Indian Government Loan: भारत सरकार हर साल 14 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा ब्याज क्यों देती है?

Indian Government Loan: भारत सरकार पर 200 लाख करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज है। जानिए सरकार को पैसा कौन देता है, बैंक और बीमा कंपनियां कैसे कर्जदाता बनती हैं, ब्याज कैसे चुकाया जाता है और पुराने कर्ज के लिए नया कर्ज क्यों लिया जाता है।

Yogesh Mishra
Published on: 30 Oct 2026 5:23 PM IST
Who Gives Loans to the Indian Government | Newstrack Hindi News
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Who Gives Loans to the Indian Government | Newstrack Hindi News

Indian Government Loan: भारत सरकार पर कितना कर्ज है? इसका उत्तर जानकर कोई भी चौंक सकता है। केंद्र सरकार के बजट 2026-27 के अनुसार 31 मार्च 2026 तक उसकी कुल बकाया देनदारियों का संशोधित अनुमान लगभग 197.18 लाख करोड़ रुपये था। मार्च 2027 तक इसके बढ़कर करीब 214.82 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है। व्यापक सरकारी लेखांकन पद्धति में विनिमय दर और कुछ अन्य समायोजन जोड़ने पर मार्च 2027 का अनुमान लगभग 218.63 लाख करोड़ रुपये तक पहुँचता है। इन संख्याओं में राज्यों का कर्ज शामिल नहीं है। लेकिन सबसे दिलचस्प सवाल यह है कि सरकार इतनी विशाल धनराशि उधार किससे लेती है। क्या अमेरिका, चीन या विश्व बैंक भारत को यह पैसा देते हैं? वास्तविकता यह है कि केंद्र सरकार के अधिकांश कर्ज का स्रोत भारत के भीतर ही है। देश के बैंक, बीमा कंपनियाँ, भविष्य निधियाँ, पेंशन कोष और दूसरे निवेशक सरकारी प्रतिभूतियाँ खरीदकर उसे उधार देते हैं। यानी आम नागरिक का बैंक में जमा पैसा या बीमा और पेंशन के रूप में किया गया निवेश भी अप्रत्यक्ष रूप से सरकार के कर्ज का हिस्सा बन सकता है। सरकार इस पर ब्याज देती है और निर्धारित अवधि पूरी होने पर मूलधन लौटाती है। वित्त वर्ष 2026-27 में केंद्र ने केवल ब्याज चुकाने के लिए लगभग 14.04 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। आखिर यह व्यवस्था कैसे चलती है? सरकार कितना भी कर्ज ले सकती है या उसकी कोई सीमा होती है? और क्या पुराने कर्ज को चुकाने के लिए नया कर्ज लेना वास्तव में देश के दिवालिया होने का संकेत है?

कर्ज की सही संख्या जानने से पहले तीन अलग बातें समझना जरूरी है

भारत पर कर्ज की चर्चा अक्सर इसलिए भ्रम पैदा करती है क्योंकि उसमें तीन अलग अवधारणाओं को एक मान लिया जाता है। पहली है केंद्र सरकार का कर्ज। दूसरी है राज्यों की सरकारों का कर्ज। तीसरी है भारत का कुल विदेशी कर्ज। इन तीनों का अर्थ और दायरा अलग है। केंद्र सरकार का कर्ज वह धन है जिसे भारत सरकार ने विभिन्न माध्यमों से उधार लिया है और जिसकी वापसी की जिम्मेदारी उस पर है। राज्यों का कर्ज उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, राजस्थान तथा दूसरे राज्यों की सरकारों द्वारा लिए गए ऋणों और उनकी देनदारियों से संबंधित है। विदेशी कर्ज का अर्थ देश के बाहर रहने वाले ऋणदाताओं के प्रति बकाया देनदारियों से है। उसमें केवल सरकार का कर्ज नहीं, बल्कि भारतीय कंपनियों, बैंकों और दूसरे क्षेत्रों की विदेशी देनदारियाँ भी शामिल हो सकती हैं। इसलिए यदि कोई कहता है कि भारत पर लगभग 200 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है और दूसरा कहता है कि भारत का विदेशी कर्ज करीब 778 अरब डॉलर है, तो जरूरी नहीं कि दोनों में से कोई एक आँकड़ा गलत हो। वे अलग-अलग आर्थिक चीजों को माप रहे हैं।

वर्ष 2026-27 के केंद्रीय बजट के 'रिसीट बजट' में प्रकाशित आधिकारिक विवरण के अनुसार 31 मार्च, 2026 तक केंद्र सरकार की आंतरिक ऋण एवं अन्य देनदारियाँ लगभग 190.44 लाख करोड़ रुपये तथा बाहरी ऋण का लेखांकन मूल्य लगभग 6.74 लाख करोड़ रुपये अनुमानित था। दोनों को जोड़ने पर कुल राशि लगभग 197.18 लाख करोड़ रुपये बनती है। इसी दस्तावेज में 31 मार्च,2027 के लिए आंतरिक ऋण एवं अन्य देनदारियों का अनुमान लगभग 207.71 लाख करोड़ रुपये और बाहरी ऋण का लगभग 7.11 लाख करोड़ रुपये है। कुल मिलाकर यह 214.82 लाख करोड़ रुपये होता है। यह अंतिम संख्या वास्तविक रूप से मार्च 2027 में दर्ज हो चुका कर्ज नहीं है, क्योंकि अक्टूबर 2026 में वह तारीख अभी भविष्य में है। यह सरकार द्वारा वर्ष के बजट में प्रस्तुत अनुमान है। इसी दस्तावेज के अनुसार व्यापक समायोजित गणना में मार्च,2026 का अनुमान 200.53 लाख करोड़ रुपये और मार्च 2027 का 218.63 लाख करोड़ रुपये है। इन दोनों लेखांकन व्यवस्थाओं का आधार थोड़ा अलग है, इसलिए उन्हें बिना स्पष्टीकरण मिलाकर नहीं देखना चाहिए।

इन आँकड़ों का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष है। सरकार के कर्ज का बड़ा हिस्सा रुपये में है और देश के भीतर विभिन्न निवेशकों के पास मौजूद है। इसका अर्थ यह नहीं कि इस कर्ज की कोई आर्थिक लागत नहीं है। सरकार को घरेलू कर्ज पर भी ब्याज देना पड़ता है और मूलधन लौटाना होता है। लेकिन रुपये में लिया गया घरेलू कर्ज और विदेशी मुद्रा में लिया गया ऋण अलग जोखिम पैदा करते हैं। विदेशी मुद्रा वाले ऋण के मामले में रुपये की विनिमय दर बदलने से उसकी वास्तविक रुपये में लागत प्रभावित हो सकती है। इस अंतर को समझे बिना केवल सभी कर्जों की बड़ी संख्या जोड़ देना अर्थव्यवस्था की सही स्थिति नहीं बताता।

क्या भारत का विदेशी कर्ज भी 200 लाख करोड़ रुपये है?

