TRENDING TAGS :
आंकड़ों के भेंट चढ़ती इंसानी जिंदगी! भारत में जान बचाना घाटे का सौदा और जान जाना क्यों बनी प्रशासनिक प्रक्रिया?
Human Life Value in India: भारत में आम इंसान की जिंदगी क्यों बन रही है सिर्फ एक आंकड़ा? सड़क हादसे, सीवर मौतें, भ्रष्ट व्यवस्था, स्वास्थ्य संकट और प्रशासनिक लापरवाही पर आधारित यह खोजी रिपोर्ट कई गंभीर सवाल उठाती है।
Human Life Value in India: भारत जैसे विशाल और तेजी से बढ़ते देश में हर दिन तरक्की की नई कहानियां लिखी जाती हैं। गगनचुंबी इमारतें, चमचमाती एक्सप्रेस-वे और डिजिटल क्रांति के इस दौर में एक ऐसी कड़वी सच्चाई भी छिपी है, जिससे हम अक्सर नजरें चुरा लेते हैं। वह सच्चाई यह है कि इस देश में आम इंसान की जिंदगी बहुत सस्ती हो चुकी है। चाहे वह सड़क का गड्ढा हो, अवैध रूप से बनी कोई इमारत हो, आवारा कुत्तों का हमला हो या फिर जहरीले सीवर में उतरने की मजबूरी, हर जगह आम नागरिक की जान एक आंकड़े में तब्दील होकर रह जाती है।
इस बेहद विस्तृत और खोजी रिपोर्ट में हम उन अनसुने नामों, रोंगटे खड़े कर देने वाले आंकड़ों और प्रशासनिक व्यवस्था के उस खोखलेपन का पर्दाफाश करेंगे, जो यह साबित करता है कि भारत में जान बचाना घाटे का सौदा और जान जाने देना एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया बन चुका है।
गुमनाम मौतें: जब सिर्फ एक आंकड़ा बनकर रह गए जीते-जागते इंसान
देश के किसी न किसी कोने से हर दिन ऐसी खबरें आती हैं जो कुछ पल के लिए दिल को दहला देती हैं, लेकिन अगले ही दिन वे अखबार के किसी कोने में दफन हो जाती हैं। आइए सबसे पहले उन चेहरों को याद करें जिनकी जिंदगी किसी न किसी लापरवाही की भेंट चढ़ गई।
साहिल धनेशरा (उम्र 23 वर्ष)
दिल्ली के द्वारका में साहिल धनेशरा जब अपनी मोटरसाइकिल से घर लौट रहा था। तभी एक तेज रफ्तार एसयूवी (SUV) ने उसे टक्कर मार दी। आरोप है कि उस गाड़ी को एक 17 साल का नाबालिग लड़का चला रहा था। गाड़ी की रफ्तार इतनी तेज थी कि साहिल को संभलने का मौका तक नहीं मिला और मौके पर ही उसकी मौत हो गई।
ट्विशा शर्मा (उम्र 31 वर्ष)
भोपाल में हुए एक बेहद चर्चित और हाई-प्रोफाइल संदिग्ध मौत मामले से जुड़ी मॉडल ट्विशा शर्मा एक जानी-मानी मॉडल और ब्यूटी पेजेंट की विजेता थीं। ग्लैमर की दुनिया का यह चमकता चेहरा एक दिन अपने ससुराल में फंदे से लटका हुआ पाया गया। उनकी मौत के बाद उनकी पूर्व जज सास गिरिबाला सिंह और पति समर्थ को दहेज हत्या, प्रताड़ना और आत्महत्या के लिए उकसाने के गंभीर आरोपों में जेल भेज दिया गया।
शहजाद अली (उम्र 25 वर्ष)
शहजाद एक बेघर और गरीब पेंटर था, जो दिनभर मेहनत कर सड़कों के किनारे सो जाता था। एक रात एक चमचमाती काले रंग की लग्जरी कार उसे कुचलते हुए निकल गई। हैरानी की बात यह है कि सड़क पर लगे तमाम सीसीटीवी (CCTV) कैमरे उस गाड़ी की पहचान करने में पूरी तरह नाकाम रहे।
आदित्य (उम्र 6 वर्ष)
