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किसी भी वक्त मच सकती है तबाही? चीन के बांध और ब्रह्मपुत्र के बढ़ते बहाव पर चिंता
China Mega Dam Flood Risk India: चीन के तिब्बत में बन रहे मेगा बांध और ब्रह्मपुत्र नदी के संभावित बढ़ते बहाव को लेकर चिंता बढ़ी। वैज्ञानिकों ने भविष्य में बाढ़ के जोखिम की आशंका जताई।
China Mega Dam Flood Risk India: चीन के तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी पर बनाई जा रही विशाल बांध परियोजना को लेकर भारत और बांग्लादेश की चिंताएं बढ़ सकती हैं। चीनी शोधकर्ताओं ने आशंका जताई है कि इस सदी के दौरान ब्रह्मपुत्र नदी में पानी का बहाव यानी रनऑफ बढ़ सकता है। इससे निचले इलाकों में बाढ़ का खतरा और गंभीर होने की आशंका है। इस चेतावनी ने चीन की करीब 168 अरब डॉलर की जलविद्युत परियोजना के संभावित पर्यावरणीय और क्षेत्रीय प्रभावों पर एक बार फिर बहस छेड़ दी है।
पेड़ों के छल्लों से 700 साल से अधिक पुराने जल प्रवाह का अध्ययन
जानकारी के मुताबिक, चीनी विज्ञान अकादमी और युन्नान यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने दक्षिण-पूर्वी तिब्बती पठार में पेड़ों के छल्लों की चौड़ाई से जुड़े आंकड़ों का अध्ययन किया। इसके आधार पर उन्होंने वर्ष 1325 से 2020 तक ब्रह्मपुत्र नदी के जल प्रवाह के ऐतिहासिक रिकॉर्ड का पुनर्निर्माण किया।
शोधकर्ताओं ने इस ऐतिहासिक डेटा को आधुनिक जलवायु संबंधी आंकड़ों के साथ मिलाकर एक मॉडल तैयार किया। पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने बताया कि यह शोध 8 अक्टूबर को 'चाइना साइंस बुलेटिन' जर्नल में प्रकाशित हुआ था।
शोध के अनुसार, भविष्य में जलवायु परिस्थितियों में होने वाले बदलाव नदी के बहाव को प्रभावित कर सकते हैं। इससे अत्यधिक जल प्रवाह और बाढ़ जैसी घटनाओं का जोखिम बढ़ने की आशंका है। शोधकर्ताओं ने जल संसाधनों के विकास और नदी प्रबंधन की योजनाओं में इन संभावित बदलावों को ध्यान में रखने की जरूरत बताई है।
भारत और बांग्लादेश के लिए क्यों अहम है ब्रह्मपुत्र?
तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी को यारलुंग त्सांगपो के नाम से जाना जाता है। यह अरुणाचल प्रदेश में सियांग नदी के रूप में भारत में प्रवेश करती है और आगे असम से गुजरते हुए ब्रह्मपुत्र कहलाती है। इसके बाद यह बांग्लादेश पहुंचती है, जहां इसे जमुना नदी के नाम से जाना जाता है।
यह नदी पूर्वोत्तर भारत और बांग्लादेश में कृषि, पेयजल, आजीविका और पारिस्थितिकी के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। नदी के जल प्रवाह में बड़े बदलाव होने पर खेती, बस्तियों, बुनियादी ढांचे और नदी के आसपास रहने वाले लोगों पर असर पड़ सकता है।
इसी वजह से नदी के ऊपरी हिस्से में बनने वाले बड़े बांध और जलविद्युत परियोजनाएं भारत तथा बांग्लादेश के लिए रणनीतिक और पर्यावरणीय महत्व रखती हैं। हालांकि, नदी में बहाव बढ़ने की आशंका और किसी बांध के वास्तविक प्रभाव को अलग-अलग समझना जरूरी है। बाढ़ का खतरा बारिश, हिमनदों के पिघलने, भौगोलिक परिस्थितियों और बांध के संचालन सहित कई कारकों पर निर्भर करता है।
क्या है रनऑफ, जिससे बढ़ सकता है बाढ़ का खतरा?
