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2026 में भारत की 'विदेश नीति' क्या है? इसे क्या नाम दिया जाए, पहले से कितनी अलग है और इससे भारत को क्या लाभ-हानि हो रही है?
India foreign policy 2026: 2026 की भारतीय विदेश नीति के लिए सबसे सटीक संज्ञा ‘हित-आधारित बहु-संरेखीय रणनीतिक स्वायत्तता’ है।
India foreign policy 2026
India foreign policy 2026: 2026 में भारत की विदेश नीति को केवल पुराने अर्थों में ‘गुटनिरपेक्ष’ कहना अब पर्याप्त नहीं है। भारत न तो अमेरिका के नेतृत्व वाले पश्चिमी खेमे में औपचारिक रूप से शामिल है, न रूस-चीन धुरी का हिस्सा है। और न ही वह नेहरू युग की उस दूरी वाली गुटनिरपेक्षता को हूबहू चला रहा है, जिसमें दो महाशक्ति गुटों से समान दूरी बनाए रखना प्रमुख चिंता थी। आज भारत अमेरिका के साथ रक्षा, प्रौद्योगिकी और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग करता है।
क्वाड में अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ बैठता है। रूस से रक्षा, परमाणु ऊर्जा और अन्य क्षेत्रों में पुरानी रणनीतिक साझेदारी बनाए रखता है। चीन के साथ सीमा-विवाद रहते हुए भी ब्रिक्स और एससीओ जैसे मंचों पर काम करता है। यूरोप से व्यापार और प्रौद्योगिकी संबंध गहरे करता है।
अरब देशों और इजराइल दोनों से घनिष्ठ संबंध रखता है। और साथ ही स्वयं को विकासशील दुनिया की आवाज के रूप में प्रस्तुत करता है। 2026 में भारत ब्रिक्स की अध्यक्षता भी कर रहा है।
इसलिए यदि आज की भारतीय विदेश नीति को कोई सार्थक नाम देना हो तो मैं इसे ‘रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित बहु-संरेखीय विदेश नीति’ कहा जाना चाहिए। और यदि इसे और सहज हिंदी में कहना हो तो—‘जहाँ हित, वहाँ सहयोग; पर निर्णय अपना।’ यही आज की नीति का केंद्रीय तत्व है। विदेश मंत्रालय स्वयं ‘रणनीतिक स्वायत्तता’, ‘बहुध्रुवीय विश्व’ और अलग-अलग देशों के साथ मुद्दा-आधारित सहयोग की भाषा इस्तेमाल करता है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी पश्चिम के साथ काम करने, रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने और बहुध्रुवीयता बढ़ाने—इन तीनों को एक साथ भारतीय नीति का हिस्सा बताया है। लेकिन इसे समझने के लिए स्वतंत्रता के बाद की पूरी यात्रा देखना जरूरी है।
नेहरू की विदेश नीति: गुटनिरपेक्षता, उपनिवेशवाद-विरोध और स्वतंत्र निर्णय
1947 में भारत स्वतंत्र हुआ तो दुनिया लगभग तुरंत अमेरिका और सोवियत संघ के नेतृत्व वाले दो बड़े खेमों में बँट गई। जवाहरलाल नेहरू की मूल चिंता यह थी कि भारत इतनी कठिनाई से औपनिवेशिक शासन से बाहर आया है, इसलिए वह अपनी विदेश नीति किसी दूसरी महाशक्ति के आदेश पर न चलाए। भारत ने सैन्य गुटों—नाटो, सीटो या सेंटो—से दूरी रखी। बाद में भारत, यूगोस्लाविया, मिस्र, इंडोनेशिया और घाना जैसे देशों के साथ गुटनिरपेक्ष आंदोलन का प्रमुख चेहरा बना।