छह साल का मासूम आदित्य अपने घर के बाहर खेल रहा था, तभी आवारा कुत्तों के एक हिंसक झुंड ने उस पर हमला कर दिया। उस मासूम की चीखें किसी को सुनाई नहीं दीं और कुत्तों ने उसे नोच-नोच कर मार डाला।
रिंकू (उम्र 16 वर्ष)
रिंकू उस समाज से आता था जिसे इस आधुनिक दौर में भी हाथ से मैला उठाने जैसे अमानवीय काम में धकेला जाता है। उसके पिता एक गहरे और जहरीली गैस से भरे सेप्टिक टैंक में फंस गए थे। अपने पिता की जान बचाने के लिए 16 साल का यह बच्चा उस मानव मल से भरे गड्ढे में उतर गया। जहरीली गैस के कारण दोनों बाप-बेटे की तड़प-तड़प कर मौत हो गई।
रोहित लाल (उम्र 29 वर्ष)
रोहित को एक मामूली बीमारी हुई थी, जिसके लिए उसने बाजार से दवा खरीदी। उसे नहीं पता था कि वह दवा नकली है। उस नकली दवा के जानलेवा असर के कारण रोहित को एक भयानक दिल का दौरा पड़ा और उसकी जान चली गई।
इसी तरह की एक अन्य घटना में महाराष्ट्र के भीतर नकली और जहरीली शराब पीने से 14 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई, जिनके नाम कभी सरकारी रिकॉर्ड से बाहर ही नहीं आ पाए।
सादिम मैला (उम्र 41 वर्ष)
मणिपुर के एक छोटे से गांव में रहने वाली सादिम एक दिन सब्जी के खेत में मृत पाई गईं। उनके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया था और बेहद बेरहमी से उनकी हत्या कर दी गई थी।
यह केवल कुछ नाम नहीं हैं, बल्कि यह उस व्यवस्था का जीता-जागता प्रमाण हैं जहां हर दिन हजारों लोग गुमनामी के अंधेरे में समा जाते हैं।
रोंगटे खड़े कर देने वाले आंकड़े: जो खुद सरकार ने संसद में माने
जब हम इन मौतों को आंकड़ों के चश्मे से देखते हैं, तो सच्चाई और भी भयावह नजर आती है। ये वो आंकड़े हैं जिन्हें खुद सरकार ने संसद के पटल पर रखा है या राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) ने जारी किया है।
ये अलग-अलग राज्य, अलग-अलग साल और अलग-अलग कारण हैं, लेकिन इन सबके पीछे एक ही सोच काम करती है: "किसी इंसान की जान बचाने के लिए नियम-कानून लागू करने का प्रशासनिक खर्च, उसकी मौत के बाद दिए जाने वाले मुआवजे से कहीं ज्यादा होता है।"
जवाबदेही से बचने का तंत्र
स्वतंत्र भारत ने अपनी नीतियों के दम पर 1943 के 'बंगाल अकाल' जैसी महात्रासदियों को तो दोबारा नहीं होने दिया, जहां नीतिगत विफलताओं के कारण 30 लाख लोग भूख से मर गए थे। लेकिन अकाल भले ही खत्म हो गया हो, पर इंसानी जिंदगी को एक फालतू खर्च समझने वाली औपनिवेशिक (औपनिवेशिक यानी अंग्रेजों के जमाने की) सोच आज भी प्रशासनिक तंत्र में जिंदा है।
समकालीन भारत में इस जवाबदेही से बचने के लिए 4 प्रमुख संस्थागत रास्ते अपनाए जाते हैं:
1. जांच और निरीक्षण का भ्रष्टाचार
