US-China Science War: विश्व विज्ञान की नई जंग, भारत के लिए सबक—क्या तीसरा वैज्ञानिक मॉडल संभव है?

US-China Science War: क्या भारत बनेगा तीसरी वैज्ञानिक महाशक्ति?

Yogesh Mishra
Published on: 23 July 2026 7:38 PM IST
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US-China Science War: अमेरिका और चीन के बीच चल रही वैज्ञानिक प्रतिस्पर्धा को केवल दो महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता मानना भारत जैसी उभरती हुई शक्ति के लिए एक बड़ी भूल होगी। वस्तुतः यह प्रतिस्पर्धा भारत के लिए एक ऐतिहासिक अवसर भी है। इतिहास में ऐसे क्षण बहुत कम आते हैं जब विश्व व्यवस्था पुनर्गठित हो रही हो, नई प्रौद्योगिकियाँ पुरानी आर्थिक संरचनाओं को बदल रही हों और स्थापित महाशक्तियाँ स्वयं परिवर्तन के दौर से गुजर रही हों। आज का समय ठीक वैसा ही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम कंप्यूटिंग, जैव-प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, उन्नत ऊर्जा, सेमीकंडक्टर, साइबर सुरक्षा और रोबोटिक्स मिलकर औद्योगिक क्रांति के एक नए चरण का निर्माण कर रहे हैं। इस परिवर्तन में जो देश समय रहते निवेश करेगा, वही अगले पचास वर्षों तक वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित करेगा। इसलिए भारत के सामने प्रश्न यह नहीं है कि वह अमेरिका का समर्थन करे या चीन का विरोध। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या वह स्वयं एक स्वतंत्र वैज्ञानिक शक्ति बनने का साहस और तैयारी रखता है।

भारत के संदर्भ में सबसे पहली और सबसे बड़ी भूल यह होगी कि वह चीन की नीतियों की यांत्रिक नकल करने लगे। चीन की राजनीतिक व्यवस्था, प्रशासनिक ढाँचा, सामाजिक अनुशासन, औद्योगिक इतिहास और राज्य की भूमिका भारत से मूलतः भिन्न है। चीन जिस गति से भूमि अधिग्रहण कर सकता है, उद्योग स्थापित कर सकता है या राष्ट्रीय परियोजनाओं के लिए संसाधनों का केंद्रीकरण कर सकता है, वही प्रक्रिया भारत जैसे लोकतांत्रिक और संघीय देश में न तो संभव है और न ही वांछनीय। दूसरी ओर अमेरिका का मॉडल भी पूरी तरह भारत के लिए उपयुक्त नहीं है। वहाँ निजी विश्वविद्यालयों की सदियों पुरानी परंपरा, अत्यंत विकसित पूँजी बाज़ार, विशाल वेंचर कैपिटल नेटवर्क, वैश्विक प्रतिभा आकर्षित करने वाली आव्रजन व्यवस्था और दुनिया की सबसे बड़ी अनुसंधान अर्थव्यवस्था है। भारत इन दोनों व्यवस्थाओं के बीच खड़ा है। इसलिए उसके सामने सबसे बुद्धिमत्तापूर्ण विकल्प किसी एक की नकल नहीं।बल्कि अपनी परिस्थितियों के अनुरूप एक ‘भारतीय वैज्ञानिक मॉडल’ विकसित करना है।


यह भारतीय मॉडल किन आधारों पर खड़ा हो सकता है? इसका पहला स्तंभ होगा—लोकतांत्रिक वैज्ञानिक स्वतंत्रता। विज्ञान का स्वभाव प्रश्न पूछना है। नई खोज वहीं जन्म लेती है जहाँ स्थापित मान्यताओं को चुनौती देने की अनुमति हो। भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी बहुलता, खुला सामाजिक वातावरण, भाषाई विविधता और लोकतांत्रिक विमर्श है। यदि विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और वैज्ञानिक समुदाय को पर्याप्त स्वायत्तता मिले, तो यही विविधता नवाचार का स्रोत बन सकती है। किसी भी महान वैज्ञानिक सभ्यता ने केवल आदेशों के आधार पर मौलिक खोजें नहीं कीं। उसके पीछे जिज्ञासा, बहस और स्वतंत्र चिंतन की संस्कृति रही है।