लेकिन गुटनिरपेक्षता का अर्थ ‘सबसे समान दूरी’ हमेशा नहीं था। 1971 में बांग्लादेश संकट के समय भारत ने सोवियत संघ के साथ भारत-सोवियत मैत्री संधि की। अमेरिका और चीन उस समय पाकिस्तान के निकट थे और भारत ने सुरक्षा आवश्यकता के कारण मॉस्को की ओर झुकाव किया। यानी भारत की पुरानी नीति भी पूरी तरह आदर्शवादी नहीं थी; राष्ट्रीय हित हमेशा मौजूद था।
नेहरू युग में उपनिवेशवाद-विरोध, नस्लभेद-विरोध, पंचशील, शांतिपूर्ण सहअस्तित्व और नवस्वतंत्र एशियाई-अफ्रीकी देशों के साथ एकजुटता अधिक स्पष्ट वैचारिक भाषा थी। आज भी इसके कुछ तत्व भारत की नीति में बचे हैं। लेकिन उसकी अभिव्यक्ति बदल गई है।
इंदिरा गांधी का दौर: आदर्शवाद से अधिक कठोर शक्ति-राजनीति
इंदिरा गांधी के समय भारतीय विदेश नीति बहुत अधिक यथार्थवादी हुई। 1971 का बांग्लादेश युद्ध इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। भारत ने पहले सोवियत संघ के साथ रणनीतिक सुरक्षा बनाई, फिर पाकिस्तान के विरुद्ध युद्ध लड़ा और बांग्लादेश के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाई। 1974 में परमाणु परीक्षण करके भारत ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा प्रश्न पर वह अंतरराष्ट्रीय दबाव की सीमाएँ स्वीकार नहीं करेगा।यहीं से भारतीय विदेश नीति में एक स्थायी तत्व मजबूत हुआ—रणनीतिक स्वायत्तता केवल भाषण नहीं, आवश्यक होने पर शक्ति का स्वतंत्र उपयोग भी है।
1991 के बाद: अर्थव्यवस्था विदेश नीति के केंद्र में आई
शीतयुद्ध समाप्त होने और सोवियत संघ टूटने के बाद भारत की विदेश नीति को भारी परिवर्तन करना पड़ा। पी. वी. नरसिंह राव के दौर में आर्थिक उदारीकरण हुआ और विदेश नीति का एक नया उद्देश्य सामने आया—पूँजी, व्यापार, प्रौद्योगिकी और बाजार तक पहुँच।
इसी दौर में ‘लुक ईस्ट’ नीति शुरू हुई। दक्षिण-पूर्व एशिया और पूर्वी एशिया को केवल राजनीतिक नहीं, आर्थिक साझेदार के रूप में देखा गया। अमेरिका के साथ संबंध धीरे-धीरे सुधरे। इजराइल के साथ 1992 में पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित हुए। भारत ने रूस से संबंध बनाए रखे लेकिन पश्चिम से दूरी घटाई। यही आज की बहु-संरेखीय नीति की वास्तविक नींव थी।
वाजपेयी और मनमोहन सिंह: अमेरिका से ऐतिहासिक निकटता लेकिन स्वतंत्रता बरकरार
1998 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने परमाणु परीक्षण किए। अमेरिका ने प्रतिबंध लगाए। लेकिन कुछ वर्षों के भीतर दोनों देशों के संबंध तेजी से सुधरे। 2000 में अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की भारत यात्रा और बाद में भारत-अमेरिका रणनीतिक संवाद ने नया दौर शुरू किया। मनमोहन सिंह सरकार के समय भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौता हुआ। यह एक बड़ी रणनीतिक छलांग थी। भारत परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर किए बिना वैश्विक परमाणु व्यापार व्यवस्था में विशेष स्थान प्राप्त करने में सफल हुआ।
साथ ही भारत रूस से संबंध बनाए रहा, ब्रिक्स में गया और ईरान से भी संबंध रखे। अर्थात आज की नीति अचानक 2014 में पैदा नहीं हुई। इसकी बुनियाद नरसिंह राव, वाजपेयी और मनमोहन सिंह के काल में क्रमशः तैयार हो चुकी थी।
2014 के बाद क्या बदला?