नहीं। भारतीय रिज़र्व बैंक के 30 सितंबर, 2026 को जारी आँकड़ों के अनुसार जून, 2026 के अंत में भारत का कुल विदेशी कर्ज लगभग 778.2 अरब अमेरिकी डॉलर था। इसे 778 अरब डॉलर से अधिक अथवा लगभग 0.778 लाख करोड़ डॉलर के रूप में समझा जा सकता है। इस संख्या में भारतीय सरकार के साथ देश के दूसरे क्षेत्रों की विदेशी देनदारियाँ भी शामिल थीं। रिज़र्व बैंक के अनुसार जून, 2026 में भारत के कुल विदेशी कर्ज का सकल घरेलू उत्पाद से अनुपात लगभग 20.8 प्रतिशत था। मार्च, 2026 के अंत में विदेशी कर्ज लगभग 762.8 अरब डॉलर दर्ज किया गया था। इस प्रकार तीन महीनों में लगभग 15.4 अरब डॉलर की वृद्धि हुई। लेकिन इस वृद्धि का पूरा अर्थ केवल नया ऋण लेना नहीं होता। विदेशी मुद्राओं की विनिमय दरों में परिवर्तन भी डॉलर में व्यक्त ऋण के मूल्य को प्रभावित कर सकता है।

सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि जून, 2026 के कुल विदेशी कर्ज में सामान्य सरकार के हिस्से की देनदारियाँ लगभग 174.3 अरब डॉलर थीं, जबकि बाकी का बहुत बड़ा हिस्सा बैंकों, कंपनियों और दूसरे गैर-सरकारी क्षेत्रों से संबंधित था। रिज़र्व बैंक के अनुसार उस समय गैर-वित्तीय कंपनियों का हिस्सा कुल विदेशी कर्ज का लगभग 36.1 प्रतिशत और केंद्रीय बैंक को छोड़कर जमा स्वीकार करने वाली संस्थाओं का हिस्सा लगभग 26.2 प्रतिशत था। सामान्य सरकार की हिस्सेदारी लगभग 22.4 प्रतिशत थी। इसलिए यदि कोई कहता है कि भारत पर 778 अरब डॉलर का विदेशी कर्ज है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि केंद्र सरकार ने विदेशों से अकेले इतनी पूरी राशि उधार ली है। यह पूरे देश की विदेशी देनदारियों का आँकड़ा है।

यह अंतर भारत की आर्थिक स्थिति समझने के लिए विशेष महत्त्वपूर्ण है। कोई भारतीय कंपनी विदेश से डॉलर में ऋण लेकर कारखाना स्थापित कर सकती है। कोई भारतीय बैंक विदेशी मुद्रा में धन जुटा सकता है। विदेश में रहने वाले भारतीय अपने देश के बैंकों में विशेष अनिवासी जमा खाते रख सकते हैं। इनसे संबंधित कुछ देनदारियाँ भी अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार विदेशी कर्ज की गणना में आती हैं। इन सभी दायित्वों को केंद्र सरकार के ऋण के बराबर मान लेना गलत होगा। इसी प्रकार भारत सरकार द्वारा किसी विदेशी संस्था से परियोजना के लिए लिया गया ऋण भी विदेशी कर्ज का एक हिस्सा हो सकता है। लेकिन उसकी प्रकृति निजी कंपनी के व्यावसायिक ऋण से अलग है।

सरकार को इतना पैसा कौन देता है? क्या जनता भी सरकार की कर्जदाता है?

सरकार के कर्ज का सबसे रोचक पक्ष यह है कि उसका बड़ा हिस्सा किसी विदेशी राजा, राष्ट्रपति या अंतरराष्ट्रीय संस्था से नहीं आता। भारत में केंद्र और राज्य सरकारें सरकारी प्रतिभूतियों के माध्यम से बाजार से धन जुटाती हैं। 'सरकारी प्रतिभूति' अर्थात 'गवर्नमेंट सिक्योरिटी' एक ऐसा वित्तीय दस्तावेज है जिसके माध्यम से सरकार स्वीकार करती है कि उसने निवेशक से निर्धारित राशि उधार ली है और उसे तय शर्तों के अनुसार वापस करेगी। भारतीय रिज़र्व बैंक के अनुसार ये प्रतिभूतियाँ अल्पकालिक और दीर्घकालिक दोनों प्रकार की हो सकती हैं। अल्पकालिक सरकारी ऋण पत्रों को सामान्यतः 'ट्रेजरी बिल' कहा जाता है, जबकि लंबी अवधि वाले ऋण पत्रों को 'गवर्नमेंट बॉन्ड' या 'डेटेड सिक्योरिटीज' कहते हैं। केंद्र सरकार दोनों प्रकार की प्रतिभूतियाँ जारी करती है। राज्य सरकारें मुख्यतः 'स्टेट डेवलपमेंट लोन' अर्थात एसडीएल के माध्यम से बाजार से उधार लेती हैं।

सरकारी प्रतिभूतियों के प्रमुख खरीदारों में वाणिज्यिक बैंक, बीमा कंपनियाँ, भविष्य निधियाँ, पेंशन कोष, म्यूचुअल फंड, वित्तीय संस्थान और दूसरे निवेशक शामिल हैं। भारतीय रिज़र्व बैंक के सरकारी ऋण प्रबंधन संबंधी दस्तावेज में दिसंबर, 2024 के अंत में केंद्र सरकार की दीर्घकालिक प्रतिभूतियों के स्वामित्व का विवरण दिया गया था। उसके अनुसार लगभग 38 प्रतिशत प्रतिभूतियाँ वाणिज्यिक बैंकों और लगभग 26.1 प्रतिशत बीमा कंपनियों के पास थीं। रिज़र्व बैंक की हिस्सेदारी लगभग 10.6 प्रतिशत, पेंशन कोषों की लगभग 5.1 प्रतिशत और भविष्य निधियों की लगभग 4.3 प्रतिशत थी। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की हिस्सेदारी लगभग 2.8 प्रतिशत थी। ये आँकड़े दिसंबर 2024 की स्थिति बताते हैं, अक्टूबर 2026 की वर्तमान हिस्सेदारी नहीं। लेकिन इनसे सरकारी कर्ज की संरचना समझने में सहायता मिलती है। स्पष्ट होता है कि सरकार को उधार देने वाले सबसे बड़े संस्थानों में भारतीय वित्तीय संस्थाएँ प्रमुख हैं।

इस व्यवस्था में आम नागरिक की भूमिका अप्रत्यक्ष रूप से बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाती है। मान लीजिए किसी व्यक्ति ने बैंक में एक लाख रुपये जमा किए हैं। बैंक उस जमा धन का एक हिस्सा अपने नियमों और निवेश संबंधी आवश्यकताओं के अनुसार सरकारी प्रतिभूतियों में लगा सकता है। सरकार उस प्रतिभूति के माध्यम से धन जुटाती है और बैंक को निर्धारित ब्याज तथा मूलधन देती है। इसी तरह कोई व्यक्ति जीवन बीमा पॉलिसी खरीदता है। बीमा कंपनी अपने दीर्घकालिक दायित्वों को ध्यान में रखते हुए विभिन्न निवेशों के साथ सरकारी प्रतिभूतियों में भी धन लगा सकती है। भविष्य निधि और पेंशन कोष भी सरकारी प्रतिभूतियों के महत्त्वपूर्ण निवेशक हैं। इस प्रकार भारतीय नागरिक का बचत के रूप में जमा धन अनेक रास्तों से सरकार के वित्तपोषण में योगदान कर सकता है। लेकिन यहाँ यह समझना आवश्यक है कि बैंक में जमा पैसा सीधे सरकार को दिया गया व्यक्तिगत ऋण नहीं है। जमाकर्ता और बैंक के बीच एक वित्तीय संबंध है, जबकि बैंक और सरकार के बीच सरकारी प्रतिभूति से संबंधित अलग संबंध होता है।

