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ड्रोन-AI से अंतरिक्ष तक वायुसेना की तैयारी, नए प्रमुख आशुतोष दीक्षित ने तय किया 'VAYU' मंत्र
New Delhi: नए वायुसेना प्रमुख आशुतोष दीक्षित ने अगले 10 वर्षों का रोडमैप पेश किया। 'VAYU' मंत्र के तहत ड्रोन, AI, अंतरिक्ष और स्वदेशी लड़ाकू विमानों पर होगा जोर।
फोटो-सोशल मीडिया
New Delhi: भविष्य के युद्ध अब केवल लड़ाकू विमानों और मिसाइलों से नहीं लड़े जाएंगे। ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), साइबर तकनीक, उपग्रहों और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों की भूमिका निर्णायक होती जा रही है। भारतीय वायुसेना के नए प्रमुख एयर चीफ मार्शल आशुतोष दीक्षित ने इसी बदलती चुनौती को ध्यान में रखते हुए अगले दस वर्षों में वायुसेना के आधुनिकीकरण की रूपरेखा सामने रखी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि नई तकनीकों को अपनाने के साथ वायुसेना को हर समय युद्ध लड़ने और जीतने के लिए तैयार रखना उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता होगी। इसके लिए उन्होंने 'VAYU' यानी 'वायु' का चार सूत्रीय मंत्र दिया है। इसके अंतर्गत सतर्कता और युद्ध की तैयारी, आत्मनिर्भरता, नई युद्ध रणनीतियों का विकास तथा तीनों सेनाओं के बीच बेहतर समन्वय को प्राथमिकता दी जाएगी। उनका सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य लड़ाकू विमानों की घटती स्क्वाड्रन संख्या को स्वीकृत स्तर तक पहुंचाना और भारत को भविष्य के बहुआयामी युद्ध के लिए तैयार करना है। 
31 अक्टूबर को संभाली कमान, चार दशक का सैन्य अनुभव
एयर चीफ मार्शल आशुतोष दीक्षित ने 31 अक्टूबर 2026 को भारतीय वायुसेना के 29वें प्रमुख के रूप में पदभार संभाला। उन्होंने एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह का स्थान लिया, जो 42 वर्षों की सेवा के बाद सेवानिवृत्त हुए। एक नवंबर को नए वायुसेना प्रमुख ने राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर शहीदों को श्रद्धांजलि दी और एयरफोर्स स्टेशन, नई दिल्ली में गार्ड ऑफ ऑनर प्राप्त किया। नौ दिसंबर 1966 को जन्मे दीक्षित ने छह दिसंबर 1986 को वायुसेना की लड़ाकू शाखा में कमीशन प्राप्त किया था। वह मिराज-2000, मिग, जगुआर और तेजस सहित कई प्रकार के विमानों के अनुभवी पायलट हैं और 3,500 घंटे से अधिक उड़ान भर चुके हैं। इससे पहले वह वायुसेना के उपप्रमुख, मध्य वायु कमान के प्रमुख और एकीकृत रक्षा स्टाफ में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं। 
‘VAYU’ मंत्र में सतर्कता, आत्मनिर्भरता, युक्ति और एकजुटता
नए वायुसेना प्रमुख ने अपनी प्राथमिकताओं को 'VAYU' के चार अक्षरों में समेटा है। 'V' का अर्थ 'Vigilance, Victory and Readiness' अर्थात सतर्कता, विजय और तत्परता है। इसका उद्देश्य प्रत्येक लड़ाकू स्क्वाड्रन, रडार, वायु रक्षा इकाई और वायुसैनिक को किसी भी समय कार्रवाई के लिए तैयार रखना है। 'A' का अर्थ 'आत्मनिर्भरता' है, जिसके तहत भारतीय लड़ाकू विमान, सेंसर, हथियार और स्वदेशी तकनीक विकसित करने पर जोर दिया जाएगा। 'Y' का अर्थ 'युक्ति' है, यानी नई रणनीतियां, तकनीकी नवाचार और युद्ध के बदलते तौर-तरीकों के अनुसार खुद को विकसित करना। इसमें एआई आधारित कमान प्रणाली, ड्रोन रोधी सुरक्षा और नई परिचालन तकनीकों को शामिल किया गया है। 'U' का अर्थ 'Unity of Effort' यानी संयुक्त प्रयास है। इसके अंतर्गत थलसेना, नौसेना, वायुसेना और राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियां बेहतर समन्वय के साथ संयुक्त अभियान संचालित करेंगी। 
