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Most Multilingual Village in India: क्या भारत में कोई आधिकारिक सबसे बहुभाषी गाँव है? जानिए पूरा सच
Most Multilingual Village in India: भारत का सबसे बहुभाषी गाँव कौन-सा है और एक बस्ती में दर्जनों भाषाएँ कैसे पहुंचती हैं? जानिए हिमाचल के सुन्नम, पूर्वोत्तर की भाषाई विविधता और जनगणना के आंकड़ों की सच्चाई।
Most Multilingual Village in India| India's Most Multilingual Village | Newstrack Hindi
Most Multilingual Village in India: सोचिए, किसी गाँव में एक परिवार अपनी मातृभाषा में बात करता है, पड़ोसी दूसरी भाषा बोलता है, बाज़ार में तीसरी भाषा सुनाई देती है और स्कूल में चौथी पढ़ाई जाती है। भारत में यह कोई अजीब बात नहीं। देश के कई सीमावर्ती और आदिवासी इलाकों में भाषाओं की ऐसी विविधता मिलती है। तो क्या भारत में कोई ऐसा गाँव है जहाँ सबसे ज़्यादा भाषाएँ बोली जाती हैं? क्या जनगणना से उसका पता चल सकता है? और सबसे अहम सवाल: एक छोटे-से गाँव में इतनी भाषाएँ पहुँचती कैसे हैं? इसके पीछे भारत के पुराने प्रवास, आदिवासी इतिहास, शादी-ब्याह के रिश्तों, व्यापार के रास्तों, सीमाओं और भाषाओं के बदलने की लंबी कहानी है।
कोई "आधिकारिक" सबसे बहुभाषी गाँव नहीं है
भारत की जनगणना ने किसी गाँव को आधिकारिक तौर पर देश का सबसे ज़्यादा भाषाओं वाला गाँव घोषित नहीं किया है। 2011 की जनगणना में मातृभाषाओं और बहुभाषिकता के बहुत से आँकड़े हैं, पर सार्वजनिक भाषा-तालिकाओं में गाँव-दर-गाँव की कोई ऐसी देशव्यापी रैंकिंग नहीं है जिससे किसी एक गाँव को बेझिझक पहला कहा जा सके। इसलिए गाँव-स्तर के भरोसेमंद भाषा सर्वे के बिना किसी गाँव को भारत का सबसे बहुभाषी गाँव कह देना तथ्यों के लिहाज़ से जोखिम भरा है।
फिर भी इस सवाल को समझने के लिए पूर्वोत्तर भारत, खासकर अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड, बहुत अहम हैं। यहाँ कई समुदायों की अपनी भाषाएँ हैं और कुछ इलाकों में थोड़ी दूरी पर ही भाषा बदल जाती है। यह विविधता सिर्फ दूसरे राज्यों से आकर बसे लोगों की वजह से नहीं है। यह स्थानीय समुदायों की अलग-अलग भाषाई परंपराओं का नतीजा भी है, जो लंबे इतिहास में बनी हैं।
हिमाचल का सुन्नम: छोटे गाँव में कई भाषाएँ
हिमाचल प्रदेश के किन्नौर ज़िले का सुन्नम गाँव बहुभाषी ग्रामीण जीवन का एक दिलचस्प उदाहरण है। यहाँ की स्थानीय भाषाओं पर भाषा-वैज्ञानिक अध्ययन हुए हैं। गाँव में सुनम (या सुनाम) भाषा और शुमचो जैसी अलग भाषाई परंपराएँ मिलती हैं। इनके साथ किन्नौरी, हिंदी और अंग्रेज़ी का संपर्क भी है, और बाहर से आए मज़दूरों की वजह से नेपाली और पश्चिमी पहाड़ी भाषाओं का ज़िक्र भी मिलता है।
खास बात यह है कि ये सारी भाषाएँ एक ही वजह से गाँव में नहीं आईं। कुछ भाषाएँ स्थानीय समुदायों की पुरानी विरासत हैं, कुछ आसपास के इलाकों से मेल-जोल के ज़रिए चलन में आईं और कुछ पढ़ाई और आज के प्रवास की वजह से पहुँचीं।
सुन्नम बताता है कि भाषाएँ ज़्यादा होने के लिए गाँव का बड़ा होना ज़रूरी नहीं। अगर अलग-अलग समुदाय अपनी मातृभाषा बचाए रखें और आपस में बात करने के लिए साझा भाषाएँ भी इस्तेमाल करें, तो छोटी आबादी में भी काफी विविधता बन सकती है। ऐसे गाँव में कोई व्यक्ति घर में अपनी मातृभाषा, पड़ोसी से दूसरी स्थानीय भाषा और बाहरी आदमी से हिंदी बोल सकता है, और स्कूल में अंग्रेज़ी से उसका वास्ता पड़ सकता है। इसका मतलब यह नहीं कि हर ग्रामीण सारी भाषाएँ बोलता है। अलग-अलग परिवार और हालात में अलग-अलग भाषाएँ काम आती हैं।
पूर्वोत्तर में इतनी भाषाएँ कैसे बनीं?
