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हाथ में डिग्री, फिर भी 91% ग्रेजुएट्स को नहीं मिला योग्यता के मुताबिक काम: नीति आयोग
NITI Aayog: नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार भारत में केवल 8.25% ग्रेजुएट्स को ही उनकी योग्यता के अनुरूप रोजगार मिल रहा है, जबकि 8.70 करोड़ युवा पढ़ाई, रोजगार और प्रशिक्षण से बाहर हैं।
NITI Aayog
NITI Aayog: देश में उच्च शिक्षा की बढ़ती संख्या के बीच युवाओं के कौशल और वास्तविक रोजगार को लेकर एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट 'विकसित भारत 2047 के लिए कौशल विकास की नई कल्पना' के अनुसार, देश में स्नातक करने वाले मात्र 8.25 प्रतिशत युवा ही अपनी शैक्षणिक योग्यता के अनुरूप रोजगार पा रहे हैं। इसका सीधा अर्थ है कि करीब 91 प्रतिशत ग्रेजुएट्स को अपनी योग्यता से कम स्तर के काम में लगना पड़ रहा है।
रिपोर्ट में 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं की स्थिति को लेकर और भी गंभीर खुलासा हुआ है। इस आयु वर्ग के करीब 8.70 करोड़ युवा वर्तमान में ऐसे हैं जो न तो कोई औपचारिक पढ़ाई कर रहे हैं, न किसी रोजगार में हैं और न ही किसी प्रकार का व्यावसायिक प्रशिक्षण ले रहे हैं-यानी वे पूरी तरह 'खाली' (NEET श्रेणी) हैं। यह अनुमान राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (NSSO के 78वें दौर) के आंकड़ों के आधार पर तैयार किया गया है।
किताबों और कार्यस्थल के बीच गायब है तालमेल
आयोग के अध्ययन के अनुसार, देश के शिक्षा ढांचे में कई ऐसी बुनियादी खामियां हैं जिनकी वजह से डिग्रियां नौकरियों में तब्दील नहीं हो पा रही हैं:
थ्योरी पर अत्यधिक जोर: पाठ्यक्रमों में व्यावहारिक ज्ञान और कार्यस्थल की वास्तविक जरूरतों का घोर अभाव है। इंटरव्यू कौशल, डिजिटल साक्षरता और प्रभावी संचार (कम्युनिकेशन) जैसे जरूरी टूल्स पर ध्यान नहीं दिया जाता।
वोकेशनल शिक्षा की उपेक्षा: सही जानकारी और जागरूकता की कमी के चलते व्यावसायिक (वोकेशनल) शिक्षा को मुख्यधारा की पढ़ाई से कमतर आंका जाता है। 12वीं के स्तर पर वोकेशनल विषय न के बराबर हैं।
महंगा प्रशिक्षण और समन्वय की कमी: अच्छे प्लेसमेंट वाले स्किल कोर्स काफी महंगे हैं, वहीं मंत्रालयों और कल्याणकारी योजनाओं के बीच आपसी समन्वय कमजोर है। भर्ती प्रक्रियाओं में भी आज वास्तविक कौशल के बजाय सिर्फ कागजी डिग्री को प्राथमिकता दी जाती है।
नीति आयोग का रोडमैप: कैसे सुधरेगी स्थिति?
इस विकट संकट से निपटने के लिए नीति आयोग ने शिक्षा और रोजगार को आपस में जोड़ने के कई ठोस उपाय सुझाए हैं:
स्कूली स्तर से स्किल ट्रैक: कक्षा 6 से 12 तक के छात्रों को उद्यमशीलता और बुनियादी रोजगार कौशल अनिवार्य रूप से सिखाए जाएं, तथा कक्षा 9 से अलग-अलग 'स्किल ट्रैक' का विकल्प मिले।
इंडस्ट्री-लिंक्ड डिग्री व अप्रेंटिसशिप: कॉलेजों और पॉलिटेक्निक संस्थानों में उद्योगों की सीधी भागीदारी सुनिश्चित की जाए। डिग्री को अप्रेंटिसशिप से जोड़ा जाए और केंद्र व राज्य की सभी अप्रेंटिसशिप योजनाओं को एक साझा डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाया जाए। छोटे उद्योगों (MSME) को अप्रेंटिस रखने के लिए विशेष प्रोत्साहन दिया जाए।
उभरते सेक्टर्स पर फोकस: ग्रीन एनर्जी, इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) और आधुनिक डिजिटल तकनीकों जैसे तेजी से बढ़ते क्षेत्रों के लिए छोटे अवधि के रोजगारपरक कोर्स शुरू किए जाएं।
डिजिटल टूल्स और सहायता केंद्र: छात्रों के सही मार्गदर्शन के लिए स्कूलों में 'पाथवे क्लिनिक', महिलाओं के लिए 'सखी बूथ' और करियर गाइडेंस के लिए MyGuide, Skill Sure तथा Skill Scout जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और नियमित 'स्किल फेस्ट' का आयोजन किया जाए।