रनऑफ जल चक्र की वह प्रक्रिया है, जिसमें बारिश, बर्फ पिघलने या अन्य स्रोतों से मिलने वाला पानी जमीन की सतह पर बहते हुए नदियों, झीलों और दूसरे जल स्रोतों तक पहुंचता है। जब जमीन पानी को पर्याप्त मात्रा में सोख नहीं पाती, तब सतही बहाव बढ़ जाता है।
सामान्य परिस्थितियों में रनऑफ नदियों और जल स्रोतों को पानी उपलब्ध कराने में मदद करता है। लेकिन जब कम समय में बहुत अधिक पानी नदी तक पहुंचता है, तो जलस्तर तेजी से बढ़ सकता है और बाढ़ की स्थिति पैदा हो सकती है।
अत्यधिक सतही बहाव से मिट्टी का कटाव भी बढ़ता है। इसके साथ उर्वरक, कीटनाशक और अन्य प्रदूषक जल स्रोतों तक पहुंच सकते हैं। शहरी क्षेत्रों में पक्की सड़कों और कंक्रीट की सतहों के कारण पानी जमीन में कम समाता है, जिससे जलभराव और बाढ़ की समस्या गंभीर हो सकती है।
168 अरब डॉलर की बांध परियोजना पर क्यों उठ रहे सवाल?
तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी पर चीन की प्रस्तावित विशाल जलविद्युत परियोजना को दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में शामिल माना जा रहा है। इसकी अनुमानित लागत करीब 168 अरब डॉलर बताई गई है। परियोजना में पांच क्रमिक जलविद्युत स्टेशन शामिल होने की जानकारी सामने आई है।
इसका प्रमुख उद्देश्य बिजली उत्पादन है, लेकिन नदी के ऊपरी हिस्से में इतने बड़े स्तर पर निर्माण होने से जल प्रवाह, पर्यावरण और आपदा प्रबंधन पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
विशेषज्ञों की चिंता है कि बांध के संचालन के दौरान पानी छोड़ने के समय और मात्रा में बदलाव का निचले क्षेत्रों पर क्या असर पड़ेगा। हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि परियोजना से निश्चित रूप से बाढ़ आएगी। इसके वास्तविक प्रभाव का आकलन करने के लिए बांध के डिजाइन, जलाशय प्रबंधन, नदी के प्राकृतिक प्रवाह और मौसम संबंधी परिस्थितियों की विस्तृत जानकारी जरूरी है।
भूकंपीय गतिविधियों और भूस्खलन का भी खतरा
हिमालय और तिब्बती पठार का क्षेत्र भूगर्भीय दृष्टि से सक्रिय है। यहां भूकंप, भूस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं का जोखिम बना रहता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, चीनी भूवैज्ञानिकों ने जुलाई में प्रस्तावित बांध के नीचे सक्रिय फॉल्ट लाइन की मौजूदगी को लेकर चिंता जताई थी। उन्होंने बांध की सुरक्षा, कमजोर ढलानों को मजबूत करने और भूस्खलन से बचाव के उपायों पर ध्यान देने की जरूरत बताई थी।
ऐसे संवेदनशील क्षेत्र में विशाल बांध परियोजना के निर्माण के लिए भूकंपीय जोखिम, भूगर्भीय संरचना और आपातकालीन प्रबंधन का आकलन बेहद महत्वपूर्ण है।
भारत के लिए निगरानी और सहयोग क्यों जरूरी?
ब्रह्मपुत्र नदी का जल प्रवाह कई देशों और क्षेत्रों को प्रभावित करता है। ऐसे में जल स्तर, बारिश, हिमनदों की स्थिति और संभावित बाढ़ से जुड़ी समय पर जानकारी निचले इलाकों में रहने वाली आबादी के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
विशेषज्ञों की चेतावनी के मद्देनजर नदी के प्रवाह की निगरानी, बाढ़ पूर्वानुमान प्रणाली को मजबूत करने और सीमा पार जल संबंधी आंकड़ों के आदान-प्रदान पर जोर देने की जरूरत है। इससे संभावित आपदाओं के लिए समय रहते तैयारी करने और जन-धन के नुकसान को कम करने में मदद मिल सकती है।
कुल मिलाकर, ब्रह्मपुत्र के संभावित बढ़ते बहाव और चीन की विशाल बांध परियोजना ने नदी प्रबंधन तथा क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े सवालों को फिर चर्चा में ला दिया है। आने वाले वर्षों में जलवायु परिवर्तन और बड़े बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के प्रभावों को समझना भारत और बांग्लादेश के लिए महत्वपूर्ण होगा।