चाहे बेंगलुरु का नागरिक निकाय (BBMP) हो या हैदराबाद का नगर निगम, भ्रष्टाचार हर स्तर पर फैला है। हैदराबाद में एंटी-करप्शन ब्यूरो की जांच में सामने आया था कि अधिकारी अवैध निर्माण को मंजूरी देने के लिए प्रति मंजिल 50,000 से 1 लाख रुपये तक की रिश्वत लेते हैं। वहीं मुंबई में साल 2024 में एक बीएमसी (BMC) अधिकारी को घाटकोपर में दो अवैध मंजिलों को नजरअंदाज करने के लिए 2 करोड़ रुपये की रिश्वत की पहली किस्त के रूप में 75 लाख रुपये लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया था।
बिल्डरों के लिए यह सौदा बहुत आसान होता है। वे अधिकारियों को कुछ लाख रुपये की रिश्वत देकर करोड़ों की अवैध इमारत खड़ी कर लेते हैं और उसे बेचकर या किराए पर देकर तुरंत अपना पैसा वसूल कर लेते हैं।
2. अधिकारियों को मिलने वाला कानूनी संरक्षण
जब कोई इमारत गिरती है या किसी मॉल या होटल में आग लगती है, तो पुलिस तुरंत प्राइवेट बिल्डर या मालिक को गिरफ्तार कर लेती है। लेकिन उन म्यूनिसिपल इंस्पेक्टरों, फायर अफसरों और लाइसेंस देने वाले अधिकारियों का क्या, जिन्होंने आंखें मूंदकर उस मौत के कुएं को हरी झंडी दिखाई थी? वे हमेशा सुरक्षित बच निकलते हैं।
3. अदालतों की कछुआ चाल
भारतीय अदालतों में इस समय 5 करोड़ से ज्यादा मामले लंबित हैं। किसी हादसे के बाद शुरू हुआ मुकदमा दशकों तक खिंचता रहता है। जब तक कोर्ट का फैसला आता है, तब तक जनता की याददाश्त से वह हादसा पूरी तरह गायब हो चुका होता है।
4. गरीबों के कल्याणकारी कोष में डाका
नेताओं और अफसरों का यह गठजोड़ सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं है। साल 2017 में एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि कृषि सब्सिडी का लगभग 35,000 करोड़ रुपये नई दिल्ली और चंडीगढ़ जैसी जगहों पर बैठे उन फर्जी लोगों और संस्थाओं को दे दिया गया, जहां दूर-दूर तक कोई खेती नहीं होती। वहीं महाराष्ट्र में लगभग 60 फीसदी कृषि ऋण और सरकारी योजनाएं मुंबई के रसूखदारों को बांट दी गईं, जबकि असली किसान कर्ज के बोझ तले दबा रहा।
प्रवासी मजदूर: देश बनाने वाले, लेकिन खुद 'फालतू' समझने वाले
भारत में लगभग 40 करोड़ आंतरिक प्रवासी मजदूर हैं। यह दुनिया की सबसे बड़ी प्रवासी आबादी है। ये लोग बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे राज्यों से पलायन कर दिल्ली, मुंबई, गोवा और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में आते हैं। ये हमारे लिए गगनचुंबी इमारतें बनाते हैं, सड़कें खोदते हैं, कंक्रीट मिलाते हैं और होटलों में खाना परोसते हैं। लेकिन इस देश की राजनैतिक अर्थव्यवस्था में इनकी हैसियत आज भी अंग्रेजों के जमाने जैसी ही है सस्ती और पूरी तरह से उपभोज्य (यानी इस्तेमाल करो और फेंक दो)।
कुछ दिल दहला देने वाली घटनाएं:
प्रयागराज (अप्रैल 2025): एक निर्माणाधीन रेलवे सबस्टेशन के भीतर सो रहे एक मजदूर और उसके तीन मासूम बच्चों को एक तेज रफ्तार डंपर ट्रक ने कुचल दिया। चारों की मौके पर ही मौत हो गई।
नासिक (अप्रैल 2025): बिहार से आए प्रवासी मजदूरों का 18 महीने का बच्चा रौनक कनोजे एक कंस्ट्रक्शन साइट पर बने पानी से भरे गड्ढे में डूब गया। उसके माता-पिता कुछ ही दूरी पर बैठकर दोपहर का खाना खा रहे थे।
