India in 1947: आज़ादी मिली, लेकिन देश बनाना बाकी था, 1947 में भारत के सामने कितनी बड़ी थी चुनौती?

India in 1947 History: 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ, लेकिन सामने गरीबी, अशिक्षा, कमजोर उद्योग, कम बिजली, खाद्य संकट, विभाजन और रियासतों के एकीकरण जैसी बड़ी चुनौतियां थीं। जानिए कैसे आधुनिक भारत की नींव रखी गई।

Yogesh Mishra
Published on: 11 Aug 2026 7:06 PM IST
India in 1947 History Explained in Hindi
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India in 1947 History Explained in Hindi

India in 1947 History Explained: 15 अगस्त, 1947 को भारत राजनीतिक रूप से स्वतंत्र जरूर हो गया था। लेकिन स्वतंत्रता के साथ उसे कोई संपन्न, शिक्षित, औद्योगिक और सुव्यवस्थित आधुनिक राष्ट्र विरासत में नहीं मिला था। अंग्रेज भारत छोड़कर जा रहे थे। पर पीछे एक ऐसा देश था, जो विभाजन की हिंसा से घायल था, जिसकी विशाल आबादी गरीब थी, अधिकांश लोग गांवों में रहते थे, खेती बहुत हद तक मानसून के भरोसे थी, आधुनिक उद्योग सीमित थे, बिजली का उत्पादन मामूली था, स्वास्थ्य सुविधाएं बेहद अपर्याप्त थीं और शिक्षा समाज के बहुत छोटे हिस्से तक पहुंची थी। इसके ऊपर करोड़ों लोगों को एक नए संविधान, नई संसद, नई न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्था तथा सार्वभौमिक मताधिकार पर आधारित लोकतंत्र के भीतर जोड़ने की चुनौती थी। इसलिए 1947 को केवल सत्ता हस्तांतरण की तारीख मानकर उस दौर का आकलन करना अधूरा होगा। असली प्रश्न यह है कि जिस देश को स्वतंत्रता मिली, उसकी शुरुआती स्थिति आखिर थी कैसी और उस विरासत से आधुनिक भारत खड़ा करना कितना कठिन काम था?

सबसे पहले आबादी को देखें। 1947 में कोई जनगणना नहीं हुई थी, इसलिए उस वर्ष के लिए अलग-अलग अनुमान मिलते हैं और करीब 34 करोड़ की संख्या सामान्यतः इस्तेमाल की जाती है। लेकिन स्वतंत्र भारत की पहली जनगणना 1951 में हुई और उसमें भारत की आबादी लगभग 36.1 करोड़ दर्ज की गई। यह आबादी आज की तुलना में भले कम दिखाई दे।लेकिन उपलब्ध संसाधनों के मुकाबले वह बहुत बड़ी थी। इससे भी महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि आबादी का विशाल हिस्सा ग्रामीण भारत में रहता था। 1951 में लगभग 82.7 प्रतिशत भारतीय ग्रामीण क्षेत्रों में रहते थे।यानी मोटे तौर पर हर छह भारतीयों में पांच गांवों में थे। अर्थव्यवस्था, रोजगार, गरीबी, शिक्षा और स्वास्थ्य—हर बड़े सवाल का केंद्र इसलिए गांव था।

अपार अशिक्षा

आज़ाद भारत को मिली सबसे गंभीर कमजोरियों में शिक्षा थी। 1951 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल साक्षरता दर केवल 18.33 प्रतिशत थी। दूसरे शब्दों में, पांच में चार से अधिक भारतीय निरक्षर थे। महिलाओं की स्थिति और भी खराब थी। यही कारण है कि 1947 के भारत के लिए कई जगह 12 या 14 प्रतिशत जैसी साक्षरता संख्या मिलती है। लेकिन उसे आधिकारिक राष्ट्रीय जनगणना का आंकड़ा नहीं कहा जाना चाहिए। स्वतंत्र भारत का पहला ठोस अखिल भारतीय जनगणना आंकड़ा 1951 का 18.33 प्रतिशत है।


