनेगा

भारत की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक यह है कि अलग-अलग राज्यों की विकास यात्रा अलग गति से चल रही है। कुछ राज्य 2047 तक आय, शिक्षा, स्वास्थ्य और उद्योग के मामले में आज के विकसित देशों के कई मानकों के करीब पहुंच सकते हैं। दूसरी तरफ कुछ राज्यों को अभी भी शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला रोजगार और बुनियादी ढांचे की बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। यही अंतर भारत के लिए अवसर भी है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे बड़ी युवा आबादी वाले राज्यों में शिक्षा, उद्योग और शहरों का विस्तार तेज हुआ तो भारत की अगली बड़ी विकास लहर इन्हीं क्षेत्रों से आ सकती है। इसलिए विकसित भारत केवल केंद्र सरकार की योजनाओं से नहीं बनेगा। राज्यों और शहरों की क्षमता उतनी ही महत्वपूर्ण होगी।

समाज: ज्यादा समृद्ध भारत क्या ज्यादा समान भी होगा?

आर्थिक विकास से भारत में विशाल मध्यवर्ग बनने की संभावना है। आवास, पर्यटन, शिक्षा, बीमा, स्वास्थ्य, वित्त और मनोरंजन पर खर्च बढ़ सकता है। लेकिन आर्थिक विकास अपने आप समान अवसर नहीं पैदा करता। अगर अच्छी शिक्षा, जमीन, पूंजी, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसर कुछ शहरों या कुछ समूहों तक सीमित रहे तो आय और संपत्ति का अंतर बना रह सकता है। जाति, भाषा और धर्म जैसी सामाजिक पहचानें 2047 में भी भारतीय समाज का हिस्सा रहेंगी। शहरीकरण और शिक्षा इनके स्वरूप को बदल सकते हैं, लेकिन सामाजिक विविधता खत्म नहीं होगी। इसलिए सामाजिक शांति विकसित भारत की आर्थिक जरूरत भी होगी। लंबे समय तक सामाजिक तनाव निवेश, शिक्षा, पर्यटन और रोजगार पर असर डाल सकता है।

वैश्विक भारतीय: प्रवासी समुदाय और बड़ी ताकत

2047 तक विदेशों में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों का आर्थिक और तकनीकी प्रभाव और बढ़ सकता है।

अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, पश्चिम एशिया और अफ्रीका में भारतीय पेशेवर, उद्यमी और निवेशक भारत के साथ पूंजी, तकनीक और ज्ञान के पुल बन सकते हैं।

भविष्य में प्रतिभा पलायन का अर्थ भी बदल सकता है। लोग विदेश में रहकर भारतीय कंपनियों से जुड़ सकते हैं, भारत में निवेश कर सकते हैं और दो देशों के बीच ज्ञान तथा पूंजी का प्रवाह बढ़ा सकते हैं। विकसित भारत की पहचान प्रतिभा को देश से बाहर जाने से रोकने में नहीं, बल्कि दुनिया की प्रतिभा और पूंजी को भारत से जोड़ने की क्षमता में भी होगी।

2047 के तीन संभावित भारत

2047 का एक ही निश्चित भविष्य नहीं है। आज की नीतियों और प्रवृत्तियों को देखकर कम से कम तीन तरह के परिदृश्य समझे जा सकते हैं। एक परिदृश्य में भारत तेज और लंबे समय तक आर्थिक वृद्धि बनाए रखता है। शिक्षा और स्वास्थ्य में बड़ा सुधार होता है, महिला रोजगार बढ़ता है, विनिर्माण मजबूत होता है, शहर बेहतर तरीके से विकसित होते हैं और भारत तकनीक का निर्माता भी बनता है। ऐसी स्थिति में 30 लाख करोड़ डॉलर के आसपास की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य नीति आयोग के परिदृश्यों के अनुरूप संभव हो सकता है।

दूसरे परिदृश्य में भारत बड़ी अर्थव्यवस्था तो बनता है, लेकिन विकास असमान रहता है। कुछ शहर और राज्य विश्वस्तरीय होते हैं, जबकि दूसरे हिस्सों में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और कृषि आय की समस्याएं बनी रहती हैं।

तीसरे परिदृश्य में आर्थिक वृद्धि धीमी पड़ती है, रोजगार पर्याप्त नहीं बढ़ता, जल और जलवायु संकट गंभीर होता है और मानव विकास आर्थिक विकास की गति से पीछे रह जाता है। ऐसी स्थिति में भारत की कुल अर्थव्यवस्था बड़ी होने के बावजूद प्रति व्यक्ति समृद्धि और जीवन की गुणवत्ता विकसित देशों के स्तर तक पहुंचने में अधिक समय ले सकती है।

2047 तक भारत को किन बड़ी चुनौतियों से गुजरना होगा?

