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India Poverty Rate 2028: 2028 तक भारत में कितनी कम हो जाएगी गरीबी? वर्ल्ड बैंक के आंकड़ों ने चौंकाया
India Poverty Rate 2028: वर्ल्ड बैंक के अनुमान के मुताबिक, भारत में 4.20 डॉलर प्रतिदिन की गरीबी सीमा से नीचे रहने वाली आबादी का अनुपात 2026 के 14.2% से घटकर 2028 तक 12.1% हो सकता है। जानिए 2011 से 2023 तक गरीबी में कितनी कमी आई और आगे क्या हैं चुनौतियां।
India Poverty Rate 2028: World Bank Estimates Further Decline in Poverty
India Poverty Rate 2028: कभी सोने की चिड़िया कहे जा भारत में गरीबी लंबे समय से एक बड़ी चुनौती रही है। एक दौर था, जब देश की बड़ी आबादी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष करती थी। लेकिन पिछले एक दशक में इस तस्वीर में काफी बदलाव आया है। करोड़ों लोग गरीबी से बाहर निकले हैं और लोगों की खर्च करने की क्षमता में भी सुधार हुआ है। अब वर्ल्ड बैंक के अनुमान ने एक बार फिर उम्मीद जगाई है कि आने वाले वर्षों में भारत में गरीबी का स्तर और कम हो सकता है।
वर्ल्ड बैंक के अक्टूबर 2026 के अनुमानों के मुताबिक, भारत में प्रतिदिन 4.20 डॉलर की अंतरराष्ट्रीय गरीबी सीमा से नीचे रहने वाली आबादी का अनुपात 2026 में 14.2 प्रतिशत से घटकर 2028 तक 12.1 प्रतिशत हो सकता है। भारतीय मुद्रा में 4.20 डॉलर की राशि करीब 370 रुपये के आसपास बैठती है। यह अनुमान गरीबी में संभावित गिरावट का संकेत देता है, लेकिन इसके साथ यह सवाल भी उतरा है कि आखिर भारत में गरीबी कितनी कम हुई है और अभी कितनी चुनौतियां बाकी हैं।
2011 में 57.7 प्रतिशत थी गरीबी, 2023 में घटकर 16.1 प्रतिशत रह गई
वर्ल्ड बैंक के आंकड़ों के अनुसार, भारत में पिछले 12 वर्षों के दौरान गरीबी के स्तर में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। वर्ष 2011 में देश की 57.7 प्रतिशत आबादी 4.20 डॉलर प्रतिदिन वाली अंतरराष्ट्रीय गरीबी सीमा से नीचे थी। वर्ष 2023 में यह अनुपात घटकर 16.1 प्रतिशत रह गया। इस अवधि में करीब 49.6 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकले।
यह बदलाव भारत की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में आए परिवर्तन को दिखाता है। हालांकि, गरीबी से बाहर निकलने का अर्थ यह नहीं है कि इन सभी लोगों की आर्थिक स्थिति पूरी तरह मजबूत हो गई है। कई परिवार अब भी सीमित आमदनी में गुजारा करते हैं और अचानक आने वाले खर्च, बीमारी या रोजगार छिनने जैसी परिस्थितियां उन्हें दोबारा आर्थिक संकट में डाल सकती हैं।
अत्यधिक गरीबी में भी आई बड़ी गिरावट
भारत में अत्यधिक गरीबी के आंकड़ों में भी उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है। वर्ल्ड बैंक की 3 डॉलर प्रतिदिन वाली अंतरराष्ट्रीय गरीबी सीमा के आधार पर वर्ष 2011 में भारत की 27.1 प्रतिशत आबादी अत्यधिक गरीबी की स्थिति में थी। बाद के वर्षों में इसमें तेज गिरावट आई। वर्ल्ड बैंक के संशोधित आंकड़ों में 2022-23 के दौरान अत्यधिक गरीबी का अनुपात लगभग 2.3 प्रतिशत बताया गया है।
अत्यधिक गरीबी कम होने का मतलब है कि बेहद कम संसाधनों के सहारे जीवन गुजारने वाले लोगों की संख्या में कमी आई है। इसके बावजूद भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षित आवास जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा करना अनेक परिवारों के लिए चुनौती बना हुआ है।
2028 तक गरीबी घटने का अनुमान क्यों है महत्वपूर्ण?