उच्च शिक्षा की तस्वीर भी इसका अंदाजा देती है। शिक्षा मंत्रालय के अनुसार 1950 में पूरे भारत में केवल 20 विश्वविद्यालय और लगभग 500 कॉलेज थे। जिस देश को विज्ञान, तकनीक, प्रशासन, चिकित्सा, इंजीनियरिंग और आधुनिक उद्योगों के लिए लाखों प्रशिक्षित लोगों की जरूरत थी। वहां उच्च शिक्षा की संस्थागत क्षमता बेहद छोटी थी।

इसलिए स्वतंत्र भारत के सामने शिक्षा की चुनौती दोहरी थी। एक ओर करोड़ों बच्चों को पहली बार स्कूल तक पहुंचाना था। दूसरी ओर विश्वविद्यालय, इंजीनियरिंग संस्थान, मेडिकल कॉलेज और वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थान खड़े करने थे। यह काम केवल भवन बनाने का नहीं था। शिक्षकों की उपलब्धता, पाठ्यक्रम, भाषा, सामाजिक भेदभाव, लड़कियों की शिक्षा और गरीब परिवारों के बच्चों को विद्यालय में टिकाए रखना—ये सभी समस्याएं एक साथ थीं।

कम जीवन प्रत्याशा

भारत की स्वास्थ्य स्थिति शायद उससे भी अधिक चिंताजनक थी। सरकारी सांख्यिकीय श्रृंखला के अनुसार 1941-51 के दशक में जन्म के समय औसत जीवन प्रत्याशा लगभग 32.1 वर्ष थी। पुरुषों के लिए यह करीब 31.7 और महिलाओं के लिए लगभग 32.4 वर्ष आंकी गई। इसका अर्थ यह नहीं था कि हर व्यक्ति 32 वर्ष में मर जाता था। कम जीवन प्रत्याशा मुख्यतः बहुत अधिक शिशु और बाल मृत्यु, संक्रामक रोगों, कुपोषण, खराब स्वच्छता और सीमित चिकित्सा सेवाओं का परिणाम थी।

मलेरिया, हैजा, चेचक, तपेदिक और अनेक संक्रामक रोग व्यापक थे। स्वच्छ पेयजल और सीवर व्यवस्था देश के बहुत छोटे हिस्से तक सीमित थी। गांवों में अस्पताल और प्रशिक्षित डॉक्टर आसानी से उपलब्ध नहीं थे। प्रसव का बड़ा हिस्सा चिकित्सा संस्थानों के बाहर होता था। इसलिए आधुनिक भारत बनाने का अर्थ अस्पताल बनाना भर नहीं था। टीकाकरण, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, सार्वजनिक स्वच्छता, चिकित्सा शिक्षा और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का पूरा तंत्र खड़ा करना था।

संकटग्रस्त खेती

आर्थिक दृष्टि से भारत मूलतः कृषि प्रधान देश था। 1950-51 में कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों का राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में हिस्सा करीब 59 प्रतिशत था। इसका अर्थ था कि भारत की आर्थिक सेहत मुख्यतः खेती की स्थिति पर निर्भर थी। लेकिन खेती आधुनिक और अत्यधिक उत्पादक नहीं थी। अधिकांश किसान पारंपरिक बीज, बैल और हल जैसी तकनीकों पर निर्भर थे। रासायनिक उर्वरकों, आधुनिक मशीनों और उच्च उत्पादक किस्मों का इस्तेमाल बेहद सीमित था। सिंचाई पूरे कृषि क्षेत्र तक नहीं पहुंची थी। बहुत बड़ी खेती मानसून के भरोसे थी। वर्षा कमजोर हुई तो उत्पादन गिर सकता था और ग्रामीण संकट बढ़ सकता था।