नियम के मुताबिक 'भवन और अन्य निर्माण श्रमिक (BOCW) अधिनियम 1996' के तहत हर बड़ी साइट पर मजदूरों के बच्चों के लिए क्रेच (शिशु गृह), स्कूल, रहने के लिए पक्के मकान और बीमा की सुविधा देना अनिवार्य है। लेकिन जमीन पर यह कानून सिर्फ कागजों तक सीमित है। साल 2023 में श्रम मामलों की संसदीय स्थाई समिति ने साफ कहा था कि भारत जिस ढर्रे पर चल रहा है, उससे वह 2025 तक बाल श्रम को खत्म करने के अपने वादे को कभी पूरा नहीं कर पाएगा। लेकिन इस नाकामी पर किसी भी बड़े अधिकारी ने इस्तीफा नहीं दिया।
प्रवासी मजदूर का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि वह जिस शहर को अपना खून-पसीना देकर बनाता है, वहां उसका कोई राजनैतिक वजूद नहीं होता। उसका नाम वहां की वोटर लिस्ट में नहीं होता, इसलिए स्थानीय नेताओं के लिए उसकी मौत का कोई चुनावी नुकसान नहीं होता। वह सिर्फ एक बाहरी व्यक्ति बनकर रह जाता है।
आधी आबादी का दर्द: दहेज की आग और सुरक्षा का अभाव
देश में हर साल आग लगने से मरने वाले 27,000 लोगों में से लगभग दो-तिहाई महिलाएं होती हैं। इसके पीछे खराब केरोसिन स्टोव, सिंथेटिक कपड़े और असुरक्षित रसोईघर तो कारण हैं ही, लेकिन इसका एक बड़ा और खौफनाक पहलू दहेज उत्पीड़न भी है।
साल 2017 से 2022 के बीच हर साल लगभग 7,000 महिलाओं को दहेज के कारण मार दिया गया। हालांकि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304B के तहत इसके लिए सख्त से सख्त सजा का प्रावधान है, लेकिन अदालतों में दोषियों को सजा मिलने की दर बेहद निराशाजनक है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्य देश की कुल दहेज मौतों का 65 प्रतिशत हिस्सा समेटे हुए हैं। अकेले उत्तर प्रदेश में साल 2022 में 2,218 दहेज हत्याएं दर्ज की गईं, जिनमें से ज्यादातर मामलों में छह महीने बाद भी जांच पूरी नहीं हो सकी थी।
इसके अलावा, आंकड़ों को छुपाने का एक खेल भी चलता है। दहेज प्रताड़ना से तंग आकर आत्महत्या करने वाली कई महिलाओं की मौत को सामान्य 'घरेलू आत्महत्या' की श्रेणी में डाल दिया जाता है। एक शोध के मुताबिक, घरेलू हिंसा के कारण मरने वाली हर 100 महिलाओं में से बमुश्किल एक मामले में अपराधी को सजा मिल पाती है।
रसूखदारों की VIP सड़कें और गरीबों के जानलेवा फुटपाथ
इस देश का कानून अमीर और गरीब के लिए किस तरह अलग व्यवहार करता है, इसे कुछ बड़े मामलों से आसानी से समझा जा सकता है।
सलमान खान हिट-एंड-रन केस (2002)
28 सितंबर 2002 की रात मुंबई के एक फुटपाथ पर सो रहे बेघर लोगों पर बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान की एसयूवी चढ़ गई। इस हादसे में एक व्यक्ति की मौत हो गई और चार घायल हो गए। 13 साल तक चले लंबे मुकदमे के बाद अभिनेता को बरी कर दिया गया क्योंकि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि गाड़ी वही चला रहे थे। लेकिन इस मामले के मुख्य गवाह और पुलिस कांस्टेबल रवींद्र पाटिल, जिन्होंने शुरुआत में बयान दिया था कि सलमान ही गाड़ी चला रहे थे, उन्हें नौकरी से हाथ धोना पड़ा और वे सालों तक अपनी गवाही की रक्षा करते हुए अंततः अत्यधिक गरीबी और बीमारी के कारण दम तोड़ गए।