नरेंद्र मोदी सरकार के दौर में सबसे बड़ा परिवर्तन विदेश नीति के स्वर, गति, सार्वजनिक प्रस्तुति और राजनीतिक आत्मविश्वास में हुआ। जो प्रक्रिया पहले से चल रही थी उसे अधिक सक्रिय, लेन-देन आधारित और रणनीतिक रूप दिया गया। पुरानी ‘लुक ईस्ट’ नीति को ‘एक्ट ईस्ट’ बनाया गया। विदेश मंत्रालय के अनुसार इसका केंद्र आसियान है और इसका उद्देश्य संपर्क, व्यापार, संस्कृति और क्षमता निर्माण के साथ भारत के विस्तारित हिंद-प्रशांत पड़ोस से संबंध मजबूत करना है।
‘नेबरहुड फर्स्ट’ के तहत दक्षिण एशियाई पड़ोस को प्राथमिकता दी गई। साथ ही हिंद-प्रशांत, क्वाड, पश्चिम एशिया, अफ्रीका और हिंद महासागर पर अधिक रणनीतिक जोर आया। लेकिन सबसे बड़ा वैचारिक परिवर्तन यह है कि भारत अब ‘किसी गुट से दूर रहने’ की तुलना में ‘अनेक गुटों के साथ एक साथ काम करने’ को अधिक महत्व देता है।यही गुटनिरपेक्षता और बहु-संरेखीयता का फर्क है।
पुरानी नीति मोटे तौर पर कहती थी—‘हम किसी सैन्य गुट का हिस्सा नहीं बनेंगे।’
आज की नीति कहती है—‘हम कई समूहों में रहेंगे। लेकिन किसी एक के अधीन नहीं होंगे।’
भारत क्वाड में है लेकिन नाटो में नहीं। ब्रिक्स में रूस और चीन के साथ है। लेकिन चीन की बेल्ट एंड रोड पहल में शामिल नहीं। अमेरिका से रक्षा सहयोग करता है। लेकिन रूस से संबंध नहीं तोड़ता। इजराइल से रक्षा सहयोग करता है। लेकिन फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना का समर्थन भी जारी रखता है। अरब खाड़ी देशों से रणनीतिक संबंध बनाता है और ईरान से भी संपर्क रखता है।यही आज की विदेश नीति की असाधारण लचक है।
2026 में अमेरिका: निकटता है लेकिन अधीनता नहीं
भारत-अमेरिका संबंध आज भारतीय विदेश नीति के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों में हैं। रक्षा, अंतरिक्ष, अर्धचालक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी, हिंद-प्रशांत और भारतीय प्रवासी समुदाय—सभी दोनों देशों को जोड़ते हैं। फरवरी, 2026 में भारत और अमेरिका ने व्यापार समझौते की घोषणा की। भारत सरकार के अनुसार भारतीय उत्पादों पर अमेरिकी शुल्क घटाकर 18 प्रतिशत करने की व्यवस्था बनी।
लेकिन भारत अमेरिका का सहयोगी देश उस अर्थ में नहीं बना है जिसमें जापान, दक्षिण कोरिया या ब्रिटेन हैं। भारत के पास अमेरिका के साथ पारस्परिक रक्षा संधि नहीं है। यही रणनीतिक स्वायत्तता का महत्वपूर्ण प्रमाण है।इस संबंध का लाभ स्पष्ट है—अमेरिकी बाजार, पूँजी, उच्च प्रौद्योगिकी, रक्षा सहयोग और चीन को संतुलित करने की क्षमता।
जोखिम भी है—व्यापार, शुल्क, रूस और रणनीतिक प्राथमिकताओं पर मतभेद कभी भी तनाव पैदा कर सकते हैं। भारत यदि अमेरिका पर आवश्यकता से अधिक निर्भर हो जाए तो वही समस्या पैदा होगी जिससे बचने के लिए रणनीतिक स्वायत्तता की नीति बनाई गई है।
रूस: दुनिया बदल गई, लेकिन पुराना संबंध समाप्त नहीं हुआ
यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और यूरोप की अपेक्षा थी कि भारत रूस से दूरी बढ़ाएगा। भारत ने ऐसा नहीं किया। उसने युद्ध की आलोचना में पश्चिम की भाषा पूरी तरह नहीं अपनाई, वार्ता और कूटनीति की बात की और रूस के साथ आर्थिक तथा रणनीतिक संबंध जारी रखे।जुलाई, 2026 के विदेश मंत्रालय के आधिकारिक विवरण में भी रूस को भारतीय विदेश नीति का महत्वपूर्ण स्तंभ कहा गया है और रक्षा, परमाणु ऊर्जा सहित व्यापक सहयोग दर्ज है।
यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का सबसे स्पष्ट उदाहरण है। अमेरिका से साझेदारी बढ़ाना और उसी समय रूस से संबंध बनाए रखना—बीसवीं शताब्दी की गुट राजनीति में यह बहुत कठिन होता। इसके लाभ हैं—रक्षा उपकरणों की निरंतरता, ऊर्जा सुरक्षा, परमाणु सहयोग और यूरेशिया में रणनीतिक पहुँच।
लेकिन जोखिम भी बढ़ रहे हैं। रूस जितना चीन पर निर्भर होता जाएगा, भारत-रूस संबंधों की पुरानी सामरिक उपयोगिता उतनी जटिल हो सकती है। भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता यही है कि उसका पुराना मित्र रूस कहीं चीन का जूनियर साझेदार न बन जाए।
चीन: सबसे कठिन संतुलन
भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी परीक्षा चीन है। दोनों देश व्यापार करते हैं, ब्रिक्स और एससीओ में साथ बैठते हैं और वैश्विक संस्थाओं के सुधार जैसे कुछ मुद्दों पर समानता भी रखते हैं। लेकिन सीमा विवाद, चीन-पाकिस्तान संबंध, हिंद महासागर में चीन की बढ़ती उपस्थिति और एशिया में शक्ति-संतुलन गहरे मतभेद हैं। 2020 के गलवान संघर्ष के बाद संबंध गंभीर रूप से खराब हुए थे। भारत ने स्पष्ट किया कि सीमा पर शांति के बिना सामान्य द्विपक्षीय संबंध संभव नहीं हैं।
2024 के बाद कुछ सुधार शुरू हुआ और 2026 में बातचीत जारी है। फरवरी, 2026 में भारत-चीन रणनीतिक संवाद हुआ; मई और फिर 6 अगस्त, 2026 तक सीमा मामलों पर संयुक्त कार्य-तंत्र की बैठकें जारी हैं। यह नीति न तो पूर्ण चीन-विरोध है, न सामान्य मैत्री। इसे प्रतिस्पर्धा के भीतर नियंत्रित संवाद कहा जा सकता है।
भारत समझता है कि चीन के साथ युद्ध आर्थिक और सुरक्षा दोनों दृष्टियों से अत्यंत महँगा होगा। लेकिन चीन को एशिया में निर्विरोध प्रभुत्व देना भी भारत के हित में नहीं है। इसलिए क्वाड, अमेरिका, जापान, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया से सुरक्षा संबंध चीन को संतुलित करने का साधन हैं—भले भारत आधिकारिक रूप से क्वाड को “चीन विरोधी गठबंधन” न कहे।
यूरोप: 2026 की बड़ी उपलब्धियों में एक
भारत ने लंबे समय तक यूरोप को अमेरिका और रूस की तुलना में कम रणनीतिक महत्व दिया था। अब स्थिति बदल रही है। जनवरी 2026 में भारत और यूरोपीय संघ ने मुक्त व्यापार समझौते की वार्ताओं के सफल समापन की घोषणा की और 2030 तक व्यापक रणनीतिक कार्यसूची बनाई, जिसमें व्यापार, प्रौद्योगिकी, सुरक्षा, रक्षा, संपर्क और नवाचार शामिल हैं।
यह महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत अपनी आर्थिक और तकनीकी निर्भरता किसी एक महाशक्ति पर नहीं रखना चाहता। यूरोप तीसरा बड़ा स्तंभ बन सकता है। फ्रांस के साथ संबंध विशेष रूप से मजबूत हैं। फरवरी, 2026 के भारत-फ्रांस संयुक्त वक्तव्य में दोनों देशों ने दीर्घकालीन रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाया। फ्रांस भारत के लिए इसलिए मूल्यवान है क्योंकि वह रक्षा, अंतरिक्ष और हिंद महासागर में सहयोगी है।लेकिन अमेरिकी गठबंधन व्यवस्था की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक रणनीतिक स्वतंत्रता रखता है।
पश्चिम एशिया: शायद मोदी काल की सबसे सफल दिशाओं में एक