1950-51 में भारत का कुल खाद्यान्न उत्पादन करीब 5.1 करोड़ टन, यानी लगभग 51 मिलियन टन, था। बाद की योजना आयोग की सरकारी समीक्षा भी 1950-51 के खाद्यान्न उत्पादन को इसी स्तर पर दर्ज करती है। इतनी बड़ी आबादी के लिए खाद्यान्न सुरक्षा चुनौती थी। विभाजन ने स्थिति और कठिन कर दी थी क्योंकि अविभाजित भारत के कुछ महत्वपूर्ण कृषि क्षेत्र पाकिस्तान में चले गए। जूट उत्पादन का बड़ा हिस्सा पूर्वी पाकिस्तान में चला गया। जबकि जूट मिलों का बड़ा हिस्सा भारत में रह गया। इसी तरह कृषि और बाजार की पुरानी आर्थिक शृंखलाएं अचानक दो देशों में बंट गईं।

इसलिए स्वतंत्रता के बाद नेतृत्व के सामने पहली प्राथमिकताओं में खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाना, सिंचाई का विस्तार करना, भूमि सुधार करना और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना शामिल था। पहली पंचवर्षीय योजना में कृषि और सिंचाई को इसलिए अपेक्षाकृत अधिक महत्व दिया गया।

दूर आत्मनिर्भरता

आज भारत दुनिया के बड़े खाद्यान्न उत्पादकों में है। लेकिन आज़ादी के शुरुआती वर्षों की स्थिति बिल्कुल अलग थी। घरेलू उत्पादन बढ़ती आबादी और आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त नहीं था। भारत को अनाज का आयात करना पड़ता था। आगे चलकर 1950 और 1960 के दशकों में अमेरिका के पीएल-480 कार्यक्रम के तहत भी भारत ने बड़े पैमाने पर खाद्यान्न आयात किया।

यह तथ्य समझना जरूरी है क्योंकि आजादी के समय भारतीय नेतृत्व के सामने केवल आर्थिक विकास दर बढ़ाने का सवाल नहीं था। उसे यह भी सुनिश्चित करना था कि देश अपने नागरिकों को भोजन उपलब्ध करा सके। आगे चलकर सिंचाई परियोजनाओं, कृषि अनुसंधान और अंततः हरित क्रांति के पीछे खाद्य सुरक्षा का यही गहरा दबाव था।

पुराने कारखाने

यह कहना गलत होगा कि 1947 में भारत में कोई उद्योग नहीं था। कपड़ा उद्योग, जूट, कोयला, लौह-इस्पात और कुछ अन्य क्षेत्रों में औद्योगिक इकाइयां मौजूद थीं। टाटा आयरन एंड स्टील जैसी कंपनियां स्वतंत्रता से पहले ही स्थापित हो चुकी थीं। मुंबई और अहमदाबाद कपड़ा उद्योग के केंद्र थे और कोलकाता के आसपास जूट उद्योग विकसित हुआ था।

लेकिन एक आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था के लिए जिस व्यापक आधार की आवश्यकता होती है—भारी मशीन निर्माण, बड़े पैमाने पर इंजीनियरिंग, ऊर्जा उपकरण, पेट्रोकेमिकल, उर्वरक, विद्युत संयंत्र, आधुनिक पूंजीगत वस्तुएं और तकनीकी अनुसंधान—उसका आधार बहुत छोटा था। भारत बहुत सी मशीनों और औद्योगिक उपकरणों के लिए विदेश पर निर्भर था।

यही पृष्ठभूमि थी जिसमें बाद के वर्षों में सार्वजनिक क्षेत्र और भारी उद्योगों पर जोर दिया गया। भिलाई, राउरकेला और दुर्गापुर जैसे इस्पात संयंत्र, भारी इंजीनियरिंग संस्थान और सार्वजनिक क्षेत्र की अनेक औद्योगिक कंपनियां इसी सोच का हिस्सा बनीं। इन नीतियों के आर्थिक लाभ और उनकी बाद की अक्षमताओं पर बहस की जा सकती है। लेकिन उस निर्णय को समझने के लिए 1947 के सीमित औद्योगिक आधार को ध्यान में रखना जरूरी है।

सबसे बड़ी कमी बिजली

आज बिजली अर्थव्यवस्था की सामान्य आवश्यकता लगती है। लेकिन स्वतंत्रता के समय भारत का बहुत बड़ा ग्रामीण क्षेत्र बिजली से अछूता था। विद्युत उत्पादन और वितरण मुख्यतः कुछ शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों तक सीमित था। कृषि में बिजली का उपयोग नगण्य था।