पुणे पोर्श कार हादसा (2024)
यही कहानी साल 2024 में पुणे में दोहराई गई। एक अमीर बिल्डर के 17 साल के बेटे वेदांत अग्रवाल ने अपनी करोड़ों की पोर्श कार से दो युवा आईटी प्रोफेशनल्स को कुचलकर मार डाला। घटना के तुरंत बाद उसे जमानत दे दी गई और कोर्ट ने उसे सड़क सुरक्षा पर महज 300 शब्दों का एक निबंध लिखने की सजा सुनाई। बाद में जांच में खुलासा हुआ कि लड़के को बचाने के लिए उसके खून के नमूनों तक को बदलने की कोशिश की गई थी।
ढांचागत आपदाएं और रसूखदारों को क्लीन चिट
मोरबी पुल हादसा (2022): गुजरात के मोरबी में केबल पुल टूटने से 135 लोगों की जान चली गई थी। पुल की मरम्मत करने वाली ओरेवा कंपनी के मालिकों ने इसे 'भगवान की मर्जी' (Act of God) बताया। छोटे कर्मचारियों को जेल हुई, लेकिन मुख्य प्रमोटर जयसुख पटेल को आसानी से जमानत मिल गई और कोर्ट ने उन पर आरोप तय करने पर रोक लगा दी।
बिहार के पुलों का गिरना: बिहार में गंगा नदी पर बन रहा अगवानी-सुल्तानगंज पुल आईआईटी रुड़की की चेतावनियों के बावजूद तीन बार ताश के पत्तों की तरह ढह गया। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि उस ठेकेदार कंपनी को आज तक ब्लैकलिस्ट (प्रतिबंधित) नहीं किया गया।
गंभीरा पुल हादसा, गुजरात (जुलाई 2025): इस पुल के अचानक ढहने से 22 लोगों की जान चली गई, जहां शुरुआती जांच में घटिया निर्माण सामग्री और खराब रखरखाव की बात सामने आई।
नोएडा हादसा (जनवरी 2026): 27 साल के सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की कार नोएडा में एक कंस्ट्रक्शन साइट पर खोदे गए गहरे और पानी से भरे गड्ढे में गिर गई। चारों तरफ कोई बैरिकेडिंग नहीं थी। युवराज अपनी कार की छत पर चढ़कर घंटों मदद के लिए चिल्लाते रहे, लेकिन समय पर मदद न मिलने के कारण वे डूब गए।
जबलपुर नाव हादसा (अप्रैल 2026): बरगी बांध के जलाशय में एक पर्यटक नाव तूफान के कारण पलट गई, जिसमें 13 लोगों की मौत हो गई। यात्रियों के पास लाइफ जैकेट तक नहीं थे और राहत कार्य घंटों देरी से शुरू हुआ।
आवारा कुत्तों का आतंक: जब इंसानी जान से बड़े हुए जानवरों के अधिकार
भारत इस समय दुनिया में आवारा कुत्तों की सबसे बड़ी आबादी (लगभग 6.2 करोड़) वाला देश बन चुका है। साल 2024 में देश के भीतर 37 लाख से ज्यादा डॉग-बाइट (कुत्तों के काटने) के मामले सामने आए। अकेले देश की राजधानी दिल्ली में 25,000 से ज्यादा मामले दर्ज किए गए। लेकिन इस समस्या का शिकार भी हमेशा समाज का सबसे गरीब तबका ही बनता है।
कुछ रोंगटे खड़े कर देने वाले उदाहरण:
बेंगलुरु (फरवरी 2025): रायचूर से आए 22 साल के मजदूर नागराजू को आवारा कुत्तों के एक झुंड ने नोच-नोच कर मार डाला। उस इलाके में एक ही साल के भीतर एक ही प्लॉट के पास से यह तीसरी लाश मिली थी।
भोपाल (2024): अपनी मां के बगल में सो रहे सात महीने के एक मासूम बच्चे को आवारा कुत्ते उठाकर ले गए और उसे मार डाला।
बेंगलुरु (2011): ओडिशा के प्रवासी मजदूरों के बिना दरवाजे वाले झोपड़े में रात को कुत्ते घुस गए और वहां सो रहे 18 महीने के प्रशांत को घसीटकर बाहर ले गए और उसकी जान ले ली।
अगस्त 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने इस गंभीर स्थिति पर खुद संज्ञान लिया और नगर निगमों को आदेश दिया कि वे स्कूलों, अस्पतालों और सार्वजनिक जगहों के आसपास फेंसिंग (बाड़) लगाएं और इन कुत्तों को शेल्टर होम में भेजें। लेकिन पशु कल्याण संगठनों ने इस आदेश को तुरंत अदालत में चुनौती दे दी। उन्होंने तर्क दिया कि यह नियम कुत्तों को उनके इलाके से हटाने की इजाजत नहीं देता। नतीजा यह हुआ कि कानूनी लड़ाई चलती रही और कुत्ते आज भी सड़कों पर इंसानों के लिए काल बने हुए हैं। नगर निगमों का 'एनिमल बर्थ कंट्रोल' (नसबंदी) कार्यक्रम भ्रष्टाचार और फंड की कमी के कारण पूरी तरह फेल हो चुका है।
सांप्रदायिक हिंसा की राजनीति: दंगों की राजनैतिक अर्थव्यवस्था
साल 2020 के फरवरी महीने में उत्तर-पूर्वी दिल्ली तीन दिनों तक सांप्रदायिक आग में जलती रही। इस हिंसा में 53 लोगों की जान चली गई। दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग ने बाद में अपनी रिपोर्ट में इसे "पूरी तरह से नियोजित और लक्षित" बताया था। पेट्रोल बम, लोहे की रॉड और हथियारों से लैस भीड़ जाफराबाद, मुस्तफाबाद और मौजपुर की गलियों में तांडव मचा रही थी।
रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी विभूति नारायण राय के मुताबिक, "कोई भी सांप्रदायिक दंगा तब तक कुछ घंटों से ज्यादा नहीं खिंच सकता, जब तक कि उसे प्रशासन या सत्ता का मूक समर्थन हासिल न हो।"
भारत में दंगों और मॉब लिंचिंग का इस्तेमाल अक्सर राजनैतिक ध्रुवीकरण के लिए किया जाता है। लेकिन इसका खामियाजा हमेशा गरीब और अल्पसंख्यक भुगतते हैं। इंसाफ की हालत यह है कि 1984 के सिख दंगों के दोषियों को सजा मिलने की शुरुआत 2018 में जाकर हुई। 2014 से 2023 के बीच देश में मॉब लिंचिंग के 189 मामले सामने आए, लेकिन उनमें सजा मिलने की दर सिर्फ 10 फीसदी रही। साल 2025 के एक पुलिस सर्वे में यह चौंकाने वाली बात सामने आई कि आधे से ज्यादा पुलिसकर्मी भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा को किसी न किसी रूप में सही मानते हैं।
सीवर में मौत: जातिवाद और अमानवीयता का वो अंधकुआं
भारत ने अंतरिक्ष में झंडे गाड़ दिए हैं, लेकिन आज भी हमारे देश में इंसानों को गटर साफ करने के लिए मौत के कुएं में उतारा जाता है। 'मैला ढोने की प्रथा और उनका पुनर्वास अधिनियम 2013' के तहत इंसानों का सीवर में उतरना पूरी तरह गैरकानूनी है। जनवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने महानगरों में इस पर पूरी तरह रोक लगाने का आदेश भी दोहराया था।
