भारत में जन्मों की संख्या 50 साल पुराने स्तर पर, 2001 के शिखर से 20% की गिरावट

India Demographic Change: EAC-PM के नए कार्यपत्र के अनुसार भारत में सालाना जन्म 2001 के 2.93 करोड़ से घटकर 2023 में 2.32 करोड़ रह गए। कम प्रजनन दर से देश की जनसांख्यिकी तेजी से बदल रही है।

Newstrack Network
Published on: 22 Sept 2026 9:03 PM IST
India Birth Rate
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India Demographic Change: दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाले भारत में जनसांख्यिकी की दिशा तेजी से बदल रही है। देश की कुल जनसंख्या अभी बढ़ रही है, लेकिन हर साल जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या अपने शिखर से लगातार नीचे आ रही है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के नए कार्यपत्र ‘द घोस्ट ऑफ पॉपुलेशन पास्ट: हाउ पॉपुलेशन कंट्रोल पर्सिस्ट्स इन इंडिया’ के अनुसार भारत में सालाना जन्मों की संख्या वर्ष 2001 में लगभग 2.93 करोड़ के शिखर पर पहुंची थी, जो 2023 में घटकर करीब 2.32 करोड़ रह गई। यानी 22 वर्षों में सालाना जन्म लगभग 61 लाख कम हुए और गिरावट करीब 20.8 प्रतिशत रही। सबसे उल्लेखनीय तथ्य यह है कि भारत में अब एक वर्ष में लगभग उतने ही बच्चे पैदा हो रहे हैं जितने करीब आधी सदी पहले 1974 में होते थे। अंतर यह है कि उस समय भारत की कुल आबादी आज की तुलना में बहुत कम थी, जबकि आज करीब डेढ़ अरब की आबादी के बावजूद सालाना जन्मों की संख्या वापस उसी स्तर पर आ गई है।

यह कार्यपत्र प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल, परिषद की निदेशक आकांक्षा अरोड़ा और सलाहकार विराट सिंह ने तैयार किया है। इसका केंद्रीय तर्क यह है कि भारत की जनसांख्यिकीय वास्तविकता बदल चुकी है और नीति-निर्माण को अब उस दौर की सोच से बाहर निकलना चाहिए जब तेज जनसंख्या वृद्धि सबसे बड़ी चिंता थी। कार्यपत्र के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर यानी एक महिला द्वारा अपने जीवनकाल में जन्म दिए जाने वाले बच्चों की औसत अनुमानित संख्या अब 1.9 है, जो आबादी को दीर्घकाल में स्थिर रखने के लिए सामान्यतः माने जाने वाले लगभग 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर से नीचे है। हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अलग-अलग आधिकारिक स्रोतों और सर्वेक्षणों की अवधि तथा पद्धति के कारण आंकड़ों में मामूली अंतर है। EAC-PM का कार्यपत्र राष्ट्रीय प्रजनन दर 1.9 बताता है, जबकि नवीनतम NFHS-6 इसे करीब 2.0 बताता है। दोनों स्रोतों का व्यापक संदेश एक ही है-भारत राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्थापन प्रजनन दर के आसपास या उससे नीचे पहुंच चुका है।

2.93 करोड़ से 2.32 करोड़, हर साल 61 लाख कम जन्म

जन्मों की संख्या में आया बदलाव भारत की जनसंख्या कहानी को समझने का सबसे सीधा पैमाना है। 2001 में लगभग 2.93 करोड़ बच्चों के जन्म के बाद संख्या धीरे-धीरे नीचे आई और 2023 में लगभग 2.32 करोड़ रह गई। इसका अर्थ है कि आज भारत में हर साल 2001 की तुलना में लगभग 61 लाख कम बच्चे पैदा हो रहे हैं। यह गिरावट किसी एक वर्ष की असामान्य घटना नहीं बल्कि लंबे समय से चल रहे प्रजनन संक्रमण का परिणाम है। परिवार छोटे हुए हैं, विवाह और पहले बच्चे की उम्र कई हिस्सों में बढ़ी है, महिलाओं की शिक्षा और शहरीकरण बढ़ा है, गर्भनिरोधक साधनों तक पहुंच बेहतर हुई है और बच्चों के पालन-पोषण तथा शिक्षा की लागत भी परिवार के आकार से जुड़े फैसलों को प्रभावित कर रही है।