इसका असर केवल घरों की रोशनी पर नहीं पड़ता था। बिना पर्याप्त बिजली के बड़े उद्योग नहीं चल सकते थे, सिंचाई पंपों का विस्तार नहीं हो सकता था। आधुनिक अस्पताल और वैज्ञानिक प्रयोगशालाएं नहीं बन सकती थीं। ग्रामीण उद्योगों का विकास कठिन था। इसलिए स्वतंत्रता के बाद बड़े बांधों और बिजली परियोजनाओं को केवल विकास परियोजनाओं के रूप में नहीं। आधुनिक अर्थव्यवस्था की बुनियादी आवश्यकता के रूप में देखा गया।

अपर्याप्त सड़क, रेल और संचार ढांचा

अंग्रेजों ने भारत में बड़ा रेलवे नेटवर्क जरूर बनाया था, लेकिन उसका प्राथमिक उद्देश्य औपनिवेशिक शासन, सैनिक आवाजाही और कच्चे माल को बंदरगाहों तक पहुंचाने जैसी जरूरतों से जुड़ा था। स्वतंत्र भारत के लिए उस नेटवर्क को राष्ट्रीय विकास की जरूरतों के अनुसार पुनर्गठित और विस्तारित करना था।

सड़क नेटवर्क विशेष रूप से कमजोर था। हजारों गांव ऐसे थे जहां सभी मौसमों में चलने वाली सड़कें उपलब्ध नहीं थीं। ग्रामीण भारत को बाजार, स्कूल, अस्पताल और प्रशासन से जोड़ने की समस्या व्यापक थी। टेलीफोन जैसी संचार सुविधाएं सीमित थीं। रेडियो महत्वपूर्ण माध्यम था, लेकिन आधुनिक जनसंचार नेटवर्क अभी शुरुआती अवस्था में था।

विभाजन की मानवीय त्रासदी

अगर आर्थिक पिछड़ापन ही चुनौती होता तो भी काम कठिन था। लेकिन स्वतंत्रता के साथ भारत को विभाजन की अभूतपूर्व मानवीय त्रासदी भी झेलनी पड़ी। पंजाब और बंगाल का विभाजन हुआ। सांप्रदायिक हिंसा फैली और इतिहास के सबसे बड़े जन-स्थानांतरणों में से एक शुरू हुआ। लाखों हिंदू और सिख पाकिस्तान से भारत आए। लाखों मुसलमान भारत से पाकिस्तान गए। मौतों की संख्या को लेकर इतिहासकारों के अनुमान अलग-अलग हैं। इसलिए किसी एक आंकड़े को निर्विवाद नहीं माना जाना चाहिए।

भारत के लिए इसका सीधा अर्थ था कि नई सरकार को स्वतंत्रता के पहले दिन से ही शरणार्थियों को भोजन, आश्रय, रोजगार और पुनर्वास उपलब्ध कराना था। दिल्ली, पंजाब और उत्तर भारत के अनेक शहरों की सामाजिक और आर्थिक संरचना इस विस्थापन से बदल गई।

नई सरकार को उन लोगों को फिर से जीवन देना था जो अपना घर, जमीन, कारोबार और संपत्ति पीछे छोड़कर आए थे। इसलिए राष्ट्र निर्माण किसी योजनाबद्ध शांत वातावरण में शुरू नहीं हुआ। वह मानवीय आपदा और सांप्रदायिक तनाव के बीच शुरू हुआ।

565 रियासतों का प्रश्न

ब्रिटिश भारत केवल सीधे ब्रिटिश शासन वाले प्रांतों से नहीं बना था। उपमहाद्वीप में 565 मान्यता प्राप्त रियासतें भी थीं। ब्रिटिश सत्ता समाप्त होने के साथ उनकी ब्रिटिश क्राउन के प्रति अधीनता समाप्त हो रही थी। इसलिए एक बड़ा सवाल था कि ये रियासतें भारत या पाकिस्तान में शामिल होंगी अथवा स्वयं को स्वतंत्र घोषित करने की कोशिश करेंगी।