पूर्वोत्तर की भौगोलिक बनावट इसकी बड़ी कुंजी है। यहाँ ऊँचे पहाड़, गहरी घाटियाँ, घने जंगल और कई नदियाँ हैं। अलग-अलग समुदाय यहाँ बसे और उनके बीच मेल-जोल जगह और समय के हिसाब से कम-ज़्यादा रहा। कुछ समुदायों में नियमित व्यापार और शादी-ब्याह चलता रहा, जबकि कुछ बस्तियाँ लंबे समय तक अपेक्षाकृत अलग-थलग रहीं। ऐसे में भाषाओं की स्थानीय खूबियाँ बनी भी रहती हैं और बढ़ती भी हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी उच्चारण, शब्द, व्याकरण और वाक्य बनाने के ढंग में फर्क बढ़ सकता है।
पर हर स्थानीय फर्क को अलग भाषा कह देना भी ठीक नहीं। भाषा और बोली का फर्क सिर्फ भाषा की बनावट से तय नहीं होता। इसमें सामाजिक पहचान, इतिहास और समुदाय की अपनी मान्यता भी शामिल होती है।
अरुणाचल प्रदेश में आदि, न्यीशी, अपातानी, गालो, मिश्मी, मोनपा, वांचो और दूसरी भाषाई परंपराएँ हैं। नागालैंड में आओ, अंगामी, लोथा, कोन्याक, सुमी, चाखेसांग और कई और भाषाएँ बोली जाती हैं। इनमें से बहुत-सी भाषाओं का अपना अलग विकास रहा है। समुदायों के बीच बातचीत के लिए इलाके के हिसाब से हिंदी, असमिया, नागामीज़ या अंग्रेज़ी का इस्तेमाल हो सकता है।
इसलिए वहाँ की भाषाओं को सिर्फ बाहर से आए प्रवासियों का नतीजा समझना गलत होगा। वहाँ की विविधता का बड़ा हिस्सा स्थानीय समुदायों के लंबे इतिहास से जुड़ा है। जनगणना की नागालैंड और अरुणाचल की मातृभाषा तालिकाएँ इस विविधता का लिखित सबूत देती हैं।
किसी गाँव में भाषाएँ पहुँचने के पाँच रास्ते
1. पुरानी बसावट: दो या ज़्यादा समुदाय सदियों से साथ रहें, पर अपनी अलग भाषा बनाए रखें, तो गाँव अपने-आप बहुभाषी हो जाता है।
2. व्यापार और आना-जाना: जिन गाँवों से पुराने व्यापारिक रास्ते गुज़रते थे, वहाँ व्यापारी, कारीगर और यात्री दूसरी भाषाओं के शब्द और बोलने वाले लोग ले आते थे।
3. शादी-ब्याह और रिश्तेदारी: अलग भाषाई समुदायों में शादी होने पर बच्चे दो या ज़्यादा भाषाओं के बीच बड़े होते हैं।
4. प्रशासन, पढ़ाई और धार्मिक संस्थाएँ: स्कूल, सरकारी दफ्तर, धार्मिक आयोजन और स्थानीय बाज़ार अलग-अलग भाषाओं का इस्तेमाल करवाते हैं।
5. आज का प्रवास: रोज़गार, सड़क निर्माण, पर्यटन, खेती और व्यापार के लिए दूसरे इलाकों से आए परिवार अपनी भाषाएँ भी साथ लाते हैं।
यहाँ एक फर्क समझना ज़रूरी है। गाँव में दस भाषाएँ बोलने वाले लोगों का होना एक बात है, और हर ग्रामीण का दस भाषाएँ बोलना बिल्कुल दूसरी बात। पहला गाँव की भाषाई विविधता बताता है, दूसरा हर आदमी की अपनी बहुभाषी क्षमता। किसी गाँव का सही अध्ययन करने के लिए देखना होगा कि कितनी भाषाएँ मातृभाषा के रूप में बोली जाती हैं, कितनी संपर्क भाषा के रूप में, और कितने लोग एक से ज़्यादा भाषाएँ बोल लेते हैं।
सबसे बहुभाषी गाँव कैसे पहचाना जाए?
इसके लिए अलग, विस्तृत अध्ययन चाहिए, जिसमें देश के गाँवों की तुलना एक ही परिभाषा से हो। कुछ सवाल पहले तय करने होंगे: अगर किसी गाँव में सिर्फ दो लोग कोई भाषा जानते हैं, तो क्या उसे गाँव की भाषा गिना जाएगा? क्या प्रवासी मज़दूरों की अस्थायी मौजूदगी गिनी जाएगी? क्या एक ही भाषा की अलग बोलियों को अलग भाषा माना जाएगा? इनके जवाब तय किए बिना कोई भी राष्ट्रीय रैंकिंग वैज्ञानिक रूप से भरोसेमंद नहीं हो सकती।
सबसे बहुभाषी गाँव अभी एक अनसुलझा शोध-सवाल है
मौजूदा सरकारी आँकड़ों से भारत के सबसे ज़्यादा भाषाओं वाले गाँव का नाम पक्के तौर पर नहीं बताया जा सकता। हिमाचल का सुन्नम बहुभाषी गाँव का एक दर्ज किया हुआ उदाहरण है, और अरुणाचल व नागालैंड जैसे राज्यों में भाषाई विविधता की बड़ी और पुरानी परंपरा है। पर तुलनात्मक सर्वे के बिना इनमें से किसी एक गाँव को देश में पहला घोषित करना ठीक नहीं होगा।
इस सवाल की सबसे दिलचस्प बात यह है कि भारत की भाषाई विविधता सिर्फ बड़े शहरों की प्रवासी आबादी की खूबी नहीं है। दूर-दराज़ के गाँवों में भी अलग-अलग भाषाएँ पीढ़ियों से साथ रहती आई हैं। कुछ भाषाएँ परिवार और समुदाय की पहचान सँभालती हैं, तो कुछ व्यापार, पढ़ाई और मेल-जोल का ज़रिया बनती हैं।
असल कहानी यह नहीं कि किसी छोटी बस्ती में अचानक दर्जनों भाषाएँ आ गईं। असल कहानी यह है कि सदियों के प्रवास, समुदायों के मेल-जोल, अलग-अलग भाषाई परंपराओं और बदलते सामाजिक हालात ने कई गाँवों को भाषाओं का जीता-जागता संगम बना दिया।