दूसरा स्तंभ होगा—दीर्घकालिक राष्ट्रीय वैज्ञानिक सहमति। भारत की सबसे बड़ी संस्थागत कमजोरी यह है कि अनेक राष्ट्रीय परियोजनाएँ सरकारों के परिवर्तन, विभागीय प्रतिस्पर्धा या वित्तीय अनिश्चितता से प्रभावित हो जाती हैं। विज्ञान पाँच वर्ष का कार्यक्रम नहीं है। एक नई दवा विकसित करने, नया विमान इंजन बनाने, क्वांटम कंप्यूटर तैयार करने या चिप उद्योग खड़ा करने में दस से बीस वर्ष लग सकते हैं। इसलिए भारत को विज्ञान और प्रौद्योगिकी के कुछ क्षेत्रों को राष्ट्रीय सहमति का विषय बनाना होगा। सरकारें बदलें। लेकिन राष्ट्रीय वैज्ञानिक लक्ष्य न बदलें। अंतरिक्ष कार्यक्रम की सफलता का एक कारण यही था कि दशकों तक विभिन्न सरकारों ने उसे निरंतर समर्थन दिया।

तीसरा स्तंभ होगा—अनुसंधान पर पर्याप्त निवेश। यदि भारत वास्तव में विकसित राष्ट्र बनना चाहता है, तो अनुसंधान एवं विकास पर उसका व्यय धीरे-धीरे सकल घरेलू उत्पाद के लगभग दो प्रतिशत तक पहुँचना चाहिए। यह लक्ष्य केवल केंद्र सरकार के बजट से पूरा नहीं होगा। राज्यों, निजी उद्योग, विश्वविद्यालयों, सार्वजनिक उपक्रमों और परोपकारी संस्थाओं को भी इसमें योगदान देना होगा। विशेष रूप से भारतीय उद्योग को यह समझना होगा कि भविष्य की प्रतिस्पर्धा केवल सस्ती श्रमशक्ति से नहीं जीती जाएगी; वह मौलिक तकनीक, पेटेंट और नवाचार से जीती जाएगी।

चौथा स्तंभ होगा—विश्वविद्यालयों का पुनर्निर्माण। भारत के कुछ चुनिंदा संस्थान विश्वस्तरीय हैं। लेकिन अधिकांश विश्वविद्यालय अभी शोध-केंद्रित नहीं बन पाए हैं। यदि देश की करोड़ों युवा प्रतिभाओं को प्रयोगशाला, आधुनिक उपकरण, सक्रिय शोध समूह और अंतरराष्ट्रीय सहयोग नहीं मिलेगा, तो कुछ उत्कृष्ट संस्थानों के बल पर वैज्ञानिक महाशक्ति नहीं बना जा सकता। विश्वविद्यालयों को केवल परीक्षा लेने वाली संस्थाओं से ज्ञान निर्माण के केंद्रों में बदलना होगा। प्रोफेसरों को अनुसंधान के लिए समय, संसाधन और स्वतंत्रता चाहिए। विद्यार्थियों को शोध में प्रारंभिक अवस्था से भागीदारी का अवसर मिलना चाहिए। और उद्योग को विश्वविद्यालयों के साथ वास्तविक साझेदारी करनी होगी।


पाँचवाँ स्तंभ होगा—प्रतिभा का सम्मान। भारत में अक्सर यह शिकायत की जाती है कि प्रतिभाशाली वैज्ञानिक विदेश चले जाते हैं। लेकिन प्रश्न यह भी पूछा जाना चाहिए कि उन्हें रोकने के लिए हमने क्या किया? यदि किसी युवा वैज्ञानिक को विदेश में आधुनिक प्रयोगशाला, स्पष्ट करियर, बेहतर वेतन, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और शोध की स्वतंत्रता मिलती है, जबकि भारत में उसे वर्षों तक अस्थायी परियोजनाओं पर काम करना पड़े, तो उसका निर्णय केवल आर्थिक नहीं बल्कि व्यावसायिक भी होगा। भारत को प्रतिभा को नैतिक भाषण नहीं, बल्कि संस्थागत अवसर देने होंगे। विदेश में कार्यरत भारतीय वैज्ञानिकों को भी ‘वापस आओ या हमेशा बाहर रहो’ जैसी द्वैत सोच से नहीं देखना चाहिए। उन्हें संयुक्त नियुक्ति, आंशिक समय, साझा प्रयोगशाला, स्टार्टअप सहयोग और वर्चुअल शोध नेटवर्क के माध्यम से भारत से जोड़ा जा सकता है।