सरदार वल्लभभाई पटेल और वी.पी. मेनन की भूमिका में अधिकांश रियासतों का भारत में विलय हुआ। लेकिन हैदराबाद, जूनागढ़ और जम्मू-कश्मीर जैसे मामलों ने प्रक्रिया की जटिलता दिखाई। इसलिए स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों की सबसे बड़ी उपलब्धियों में केवल संविधान बनाना नहीं। बल्कि राजनीतिक रूप से विखंडित भूभाग को एक संघीय राष्ट्र के रूप में संगठित करना भी शामिल था। यदि यह एकीकरण सफल न होता तो आज जिस भारत के राजनीतिक नक्शे को हम स्वाभाविक मानते हैं, उसका स्वरूप बिल्कुल अलग हो सकता था।

संविधान निर्माण महत्वाकांक्षी लोकतांत्रिक प्रयोग

इन आर्थिक और सामाजिक संकटों के बीच भारत ने एक और असाधारण निर्णय लिया—लोकतंत्र को भविष्य के लिए स्थगित नहीं किया गया। यह नहीं कहा गया कि पहले देश को शिक्षित और समृद्ध बनाया जाएगा, उसके बाद आम नागरिक को मतदान का अधिकार मिलेगा।

भारत ने सीधे सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार अपनाया। संपत्ति, शिक्षा, जाति, धर्म या लिंग को वोट देने की शर्त नहीं बनाया गया। उस समय पांच में चार से अधिक लोग निरक्षर थे।फिर भी संविधान निर्माताओं ने यह नहीं माना कि निरक्षर नागरिक लोकतंत्र के योग्य नहीं है।

यह निर्णय अपने समय के लिए अत्यंत साहसिक था। अनेक पुराने पश्चिमी लोकतंत्रों में भी मतदान का अधिकार लंबे संघर्ष और कई चरणों में व्यापक हुआ था। भारत ने गणराज्य बनने के साथ ही सामान्य नागरिक को समान राजनीतिक अधिकार दे दिया।

26 जनवरी, 1950 को संविधान लागू हुआ और इसके तुरंत बाद करोड़ों मतदाताओं की सूची तैयार करके 1951-52 में पहला आम चुनाव कराया गया। इसलिए आर्थिक राष्ट्र-निर्माण और राजनीतिक राष्ट्र-निर्माण एक साथ चल रहे थे।

नई शासन व्यवस्था

1947 में भारत को केवल सड़क, बांध और कारखाने नहीं बनाने थे। उसे आधुनिक राज्य की संस्थाएं भी विकसित करनी थीं। संसद, सर्वोच्च न्यायालय, चुनाव आयोग, संघीय शासन व्यवस्था, अखिल भारतीय सेवाएं, राज्यों के प्रशासन और वित्तीय संस्थानों के बीच संतुलन बनाना था।

अलग-अलग भाषाओं, धर्मों, जातियों, क्षेत्रों और सामाजिक परंपराओं वाले विशाल देश को एक संविधान के भीतर जोड़ना आसान नहीं था। कुछ ही वर्षों बाद भाषाई राज्यों की मांग जोर पकड़ने लगी। दक्षिण में भाषा का प्रश्न था। पूर्वोत्तर में अलग परिस्थितियां थीं। कश्मीर का विवाद सामने था। विभिन्न क्षेत्रों में आदिवासी तथा क्षेत्रीय अस्मिताएं थीं। इसलिए भारत का राष्ट्र निर्माण केवल आर्थिक विकास कार्यक्रम नहीं था। यह राजनीतिक एकीकरण और सामाजिक सहमति की लगातार चलने वाली प्रक्रिया थी।

जमीन और सामाजिक असमानता

ग्रामीण भारत में भूमिहीनता और असमान भूमि स्वामित्व भी बड़ी समस्या थी। जमींदारी और अन्य मध्यस्थ भू-व्यवस्थाओं ने अनेक क्षेत्रों में किसान और वास्तविक भूमि स्वामी के बीच कई स्तर पैदा कर दिए थे। स्वतंत्रता के बाद जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार का प्रयास हुआ। लेकिन इसकी सफलता राज्यों में असमान रही। कहीं सुधार अपेक्षाकृत प्रभावी रहे। कहीं कानूनी रास्तों, राजनीतिक प्रभाव और प्रशासनिक कमजोरी के कारण सीमित परिणाम आए। इसलिए शुरुआती भारत की कहानी केवल उपलब्धियों की नहीं है; कई ऐसे संरचनात्मक प्रश्न भी थे जिनका पूर्ण समाधान दशकों बाद भी नहीं हो पाया।