42 स्क्वाड्रन की जरूरत, अभी करीब 29 से चल रहा काम
वायुसेना के सामने सबसे बड़ी चुनौती लड़ाकू विमानों की संख्या बढ़ाने की है। भारत के लिए लगभग 42 लड़ाकू स्क्वाड्रन का स्वीकृत स्तर निर्धारित है, जबकि वर्तमान में इनकी संख्या करीब 29 बताई जा रही है। मिग-21 विमानों की चरणबद्ध विदाई और नए विमानों की आपूर्ति में देरी के कारण यह अंतर बढ़ा है। चीन और पाकिस्तान से जुड़ी सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए लड़ाकू विमानों की पर्याप्त संख्या आवश्यक मानी जाती है। एयर चीफ मार्शल दीक्षित ने स्पष्ट किया है कि स्वीकृत युद्धक क्षमता को फिर हासिल करना उनका प्रमुख लक्ष्य होगा। हालांकि, आधुनिक युद्ध में केवल विमानों की संख्या ही निर्णायक नहीं होती। उनकी मारक क्षमता, लंबी दूरी की मिसाइलें, रडार, इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा, प्रशिक्षण और परिचालन उपलब्धता भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। 
तेजस एमके-1ए, एमके-2 और पांचवीं पीढ़ी के एएमसीए पर जोर
स्वदेशी रक्षा उत्पादन को नई वायुसेना की रीढ़ बनाने की तैयारी है। आशुतोष दीक्षित ने तेजस एमके-1ए, तेजस एमके-2 और एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एएमसीए) को प्रमुख प्राथमिकताओं में रखा है। तेजस एमके-1ए भारतीय वायुसेना की लड़ाकू क्षमता बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण है, जबकि एमके-2 को अधिक क्षमता वाले मध्यम श्रेणी के लड़ाकू विमान के रूप में विकसित किया जा रहा है। एएमसीए भारत की पांचवीं पीढ़ी के स्टेल्थ लड़ाकू विमान की परियोजना है। दीक्षित ने भारतीय सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों और स्वदेशी हथियारों के विकास पर भी जोर दिया है। उनका उद्देश्य केवल विदेशी उपकरणों की निर्भरता कम करना नहीं, बल्कि युद्ध के दौरान आवश्यक हथियारों, पुर्जों और तकनीकी सहायता की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करना भी है। हालांकि, इन परियोजनाओं की वास्तविक समयसीमा उत्पादन, परीक्षण और तकनीकी विकास की प्रगति पर निर्भर करेगी। 
यूक्रेन और पश्चिम एशिया के युद्धों ने बदली सैन्य रणनीति
हाल के वर्षों में यूक्रेन और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने आधुनिक युद्ध की प्रकृति में महत्वपूर्ण बदलाव दिखाए हैं। छोटे और अपेक्षाकृत सस्ते ड्रोन भी महंगे सैन्य उपकरणों, हवाई अड्डों और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों के लिए गंभीर खतरा बन सकते हैं। इसके साथ लंबी दूरी के सटीक हमले, इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग और उपग्रह आधारित निगरानी का महत्व बढ़ा है। भविष्य में किसी देश की वायु शक्ति का आकलन केवल उसके लड़ाकू विमानों से नहीं, बल्कि उसकी ड्रोन क्षमता, ड्रोन रोधी सुरक्षा, खुफिया सूचनाओं के विश्लेषण और डिजिटल कमान व्यवस्था से भी होगा। नए वायुसेना प्रमुख ने इसी कारण बहुस्तरीय ड्रोन रोधी सुरक्षा, तेज रखरखाव, एआई आधारित निर्णय सहायता और संचार प्रणालियों को मजबूत करने पर जोर दिया है। 