भारत ने एक समय पश्चिम एशिया को मुख्यतः तेल और प्रवासी भारतीयों की दृष्टि से देखा था। आज UAE, सऊदी अरब, इजराइल, कतर और दूसरे देशों के साथ संबंध व्यापार, निवेश, रक्षा, ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और संपर्क परियोजनाओं तक फैल गए हैं।
यहाँ भारत ने एक कठिन संतुलन साधा है—इजराइल से निकटता बढ़ाई लेकिन अरब देशों से संबंध खराब नहीं हुए। जनवरी 2026 में भारत-UAE संबंधों में व्यापक आर्थिक साझेदारी के प्रभाव को दोनों देशों ने सकारात्मक माना। यह बदलाव भारत के लिए बहुत लाभकारी है क्योंकि खाड़ी क्षेत्र ऊर्जा का स्रोत होने के साथ भारतीय प्रवासियों, निवेश और व्यापार का भी विशाल केंद्र है।
‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज बनने का प्रयास
आज की विदेश नीति का एक और प्रमुख तत्व यह है कि भारत स्वयं को केवल पश्चिम और चीन-रूस के बीच तीसरी शक्ति नहीं, बल्कि विकासशील देशों के प्रतिनिधि स्वर के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है। भारत ने ‘वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ’ सम्मेलनों की शुरुआत की। पहले सम्मेलन में 125 देशों ने भाग लिया था। भारत सरकार ने 2026 में भी इसे विकासशील देशों की प्राथमिकताओं को वैश्विक मंच पर रखने की नीति के रूप में रेखांकित किया है।
G20 में अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्य बनाने में भारत की भूमिका भी इसी बड़े प्रयास का हिस्सा थी। यह एक प्रकार से नेहरू युग की एशिया-अफ्रीका एकजुटता का नया रूप है—लेकिन अब भाषा ‘उपनिवेशवाद-विरोध’ की जगह विकास, कर्ज, खाद्य सुरक्षा, डिजिटल तकनीक, जलवायु वित्त और वैश्विक संस्थाओं के सुधार की है।
तो पुरानी और नई विदेश नीति में वास्तविक अंतर कितना है?
मूल सिद्धांत उतना नहीं बदला जितना तरीका बदला है।
1947 से भारत का स्थायी सिद्धांत रहा है—राष्ट्रीय निर्णय किसी बाहरी शक्ति से निर्देशित नहीं होंगे। नेहरू ने इसे गुटनिरपेक्षता कहा; आज इसे रणनीतिक स्वायत्तता कहा जाता है।इस अर्थ में निरंतरता बहुत गहरी है। लेकिन चार बड़े परिवर्तन हुए हैं।
पहला, दूरी की जगह सहभागिता आई है। पहले महाशक्तियों के सैन्य खेमों से दूर रहना प्राथमिकता थी; आज भारत लगभग हर महत्वपूर्ण शक्ति के साथ सक्रिय मंच बनाता है।
दूसरा, आदर्शवाद के मुकाबले राष्ट्रीय हित की भाषा अधिक खुली हुई है। आज भारतीय नेतृत्व तेल कहाँ सस्ता मिलेगा, तकनीक कहाँ से आएगी, रक्षा क्षमता कैसे बढ़ेगी और आपूर्ति शृंखला कहाँ सुरक्षित होगी—इन प्रश्नों को खुलकर विदेश नीति का हिस्सा मानता है।
तीसरा, अर्थव्यवस्था और प्रौद्योगिकी विदेश नीति के केंद्र में आ गई हैं। 2026 में अमेरिका के साथ व्यापार समझौता, यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार वार्ता का समापन, UAE और दूसरे देशों के साथ आर्थिक संबंध इसका प्रमाण हैं।
चौथा, सैन्य और सुरक्षा आयाम अधिक मुखर हुआ है। क्वाड की मई 2026 की बैठक में कानून के शासन, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता जैसे सिद्धांत फिर दोहराए गए।
यानी भारत अब केवल विश्व शांति पर विचार देने वाला देश नहीं रहना चाहता। वह शक्ति-संतुलन को प्रभावित करने की क्षमता भी बनाना चाहता है।
इस विदेश नीति से भारत को क्या लाभ हुए हैं?