आर्थिक योजना

इन परिस्थितियों को देखते हुए भारत ने योजनाबद्ध आर्थिक विकास का रास्ता चुना। 1950 में योजना आयोग बना और 1951 में पहली पंचवर्षीय योजना शुरू हुई। पहली योजना में कृषि, सिंचाई और ग्रामीण विकास पर अधिक ध्यान दिया गया क्योंकि तत्काल समस्या भोजन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था थी। बाद की दूसरी पंचवर्षीय योजना में भारी उद्योग और औद्योगीकरण पर अधिक जोर आया। बड़े बांधों को उस समय सिंचाई, बिजली और बाढ़ नियंत्रण—तीनों के समाधान के रूप में देखा गया। भाखड़ा-नांगल, हीराकुंड और दामोदर घाटी जैसी परियोजनाएं इसी राष्ट्र-निर्माण दृष्टि का हिस्सा थीं।

आगे चलकर इस मॉडल की आलोचना भी हुई। सार्वजनिक क्षेत्र की अक्षमता, लाइसेंस-परमिट व्यवस्था, प्रतिस्पर्धा की कमी और निजी उद्यम पर अत्यधिक नियंत्रण जैसी समस्याएं सामने आईं। 1991 में भारत को व्यापक आर्थिक उदारीकरण करना पड़ा। इसलिए शुरुआती विकास मॉडल को बिना आलोचना के सफल कहना भी सही नहीं होगा। लेकिन यह समझना आवश्यक है कि वह मॉडल किस ऐतिहासिक परिस्थिति में चुना गया था।

1947 के नेतृत्व की असली परीक्षा

उस समय नेतृत्व के सामने कोई एक समस्या नहीं थी। उसे एक साथ— विभाजन संभालना था। शरणार्थियों का पुनर्वास करना था। रियासतों को जोड़ना था। संविधान बनाना था। लोकतंत्र स्थापित करना था। खाद्यान्न संकट से निपटना था। खेती की उत्पादकता बढ़ानी थी। सिंचाई विकसित करनी थी। उद्योग खड़े करने थे बिजली उत्पादन बढ़ाना था। स्कूल और विश्वविद्यालय बनाने थे। अस्पताल तथा स्वास्थ्य व्यवस्था तैयार करनी थी और भाषाई, धार्मिक तथा क्षेत्रीय विविधता वाले देश को एक राजनीतिक इकाई के रूप में कायम रखना था।

यही कारण है कि स्वतंत्र भारत के शुरुआती वर्षों को केवल इस प्रश्न से नहीं मापा जाना चाहिए कि आर्थिक विकास दर कितनी थी। प्रश्न यह भी होना चाहिए कि किस आधार से विकास यात्रा शुरू हुई थी।

इस इतिहास को दो अतियों से बचाकर देखना चाहिए। एक दृष्टिकोण ऐसा है जिसमें स्वतंत्रता के बाद के शुरुआती नेतृत्व की हर नीति को महान उपलब्धि मान लिया जाता है। दूसरी ओर ऐसा राजनीतिक विमर्श भी मिलता है जिसमें यह धारणा बना दी जाती है कि 1947 में भारत को लगभग तैयार अर्थव्यवस्था मिली थी और उसके बाद दशकों तक कुछ खास हुआ ही नहीं।