सरकार को सीधे उधार देने की सुविधा भी सामान्य नागरिकों के लिए उपलब्ध है। भारतीय रिज़र्व बैंक ने नवंबर 2021 में 'आरबीआई रिटेल डायरेक्ट' योजना शुरू की थी। इसके अंतर्गत पात्र व्यक्तिगत निवेशक सरकारी प्रतिभूतियों में सीधे निवेश कर सकते हैं। वे केंद्रीय सरकारी बॉन्ड, ट्रेजरी बिल और राज्य सरकारों की प्रतिभूतियों में भागीदारी कर सकते हैं। इसका अर्थ यह है कि किसी व्यक्ति के लिए सरकार का कर्जदाता बनने के लिए बैंक या बीमा कंपनी होना आवश्यक नहीं है। यदि वह निर्धारित नियमों के अनुसार सरकारी प्रतिभूति खरीदता है, तो सरकार उस प्रतिभूति की शर्तों के अनुसार उसकी देनदार हो जाती है। लेकिन किसी प्रतिभूति को परिपक्वता से पहले बेचने पर उसका बाजार मूल्य बदल सकता है। इसलिए सरकारी प्रतिभूतियों को सामान्य जमा खाते के पूरी तरह समान नहीं समझना चाहिए।

सरकार कर्ज लेने के लिए किसके सामने आवेदन करती है?

सामान्य नागरिक जब बैंक से घर बनाने या व्यापार करने के लिए कर्ज लेता है, तो बैंक उसकी आय, संपत्ति, क्रेडिट इतिहास और ऋण लौटाने की क्षमता जाँचता है। सरकार के मामले में प्रक्रिया अलग होती है। केंद्र सरकार अपनी वित्तीय आवश्यकताओं और उधारी की योजना के आधार पर प्रतिभूतियाँ जारी करती है। भारतीय रिज़र्व बैंक सरकार के ऋण प्रबंधक के रूप में प्रतिभूतियों की नीलामी और संबंधित प्रक्रियाएँ संचालित करता है। उदाहरण के लिए सरकार घोषणा कर सकती है कि उसे निश्चित अवधि का सरकारी बॉन्ड जारी करके हजारों करोड़ रुपये जुटाने हैं। इसके बाद बैंक, बीमा कंपनियाँ और दूसरे पात्र निवेशक नीलामी में भाग लेते हैं। वे यह बताते हैं कि वे किस प्रतिफल या कीमत पर प्रतिभूति खरीदने को तैयार हैं। नीलामी में प्राप्त बोलियों और निर्धारित नियमों के आधार पर प्रतिभूतियाँ आवंटित की जाती हैं।

यहाँ सबसे महत्त्वपूर्ण शब्द है 'यील्ड' अर्थात निवेश पर मिलने वाला प्रतिफल। सामान्य भाषा में इसे सरकार के उधार लेने की बाजार लागत से जोड़कर समझ सकते हैं। यदि निवेशकों को लगता है कि किसी विशेष अवधि के बॉन्ड में निवेश करने पर उन्हें अधिक प्रतिफल चाहिए, तो वे उसी के अनुसार बोली लगाएंगे। दूसरी ओर यदि सरकारी प्रतिभूतियों की माँग बहुत अधिक है, तो सरकार अपेक्षाकृत कम प्रतिफल पर भी धन जुटा सकती है। ब्याज दरों का व्यापक वातावरण, महँगाई की अपेक्षा, बाजार में उपलब्ध नकदी, निवेशकों की जोखिम संबंधी धारणा और दूसरी आर्थिक परिस्थितियाँ सरकारी बॉन्ड के प्रतिफल को प्रभावित करती हैं। इसीलिए सरकार उधार लेते समय हर बार मनमाने ढंग से ब्याज तय करके निवेशकों को उसे स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं कर सकती। बाजार की माँग और नीलामी की प्रक्रिया भी महत्त्वपूर्ण होती है।

भारतीय रिज़र्व बैंक के अनुसार सरकारी प्रतिभूतियों की नीलामी मुख्यतः मूल्य अथवा प्रतिफल के आधार पर की जाती है। किसी नई प्रतिभूति में निवेशक अपेक्षित प्रतिफल की बोली दे सकते हैं। सफल बोलियों के आधार पर उस प्रतिभूति के लिए ब्याज की दर तय की जा सकती है। पहले से जारी किसी प्रतिभूति को दोबारा बाजार में उपलब्ध कराने की प्रक्रिया में उसकी कीमत के आधार पर नीलामी हो सकती है। इसलिए बॉन्ड पर लिखी ब्याज दर और निवेशक को वास्तविक बाजार कीमत के अनुसार मिलने वाला प्रतिफल हमेशा समान नहीं होते। यह अंतर इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि सरकारी कर्ज की लागत का निर्धारण केवल प्रतिभूति पर लिखे ब्याज से नहीं, बल्कि उसे किस कीमत पर जारी या खरीदा गया है, इससे भी जुड़ा होता है।

सरकार को कौन-सी गारंटी पर इतना बड़ा कर्ज मिल जाता है?

यह इस पूरे विषय का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। सामान्य व्यक्ति किसी बैंक से एक करोड़ रुपये का कर्ज माँगे तो बैंक उसकी संपत्ति या दूसरी सुरक्षा माँग सकता है। लेकिन जब सरकार हजारों करोड़ रुपये के बॉन्ड जारी करती है, तो वह प्रत्येक निवेशक के नाम किसी सरकारी भवन, रेललाइन या सड़क को गिरवी नहीं रखती। उसकी प्रतिभूतियाँ सामान्यतः राज्य की ऋण चुकाने की क्षमता और उसके कानूनी दायित्व पर आधारित होती हैं। अर्थशास्त्र में इसे 'सॉवरेन बॉरोइंग' अर्थात संप्रभु सरकार द्वारा लिया गया ऋण कहा जाता है। निवेशक सरकार की कर वसूलने की क्षमता, राजस्व, आर्थिक विकास, मौद्रिक व्यवस्था और ऋण चुकाने के इतिहास को ध्यान में रखते हैं। केंद्र सरकार के रुपये में जारी बॉन्डों के लिए भारत की राजकोषीय और आर्थिक क्षमता विशेष महत्त्वपूर्ण आधार है।

निवेशक यह मानकर पैसा देते हैं कि सरकार भविष्य में करों तथा दूसरे राजस्व स्रोतों से आय प्राप्त करती रहेगी और अपने ऋण संबंधी दायित्वों का निर्वहन करेगी। लेकिन किसी सरकार का संप्रभु होना यह गारंटी नहीं है कि उसका कर्ज कभी असुरक्षित नहीं हो सकता। दुनिया में ऐसी घटनाएँ हुई हैं जब देशों को ऋण पुनर्गठन या भुगतान संबंधी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। किसी देश की ऋण चुकाने की क्षमता आर्थिक विकास, राजस्व, राजनीतिक परिस्थितियों, वित्तीय स्थिरता और मुद्रा संबंधी जोखिम से प्रभावित हो सकती है। इसीलिए निवेशक अलग-अलग देशों के सरकारी बॉन्डों से अलग प्रतिफल की अपेक्षा कर सकते हैं। किसी स्थिर आर्थिक व्यवस्था वाले देश को अपेक्षाकृत कम लागत पर कर्ज मिल सकता है, जबकि गंभीर वित्तीय संकट से प्रभावित देश को अधिक ब्याज देना पड़ सकता है या नए ऋण तक पहुँच सीमित हो सकती है।

सरकारी प्रतिभूतियों के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक के पास ऋण प्रबंधन और भुगतान से संबंधित निर्धारित व्यवस्थाएँ हैं। केंद्रीय सरकार के ऋण प्रबंधन में रिज़र्व बैंक की भूमिका उसके कानूनी अधिकारों से संबंधित है, जबकि बाहरी सरकारी ऋण का प्रबंधन वित्त मंत्रालय करता है। इस प्रकार सरकार का कर्ज लेना एक संस्थागत और कानूनी प्रक्रिया है, न कि केवल किसी बैंक से मौखिक भरोसे पर पैसा प्राप्त करने की व्यवस्था।

क्या विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष भी भारत को कर्ज देते हैं?