लेकिन इसके बावजूद:
नरेला, दिल्ली (फरवरी 2025): बिना किसी सुरक्षा उपकरण और ऑक्सीजन मास्क के दो सफाई कर्मचारियों को सीवर साफ करने के लिए नीचे उतारा गया, जहां जहरीली गैस के कारण दोनों की मौत हो गई।
कोलकाता (फरवरी 2025): मुर्शिदाबाद से आए तीन कर्मचारी कोलकाता मेट्रोपॉलिटन डेवलपमेंट अथॉरिटी के एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे, तभी अचानक सीवर की पाइप फट गई और वे गंदे पानी के तेज बहाव में बह गए।
साल 2014 से 2025 के बीच भारत में सीवर और सेप्टिक टैंक साफ करते समय कम से कम 859 सफाई कर्मचारियों की मौत हो चुकी है। यानी हर पांच दिन में एक मौत! सफाई कर्मचारी आंदोलन के मुताबिक अकेले 2024 में 116 लोगों की मौत हुई, जबकि सरकार ने अपने आंकड़ों में सिर्फ 54 मौतें दिखाईं। मरने वाले ये सभी लोग दलित समाज के होते हैं, जिन्हें सदियों से इस अमानवीय काम में धकेला गया है। सरकार की 'नमस्ते' (NAMASTE) योजना, जो सीवर सफाई के मशीनीकरण के लिए बनाई गई थी, जमीन पर पूरी तरह नाकाम साबित हुई है। 2001 से 2022 के बीच इस कानून के तहत पूरे देश में सिर्फ दो मामलों में ट्रायल शुरू हुआ और सजा सिर्फ एक व्यक्ति को हुई।
महंगे प्राइवेट अस्पताल और दम तोड़ता सरकारी सिस्टम
भारत में अपोलो, फोर्टिस और नारायणा हेल्थ जैसे बेहतरीन प्राइवेट अस्पताल हैं, जहां दुनिया भर से लोग इलाज कराने आते हैं। भारत दुनिया भर में सस्ती जेनेरिक दवाएं सप्लाई करने वाला सबसे बड़ा देश है। लेकिन भारत के अपने नागरिकों के लिए स्वास्थ्य व्यवस्था किसी बुरे सपने जैसी है।
राष्ट्रीय बीमा अकादमी की 2023 की रिपोर्ट के मुताबिक, 73 प्रतिशत भारतीयों के पास कोई स्वास्थ्य बीमा (Health Insurance) नहीं है। सरकार की 'आयुष्मान भारत' योजना के लाभार्थियों में से भी केवल 35 प्रतिशत लोग ही अस्पताल में भर्ती होने पर इसका लाभ उठा पाते हैं। अस्पतालों को सरकार से समय पर पैसा नहीं मिलता, इसलिए कई बड़े अस्पतालों ने इस योजना से अपने हाथ खींच लिए हैं।
भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का महज 1.3 प्रतिशत हिस्सा ही जन स्वास्थ्य पर खर्च करता है, जो दुनिया में सबसे कम दरों में से एक है। लोगों को अपनी जेब से इलाज का खर्च उठाना पड़ता है, जिससे हर साल करोड़ों लोग गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं। गाम्बिया और उजबेकिस्तान में भारतीय कफ सिरप पीने से हुई बच्चों की मौत ने हमारे ड्रग रेगुलेशन सिस्टम की पोल खोल दी थी। देश के भीतर नकली दवाओं और मेडिकल लापरवाही के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ना किसी आम परिवार के बस की बात नहीं है।
जल, जंगल, जमीन: आदिवासियों के विनाश पर खड़ी तरक्की