1974 से तुलना इस बदलाव को और स्पष्ट करती है। लगभग 50 वर्ष पहले भारत की आबादी करीब 60 करोड़ के आसपास थी और सालाना जन्म लगभग 2.3 करोड़ के स्तर पर थे। आज आबादी उससे दोगुने से भी अधिक हो चुकी है, लेकिन जन्मों की संख्या फिर करीब 2.32 करोड़ पर आ गई है। इसका अर्थ यह है कि कुल आबादी के अनुपात में जन्म दर बहुत तेजी से गिरी है। इसलिए केवल भारत की विशाल आबादी देखकर यह मान लेना कि देश में बच्चों की संख्या भी लगातार उसी अनुपात में बढ़ रही है, अब वास्तविकता से मेल नहीं खाता।

फिर आबादी क्यों बढ़ रही है

प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर से नीचे आने और जन्मों की संख्या घटने का यह अर्थ नहीं है कि भारत की कुल आबादी तत्काल घटने लगेगी। इसका सबसे बड़ा कारण जनसंख्या जड़त्व है। भारत में प्रजनन आयु में प्रवेश करने वाले लोगों की संख्या अभी बहुत बड़ी है। यदि प्रत्येक परिवार में बच्चों की औसत संख्या कम भी हो जाए तो माता-पिता बनने वाली पीढ़ी का आकार इतना बड़ा है कि कुल जन्मों की संख्या काफी समय तक ऊंची बनी रह सकती है। साथ ही मृत्यु की औसत आयु बढ़ने से अधिक लोग लंबे समय तक जीवित रहते हैं। इसलिए जन्म घटने के बावजूद कुछ समय तक कुल जनसंख्या बढ़ती रह सकती है।

इसे सरल उदाहरण से समझें तो यदि पिछली पीढ़ी में एक करोड़ परिवार चार-चार बच्चे पैदा करते थे और अगली पीढ़ी में दो करोड़ परिवार दो-दो बच्चे पैदा करें, तो प्रति परिवार प्रजनन आधा होने के बावजूद कुल जन्म समान रह सकते हैं। भारत में पिछले दशकों की बड़ी युवा आबादी अब विवाह और प्रजनन आयु में है। इसी वजह से कम प्रजनन दर का पूरा प्रभाव कुल आबादी पर आने में कई दशक लगते हैं। संयुक्त राष्ट्र के जनसंख्या अनुमानों में भी भारत की आबादी के तत्काल घटने के बजाय आने वाले दशकों तक बढ़ने और उसके बाद स्थिर होकर गिरने की दिशा में जाने का अनुमान लगाया गया है।

यूपी और बिहार को हटा दें तो प्रजनन दर 1.6

भारत की जनसांख्यिकीय कहानी का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू राज्यों के बीच बहुत बड़ा अंतर है। EAC-PM के कार्यपत्र के अनुसार राष्ट्रीय कुल प्रजनन दर 1.9 है, लेकिन यदि उत्तर प्रदेश और बिहार को गणना से बाहर कर दिया जाए तो शेष भारत की प्रजनन दर केवल 1.6 रह जाती है। कार्यपत्र ने इसकी तुलना उत्तरी यूरोप के करीब 1.5 और अमेरिका के लगभग 1.6 से की है। इसका अर्थ है कि भारत का बड़ा हिस्सा अब उस जनसांख्यिकीय अवस्था में पहुंच चुका है जिसे अभी तक मुख्य रूप से विकसित और उम्रदराज होती अर्थव्यवस्थाओं से जोड़ा जाता था।

यह तुलना उत्तर प्रदेश और बिहार के महत्व को भी सामने लाती है। दोनों राज्य भारत की विशाल आबादी का बड़ा हिस्सा रखते हैं और यहां प्रजनन दर दूसरे अनेक बड़े राज्यों की तुलना में अब भी अधिक है। इसलिए राष्ट्रीय औसत को ये राज्य ऊपर बनाए हुए हैं। इसका दूसरा पहलू यह है कि भविष्य में भारत के भीतर श्रम शक्ति की भौगोलिक संरचना बदल सकती है। कम प्रजनन वाले दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों में युवा श्रमिकों की उपलब्धता अपेक्षाकृत जल्दी कम हो सकती है, जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे अपेक्षाकृत युवा राज्यों से कामकाजी आबादी का बड़ा हिस्सा निकल सकता है। इससे राज्यों के बीच श्रम प्रवासन का महत्व और बढ़ सकता है।

केरल-तमिलनाडु 1.3, दिल्ली 1.2 और सिक्किम सिर्फ 1.0

कुछ राज्यों में प्रजनन दर यूरोप और पूर्वी एशिया के कम प्रजनन वाले देशों के स्तर तक पहुंच चुकी है। EAC-PM के कार्यपत्र के अनुसार केरल और तमिलनाडु की TFR 1.3, आंध्र प्रदेश की 1.4, तेलंगाना और कर्नाटक की 1.5 है। पश्चिम बंगाल में भी यह 1.3, पंजाब और महाराष्ट्र में 1.4, हिमाचल प्रदेश में 1.5, गोवा में 1.6 और दिल्ली में केवल 1.2 है। सिक्किम में यह आंकड़ा 1.0 तक पहुंच चुका है। इनमें से कई राज्य दो दशक से अधिक समय से प्रतिस्थापन स्तर से नीचे हैं।