छठा स्तंभ होगा—डीप टेक (Deep Tech) पर राष्ट्रीय ध्यान। भारत ने डिजिटल सेवाओं, भुगतान प्रणालियों और सॉफ्टवेयर में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। लेकिन आने वाले युग की निर्णायक प्रतिस्पर्धा केवल ऐप बनाने से नहीं जीती जाएगी। चिप निर्माण, उन्नत सामग्री, जैव-प्रौद्योगिकी, क्वांटम, रोबोटिक्स, रक्षा तकनीक, ऊर्जा भंडारण, चिकित्सा उपकरण और अंतरिक्ष उद्योग में दीर्घकालिक निवेश की आवश्यकता है। इन क्षेत्रों में प्रारंभिक लाभ कम और जोखिम अधिक होता है, इसलिए सरकार को निजी उद्योग के साथ साझेदारी में जोखिम साझा करना होगा।

सातवाँ स्तंभ होगा—वैज्ञानिक उपकरणों का स्वदेशी निर्माण। भारत में प्रयोग होने वाले अनेक अत्याधुनिक उपकरण विदेश से आते हैं। इससे अनुसंधान महँगा भी होता है और निर्भरता भी बढ़ती है। यदि भारत वास्तव में वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता चाहता है, तो उसे माइक्रोस्कोप, सेंसर, विश्लेषण प्रणाली, परीक्षण उपकरण, चिकित्सा मशीनें, वैज्ञानिक सॉफ्टवेयर और प्रयोगशाला सामग्री के घरेलू उद्योग को भी विकसित करना होगा। किसी देश की वैज्ञानिक शक्ति केवल उसके शोध-पत्रों से नहीं मापी जाती। यह भी देखा जाता है कि वह अपने वैज्ञानिक उपकरण स्वयं बना सकता है या नहीं।

आठवाँ स्तंभ होगा—विज्ञान और समाज के बीच गहरा संबंध। भारत की चुनौतियाँ अमेरिका और चीन से अलग हैं। हमारे सामने कृषि, जल, सार्वजनिक स्वास्थ्य, प्रदूषण, ग्रामीण उत्पादकता, बहुभाषिकता, ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याएँ हैं। यदि भारतीय विज्ञान इन समस्याओं का समाधान नहीं करेगा, तो वह समाज से कट जाएगा। इसलिए उच्च प्रौद्योगिकी और सामाजिक प्रौद्योगिकी—दोनों को समान महत्व देना होगा। एक ओर भारत को क्वांटम कंप्यूटिंग और AI में अग्रणी बनना है, दूसरी ओर उसे स्वच्छ पेयजल, सस्ती स्वास्थ्य तकनीक, जल संरक्षण, जलवायु-प्रतिरोधी कृषि और स्थानीय भाषाओं के लिए डिजिटल समाधान भी विकसित करने हैं।

नौवाँ स्तंभ होगा—विज्ञान, उद्योग और राष्ट्रीय सुरक्षा का संतुलित समन्वय। चीन ने विज्ञान और उद्योग के एकीकरण से बहुत लाभ उठाया है। अमेरिका ने विश्वविद्यालय, उद्योग और रक्षा अनुसंधान के सहयोग से विशाल नवाचार पारिस्थितिकी विकसित की। भारत को भी इस दिशा में आगे बढ़ना होगा। लेकिन लोकतांत्रिक पारदर्शिता और नागरिक स्वतंत्रता को बनाए रखते हुए। रक्षा अनुसंधान का लाभ नागरिक उद्योग तक पहुँचना चाहिए और नागरिक उद्योग की तकनीकी प्रगति रक्षा क्षेत्र को मजबूत करे। इस प्रकार विज्ञान केवल प्रयोगशाला का विषय नहीं रहेगा। बल्कि राष्ट्रीय उत्पादन, रोजगार और सुरक्षा का आधार बनेगा।