दोनों दृष्टिकोण इतिहास को सरल बना देते हैं।

भारत ने शुरुआती दशकों में लोकतांत्रिक संस्थाएं कायम रखीं। उच्च शिक्षा और वैज्ञानिक संस्थानों का विस्तार किया। भारी उद्योग की नींव रखी। सिंचाई और बिजली परियोजनाएं विकसित कीं और एक विशाल संघीय राष्ट्र को राजनीतिक रूप से जोड़े रखा। लेकिन उसी दौर में धीमी आर्थिक वृद्धि, व्यापक गरीबी, कमजोर प्राथमिक शिक्षा, अपर्याप्त स्वास्थ्य व्यवस्था, नौकरशाही नियंत्रण, कम उत्पादकता और कई अधूरे भूमि सुधार भी वास्तविकताएं थीं।

इसलिए उस दौर का मूल्यांकन न तो श्रद्धा से होना चाहिए, न घृणा से। बल्कि उस शुरुआती स्थिति और उपलब्ध संसाधनों की तुलना में होना चाहिए।

सबसे बड़ा प्रश्न

आज पीछे मुड़कर देखने पर एक बात अक्सर छूट जाती है। 1947 में यह निश्चित नहीं माना जा रहा था कि इतनी विविधता वाला भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में लंबे समय तक बना रहेगा। विभाजन हो चुका था। सांप्रदायिक तनाव था। गरीबी थी। निरक्षरता व्यापक थी। अनेक रियासतें थीं। भाषाएं और सामाजिक संरचनाएं अलग थीं। फिर भी भारत ने सैन्य शासन के बजाय संसदीय लोकतंत्र चुना, सार्वभौमिक मताधिकार कायम किया और चुनाव के माध्यम से राजनीतिक वैधता हासिल करने की परंपरा विकसित की। यही कारण है कि स्वतंत्र भारत के निर्माण की कहानी को केवल आर्थिक आंकड़ों तक सीमित नहीं किया जा सकता। यह एक साथ राष्ट्र निर्माण, राज्य निर्माण, अर्थव्यवस्था निर्माण और लोकतंत्र निर्माण की कहानी थी।

सबसे कठिन शुरुआत

15 अगस्त, 1947 को भारत को स्वतंत्रता मिली थी। विकसित राष्ट्र नहीं। करीब 34 करोड़ की अनुमानित आबादी वाला देश कुछ वर्षों बाद 1951 की जनगणना में 36.1 करोड़ से अधिक आबादी का देश था। साक्षरता सिर्फ 18.33 प्रतिशत थी। लगभग 83 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती थी। जन्म के समय औसत जीवन प्रत्याशा करीब 32 वर्ष थी। खाद्यान्न उत्पादन केवल करीब 5.1 करोड़ टन था। अर्थव्यवस्था का लगभग 59 प्रतिशत हिस्सा कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों पर निर्भर था। उच्च शिक्षा के लिए पूरे देश में सिर्फ 20 विश्वविद्यालय तथा करीब 500 कॉलेज थे।

इसके साथ विभाजन और शरणार्थी संकट था। सैकड़ों रियासतों का एकीकरण करना था। करोड़ों निरक्षर लोगों के बीच दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक प्रयोग शुरू करना था। इसलिए स्वतंत्र भारत के शुरुआती नेतृत्व के सामने प्रश्न केवल यह नहीं था कि देश को कितनी तेजी से आगे बढ़ाया जाए। उससे भी पहले प्रश्न था—इस विशाल, गरीब, विभाजित और अत्यंत विविध भूभाग को एक राष्ट्र के रूप में कैसे खड़ा रखा जाए; उसके नागरिकों को भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य कैसे मिले। आधुनिक अर्थव्यवस्था कैसे बने और उसी समय लोकतंत्र भी कैसे जीवित रहे।

आज़ादी भारत की मंजिल नहीं थी। वह उस अत्यंत कठिन यात्रा का आरंभ थी जिसमें एक औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था को आधुनिक राष्ट्र, करोड़ों प्रजा को समान अधिकार वाले नागरिक और बिखरी हुई व्यवस्थाओं को लोकतांत्रिक गणराज्य में बदलना था।

और शायद 1947 की सबसे बड़ी चुनौती को एक वाक्य में इसी तरह समझा जा सकता है—भारत को केवल अपनी सरकार नहीं बनानी थी।उसे लगभग हर क्षेत्र में अपना आधुनिक भविष्य स्वयं बनाना था।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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