भारत घरेलू बाजार के अतिरिक्त अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों और कुछ विदेशी सरकारों से भी ऋण ले सकता है। इनमें विश्व बैंक समूह की अंतरराष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक तथा अंतरराष्ट्रीय विकास संघ जैसी संस्थाएँ, एशियाई विकास बैंक और एशियाई अवसंरचना निवेश बैंक जैसे बहुपक्षीय विकास बैंक महत्त्वपूर्ण हैं। द्विपक्षीय ऋण में जापान जैसे देशों की विकास सहायता संस्थाओं से प्राप्त ऋण शामिल हो सकते हैं। लेकिन इनके ऋण सामान्य सरकारी बॉन्डों से कुछ मायनों में अलग होते हैं। उदाहरण के लिए किसी रेल परियोजना, शहरी परिवहन व्यवस्था, जल आपूर्ति, ऊर्जा अवसंरचना या दूसरे विकास कार्यक्रम के लिए परियोजना-संबंधी ऋण स्वीकृत किया जा सकता है। ऐसे ऋणों में परियोजना की उपयोगिता, आर्थिक और पर्यावरणीय मूल्यांकन, ऋण की अवधि तथा दूसरी शर्तें महत्त्वपूर्ण होती हैं। कई मामलों में धन एक साथ देने के बजाय परियोजना की प्रगति के अनुसार किस्तों में उपलब्ध कराया जाता है।

विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष अर्थात आईएमएफ को एक ही प्रकार का ऋणदाता मानना गलत होगा। विश्व बैंक समूह की संस्थाएँ विकास परियोजनाओं और नीतिगत कार्यक्रमों के वित्तपोषण में भूमिका निभाती हैं। इसके विपरीत आईएमएफ का प्रमुख उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक और वित्तीय स्थिरता से जुड़ा है। जिन सदस्य देशों को भुगतान संतुलन संबंधी गंभीर कठिनाइयाँ होती हैं, उन्हें निर्धारित व्यवस्थाओं के अंतर्गत आईएमएफ से वित्तीय सहायता मिल सकती है। भारत आईएमएफ का सदस्य है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि भारत सरकार का अधिकांश कर्ज आईएमएफ से लिया गया है। विदेशी कर्ज के आँकड़ों में आईएमएफ से संबंधित कुछ अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक दायित्व या विशेष आहरण अधिकारों के आवंटन भी शामिल हो सकते हैं, लेकिन वे सामान्य परियोजना ऋण से अलग व्यवस्था हैं। इसलिए यह कहना कि भारत का लगभग 200 लाख करोड़ रुपये का सरकारी कर्ज विश्व बैंक या आईएमएफ ने दिया है, पूरी तरह गलत होगा।

विदेशी संस्थानों से मिले कुछ विकास ऋणों की अवधि लंबी और शर्तें अपेक्षाकृत रियायती हो सकती हैं। लेकिन हर विदेशी ऋण सस्ता हो, ऐसा आवश्यक नहीं है। ऋण की ब्याज दर के अतिरिक्त विनिमय दर का जोखिम भी महत्त्वपूर्ण होता है। मान लीजिए भारत ने किसी विदेशी ऋणदाता से एक अरब डॉलर का ऋण लिया। जब एक डॉलर 80 रुपये का था, तब उसका रुपये में मूल्य लगभग 8,000 करोड़ रुपये था। यदि बाद में एक डॉलर 95 रुपये का हो जाए, तो उसी एक अरब डॉलर का रुपये में मूल्य लगभग 9,500 करोड़ रुपये हो जाएगा। यह उदाहरण केवल विनिमय दर के प्रभाव को समझाने के लिए है; इसमें वास्तविक भुगतान अवधि और ऋण की दूसरी शर्तें शामिल नहीं हैं। लेकिन इससे स्पष्ट होता है कि विदेशी मुद्रा में लिया गया ऋण घरेलू रुपये के कर्ज से अलग प्रकार का जोखिम पैदा करता है।

सरकारी बॉन्ड पर ब्याज और मूलधन कैसे लौटाया जाता है?

अब समझिए कि सरकार कर्ज की वापसी कैसे करती है। मान लीजिए भारत सरकार ने दस वर्ष के लिए एक हजार करोड़ रुपये का बॉन्ड जारी किया है और उस पर सालाना ब्याज दर सात प्रतिशत है। यह केवल समझाने के लिए काल्पनिक उदाहरण है। यदि बॉन्ड की शर्तों में सात प्रतिशत निश्चित कूपन है, तो सरकार को निवेशकों को सालाना कुल 70 करोड़ रुपये ब्याज देना होगा। भारतीय सरकारी बॉन्डों में निश्चित कूपन का भुगतान सामान्यतः छह-छह महीने पर किया जाता है, इसलिए इस उदाहरण में हर छह महीने लगभग 35 करोड़ रुपये भुगतान हो सकता है। दस वर्ष पूरे होने पर निर्धारित शर्तों के अनुसार एक हजार करोड़ रुपये का मूलधन भी लौटाना होगा। सरकार ब्याज और मूलधन का भुगतान अपने ऋण प्रबंधन तथा बैंकिंग व्यवस्था के माध्यम से करती है। जिस निवेशक के पास भुगतान की पात्रता वाली प्रतिभूति होती है, उसे तय शर्तों के अनुसार धन प्राप्त होता है।

लेकिन सरकार के कर्ज की वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है। उसके पास एक या दस बॉन्ड नहीं, बल्कि अलग-अलग वर्षों में जारी हजारों करोड़ रुपये की अनेक प्रतिभूतियाँ होती हैं। कुछ बॉन्ड पाँच वर्ष में परिपक्व होते हैं, कुछ दस वर्ष में, कुछ बीस या तीस वर्ष अथवा उससे भी अधिक अवधि के हो सकते हैं। इससे सरकार को एक ही दिन अपने सभी ऋणों का मूलधन लौटाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। ऋण प्रबंधन का एक प्रमुख उद्देश्य यह भी होता है कि परिपक्वता की तिथियाँ इस तरह व्यवस्थित रहें कि भुगतान का बोझ किसी एक वर्ष में असामान्य रूप से बहुत अधिक केंद्रित न हो। भारतीय रिज़र्व बैंक सरकार के साथ मिलकर ऋण की अवधि, जारी करने के समय और दूसरे प्रबंधन संबंधी पहलुओं पर काम करता है।

अल्पकालिक ट्रेजरी बिल की प्रक्रिया कुछ अलग हो सकती है। इन्हें अक्सर अंकित मूल्य से कम कीमत पर जारी किया जाता है और परिपक्वता पर पूरा अंकित मूल्य लौटाया जाता है। मान लीजिए एक लाख रुपये के अंकित मूल्य वाला ट्रेजरी बिल किसी निवेशक को 97 हजार रुपये में मिलता है। निर्धारित अवधि पूरी होने पर उसे एक लाख रुपये वापस मिलते हैं। बीच का तीन हजार रुपये का अंतर उसके निवेश से संबंधित आय है। यह केवल उदाहरण है; वास्तविक कीमत नीलामी और अवधि के अनुसार निर्धारित होती है। इसलिए सरकारी उधारी में हर साधन पर नियमित ब्याज की किस्त देना आवश्यक नहीं होता। अलग-अलग प्रतिभूतियों की भुगतान व्यवस्था अलग हो सकती है। रिज़र्व बैंक की सरकारी प्रतिभूति संबंधी मार्गदर्शिका में इन व्यवस्थाओं को विस्तार से समझाया गया है।

पुराने कर्ज को चुकाने के लिए नया कर्ज क्यों लिया जाता है?

