नेपाल को दरकिनार कर भारत की बड़ी चाल…इस देश से मिलाया हाथ, टेंशन में बालेन सरकार!

Lipulekh Dispute: भारत और चीन ने कई वर्षों बाद लिपुलेख दर्रे के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा को फिर से शुरू करने का फैसला किया है। इस फैसले ने जहां तीर्थयात्रियों के लिए रास्ता आसान किया है, वहीं नेपाल की बालेन शाह सरकार के सामने एक नई राजनीतिक और कूटनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। जानें कैसे।

Aditya Kumar Verma
Published on: 2 May 2026 2:18 PM IST
Lipulekh Dispute
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Lipulekh Dispute: भारत और चीन ने कई वर्षों बाद लिपुलेख दर्रे के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा को फिर से शुरू करने का फैसला किया है। इस फैसले ने जहां तीर्थयात्रियों के लिए रास्ता आसान किया है, वहीं नेपाल की बालेन शाह सरकार के सामने एक नई राजनीतिक और कूटनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। नेपाल इस क्षेत्र पर अपना दावा करता रहा है, ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या वह भारत और चीन के इस कदम का विरोध दर्ज करा पाएगा या नहीं।

दशकों से चला आ रहा है विवाद

दरअसल लिपुलेख दर्रा भारत, नेपाल और तिब्बत के मिलन बिंदु पर स्थित एक बेहद अहम हिमालयी दर्रा है, जिसकी ऊंचाई करीब 5,334 मीटर है। यह दर्रा भारतीय नक्शों में भारत का हिस्सा दिखाया जाता है, जबकि नेपाल अपने नक्शों में इसे अपने क्षेत्र में शामिल करता है। दशकों से यह विवाद चला आ रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में यहां बढ़ते इंफ्रास्ट्रक्चर ने इसे और संवेदनशील बना दिया है।

सड़क निर्माण ने बढ़ाया तनाव

भारत के सीमा सड़क संगठन ने मई 2020 में कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग के आखिरी 80 किलोमीटर हिस्से को पूरा कर लिया था। यह सड़क उत्तराखंड के घाटियाबगड़ से लिपुलेख दर्रे तक जाती है, जिससे पहले जो यात्रा पैदल होती थी वह अब वाहनों से संभव हो गई है। नेपाल का दावा है कि यह सड़क उसके संप्रभु क्षेत्र से होकर गुजरती है, जबकि भारत का कहना है कि यह पूरी तरह उसके नियंत्रण वाले इलाके में ही आती है।

नेपाल में राष्ट्रवाद का मुद्दा बना लिपुलेख

नेपाल में इस मुद्दे ने राष्ट्रवाद का रूप ले लिया है। पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के शासनकाल में नेपाल की संसद ने संविधान में संशोधन कर लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी को अपने आधिकारिक नक्शे में शामिल कर लिया था। इस कदम को देश में राजनीतिक समर्थन बढ़ाने की रणनीति के तौर पर भी देखा गया।

चीन का रुख और नेपाल की नाराजगी

हालांकि भारत के खिलाफ नेपाल के दावे को चीन ने खुलकर समर्थन नहीं दिया है। 2023 में जब चीन ने अपना आधिकारिक नक्शा जारी किया तो इन विवादित क्षेत्रों को भारत की सीमा में ही दिखाया गया। इस पर नेपाल ने चीन के सामने कड़ा विरोध दर्ज कराया था।

ट्राई-जंक्शन की वजह से बढ़ी अहमियत

लिपुलेख दर्रा भौगोलिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत, नेपाल और चीन के ट्राई-जंक्शन पर स्थित है। भारत द्वारा बनाया गया सड़क मार्ग सिर्फ तीर्थ यात्रा ही नहीं, बल्कि सैन्य और लॉजिस्टिक दृष्टि से भी बेहद अहम है। यह क्षेत्र ‘वास्तविक नियंत्रण रेखा’ के पास होने के कारण रणनीतिक रूप से और संवेदनशील हो जाता है।

सुगौली संधि से जुड़ा है विवाद

भारत और नेपाल के बीच इस विवाद की जड़ 1816 की सुगौली संधि से जुड़ी है। इस संधि के तहत सीमा निर्धारण काली नदी के उद्गम पर आधारित है, लेकिन दोनों देशों की इस मुद्दे पर अलग-अलग व्याख्याएं हैं। यही कारण है कि कालापानी और लिपुलेख जैसे क्षेत्रों पर विवाद अब तक सुलझ नहीं पाया है।

आर्थिक निर्भरता से सीमित नेपाल की भूमिका

नेपाल के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह भारत और चीन दोनों पर आर्थिक रूप से निर्भर है। ऐसे में वह अपने दावे को लेकर ज्यादा आक्रामक रुख नहीं अपना पा रहा है। चीन से मिलने वाली पूंजी और भारत के साथ व्यापारिक रिश्ते उसकी स्थिति को और जटिल बना देते हैं।

भारत-चीन व्यापार में लिपुलेख की बढ़ती भूमिका

अगस्त 2025 में भारत और चीन ने लिपुलेख के रास्ते सीमा पार व्यापार को फिर से शुरू करने पर सहमति जताई थी। नेपाल ने इस पर आपत्ति जताते हुए दोनों देशों को राजनयिक नोट भी भेजा, लेकिन जवाब में भारत और चीन ने अपने द्विपक्षीय समझौतों और परंपराओं को प्राथमिकता दी।

त्रिपक्षीय विवाद की ओर बढ़ता मामला

फिलहाल स्थिति यह है कि यह दर्रा नेपाल की आपत्तियों के बावजूद भारत और चीन के बीच एक सक्रिय व्यापार मार्ग बन चुका है। जो विवाद पहले द्विपक्षीय था, वह अब तेजी से त्रिपक्षीय मुद्दा बनता जा रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस पूरे समीकरण में नेपाल बातचीत की मेज पर मजबूती से मौजूद नहीं दिख रहा है, जिससे उसके लिए आगे की राह और कठिन होती जा रही है।

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आदित्य कुमार वर्मा उत्तर प्रदेश के पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 8 वर्षों से अधिक का अनुभव प्राप्त है। उन्होंने भारतीय राजनीति, अपराध, स्वास्थ्य और मानवीय सरोकारों से जुड़ी खबरों की व्यापक रिपोर्टिंग की है। उनके पास मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन (MJMC) की डिग्री है और वे रिपोर्टर, एंकर तथा सब-एडिटर जैसे महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके हैं। साथ ही वो उत्तर प्रदेश की राजनीति, शासन-प्रशासन और नौकरशाही व्यवस्था की गहरी समझ रखते हैं। पत्रकारिता के अलावा उन्हें पुस्तकों का अध्ययन, लेखन, कविता-लेखन और पाठ और यात्राएं करना विशेष रूप से पसंद है। विभिन्न संस्कृतियों और समाजों को करीब से जानने-समझने की उनकी रुचि ने उनके दृष्टिकोण को व्यापक बनाया है, जिसका सकारात्मक प्रभाव उनकी लेखन शैली और रिपोर्टिंग में भी देखने को मिलता है।

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