वर्ल्ड बैंक के अनुमान के मुताबिक, 4.20 डॉलर प्रतिदिन की गरीबी सीमा से नीचे रहने वाली आबादी का अनुपात 2026 में 14.2 प्रतिशत से घटकर 2028 तक 12.1 प्रतिशत हो सकता है। यानी दो वर्षों में गरीबी दर में 2.1 प्रतिशत अंक की कमी आने की संभावना है। देश की आर्थिक वृद्धि, रोजगार के अवसर, महंगाई और लोगों की वास्तविक क्रय शक्ति जैसे कारक भविष्य में गरीबी की स्थिति को प्रभावित कर सकते हैं। अगर रोजगार बढ़ता है और आमदनी में सुधार होता है, तो ज्यादा परिवार गरीबी की सीमा से ऊपर आ सकते हैं। दूसरी तरफ, महंगाई बढ़ने या रोजगार के अवसर कमजोर पड़ने से परिवारों की आर्थिक स्थिति पर दबाव भी पड़ सकता है।
साथ ही यह समझना भी जरूरी है कि अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा की गणना में वर्ल्ड बैंक क्रय शक्ति क्षमता यानी परचेजिंग पावर पैरिटी का इस्तेमाल करता है। इसका उद्देश्य अलग-अलग देशों में वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों के अंतर को ध्यान में रखना है। इसलिए डॉलर की राशि को सामान्य बाजार विनिमय दर से भारतीय रुपये में बदल देना गरीबी मापने का पूरा तरीका नहीं है।
रोजगार बढ़ने से परिवारों की आर्थिक स्थिति में हुआ सुधार
गरीबी कम होने के पीछे रोजगार के अवसरों और परिवारों की आमदनी में सुधार को महत्वपूर्ण माना जाता है। जब परिवार के अधिक सदस्यों को काम मिलता है, तो घर की कुल आय बढ़ती है। इससे भोजन, बच्चों की पढ़ाई, इलाज और दूसरी जरूरी जरूरतों पर खर्च करना आसान हो सकता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की आर्थिक गतिविधियों में बढ़ती भागीदारी भी इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण पहलू है। खेती, स्वरोजगार, छोटे कारोबार और अन्य आय अर्जित करने वाले कामों से जुड़ने पर महिलाएं परिवार की आमदनी बढ़ाने में योगदान दे सकती हैं। इससे आर्थिक रूप से परिवार की निर्भरता केवल एक कमाने वाले सदस्य पर नहीं रहती। कम वेतन, अनियमित काम और सामाजिक सुरक्षा की कमी के कारण कई परिवारों की आर्थिक स्थिति अब भी अस्थिर बनी रह सकती है। इसलिए गरीबी को लंबे समय तक कम रखने के लिए स्थायी रोजगार और बेहतर आमदनी के अवसर जरूरी हैं।
सरकारी योजनाओं ने भी कम किया आर्थिक बोझ
गरीबी कम करने में सरकारी योजनाओं की भूमिका को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। खाद्यान्न सहायता, सामाजिक सुरक्षा योजनाएं और दूसरी कल्याणकारी सुविधाएं कम आय वाले परिवारों को जरूरी खर्च पूरा करने में मदद करती हैं। जब किसी परिवार को भोजन जैसी बुनियादी जरूरतों पर कम खर्च करना पड़ता है, तो उसके पास शिक्षा, इलाज और दूसरी जरूरतों के लिए कुछ संसाधन बच सकते हैं।
8.30 डॉलर वाली गरीबी सीमा से सामने आती है दूसरी तस्वीर
भारत में गरीबी की स्थिति को समझने के लिए अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय गरीबी सीमाओं को देखना भी जरूरी है। वर्ल्ड बैंक की 8.30 डॉलर प्रतिदिन वाली सीमा के आधार पर वर्ष 2023 में भारत की करीब 80 प्रतिशत आबादी इस स्तर से नीचे थी।
इसका मतलब यह है कि अधिक ऊंची अंतरराष्ट्रीय गरीबी सीमा के आधार पर बड़ी आबादी का उपभोग स्तर उस सीमा तक नहीं पहुंचता। इससे पता चलता है कि अत्यधिक गरीबी में गिरावट के बावजूद बड़ी संख्या में लोगों की आमदनी और खर्च करने की क्षमता सीमित हो सकती है।
गरीबी की अलग-अलग सीमाएं इस बात को सामने लाती हैं कि आर्थिक सुधार का आकलन केवल एक आंकड़े से नहीं किया जा सकता। बेहद गरीब लोगों की संख्या घटना महत्वपूर्ण है, लेकिन यह भी देखना होगा कि कितने परिवार बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और स्थायी रोजगार तक पहुंच बना पा रहे हैं।
गरीबी के आंकड़ों में बदलाव को समझना भी जरूरी
गरीबी के आंकड़े घरेलू उपभोग सर्वेक्षणों, आंकड़े जुटाने के तरीकों और इस्तेमाल की गई गरीबी रेखा पर निर्भर करते हैं। वर्ल्ड बैंक ने 2025 में अपनी अंतरराष्ट्रीय गरीबी सीमाओं को संशोधित किया था। इसलिए अलग-अलग वर्षों के आंकड़ों की तुलना करते समय यह देखना जरूरी है कि उनमें कौन-सी गरीबी सीमा और कौन-सा आधार इस्तेमाल किया गया है।
इसके अलावा, आर्थिक असमानता भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। देश में गरीबी कम होने के बावजूद सभी परिवारों की आमदनी एक समान गति से नहीं बढ़ती। कुछ परिवार तेजी से आर्थिक रूप से मजबूत होते हैं, जबकि दूसरे परिवार सीमित आय के कारण बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में ही अपनी कमाई खर्च कर देते हैं। इसलिए गरीबी के साथ-साथ आय और अवसरों के अंतर पर भी ध्यान देना जरूरी है।
2028 तक क्या बदल सकती है भारत की तस्वीर?
कुल मिलाकर, वर्ल्ड बैंक के आंकड़े भारत में गरीबी कम होने की दिशा में हुई प्रगति को दिखाते हैं। वर्ष 2011 से 2023 के बीच करोड़ों लोगों का गरीबी से बाहर निकलना एक बड़ा बदलाव है। वहीं, 2028 तक गरीबी दर 12.1 प्रतिशत होने का अनुमान बताता है कि आने वाले वर्षों में भी सुधार की संभावना बनी हुई है। लेकिन असली चुनौती केवल गरीबी दर को कम करना नहीं, बल्कि लोगों की आर्थिक स्थिति को स्थायी रूप से मजबूत बनाना है। इसके लिए बेहतर रोजगार, महिलाओं की आर्थिक भागीदारी, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं और सरकारी योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन महत्वपूर्ण होगा। गरीबी में कमी निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत है, लेकिन इस प्रगति का वास्तविक महत्व तभी बढ़ेगा, जब देश के कमजोर वर्गों तक विकास का लाभ पहुंचे और ज्यादा परिवार सम्मानजनक जीवन जीने की स्थिति में आ सकें।


