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इंदौर में आर्थिक तंगी ने ली मां-बेटे की जान, क्या देश में बढ़ रहा है 'गरीबी से मौत' का संकट?
Deaths Due To Poverty in Indore: इंदौर में आर्थिक तंगी और मानसिक बीमारी से जूझ रहे मां-बेटे की मौत के बाद गरीबी, कर्ज और मानसिक तनाव पर फिर बहस तेज हो गई है।
Deaths Due To Poverty in Indore
Deaths Due To Poverty in Indore: देश में आर्थिक तंगी और कर्ज के कारण सामने आने वाली दर्दनाक घटनाएं लगातार चिंता बढ़ा रही हैं। मध्य प्रदेश के इंदौर में आर्थिक परेशानियों और मानसिक बीमारी से जूझ रहे मां-बेटे की जहरीला पदार्थ खाने के बाद मौत हो गई। इस घटना ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या बढ़ती महंगाई, सीमित आय, बेरोजगारी और कर्ज का बोझ लोगों को ऐसे हालात में धकेल रहा है, जहां उन्हें जिंदगी से उम्मीद खत्म होती नजर आती है। मनोचिकित्सकों का कहना है कि आर्थिक संकट और मानसिक तनाव का गहरा संबंध है। समय रहते सहायता नहीं मिलने पर इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं।
इंदौर में घटित हुई झकझोर देने वाली घटना
पुलिस के अनुसार, इंदौर के परदेशीपुरा क्षेत्र में रहने वाली 62 वर्षीय इंदिरा और उनके 35 वर्षीय बेटे संजय मंगलवार दोपहर घर से कुछ दूरी पर स्थित एक बगीचे में पहुंचे और वहां जहरीला पदार्थ खा लिया। दोनों को बेहोशी की हालत में अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन इलाज के दौरान बुधवार शाम बेटे और गुरुवार सुबह मां की मौत हो गई। पुलिस मामले की जांच कर रही है और सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर पड़ताल जारी है।
बहन का परिवार उठा रहा था पूरा खर्च
परिजनों ने बताया कि इंदिरा के पति का कई वर्ष पहले निधन हो चुका था। इसके बाद वह अपनी बहन और उनके परिवार के साथ रह रही थीं। परिवार का पूरा खर्च बहन का परिवार ही वहन कर रहा था। बताया गया कि बेटा संजय भी कोई नियमित काम नहीं करता था। रिश्तेदारों के अनुसार, मां और बेटा दोनों मानसिक बीमारी से भी पीड़ित थे और उनका इलाज बाणगंगा स्थित मानसिक चिकित्सालय में चल रहा था। ऐसे में आर्थिक तंगी और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं ने उनकी परेशानियों को और बढ़ा दिया।
आर्थिक संकट और मानसिक तनाव का गहरा रिश्ता
मनोविशेषज्ञ मानते हैं कि आर्थिक परेशानियां अकेले किसी व्यक्ति को ऐसा कदम उठाने के लिए मजबूर नहीं करतीं, लेकिन लगातार बढ़ता कर्ज, बेरोजगारी, आय का अभाव और भविष्य की चिंता मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डालते हैं। यदि व्यक्ति पहले से किसी मानसिक बीमारी से जूझ रहा हो तो स्थिति और गंभीर हो सकती है। इसलिए ऐसे मामलों को केवल आर्थिक कारणों से जोड़कर देखना सही नहीं होगा, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य को भी उतनी ही गंभीरता से समझना जरूरी है।
एनसीआरबी के आंकड़े क्या कहते हैं
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट बताती है कि आर्थिक कारणों से होने वाली आत्महत्याएं देश में लगातार चिंता का विषय बनी हुई हैं। वर्ष 2023 के आंकड़ों के अनुसार दिवालियापन, कर्ज और गरीबी से जुड़े कारणों के चलते 10,903 लोगों ने आत्महत्या की। यह कुल आत्महत्याओं का लगभग 3.8 प्रतिशत हिस्सा है। वहीं बेरोजगारी भी एक प्रमुख कारण के रूप में सामने आती है और इससे जुड़े मामलों में भी हर साल हजारों लोगों की जान जाती है।
कम आय वाले परिवार सबसे ज्यादा प्रभावित
एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि आर्थिक असुरक्षा का सबसे अधिक असर कम आय वाले परिवारों पर पड़ता है। आत्महत्या करने वाले करीब 66 प्रतिशत लोगों की वार्षिक आय एक लाख रुपये से कम थी। इससे साफ संकेत मिलता है कि सीमित आय, बढ़ते खर्च और रोजगार की अनिश्चितता गरीब तथा निम्न आय वर्ग के परिवारों को सबसे अधिक प्रभावित करती है।
दिहाड़ी मजदूर और छोटे कारोबारी सबसे अधिक दबाव में
रिपोर्ट के अनुसार आत्महत्या के मामलों में सबसे बड़ा हिस्सा दिहाड़ी मजदूरों और छोटे कारीगरों का होता है। इनकी आय पूरी तरह रोज मिलने वाले काम पर निर्भर रहती है। कुछ दिन काम बंद होने, बीमारी आने या अचानक आर्थिक संकट खड़ा होने पर पूरे परिवार की आजीविका प्रभावित हो जाती है। इसी तरह छोटे व्यापारियों को कारोबार में घाटा और कर्ज का दबाव कई बार गंभीर मानसिक तनाव में डाल देता है।
हाल के वर्षों में बढ़े हैं ऐसे मामले
इंदौर की घटना से पहले गुजरात के राजकोट में भी आर्थिक तंगी और कर्जदारों के दबाव के कारण एक ही परिवार के तीन सदस्यों की आत्महत्या का मामला सामने आया था। इसके अलावा महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों से भी समय-समय पर व्यापार में नुकसान, कर्ज और आर्थिक संकट से जुड़ी ऐसी घटनाएं सामने आती रही हैं। यानी आर्थिक दबाव अब केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक चिंता का विषय बन चुका है।
सिर्फ आर्थिक मदद नहीं, मानसिक सहयोग भी जरूरी
मनोविशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए केवल आर्थिक सहायता पर्याप्त नहीं है। जरूरत इस बात की है कि आर्थिक संकट से जूझ रहे लोगों तक समय पर मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं, काउंसलिंग, रोजगार सहायता और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ पहुंचे। परिवार और समाज की संवेदनशील भूमिका भी ऐसे लोगों को कठिन परिस्थितियों से बाहर निकालने में महत्वपूर्ण हो सकती है।
आर्थिक तंगी केवल जेब पर नहीं, बल्कि व्यक्ति के मन और जीवन पर भी गहरा असर डालती है। इसलिए आर्थिक और मानसिक दोनों स्तरों पर समय रहते सहायता उपलब्ध कराना बेहद जरूरी है।