इसी कारण देश के भीतर उम्र की संरचना भी अलग होने लगी है। कार्यपत्र के अनुसार जनसांख्यिकीय रूप से आगे निकल चुके कई राज्यों की औसत मध्य आयु लगभग 35 वर्ष तक पहुंच रही है, जबकि पूरे भारत की मध्य आयु करीब 30 वर्ष है। तुलना के लिए अमेरिका की मध्य आयु करीब 39 वर्ष बताई गई है। यानी भारत को अब एक समान युवा देश मानकर जनसंख्या नीति बनाना धीरे-धीरे कठिन होगा। एक राज्य को अभी मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, विद्यालय और युवाओं के रोजगार पर अधिक संसाधन लगाने पड़ सकते हैं, जबकि दूसरे राज्य में बुजुर्ग आबादी, स्वास्थ्य सेवा, पेंशन और दीर्घकालीन देखभाल बड़ी चुनौती बनने लगेगी।

आर्थिक सलाहकार परिषद ने कहा, अब ‘जनसंख्या नियंत्रण’ की सोच बदलने का समय

कार्यपत्र का सबसे महत्वपूर्ण नीतिगत हिस्सा केवल जन्म और प्रजनन दर के आंकड़े नहीं बल्कि उनसे निकाला गया सुझाव है। लेखकों का तर्क है कि भारत को अब जनसंख्या नियंत्रण को अपने आप में सरकारी नीति का लक्ष्य मानने पर पुनर्विचार करना चाहिए। कार्यपत्र ने नसबंदी से जुड़े कुछ प्रोत्साहनों, परिवार का आकार सीमित करने से जुड़े भुगतान, ‘दो बच्चे’ जैसी अयोग्यता शर्तों और जनसंख्या नियंत्रण की भाषा को नीति से हटाने की सिफारिश की है। इसके अनुसार नसबंदी कराने वालों को मिलने वाले प्रत्यक्ष लाभ, मजदूरी नुकसान की भरपाई से जुड़े कुछ भुगतान तथा इसे बढ़ावा देने वाले प्रोत्साहनों की भी समीक्षा होनी चाहिए।

लेकिन इस सिफारिश का अर्थ परिवार नियोजन अथवा गर्भनिरोधक सेवाएं बंद करना नहीं है। कार्यपत्र ने स्पष्ट किया है कि वह स्वास्थ्य, जन्म के बीच पर्याप्त अंतर और व्यक्तिगत पसंद के लिए परिवार नियोजन के खिलाफ नहीं है। उसका तर्क केवल इतना है कि प्रजनन दर को और नीचे ले जाना अब अपने आप में राष्ट्रीय नीति का लक्ष्य नहीं होना चाहिए। लेखकों ने दूसरे देशों के अनुभव के आधार पर चेतावनी दी है कि एक बार बहुत कम प्रजनन दर सामाजिक व्यवहार और पारिवारिक मानदंडों का हिस्सा बन जाए तो उसे दोबारा ऊपर लाना बेहद कठिन हो सकता है।

कम बच्चे केवल जनसंख्या का नहीं, अर्थव्यवस्था का भी सवाल

आज पैदा होने वाले बच्चे करीब दो दशक बाद भारत की नई श्रम शक्ति का हिस्सा बनेंगे। इसलिए 2001 से 2023 के बीच सालाना जन्मों में लगभग 61 लाख की कमी का वास्तविक आर्थिक प्रभाव तत्काल नहीं बल्कि आने वाले दशकों में दिखाई देगा। पहले विद्यालयों में बच्चों की संख्या और शिक्षा ढांचे की मांग बदलेगी, उसके बाद कॉलेज और उच्च शिक्षा में प्रवेश करने वालों की संख्या प्रभावित होगी और अंततः श्रम बाजार में आने वाली नई पीढ़ी छोटी होने लगेगी। यदि अर्थव्यवस्था की उत्पादकता तेजी से बढ़ती है तो छोटी युवा पीढ़ी अपने आप संकट नहीं है, लेकिन यदि उत्पादकता, तकनीक और सामाजिक सुरक्षा पर्याप्त तेजी से नहीं बढ़े तो कम कामकाजी लोगों को अधिक बुजुर्ग आबादी का आर्थिक भार उठाना पड़ सकता है।