अगले दो दशकों में भारत के सामने कई ऐसे सवाल होंगे जिनका जवाब केवल पैसा खर्च करके नहीं दिया जा सकता। हर बच्चे को अच्छी शिक्षा देना होगा। युवाओं को बड़े पैमाने पर उत्पादक रोजगार देना होगा। महिलाओं को अर्थव्यवस्था में बराबर भागीदार बनाना होगा। उद्योग को विश्वस्तरीय बनाना होगा। शहरों और पानी का बेहतर प्रबंधन करना होगा। स्वास्थ्य सेवा को ज्यादा सुलभ और सस्ती बनाना होगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, विज्ञान और अर्धचालक जैसी तकनीकों में भारत को केवल उपभोक्ता नहीं, निर्माता बनना होगा। साथ ही लोकतांत्रिक संस्थाओं और सामाजिक शांति को मजबूत रखना होगा। सड़क, रेलवे, डिजिटल भुगतान और बड़े कारखाने जरूरी हैं, लेकिन अकेले इनके दम पर विकसित भारत नहीं बनेगा।

2047 का भारत दुनिया को चौंका सकता है, लेकिन असली परीक्षा नागरिक की जिंदगी होगी

1947 का भारत राजनीतिक स्वतंत्रता की शुरुआत था। 1991 का भारत आर्थिक बदलाव की बड़ी शुरुआत बना। 2047 यह दिखाने का अवसर होगा कि क्या एक बेहद विशाल, विविध और लोकतांत्रिक देश आधुनिक विकसित अर्थव्यवस्था और उच्च जीवन स्तर वाले समाज में बदल सकता है। भारत के पक्ष में कई बड़े अवसर हैं। उसकी आबादी अभी कुछ दशकों तक बढ़ सकती है, घरेलू बाजार विशाल है, डिजिटल ढांचा तेजी से विकसित हुआ है और ऊर्जा, उद्योग, अंतरिक्ष तथा तकनीक में उसकी क्षमता बढ़ रही है। दूसरी तरफ जलवायु परिवर्तन, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, शहरीकरण और वृद्ध होती आबादी जैसी चुनौतियां भी उतनी ही वास्तविक हैं।

इसलिए 2047 के भारत की सबसे महत्वपूर्ण तस्वीर 30 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था नहीं होगी। वास्तविक विकसित भारत वह होगा जहां सामान्य परिवार को अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य मिल सके, किसान की आय सम्मानजनक और अपेक्षाकृत सुरक्षित हो, महिला सुरक्षित होकर काम कर सके, युवा अपनी योग्यता के अनुरूप रोजगार पा सके, शहर में साफ हवा और पर्याप्त पानी हो, अदालतों में न्याय के लिए पीढ़ियां इंतजार न करें, उद्योग दुनिया से प्रतिस्पर्धा कर सकें और नागरिक अपनी बात तथा राजनीतिक असहमति स्वतंत्र रूप से रख सके। अगर आर्थिक शक्ति, विज्ञान, मानव विकास, पर्यावरणीय सुरक्षा और मजबूत संस्थाएं एक साथ आगे बढ़ीं तो 2047 में भारत की भूमिका विश्व व्यवस्था में आज की तुलना में बहुत बड़ी हो सकती है। लेकिन अगर आर्थिक आकार बढ़ता गया और मानव विकास तथा संस्थागत सुधार पीछे रह गए तो भारत बहुत बड़ी अर्थव्यवस्था और प्रभावशाली राष्ट्र तो बन सकता है, पर विकसित समाज बनने की यात्रा 2047 के बाद भी जारी रहेगी।

आखिरकार 2047 की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं होगी कि भारत दुनिया में कितने नंबर पर है। असली उपलब्धि यह होगी कि 1947 में आजादी पाने वाला देश 100 साल बाद अपने नागरिकों को कैसी जिंदगी दे पाया।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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