सरकारी वित्त की यह सबसे कम समझी जाने वाली प्रक्रिया है। सामान्य परिवार या व्यक्ति के संदर्भ में पुराने कर्ज को चुकाने के लिए नया कर्ज लेना अक्सर चिंता का विषय माना जाता है। लेकिन संप्रभु सरकारों की ऋण व्यवस्था में परिपक्व हो रहे पुराने बॉन्डों का भुगतान नई प्रतिभूतियाँ जारी करके करना एक सामान्य प्रक्रिया हो सकती है। इसे 'रोलओवर' या 'रीफाइनेंसिंग' कहा जाता है। मान लीजिए सरकार के एक हजार करोड़ रुपये के पुराने बॉन्ड इस वर्ष परिपक्व हो रहे हैं। सरकार नई अवधि का बॉन्ड जारी करके एक हजार करोड़ रुपये जुटा सकती है और पुराने बॉन्डधारकों को भुगतान कर सकती है। इससे पुराना ऋण समाप्त होता है, लेकिन नया ऋण उत्पन्न हो जाता है। यदि नई उधारी केवल पुराने मूलधन के भुगतान तक सीमित है, तो उस लेनदेन से कुल बकाया मूलधन अपने आप नहीं बढ़ता। हालांकि ब्याज दर, निर्गम कीमत और दूसरे कारकों के कारण ऋण की लागत बदल सकती है।

इसके विपरीत यदि सरकार पुराने कर्ज की वापसी के साथ अपने अतिरिक्त खर्च पूरे करने के लिए भी उधार ले रही है, तो कुल बकाया कर्ज बढ़ सकता है। इसी अंतर को समझने के लिए 'ग्रॉस बॉरोइंग' और 'नेट बॉरोइंग' शब्द महत्त्वपूर्ण हैं। ग्रॉस बॉरोइंग अर्थात कुल नई उधारी में उस धन का हिस्सा भी शामिल हो सकता है जो पुराने ऋणों की वापसी के लिए जुटाया जा रहा है। नेट बॉरोइंग नई उधारी और निर्धारित मूलधन वापसी के बीच अंतर से संबंधित है। इसलिए यदि सरकार किसी वर्ष बहुत बड़ी राशि के बॉन्ड जारी करती है, तो यह मान लेना गलत होगा कि पूरी राशि उसके कर्ज में अतिरिक्त वृद्धि है। उसका एक हिस्सा पुराने बॉन्डों के भुगतान के लिए भी हो सकता है।

क्या इसका अर्थ यह हुआ कि सरकार को कभी कर्ज चुकाना ही नहीं पड़ता? बिल्कुल नहीं। पुराने बॉन्डों का भुगतान तय तिथि पर करना पड़ता है। सरकार केवल अपने ऋणों की कुल व्यवस्था को नई उधारी के माध्यम से जारी रख सकती है। इस प्रक्रिया की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि निवेशक भविष्य में भी सरकार की प्रतिभूतियाँ खरीदने के लिए तैयार हों और वह उचित लागत पर धन जुटा सके। यदि वित्तीय बाजार में विश्वास कम हो जाए या सरकार की ऋण चुकाने की क्षमता पर गंभीर संदेह पैदा हो, तो नई उधारी कठिन और महँगी हो सकती है। इसलिए रोलओवर सामान्य प्रक्रिया होते हुए भी वित्तीय अनुशासन का विकल्प नहीं है।

ब्याज के लिए हर साल कितना पैसा खर्च होता है?

भारतीय बजट में ब्याज भुगतान एक अत्यंत बड़ा खर्च है। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए केंद्र सरकार ने लगभग 14.04 लाख करोड़ रुपये के ब्याज भुगतान का अनुमान रखा है। इसी बजट में कुल खर्च लगभग 53.47 लाख करोड़ रुपये अनुमानित था। इसका अर्थ है कि कुल बजटीय व्यय का लगभग एक चौथाई हिस्सा ब्याज चुकाने के लिए निर्धारित है। यह एक बड़ी राशि है, क्योंकि सरकार को इसी बजट से रक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, रेल, कृषि, प्रशासन और अन्य सार्वजनिक जरूरतों के लिए भी खर्च करना पड़ता है। अगस्त 2026 तक उपलब्ध नियंत्रक महालेखाकार के आँकड़ों के अनुसार उस वित्त वर्ष में शुरुआती पाँच महीनों की वास्तविक प्राप्ति और खर्च बजटीय अनुमान से अलग गति से चल रहे थे। इसलिए पूरे वर्ष के ब्याज भुगतान का बजटीय अनुमान और वर्ष के बीच में हो चुका वास्तविक भुगतान अलग-अलग समझना आवश्यक है।

लेकिन ब्याज भुगतान को सीधे व्यर्थ खर्च मान लेना भी सही नहीं होगा। सरकार ने जिस धन को पहले उधार लिया था, उस पर ब्याज देना उसके कानूनी और वित्तीय दायित्व का हिस्सा है। निवेशकों को इसी भरोसे पर सरकारी प्रतिभूतियाँ खरीदने के लिए प्रोत्साहन मिलता है कि उन्हें तय शर्तों के अनुसार भुगतान होगा। यदि सरकार ब्याज नहीं चुकाएगी, तो भविष्य में उसे उधार मिलना कठिन हो सकता है और देश की वित्तीय विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। इसलिए ब्याज चुकाना आवश्यक है। वास्तविक नीति संबंधी प्रश्न यह है कि सरकार का कर्ज कितना बड़ा होना चाहिए, उसकी औसत ब्याज लागत क्या है और क्या उधार ली गई राशि से अर्थव्यवस्था को पर्याप्त लाभ मिल रहा है।

एक महत्त्वपूर्ण अंतर यह भी है कि सरकार के कुल खर्च में ब्याज का हिस्सा और उसके कर राजस्व में ब्याज का हिस्सा अलग हो सकता है। यदि ब्याज भुगतान बढ़ता है और सरकारी आय उसी गति से नहीं बढ़ती, तो दूसरे खर्चों के लिए उपलब्ध धन पर दबाव पड़ सकता है। इसी कारण अर्थशास्त्री केवल कुल कर्ज नहीं देखते, बल्कि ब्याज भुगतान और सरकारी राजस्व के अनुपात पर भी ध्यान देते हैं। यह अनुपात बताता है कि सरकार की नियमित आय का कितना हिस्सा पहले से लिए गए ऋणों की सेवा में खर्च हो रहा है।

सरकार इतना कर्ज आखिर लेती क्यों है?

