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अमेरिका से दोस्ती, रूस से यारी...भारत ने दुनिया को कैसे दिखाया ‘अपना रास्ता’? मोदी-पुतिन की दोस्ती का बड़ा राज
BRICS summit India-Russia: भारत और रूस के रिश्तों की कहानी सिर्फ 1947 से शुरू नहीं होती। अफानासी निकितिन से लेकर मोदी-पुतिन की दोस्ती, 1971 की संधि, रक्षा सहयोग, ब्रिक्स और रणनीतिक स्वायत्तता तक जानिए कैसे भारत-रूस साझेदारी ने बदलती वैश्विक राजनीति के बीच अपनी खास जगह बनाई।
BRICS summit India-Russia: नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में रूस एक ऐसा साथी बनकर उभरा है, जिसकी भारत के साथ साझीदारी वक्त के साथ और अधिक मजबूत हुई है। दुनिया के बदलते राजनीतिक हालात के बावजूद इस रिश्ते ने अपनी रणनीतिक गहराई को कभी नहीं खोया। भारत और रूस के संबंधों की जड़ें 13 अप्रैल 1947 को राजनयिक संबंध स्थापित होने से भी बहुत पुरानी हैं। भारत रूस को किसी पश्चिम-विरोधी गुट के हिस्से के रूप में नहीं, बल्कि ब्रिक्स के भीतर एक विश्वसनीय और व्यावहारिक साझेदार के रूप में देखता है। यह संबंध दिखाता है कि अलग-अलग विदेश नीतियों वाले दो देश भी आपसी हित और समझ के साथ लंबे समय तक एक मजबूत सहयोग कायम रख सकते हैं।
सदियों पुराना है दोनों देशों के बीच इंसानी और व्यापारिक रिश्ता
भारत और रूस के बीच यह जुड़ाव आधुनिक दौर की देन नहीं है। साल 1469 में रूसी व्यापारी अफानासी निकितिन भारत आए थे और उन्होंने बीदर में तीन साल बिताए थे। उनकी यात्रा वृत्तांत 'जर्नी बियॉन्ड द थ्री सीज' भारत पर लिखी गई पहली रूसी किताब बनी। 17वीं शताब्दी में गुजराती व्यापारियों ने वोल्गा नदी के किनारे अस्त्रखान में एक समृद्ध समुदाय बनाया, जो रूसी जार को बेहतरीन कपड़े आपूर्ति करता था। 19वीं सदी के मध्य तक रूस के तीन प्रमुख विश्वविद्यालयों में संस्कृत भाषा पढ़ाई जाने लगी थी। 1890 के दशक में व्लादिमीर हाफकाइन ने बॉम्बे में हैजा और प्लेग के टीकों का विकास किया, जिसने लाखों भारतीयों की जान बचाई। इसके अलावा लियो टॉल्स्टॉय और महात्मा गांधी के बीच हुए पत्राचार ने भारत के अहिंसक स्वतंत्रता संग्राम को बहुत प्रभावित किया।
आजादी के बाद से 1971 की ऐतिहासिक संधि तक का सफर
साल 1947 में भारत की आजादी के बाद दोनों देशों के रिश्ते अधिक व्यावहारिक और टिकाऊ साझेदारी में बदल गए। सोवियत संघ की मदद से भारत के औद्योगीकरण को नई दिशा मिली, जिसका सबसे बड़ा प्रतीक भिलाई स्टील प्लांट था। रक्षा के क्षेत्र में दोनों देशों का सहयोग लगातार आगे बढ़ता रहा। साल 1971 में हुई 'भारत-सोवियत शांति, मित्रता और सहयोग संधि' ने इस रिश्ते को नई रणनीतिक ऊंचाई दी। 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान सोवियत नौसेना की मौजूदगी और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सोवियत संघ द्वारा बार-बार इस्तेमाल किए गए वीटो ने पश्चिमी ताकतों के हस्तक्षेप को रोकने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी।
सोवियत संघ के विघटन के बाद भी मजबूत रही रणनीतिक साझेदारी
