TRENDING TAGS :
न पैसा, न पढ़ाई बनी रुकावट… जब करोड़ों भारतीयों ने 'पहली बार' चुनी अपनी सरकार, जानें पहले चुनाव की पूरी कहानी
First Election in Independent India: भारत में पहली बार आम चुनाव की प्रक्रिया अक्टूबर 1951 में शुरू हुई और फरवरी 1952 तक चली।
First Election in Independent India (photo: social media)
First Election in Independent India: भारत की आजादी के बाद कई सपनों को साकार करने वाली चुनौतियां थी। उनमें से एक चुनौती थी कि देश का शासन किस तरह लोकतांत्रिक तरीके से चलाया जाए। कोई ऐसा हो जो सभी के हितो के लिए काम करे। भारत ने पश्चिमी देशों की विचारधारा से अलग हटकर अपने देश में सभी को एक समान रखकर वयस्क मताधिकार का नियम अपनाया। फिर हुआ भारत का पहला चुनाव, जिसमे करोड़ों लोगों ने अपने प्रतिनिधियों को चुना और देश की लोकतांत्रिक यात्रा की नींव मजबूत की।
पश्चिम देशों से अलग भारत ने अपनाया वयस्क मताधिकार का रास्ता
पश्चिम देशों में एक लम्बे समय से केवल अमीरों को ही वोट देने का अधिकार होता था। महिलाओं और कामगारों को इस अधिकार से वंचित रखा जाता था। इसके विपरीत भारत ने लोकतान्त्रिक की ऐसी व्यवस्था अपनाने का फैसला लिया जिसमे धर्म, जाति, लिंग या आर्थिक स्थिति के आधार पर मतदान के अधिकार में किसी के साथ भेदभाव न हो।
1951-52 में हुआ था पहला चुनाव
भारत में पहली बार आम चुनाव की प्रक्रिया अक्टूबर 1951 में शुरू हुई और फरवरी 1952 तक चली। यह चुनाव स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक इतिहास की बड़ी शुरुआत था। देश के करीब 17 करोड़ लोगों को मतदान के योग्य माना गया। चुनाव के लिए देशभर में लाखों मतपेटियां और मतदान केंद्र तैयार किए गए। इस चुनाव के बाद भारत ने दुनिया के सामने साबित किया कि विविधताओं और चुनौतियों के बावजूद लोकतांत्रिक व्यवस्था को सफलतापूर्वक चलाया जा सकता है।
सुकुमार सेन बने पहले मुख्य चुनाव आयुक्त
आज़ादी के 2 साल के अंदर चुनाव आयुक्त की स्थापना हुई जिसमे सुकुमार सेन को 1950 में पहला मुख्या चुनाव आयुक्त घोषित किया। इनके ऊपर बड़े और विविध देश में पहली बार चुनाव कराने की जिम्मेदारी थी। पहले चुनाव की तैयारी आसान नहीं थी। उस समय देश में ज्यादातर लोग अशिक्षित थे और लोगों को चुनावी प्रक्रिया की जानकारी भी कम थी।
ऐसे में चुनाव आयोग को मतदान केंद्रों की व्यवस्था करने, मतदाता सूची तैयार करने और मतदान अधिकारियों की नियुक्ति के साथ-साथ लोगों को चुनाव प्रक्रिया समझाने का काम भी करना पड़ा।
अशिक्षित मतदाताओं के लिए चुनाव चिन्ह बने पहचान
पहले आम चुनाव में करीब 85% मतदाताओं के पढ़े-लिखे न होने के कारण उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों की पहचान के लिए चुनाव चिन्हों का इस्तेमाल किया गया। मतदान केंद्रों पर अलग-अलग चुनाव चिन्ह वाली मतपेटियां रखी जाती थीं, ताकि मतदाता अपनी पसंद के उम्मीदवार की पहचान आसानी से कर सकें।
नकली मतदान रोकने के लिए मतदाताओं की उंगली पर खास तरह की स्याही भी लगाई गई। यह स्याही कई दिनों तक आसानी से नहीं मिटती थी। इस व्यवस्था का मकसद एक व्यक्ति को दोबारा मतदान करने से रोकना था।
25 अक्टूबर 1951 को पड़ा पहला वोट
भारत के पहले आम चुनाव का पहला वोट 25 अक्टूबर 1951 को हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले के चीनी इलाके में डाला गया। यह वोट श्याम शरण नेगी ने डाला था। सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण इस इलाके का देश के दूसरे हिस्सों से संपर्क कट जाता था। इसलिए यहां मतदान बाकी देश से पहले कराया गया।
श्याम शरण नेगी उस समय शिक्षक थे और चुनाव ड्यूटी पर भी तैनात थे। उन्होंने अधिकारियों से अपना वोट पहले डालने की अनुमति मांगी, जिसे स्वीकार कर लिया गया। इस तरह वह स्वतंत्र भारत के पहले मतदाता बने।
पहले चुनाव ने दुनिया को दिया लोकतंत्र का संदेश
1951-52 का पहला आम चुनाव भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुआ। देश में गरीबी, अशिक्षा, विभाजन और बड़ी आबादी जैसी कई चुनौतियां थीं, लेकिन इसके बावजूद करोड़ों लोगों ने मतदान कर अपने प्रतिनिधियों को चुना।
भारत के पहले चुनाव ने दुनिया के सामने यह साबित किया कि लोकतंत्र केवल संपन्न या विकसित देशों तक सीमित नहीं है। आम जनता को बराबरी का मतदान अधिकार देकर भारत ने लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूत नींव रखी, जिसकी यात्रा आज भी जारी है।