कर्ज लेने का सबसे सीधा कारण यह है कि किसी वित्त वर्ष में सरकार की कुल आय उसके कुल खर्च से कम हो सकती है। केंद्र सरकार को आयकर, कॉरपोरेट कर, वस्तु एवं सेवा कर से संबंधित उसका हिस्सा, सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क और विभिन्न गैर-कर स्रोतों से धन प्राप्त होता है। लेकिन उसे रक्षा, प्रशासन, ब्याज, पेंशन, सब्सिडी, बुनियादी ढाँचे और अनेक कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च भी करना होता है। यदि उपलब्ध राजस्व तथा दूसरे गैर-ऋण स्रोत इन सभी खर्चों के लिए पर्याप्त नहीं हैं, तो अंतर को पूरा करने के लिए उधार लेना पड़ सकता है। इस अंतर को 'राजकोषीय घाटा' अर्थात 'फिस्कल डेफिसिट' कहा जाता है। वित्त वर्ष 2026-27 के केंद्रीय बजट में राजकोषीय घाटा लगभग 16.96 लाख करोड़ रुपये और सकल घरेलू उत्पाद का 4.3 प्रतिशत अनुमानित था।

लेकिन सरकार केवल इसलिए कर्ज नहीं लेती कि उसकी आय कम पड़ गई है। कभी-कभी उधार लेकर ऐसे बड़े निर्माण और विकास कार्य किए जाते हैं जिनका लाभ अनेक वर्षों तक मिल सकता है। उदाहरण के लिए कोई राष्ट्रीय राजमार्ग, रेलवे लाइन, बंदरगाह, सिंचाई परियोजना या बिजली व्यवस्था लंबे समय तक आर्थिक गतिविधियों को सहायता दे सकती है। यदि सरकार किसी ऐसी परियोजना का पूरा खर्च केवल उसी वर्ष के कर राजस्व से निकालने का प्रयास करे, तो उसे दूसरे आवश्यक खर्च बहुत कम करने पड़ सकते हैं या करों में बड़ी वृद्धि करनी पड़ सकती है। उधार लेकर खर्च को समय के साथ बाँटना एक विकल्प हो सकता है। लेकिन यह तभी आर्थिक रूप से उपयोगी होगा जब परियोजना का वास्तविक लाभ उसकी लागत और ऋण के बोझ के अनुरूप हो। प्रत्येक परियोजना अपने आप पर्याप्त आय पैदा करेगी, यह मान लेना गलत होगा।

इसी कारण अर्थशास्त्र में राजस्व खर्च और पूँजीगत खर्च के बीच अंतर किया जाता है। सरकारी कर्मचारियों का वेतन, कई प्रशासनिक खर्च और ब्याज जैसे भुगतान सामान्यतः राजस्व खर्च की श्रेणी में आते हैं। सड़क, पुल और दूसरे टिकाऊ सार्वजनिक परिसंपत्तियों के निर्माण पर होने वाला खर्च पूँजीगत व्यय से संबंधित हो सकता है। लेकिन केवल यह कहना कि उधार लेकर पूँजीगत खर्च करना हमेशा अच्छा है और राजस्व खर्च करना हमेशा खराब, उचित नहीं होगा। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी आवश्यक सेवाओं पर होने वाला नियमित राजस्व खर्च भी अर्थव्यवस्था की दीर्घकालिक उत्पादकता के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकता है। वास्तविक प्रश्न खर्च की उपयोगिता, उसकी गुणवत्ता और वित्तीय स्थिरता का है।

क्या भारत का कर्ज उसकी कमाई के अनुपात में बहुत अधिक है?

किसी देश पर कितना कर्ज है, यह जानने के बाद अगला प्रश्न होना चाहिए कि वह कर्ज उसकी अर्थव्यवस्था की तुलना में कितना बड़ा है। किसी सामान्य परिवार पर दस लाख रुपये का कर्ज बहुत बड़ा हो सकता है, जबकि किसी बड़े व्यवसाय के लिए वही राशि छोटी हो सकती है। इसी प्रकार अलग-अलग देशों के कर्ज की तुलना केवल रुपये या डॉलर की कुल संख्या से करना उचित नहीं है। इसके लिए 'डेट टू जीडीपी रेशियो' अर्थात सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में कर्ज को देखा जाता है। जीडीपी किसी वर्ष में देश में पैदा हुई अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के आर्थिक मूल्य का सूचक है। यह सीधे सरकार के बैंक खाते में आने वाली आय नहीं है, लेकिन अर्थव्यवस्था के आकार और उससे जुड़े संभावित राजस्व आधार को समझने में उपयोगी है।

केंद्र सरकार के 2026-27 के बजट के अनुसार संशोधित गणना में उसका ऋण-जीडीपी अनुपात वित्त वर्ष 2025-26 के लिए लगभग 56.1 प्रतिशत और 2026-27 के लिए 55.6 प्रतिशत अनुमानित था। सरकार ने 2030 तक केंद्रीय ऋण-जीडीपी अनुपात को लगभग 50 प्रतिशत के आसपास, एक प्रतिशत अंक ऊपर या नीचे की सीमा सहित, लाने का लक्ष्य भी बताया। इस लक्ष्य का अर्थ कुल रुपये में कर्ज को अनिवार्य रूप से कम करना नहीं है। संभव है कि किसी वर्ष बकाया कर्ज की रुपये में राशि बढ़े, लेकिन अर्थव्यवस्था उससे अधिक तेजी से बढ़ने के कारण कर्ज का जीडीपी से अनुपात घट जाए। यही कारण है कि सरकारी ऋण प्रबंधन में कर्ज की कुल राशि और अर्थव्यवस्था के मुकाबले उसका अनुपात, दोनों अलग संकेतक हैं।

लेकिन 55.6 प्रतिशत को पूरे भारत की सभी सरकारों के संयुक्त कर्ज का अनुपात नहीं समझना चाहिए। यह केंद्र सरकार से संबंधित अनुमान है। राज्यों का अपना अलग कर्ज है। केंद्र और राज्यों का संयुक्त ऋण अनुपात निकालते समय दोनों के बीच मौजूद कुछ परस्पर देनदारियों का समायोजन भी आवश्यक हो सकता है। इसी कारण केंद्र के कर्ज और राज्यों के कर्ज को केवल जोड़कर बिना समायोजन के 'भारत सरकार का कुल कर्ज' कहना सटीक नहीं होगा। इसके अतिरिक्त राज्य सरकारों की वित्तीय क्षमता, कर राजस्व, विकास का स्तर और ऋण की लागत भी अलग-अलग होती है। किसी राज्य के लिए उचित कर्ज का स्तर दूसरे राज्य से अलग हो सकता है।

राज्यों की सरकारें किससे कर्ज लेती हैं?