साल 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद भी दोनों देशों के संबंधों की मूल भावना बरकरार रही। इसके बाद 1993 में मित्रता संधि और 1994 में बहुलवादी राज्यों के हितों पर मास्को घोषणापत्र जारी हुआ। जब भारत ने 1998 में परमाणु परीक्षण किया, तब रूस ने भारत के फैसले का पूरा समर्थन किया। साल 2000 में रूस भारत का पहला रणनीतिक साझेदार बना और 2010 में इस रिश्ते को "विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझीदारी" का दर्जा दिया गया। दोनों देशों के बीच एक अनोखी राजनीतिक सहमति है, जिसके तहत दोनों देशों की हर राजनीतिक पार्टी इस रिश्ते का सम्मान करती है।
ट्राइंगल से ब्रिक और फिर ब्रिक्स बनने का सफर
दिसंबर 1998 में रूस के प्रधानमंत्री येवगेनी प्राइमाकोव ने रूस-भारत-चीन (आरआईसी) त्रिकोण का विचार रखा था। इसके बाद 2002 से विदेश मंत्रियों की वार्षिक बैठकें शुरू हुईं, जिसने बाद में ब्रिक समूह का रूप लिया। 20 सितंबर 2006 को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के इतर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की पहल पर ब्रिक की पहली बैठक हुई थी। ब्राजील द्वारा आयोजित उस शुरुआती बैठक में ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक वित्तीय सुधार और पश्चिम एशिया जैसे मुद्दों पर बात हुई थी। 20 साल बाद आज वही ब्रिक बढ़कर 'ब्रिक्स' बन चुका है, जिसमें 11 प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं। यह समूह दुनिया की लगभग आधी आबादी और वैश्विक जीडीपी के 40 फीसदी हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है।
पीएम मोदी और पुतिन का आपसी विश्वास और विजन
18वें ब्रिक्स सम्मेलन से ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच द्विपक्षीय मुलाकात हुई। दोनों नेताओं की यह इस साल की दूसरी और कुल मिलाकर 24वीं मुलाकात थी। दोनों नेताओं के बीच व्यापार, ऊर्जा, अंतरिक्ष, रक्षा और जन-जन के जुड़ाव पर विस्तार से चर्चा हुई। पीएम मोदी और पुतिन के बीच का यह व्यक्तिगत जुड़ाव 2001 में शुरू हुआ था, जब गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री के रूप में पीएम मोदी तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ मास्को गए थे। आज दोनों देशों के बीच सुखोई लड़ाकू विमान, टी-90 टैंक, एस-400 वायु रक्षा प्रणाली और ब्रह्मोस मिसाइल जैसे बड़े रक्षा प्रोजेक्ट्स पर काम हो रहा है, जबकि कुडनकुलम में परमाणु ऊर्जा सहयोग लगातार जारी है।
भारत की संप्रभुता और रणनीतिक स्वायत्तता की नई मिसाल
आज के दौर में भारत-रूस संबंधों की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह अमेरिका, यूरोप और जापान के साथ भारत के बढ़ते रिश्तों के आड़े नहीं आता। यह भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' को दर्शाता है, जिसमें भारत अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार किसी भी महाशक्ति के साथ मिलकर काम करने के लिए स्वतंत्र है। भारत के लिए रूस और अमेरिका के साथ रिश्ते किसी एक के नुकसान पर दूसरे का फायदा वाला सौदा नहीं हैं। भारत का मानना है कि ब्रिक्स कोई पश्चिम-विरोधी मंच नहीं है, बल्कि यह एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के निर्माण की दिशा में एक सकारात्मक कदम है, जहाँ भारत अपने हितों को सर्वोपरि रखते हुए वैश्विक मंच पर मजबूती से खड़ा है।