सबसे बड़ा लाभ है विकल्पों की संख्या बढ़ना। यदि भारत केवल अमेरिका के साथ होता तो रूस से रक्षा और ऊर्जा संबंध मुश्किल होते। यदि केवल रूस के साथ रहता तो अमेरिकी, जापानी और यूरोपीय प्रौद्योगिकी तथा पूँजी तक पहुँच सीमित होती। यदि चीन-विरोध को पूर्ण नीति बना देता तो दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था से व्यवहार असंभव हो जाता।
बहु-संरेखीय नीति भारत को यह सुविधा देती है कि वह अलग मुद्दे पर अलग साझेदार चुने।रक्षा में रूस, फ्रांस, अमेरिका और इजराइल—चारों महत्वपूर्ण हो सकते हैं।ऊर्जा में रूस, खाड़ी और अमेरिका सभी उपयोगी हो सकते हैं।प्रौद्योगिकी में अमेरिका, जापान, ताइवान, दक्षिण कोरिया और यूरोप महत्वपूर्ण हैं।वैश्विक संस्थाओं के सुधार में ब्रिक्स और ग्लोबल साउथ उपयोगी हैं।हिंद-प्रशांत सुरक्षा में क्वाड महत्वपूर्ण है।यही आधुनिक भारतीय नीति की सबसे बड़ी ताकत है।
दूसरा लाभ सौदेबाजी की क्षमता है। जब किसी देश के पास केवल एक विकल्प होता है तो उसका साझेदार शर्तें तय करता है। भारत कई विकल्प बनाए रखकर अपनी सौदेबाजी क्षमता बढ़ाता है।
तीसरा लाभ ऊर्जा सुरक्षा है। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी दबाव के बावजूद भारत ने राष्ट्रीय आर्थिक हित को प्राथमिकता देने की नीति अपनाई। सरकार ने सार्वजनिक रूप से बाहरी आलोचनाओं का प्रतिवाद भी किया।
चौथा लाभ चीन को संतुलित करने की क्षमता है। अकेले भारत के लिए चीन की विशाल अर्थव्यवस्था और सैन्य क्षमता को संतुलित करना कठिन है। अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस और अन्य देशों के साथ सहयोग भारत की स्थिति मजबूत करता है—बिना किसी औपचारिक सैन्य गठबंधन में प्रवेश किए।
पाँचवाँ लाभ विश्वसनीय स्वतंत्र शक्ति की छवि है। रूस यह मानता है कि भारत पूरी तरह अमेरिका के साथ नहीं जाएगा। अमेरिका समझता है कि चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने में भारत आवश्यक है। यूरोप भारत को चीन के विकल्प के रूप में देखता है; और विकासशील देश भारत को पश्चिम का सामान्य सहयोगी न मानकर कुछ हद तक स्वतंत्र आवाज के रूप में देख सकते हैं।यही स्थिति भारत को अपनी आर्थिक शक्ति से कहीं अधिक राजनयिक महत्व देती है।
लेकिन इसके नुकसान और जोखिम क्या हैं?