केंद्र की तरह राज्य सरकारें भी बाजार से ऋण जुटाती हैं। इसके लिए 'स्टेट डेवलपमेंट लोन' जारी किए जाते हैं। ये राज्य सरकारों द्वारा जारी ऋण प्रतिभूतियाँ होती हैं। इनके खरीदारों में बैंक, बीमा कंपनियाँ, भविष्य निधियाँ और दूसरे निवेशक शामिल हो सकते हैं। भारतीय रिज़र्व बैंक इन प्रतिभूतियों की नीलामी और ऋण प्रबंधन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लेकिन किसी राज्य सरकार द्वारा जारी बॉन्ड और केंद्र सरकार द्वारा जारी बॉन्ड एक ही देनदारी नहीं हैं। जिस राज्य ने ऋण जारी किया है, निर्धारित शर्तों के अनुसार उसकी वापसी का प्राथमिक दायित्व उसी राज्य से संबंधित होता है। निवेशक राज्य की वित्तीय स्थिति और बाजार की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर उसके बॉन्ड का मूल्यांकन कर सकते हैं।

राज्य सरकारों पर केंद्र सरकार से प्राप्त ऋण तथा कुछ अन्य देनदारियाँ भी हो सकती हैं। राज्य के विकास कार्यों के लिए उधारी आवश्यक हो सकती है, लेकिन उसका प्रबंधन संवैधानिक और राजकोषीय नियमों के अधीन होता है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 293 राज्यों की उधारी से संबंधित महत्त्वपूर्ण प्रावधान है। विशेष रूप से यदि किसी राज्य पर केंद्र सरकार का ऋण बकाया हो या केंद्र ने उसके ऋण की गारंटी दी हो, तो निर्धारित परिस्थितियों में नई उधारी के लिए केंद्र की सहमति आवश्यक हो सकती है। इस प्रकार राज्य सरकारें केंद्र से अलग वित्तीय इकाइयाँ होते हुए भी पूरी तरह स्वतंत्र और असीमित उधारी अधिकार नहीं रखतीं। भारत की संघीय व्यवस्था में राज्यों की वित्तीय जरूरतें और समग्र राष्ट्रीय आर्थिक स्थिरता एक-दूसरे से जुड़ी रहती हैं।

क्या सरकार जरूरत पड़ने पर केवल नोट छापकर कर्ज चुका सकती है?

यह प्रश्न अक्सर तब उठता है जब लोगों को पता चलता है कि सरकार पर लाखों करोड़ रुपये का कर्ज है। सामान्य धारणा होती है कि यदि देश की मुद्रा सरकार और रिज़र्व बैंक की व्यवस्था से जारी होती है, तो इतनी बड़ी देनदारी चुकाने के लिए अधिक नोट क्यों नहीं छाप लिए जाते। समस्या यह है कि मुद्रा का मूल्य केवल कागज के नोट की छपाई से पैदा नहीं होता। वह अर्थव्यवस्था में उपलब्ध वस्तुओं, सेवाओं, लोगों के भरोसे, मुद्रा की माँग और व्यापक मौद्रिक व्यवस्था से जुड़ा होता है। यदि बिना वास्तविक उत्पादन और आर्थिक परिस्थितियों का ध्यान रखे बहुत अधिक मुद्रा पैदा करके खर्च किया जाए, तो महँगाई और मुद्रा के मूल्य पर दबाव पड़ सकता है। इसलिए अधिक नोट छापना सरकार की वित्तीय समस्याओं का असीमित समाधान नहीं है।

भारत में रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति और सरकारी ऋण प्रबंधन की भूमिकाएँ अलग होते हुए भी संबंधित हैं। रिज़र्व बैंक आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार सरकारी प्रतिभूतियाँ खरीद या बेच सकता है। लेकिन ऐसे लेनदेन का उद्देश्य और प्रभाव समझे बिना उन्हें केवल सरकार का कर्ज मिटाने के लिए नए नोट छापने के बराबर नहीं माना जा सकता। बाजार में सरकारी बॉन्डों की खरीद-बिक्री से नकदी की स्थिति और ब्याज दरों पर प्रभाव पड़ सकता है, जबकि सरकार की मूल ऋण देनदारी अपने आप समाप्त नहीं होती। यदि केंद्रीय बैंक कोई सरकारी प्रतिभूति अपने पास रखता है, तो वह भी सरकारी ऋण की लेखांकन व्यवस्था का हिस्सा रहती है। इसलिए मौद्रिक नीति, बजटीय घाटा और सरकारी ऋण के बीच स्पष्ट अंतर रखना आवश्यक है।

नहीं। केवल बकाया कर्ज की राशि बढ़ने से किसी देश का दिवालिया होना सिद्ध नहीं होता। यह समझने के लिए उसके राजस्व, आर्थिक विकास, ऋण की ब्याज दर, परिपक्वता की अवधि, विदेशी मुद्रा संबंधी जोखिम और बाजार से नए ऋण जुटाने की क्षमता को साथ देखना पड़ता है। किसी देश पर बहुत बड़ा ऋण हो सकता है, लेकिन वह नियमित भुगतान करता रहे और निवेशकों को उसकी क्षमता पर विश्वास बना रहे। दूसरी ओर अपेक्षाकृत कम कर्ज वाला देश भी गंभीर वित्तीय संकट का सामना कर सकता है, यदि उसकी विदेशी मुद्रा आय कम हो जाए, बड़ी मात्रा में विदेशी ऋण तुरंत चुकाना पड़े या बाजार का विश्वास टूट जाए। इसीलिए केवल एक विशाल संख्या दिखाकर आर्थिक संकट की घोषणा करना उचित नहीं है।

भारत की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि केंद्र सरकार के कर्ज का अधिकांश हिस्सा घरेलू वित्तीय प्रणाली और रुपये में जारी प्रतिभूतियों से संबंधित है। इससे विदेशी मुद्रा में ऋण लौटाने का प्रत्यक्ष जोखिम अपेक्षाकृत सीमित रहता है। लेकिन घरेलू ऋण के अपने जोखिम भी हैं। यदि ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो नई उधारी की लागत बढ़ सकती है। यदि सरकार की आय अपेक्षा के अनुरूप नहीं बढ़ती, तो ब्याज भुगतान उसके बजट पर अधिक दबाव डाल सकता है। इसी तरह यदि सरकार बार-बार बहुत बड़ा घाटा चलाती है, तो उसका बकाया ऋण बढ़ सकता है। इसलिए सरकार की वित्तीय स्थिरता का मूल्यांकन आश्वासन या भय, किसी एक आधार पर नहीं, बल्कि अनेक आर्थिक संकेतकों से करना चाहिए।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऋण की तुलना करते समय एक और बात समझना आवश्यक है। कुछ विकसित देशों का सरकारी ऋण-जीडीपी अनुपात भारत से अधिक हो सकता है, जबकि कुछ देशों का अनुपात कम होता है। लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि अधिक अनुपात वाला प्रत्येक देश अधिक असुरक्षित है। मुद्रा की अंतरराष्ट्रीय स्थिति, घरेलू बचत, निवेशकों का भरोसा, ऋण की औसत अवधि और सरकार की राजस्व जुटाने की क्षमता अलग-अलग देशों में भिन्न होती है। इसलिए भारत के कर्ज का मूल्यांकन उसकी अपनी आर्थिक संरचना और वित्तीय परिस्थितियों के संदर्भ में करना अधिक उचित है।

क्या सरकार का कर्ज आम आदमी पर बोझ बनता है?