दूसरी ओर कम प्रजनन दर के कुछ सकारात्मक आर्थिक प्रभाव भी हो सकते हैं। परिवार में बच्चों की संख्या कम होने पर प्रति बच्चे शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण पर अधिक खर्च संभव होता है। महिलाओं के लिए लगातार गर्भधारण और बच्चों की देखभाल का बोझ कम होने से उनकी शिक्षा और रोजगार में भागीदारी बढ़ सकती है। इसी प्रक्रिया को जनसांख्यिकीय लाभांश से जोड़ा जाता है-जब आश्रित बच्चों की संख्या घटती है और कामकाजी उम्र की आबादी का अनुपात बढ़ता है। भारत अभी इस लाभांश के महत्वपूर्ण दौर में है, लेकिन यह स्थायी नहीं है। आज का कम बाल आश्रित अनुपात कुछ दशक बाद अधिक वृद्ध आश्रित अनुपात में बदल सकता है।

बुजुर्गों की देखभाल बनेगी अगली बड़ी चुनौती

कम प्रजनन दर का एक सामाजिक प्रभाव परिवार के आकार पर पड़ेगा। जिस परिवार में पहले चार या पांच भाई-बहन होते थे, वहां बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल की जिम्मेदारी कई लोगों में बंट सकती थी। एक या दो बच्चों वाले परिवारों में यह जिम्मेदारी बहुत छोटे परिवार पर केंद्रित होगी। इसके साथ यदि युवा रोजगार के लिए दूसरे शहर या देश में चले जाएं तो पारंपरिक संयुक्त परिवार आधारित वृद्ध देखभाल व्यवस्था कमजोर हो सकती है। EAC-PM स्वयं अपनी देखभाल अर्थव्यवस्था से जुड़ी रिपोर्टों में घटती प्रजनन दर, बढ़ती बुजुर्ग आबादी और तेजी से हो रहे शहरीकरण को भारत के सामने उभरती हुई सामाजिक-आर्थिक चुनौती मान चुका है।

इस बदलाव का असर स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी पड़ेगा। युवा आबादी वाले समाज में मातृ स्वास्थ्य, टीकाकरण, संक्रामक रोग और बाल स्वास्थ्य की मांग अधिक होती है, जबकि उम्रदराज समाज में मधुमेह, हृदय रोग, कैंसर, तंत्रिका संबंधी बीमारियां, हड्डियों की समस्या और दीर्घकालीन देखभाल का भार बढ़ता है। इसलिए भारत के लिए जनसंख्या नीति का प्रश्न अब केवल ‘कितने लोग होंगे’ नहीं बल्कि ‘किस उम्र के कितने लोग होंगे’ बनता जा रहा है।

भारत में एक नहीं, कई जनसांख्यिकीय वास्तविकताएं

देश की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि जनसांख्यिकीय परिवर्तन सभी राज्यों में एक गति से नहीं हो रहा। दक्षिण और पश्चिम के कई राज्य कम प्रजनन तथा बढ़ती उम्र की आबादी के चरण में पहुंच चुके हैं, जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों के पास अभी बड़ी युवा आबादी और अपेक्षाकृत ऊंची प्रजनन दर है। इसका असर रोजगार, आंतरिक प्रवासन, स्वास्थ्य, शिक्षा और केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों तक पड़ेगा। आने वाले वर्षों में भारत की नई श्रम शक्ति का बढ़ता हिस्सा उत्तर और मध्य भारत से आ सकता है, जबकि दक्षिण और पश्चिम के अधिक विकसित औद्योगिक राज्यों में श्रमिकों की मांग बनी रह सकती है। ऐसे में अंतरराज्यीय प्रवासन केवल रोजगार का विषय नहीं बल्कि भारत की जनसांख्यिकीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।

EAC-PM के कार्यपत्र का सबसे बड़ा संदेश इसलिए यह नहीं है कि भारत की आबादी घटने लगी है-ऐसा अभी नहीं हुआ है। महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि आबादी को भविष्य में बढ़ाने वाली बुनियादी शक्ति, यानी जन्मों की संख्या, पहले ही कमजोर होने लगी है। 2001 के 2.93 करोड़ सालाना जन्मों से 2023 के 2.32 करोड़ तक की गिरावट और जन्मों का 1974 के स्तर पर लौटना भारत के जनसांख्यिकीय इतिहास का बड़ा मोड़ है। आज देश के सामने चुनौती अत्यधिक जन्मों को कम करने की पुरानी बहस से आगे बढ़कर यह तय करने की है कि घटते जन्म, छोटी होती भावी श्रम शक्ति और बढ़ती बुजुर्ग आबादी के बीच शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, पेंशन और देखभाल की व्यवस्था को किस तरह नए जनसांख्यिकीय भारत के अनुरूप बनाया जाए।

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