अंतरिक्ष और साइबर क्षेत्र भी बनेंगे युद्ध की तैयारी का हिस्सा
एयर चीफ मार्शल दीक्षित ने अंतरिक्ष, साइबर और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम को भविष्य के सैन्य अभियानों का महत्वपूर्ण क्षेत्र बताया है। आधुनिक वायुसेना के लिए उपग्रहों से मिलने वाली तस्वीरें, सुरक्षित संचार, नेविगेशन और मिसाइल चेतावनी संबंधी सूचनाएं अत्यंत उपयोगी हैं। युद्ध के दौरान इन प्रणालियों में बाधा उत्पन्न होने से सैन्य अभियानों की क्षमता प्रभावित हो सकती है। इसी तरह साइबर हमले रडार, संचार और सूचना नेटवर्क के लिए खतरा बन सकते हैं। एआई की सहायता से बड़ी मात्रा में प्राप्त सूचनाओं का तेजी से विश्लेषण करना, संभावित खतरों की पहचान करना और कमांडरों को निर्णय लेने में सहायता देना संभव है। हालांकि, युद्ध संबंधी महत्वपूर्ण निर्णयों में मानवीय नियंत्रण, विश्वसनीयता और तकनीकी सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक रहेगा।
तीनों सेनाओं के बीच संयुक्त अभियान पर विशेष ध्यान
नए वायुसेना प्रमुख ने कहा कि वायु शक्ति का सबसे अधिक प्रभाव तब होता है, जब उसे सैन्य अभियान की योजना बनाते समय ही थलसेना और नौसेना की रणनीति के साथ जोड़ा जाए। उनका जोर 'JAI' यानी संयुक्तता, आत्मनिर्भरता और नवाचार की अवधारणा पर है। इसके तहत तीनों सेनाओं के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान, लक्ष्य निर्धारण, हवाई सुरक्षा और संयुक्त युद्ध संचालन को अधिक प्रभावी बनाने का प्रयास होगा। साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी दूसरी एजेंसियों के साथ समन्वय बढ़ाया जाएगा। इसका उद्देश्य किसी संभावित संकट की स्थिति में अलग-अलग सेनाओं की क्षमताओं का एकीकृत इस्तेमाल सुनिश्चित करना है।
युद्ध लड़ना ही नहीं, अपनी ताकत से युद्ध रोकना भी लक्ष्य
आशुतोष दीक्षित ने देशवासियों को आश्वस्त किया कि भारतीय वायुसेना सतर्क, तैयार और अपने संकल्प पर अडिग है। उन्होंने युद्धक क्षमता को इतना मजबूत बनाने पर जोर दिया कि संभावित विरोधी भारत के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई करने से पहले उसके परिणामों का गंभीरता से आकलन करें। सैन्य रणनीति में इसे विश्वसनीय प्रतिरोधक क्षमता माना जाता है। इसके लिए युद्ध की तैयारी, हथियारों की उपलब्धता, प्रशिक्षण और आधुनिक तकनीक का एक साथ विकास आवश्यक है।
नए वायुसेना प्रमुख के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन प्राथमिकताओं को वास्तविक सैन्य क्षमता में बदलने की होगी। स्वदेशी लड़ाकू विमानों की समय पर आपूर्ति, स्क्वाड्रन संख्या में वृद्धि, ड्रोन और मिसाइल रक्षा प्रणाली का विस्तार तथा एआई और अंतरिक्ष आधारित तकनीकों का विश्वसनीय एकीकरण उनके कार्यकाल की प्रमुख कसौटियां होंगी। भारतीय वायुसेना के लिए अगले दशक का वास्तविक लक्ष्य केवल अधिक शक्तिशाली लड़ाकू विमान हासिल करना नहीं, बल्कि ऐसी एकीकृत सैन्य शक्ति विकसित करना है जो आसमान से लेकर साइबर और अंतरिक्ष तक उभरते खतरों का सामना कर सके।