सरकार का कर्ज सीधे इस अर्थ में प्रत्येक नागरिक का व्यक्तिगत कर्ज नहीं है कि उसे अपनी जेब से किसी बैंक को निर्धारित रकम जमा करनी पड़े। सरकारी बॉन्डधारक किसी सामान्य नागरिक के घर जाकर अपना पैसा नहीं माँग सकता। लेकिन सरकारी ऋण का अप्रत्यक्ष संबंध नागरिकों से अवश्य है। सरकार को ब्याज और मूलधन लौटाने के लिए वित्तीय संसाधन चाहिए। उसका प्रमुख राजस्व स्रोत कर हैं। इसलिए लंबे समय में सरकारी कर्ज की लागत बजट की प्राथमिकताओं को प्रभावित कर सकती है। यदि ब्याज भुगतान पर अधिक धन खर्च हो रहा है, तो कुछ परिस्थितियों में शिक्षा, स्वास्थ्य या दूसरी सेवाओं के लिए अतिरिक्त राशि उपलब्ध कराना कठिन हो सकता है। दूसरी ओर यदि सरकार ने उधार लेकर उत्पादक अवसंरचना विकसित की है, तो उससे आर्थिक गतिविधियाँ और भविष्य का राजस्व बढ़ने की संभावना भी हो सकती है। इस प्रकार कर्ज का वास्तविक प्रभाव इस बात पर भी निर्भर करता है कि उसका उपयोग किस उद्देश्य से हुआ।

यहाँ भविष्य की पीढ़ियों का प्रश्न भी सामने आता है। आज सरकार द्वारा लिया गया लंबी अवधि का ऋण आने वाले वर्षों में लौटाया जाएगा। उस समय की सरकार को ब्याज और मूलधन की जिम्मेदारी निभानी होगी। लेकिन यदि आज के ऋण से ऐसी सड़क, विश्वविद्यालय, अस्पताल या सार्वजनिक व्यवस्था बनती है जिसका लाभ भविष्य की पीढ़ियों को भी मिलता है, तो ऋण के माध्यम से खर्च की लागत समय के साथ बाँटने का आर्थिक तर्क मौजूद हो सकता है। इसके विपरीत यदि उधार की राशि बिना पर्याप्त सार्वजनिक लाभ के खर्च हो जाए, तो भविष्य पर बोझ अधिक और लाभ कम रह सकता है। इसलिए सरकारी कर्ज के मूल्यांकन में केवल कुल राशि नहीं, बल्कि उसके उपयोग की गुणवत्ता और परिणाम देखना आवश्यक है।

भारत सरकार अपना कर्ज घटा कैसे सकती है?

सरकार का कर्ज घटाने के लिए केवल खर्च बंद कर देना व्यावहारिक विकल्प नहीं है। उसे आवश्यक सार्वजनिक सेवाएँ और विकास संबंधी जिम्मेदारियाँ निभानी होती हैं। इसलिए ऋण प्रबंधन में विभिन्न उपायों का संयुक्त उपयोग किया जाता है। राजस्व बढ़ाना, अनावश्यक या कम प्रभावी खर्च कम करना, सार्वजनिक धन का बेहतर उपयोग, आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करना और ऋण की लागत तथा अवधि का सावधानीपूर्वक प्रबंधन, सभी महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं। यदि अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ती है और सरकारी कर्ज अपेक्षाकृत धीमी गति से बढ़ता है, तो ऋण-जीडीपी अनुपात कम हो सकता है। इसी प्रकार राजकोषीय घाटा नियंत्रित करने से नए कर्ज की आवश्यकता घट सकती है। लेकिन ये परिणाम अर्थव्यवस्था की वास्तविक परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं।

वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में केंद्र सरकार ने ऋण-जीडीपी अनुपात को धीरे-धीरे कम करने की दिशा बताई थी। सरकार के अनुसार लक्ष्य 2030 तक इस अनुपात को लगभग 50 प्रतिशत के आसपास लाना है। इसका अर्थ यह नहीं कि 2030 तक सरकार का समूचा कर्ज समाप्त हो जाएगा। सरकारी कर्ज का पूर्ण रूप से शून्य हो जाना आधुनिक अर्थव्यवस्थाओं के लिए सामान्य या अनिवार्य नीति लक्ष्य नहीं है। अनेक देशों में सरकारी प्रतिभूतियाँ वित्तीय प्रणाली की महत्त्वपूर्ण संपत्ति भी होती हैं। बैंक, बीमा कंपनियाँ और पेंशन कोष इनमें निवेश करते हैं तथा वित्तीय बाजार में इनका उपयोग विभिन्न उद्देश्यों से होता है। वास्तविक प्रश्न कर्ज को समाप्त करना नहीं, बल्कि उसे ऐसी स्थिति में बनाए रखना है जहाँ सरकार अपने दायित्व पूरे कर सके और अर्थव्यवस्था पर असहनीय दबाव न पड़े।

भारत के कर्ज का सबसे महत्त्वपूर्ण सच

भारत के सरकारी कर्ज को समझने के लिए एक सरल लेकिन अत्यंत महत्त्वपूर्ण तथ्य याद रखना चाहिए। सरकार जब कर्ज लेती है, तो वह सामान्यतः किसी एक देश के सामने हाथ फैलाकर पूरी राशि नहीं माँगती। वह घरेलू वित्तीय बाजार में प्रतिभूतियाँ जारी करती है। देश के बैंक, बीमा कंपनियाँ, पेंशन कोष और दूसरे निवेशक उन्हें खरीदते हैं। कुछ धन विदेशी संस्थानों तथा द्विपक्षीय ऋणदाताओं से भी प्राप्त होता है। यह पूरा लेनदेन निर्धारित कानून, प्रतिभूति की शर्तों, नीलामी, ब्याज और मूलधन की वापसी की व्यवस्था पर आधारित होता है।

इसमें विश्वास सबसे महत्त्वपूर्ण तत्व है। निवेशक सरकार को धन इसलिए देते हैं क्योंकि उन्हें भरोसा होता है कि वह भविष्य में अपनी वित्तीय जिम्मेदारियाँ पूरी करेगी। सरकार की कर वसूलने की क्षमता, अर्थव्यवस्था का आकार, ऋण प्रबंधन की विश्वसनीयता और वित्तीय संस्थाओं की स्थिरता इस भरोसे को आधार देते हैं। दूसरी ओर सरकार की जिम्मेदारी है कि उधार लिया गया धन उपयोगी कार्यों में लगाए और ब्याज तथा मूलधन के भुगतान की व्यवस्था बनाए रखे। यह केवल लेखांकन की प्रक्रिया नहीं, बल्कि सार्वजनिक वित्त की एक दीर्घकालिक प्रतिबद्धता है।

अक्टूबर 2026 की स्थिति में केंद्र सरकार की बकाया देनदारियों का मार्च 2026 का संशोधित बजटीय अनुमान लगभग 197.18 लाख करोड़ रुपये और मार्च 2027 का अनुमान लगभग 214.82 लाख करोड़ रुपये है। इसमें राज्यों के ऋण शामिल नहीं हैं। दूसरी ओर जून 2026 के अंत में भारत का कुल विदेशी कर्ज लगभग 778.2 अरब डॉलर था, जिसमें सरकार के साथ कंपनियों, बैंकों और दूसरे क्षेत्रों की देनदारियाँ भी शामिल थीं। इन संख्याओं से घबराने या उन्हें अनदेखा करने के बजाय उनका सही अर्थ समझना जरूरी है। सरकार का कर्ज अपने आप बुरा नहीं होता और कर्ज का लगातार बढ़ते रहना अपने आप सुरक्षित भी नहीं होता। निर्णय इस बात से होता है कि उधार कितनी लागत पर लिया गया, उसे कहाँ खर्च किया गया, भविष्य की आय और अर्थव्यवस्था कितनी तेजी से बढ़ रही है तथा भुगतान की क्षमता कितनी विश्वसनीय है। देश की आर्थिक मजबूती केवल इस बात से नहीं मापी जाती कि उसने कितना कर्ज लिया है। उससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उधार लिए गए धन से उसने अपनी वर्तमान जरूरतें कितनी अच्छी तरह पूरी कीं और भविष्य के लिए कितनी स्थायी क्षमता विकसित की।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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