इस नीति की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी ताकत का उलटा पक्ष है—सबके साथ संबंध रखना कठिन है, क्योंकि उनके हित परस्पर टकराते हैं।अमेरिका चाहता है कि भारत चीन को संतुलित करने में अधिक सक्रिय हो और रूस पर निर्भरता कम करे। रूस नहीं चाहता कि भारत अमेरिकी सुरक्षा व्यवस्था के बहुत निकट जाए। चीन क्वाड को संदेह से देखता है। ईरान और इजराइल एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं। अरब दुनिया और इजराइल के बीच संकट भारत के लिए कठिन चुनाव पैदा करता है।
अर्थात बहु-संरेखीयता तभी सफल है जब दुनिया में कुछ रणनीतिक स्थान उपलब्ध हो। यदि महाशक्तियों के बीच संघर्ष इतना तीखा हो जाए कि वे पूछें—‘आप हमारे साथ हैं या उनके?’ तो भारत की गुंजाइश कम हो सकती है।
दूसरा खतरा है कि रणनीतिक स्वायत्तता कभी-कभी रणनीतिक अस्पष्टता जैसी दिखाई देने लगती है। यदि हर संकट में भारत दोनों पक्षों से संबंध बचाने का प्रयास करे तो कुछ साथी इसे स्पष्ट नेतृत्व की कमी मान सकते हैं।
तीसरा खतरा चीन है। भारत की सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती चीन है, लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी कई क्षेत्रों में चीनी आयात और आपूर्ति शृंखलाओं पर निर्भर है। इसलिए राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और आर्थिक निर्भरता साथ-साथ चल रही हैं। इसे लंबे समय तक संभालना कठिन है।
चौथा जोखिम रूस से संबंधित है। भारत का पुराना रूस संबंध मूल्यवान है, लेकिन रूस और चीन की निकटता बढ़ने से भारत की रणनीतिक गणना बदल सकती है। भारत ऐसे रूस को चाहता है जो चीन से पर्याप्त स्वतंत्र हो। यदि मॉस्को की निर्भरता बीजिंग पर बहुत बढ़ी तो भारत का यह संतुलन कमजोर होगा।
पाँचवाँ जोखिम पड़ोस है। बड़ी शक्तियों के साथ भारत की उपलब्धियाँ उल्लेखनीय हैं, लेकिन विदेश नीति की अंतिम परीक्षा अक्सर अपने पड़ोस में होती है। दक्षिण एशिया के छोटे देश चीन और भारत दोनों के साथ संबंध बनाकर अपनी सौदेबाजी करते हैं। यदि भारत अमेरिका, यूरोप और ग्लोबल साउथ में बड़ी भूमिका निभाए लेकिन अपने पड़ोस में अविश्वास बढ़े तो वह रणनीतिक कमजोरी होगी।
छठा जोखिम यह है कि विदेश नीति की महत्वाकांक्षा और घरेलू आर्थिक-सैन्य क्षमता में अंतर न बढ़ जाए। स्वतंत्र विदेश नीति अंततः आर्थिक शक्ति, रक्षा उत्पादन, तकनीकी क्षमता, ऊर्जा सुरक्षा और मजबूत मुद्रा पर टिकती है। केवल कूटनीतिक कुशलता से महाशक्ति की स्वायत्तता लंबे समय तक नहीं चल सकती।
क्या यह वास्तव में मोदी की बिल्कुल नई विदेश नीति है?