दसवाँ और सबसे महत्त्वपूर्ण स्तंभ होगा—वैज्ञानिक संस्कृति। वैज्ञानिक संस्कृति का अर्थ केवल अधिक वैज्ञानिक तैयार करना नहीं है। इसका अर्थ है—प्रश्न पूछने की आदत, प्रमाण पर आधारित निर्णय, असफलता को सीखने की प्रक्रिया मानना, दीर्घकालिक सोच और सार्वजनिक जीवन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का सम्मान। यदि समाज केवल परीक्षा में अंक प्राप्त करने को शिक्षा मानेगा और अनुसंधान को अनिश्चित करियर समझेगा, तो सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा विज्ञान में नहीं आएगी। विज्ञान को राष्ट्रीय प्रतिष्ठा और सामाजिक सम्मान दोनों मिलना चाहिए।

भारत के सामने आज एक असाधारण अवसर है। अमेरिका और चीन की प्रतिस्पर्धा के कारण वैश्विक उद्योग नई आपूर्ति शृंखलाएँ खोज रहा है। अनेक देश विश्वसनीय तकनीकी भागीदार चाहते हैं। भारतीय मूल के वैज्ञानिक दुनिया भर में प्रभावशाली स्थानों पर कार्य कर रहे हैं। डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, अंतरिक्ष कार्यक्रम, औषधि उद्योग और स्टार्टअप पारिस्थितिकी ने भारत की विश्वसनीयता बढ़ाई है। यदि भारत अगले दस से पंद्रह वर्षों में शिक्षा, अनुसंधान, उद्योग और शासन के स्तर पर निर्णायक सुधार कर सके, तो वह केवल एक बड़ा बाजार नहीं। बल्कि वैश्विक ज्ञान अर्थव्यवस्था का प्रमुख निर्माता बन सकता है।

लेकिन यदि भारत इस अवसर को खो देता है, तो वह लंबे समय तक विदेशी तकनीकों का उपभोक्ता बना रह सकता है। तब हम चिप आयात करेंगे, AI मॉडल आयात करेंगे, वैज्ञानिक उपकरण आयात करेंगे और उच्च मूल्य वाली तकनीकों के लिए दूसरों पर निर्भर रहेंगे। आर्थिक विकास संभव होगा। लेकिन तकनीकी संप्रभुता सीमित रहेगी। इसलिए आज लिए गए निर्णय अगले पच्चीस वर्षों की दिशा तय करेंगे।

साफ है कि 21वीं सदी का वास्तविक शक्ति-संतुलन टैंकों, मिसाइलों और परमाणु हथियारों से कम तथा प्रयोगशालाओं, विश्वविद्यालयों, डेटा केंद्रों, चिप निर्माण संयंत्रों और वैज्ञानिक प्रतिभा से अधिक निर्धारित होगा। जिस राष्ट्र के पास ज्ञान होगा, उसके पास उद्योग होगा। जिसके पास उद्योग होगा, उसके पास आर्थिक शक्ति होगी। और जिसके पास आर्थिक शक्ति होगी, वही अंततः वैश्विक राजनीति को सबसे अधिक प्रभावित करेगा।

भारत के पास जनसंख्या है, प्रतिभा है, लोकतंत्र है, उद्यमशीलता है और एक प्राचीन ज्ञान परंपरा भी है। अब आवश्यकता केवल इस बात की है कि इन सभी को एक साझा राष्ट्रीय वैज्ञानिक दृष्टि में बदला जाए। यदि यह परिवर्तन हो सका, तो भारत न अमेरिका की प्रतिलिपि बनेगा और न चीन की। वह अपनी विशिष्ट लोकतांत्रिक, ज्ञान-आधारित और मानवीय विकास की राह बनाकर 21वीं सदी की प्रमुख वैज्ञानिक शक्तियों में स्थान प्राप्त कर सकता है।

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Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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