यहाँ निष्पक्षता जरूरी है। इसे पूरी तरह ‘नई’ कहना ऐतिहासिक रूप से गलत होगा और इसे केवल ‘पुरानी नीति का नया नाम’ कहना भी गलत होगा।
रणनीतिक स्वायत्तता की जड़ नेहरू की गुटनिरपेक्षता में है। आर्थिक कूटनीति और पूर्व की ओर झुकाव नरसिंह राव के समय तेज हुआ। अमेरिका के साथ रणनीतिक निकटता वाजपेयी और मनमोहन सिंह काल में बहुत आगे बढ़ी। रूस के साथ साझेदारी स्वतंत्र भारत की पुरानी विरासत है।
लेकिन मोदी काल में इन सभी धाराओं को अधिक आक्रामक बहु-संरेखीयता, हिंद-प्रशांत रणनीति, व्यक्तिगत शिखर कूटनीति, प्रवासी भारतीय कूटनीति, ग्लोबल साउथ नेतृत्व और सुरक्षा-आधारित विदेश नीति के साथ जोड़ा गया है।
इसलिए इसमें निरंतरता भी है और महत्वपूर्ण परिवर्तन भी।
नेहरू की ‘गुटनिरपेक्षता’ और आज की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ में सबसे सरल अंतर
इसे एक वाक्य में ऐसे समझिए—नेहरू युग की प्राथमिकता थी: किसी गुट में मत जाओ।आज की प्राथमिकता है: सभी महत्वपूर्ण शक्तियों के साथ काम करो, लेकिन किसी को अपना मालिक मत बनने दो।
यही परिवर्तन बहुत बड़ा है। आज भारत रूस के राष्ट्रपति से मिल सकता है। अगले सप्ताह अमेरिकी राष्ट्रपति से रक्षा और प्रौद्योगिकी पर बातचीत कर सकता है। फिर ब्रिक्स में चीन के साथ बैठ सकता है। क्वाड में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित कर सकता है। अरब देश से तेल खरीद सकता है। इजराइल से रक्षा तकनीक ले सकता है और यूरोप से मुक्त व्यापार समझौता कर सकता है।शीतयुद्ध के कठोर गुटों वाली दुनिया में ऐसी नीति लगभग असंभव होती।
क्या यह नीति सफल है?
2026 तक इसके परिणाम देखें तो कुल मिलाकर यह भारत के लिए लाभकारी रही है। लेकिन उसकी सफलता अभी अंतिम नहीं है। भारत ने अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता छोड़े बिना अमेरिका से निकटता बढ़ाई है। रूस से संबंध बचाए हैं। यूरोप के साथ जनवरी 2026 में मुक्त व्यापार वार्ता सफल निष्कर्ष तक पहुँची। क्वाड सक्रिय है। खाड़ी देशों के साथ संबंध इतिहास के सबसे मजबूत स्तरों में हैं। ग्लोबल साउथ में भारत ने अलग राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश की है। चीन के साथ गंभीर सीमा विवाद के बावजूद संवाद पूरी तरह समाप्त नहीं किया है।
इन सबको एक साथ कर पाना छोटी उपलब्धि नहीं है।लेकिन असली परीक्षा अगले दशक में होगी। क्या भारत चीन पर आर्थिक निर्भरता कम कर पाएगा? क्या अमेरिका से गहरा संबंध बनाए रखते हुए अपनी स्वतंत्रता बचा पाएगा? क्या रूस को चीन की छाया में जाने से रोकने में कोई भूमिका निभा पाएगा? क्या दक्षिण एशियाई पड़ोस में अपना प्रभाव बनाए रखेगा? क्या भारतीय उद्योग और रक्षा उत्पादन इतनी क्षमता बनाएँगे कि रणनीतिक स्वायत्तता केवल कूटनीतिक शब्द न रहे? इन प्रश्नों के उत्तर तय करेंगे कि आज की नीति इतिहास में कितनी सफल मानी जाएगी।
2026 की भारतीय विदेश नीति के लिए सबसे सटीक संज्ञा ‘हित-आधारित बहु-संरेखीय रणनीतिक स्वायत्तता’ है। इसमें नेहरू की स्वतंत्र निर्णय क्षमता बची हुई है, इंदिरा गांधी का शक्ति-यथार्थवाद है, नरसिंह राव की आर्थिक व्यावहारिकता है, वाजपेयी-मनमोहन काल की अमेरिका के साथ रणनीतिक निकटता है और मोदी काल की अधिक सक्रिय, दृश्यमान तथा बहु-दिशात्मक कूटनीति जुड़ गई है।और इसका सबसे छोटा सूत्र शायद यही है—
न अमेरिका का स्थायी अनुयायी, न रूस का आश्रित, न चीन का सहयोगी खेमेदार—बल्कि प्रत्येक शक्ति से उतना सहयोग, जितना भारत के हित में हो।
यह नीति तभी सफल रहेगी जब भारत के पास दूसरों के बीच संतुलन बनाने भर की नहीं। बल्कि अपने दम पर विकल्प बनाने की आर्थिक, सैन्य और तकनीकी शक्ति भी लगातार बढ़ती रहे।