भारत का असली खनिज खजाना- लोहा, बॉक्साइट, कोयला और लिथियम, उन इलाकों में है जहां देश का सबसे सीधा और शांत समाज यानी 'आदिवासी' रहता है। बस्तर, झारखंड के पठार और ओडिशा की पहाड़ियां इसका केंद्र हैं। लेकिन इस विकास मॉडल की सबसे बड़ी कीमत भी इन्हीं आदिवासियों को चुकानी पड़ी है।
जनवरी 2006 में ओडिशा के कलिंगनगर में टाटा स्टील प्लांट के लिए जमीन अधिग्रहण का विरोध कर रहे आदिवासियों पर पुलिस ने अंधाधुंध गोलियां चला दी थीं, जिसमें 12 आदिवासियों की मौत हो गई थी। आदिवासियों ने अपने हक के लिए कई दिनों तक शवों को हाईवे से नहीं हटने दिया था। संविधान की पांचवीं अनुसूची और पेसा (PESA) कानून आदिवासियों की जमीन की रक्षा करने और ग्राम सभा की अनुमति को अनिवार्य बनाते हैं। लेकिन कॉर्पोरेट घरानों और नौकरशाही के दबाव में इन कानूनों को आसानी से दरकिनार कर दिया जाता है।
बस्तर में सुरक्षा अभियानों के नाम पर कई बार निर्दोष ग्रामीणों और बच्चों के मारे जाने के आरोप लगते रहे हैं। विस्थापन का विरोध करने वाले संगठन 'मूलवासी बचाओ मंच' को 2024 में प्रतिबंधित कर दिया गया और इसके अध्यक्ष को 2025 में यूएपीए (UAPA) के तहत जेल में डाल दिया गया। साल 2022 में छत्तीसगढ़ के एक आदिवासी परिवार की औसत सालाना आय महज 53,610 रुपये थी। जब इनसे इनकी जमीन छीन ली जाती है, तो इनके पास जिंदा रहने का कोई और जरिया नहीं बचता।
कैसे बेहतर और सुरक्षित बन सकता है हमारा भारत?
यह ऐसा संकट नहीं है जिसका समाधान हमारे पास न हो। कई सरकारी समितियों और एक्सपर्ट्स ने बार-बार इसके उपाय सुझाए हैं:
सख्त ऑडिट और पारदर्शिता: सभी व्यावसायिक और सार्वजनिक इमारतों का हर साल स्वतंत्र फायर और स्ट्रक्चरल ऑडिट होना चाहिए और उसकी रिपोर्ट ऑनलाइन सार्वजनिक की जानी चाहिए।
अधिकारियों पर सीधे आपराधिक मुकदमे: अगर किसी अवैध इमारत के गिरने या आग लगने से मौत होती है, तो सिर्फ बिल्डर नहीं, बल्कि उस इलाके के म्यूनिसिपल इंस्पेक्टर और संबंधित अधिकारी पर सीधे गैर-इरादतन हत्या का मुकदमा चलना चाहिए और उन्हें जेल भेजा जाना चाहिए।
फास्ट-ट्रैक अदालतें: लापरवाही और सार्वजनिक हादसों से जुड़े मामलों के लिए विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतें बननी चाहिए, जो अधिकतम छह महीने के भीतर अपना फैसला सुनाएं।
प्रवासी मजदूरों के लिए पोर्टेबल वोटिंग राइट्स: जब तक प्रवासी मजदूरों को उस शहर में वोट डालने का अधिकार नहीं मिलेगा जहां वे काम करते हैं, तब तक कोई भी राजनैतिक दल उनके प्रति जवाबदेह नहीं होगा।
डिजिटल और पारदर्शी सिंगल-विंडो सिस्टम: बिल्डिंग प्लान और एनओसी (NOC) देने की पूरी प्रक्रिया को इंसानी दखल से मुक्त करके पूरी तरह डिजिटल किया जाना चाहिए, ताकि रिश्वतखोरी की गुंजाइश खत्म हो सके।
क्या हम वाकई एक संवेदनशील समाज हैं?
आज जब आप यह रिपोर्ट पढ़ रहे हैं, ठीक इसी समय देश के किसी न किसी कोने में कोई बिल्डिंग इंस्पेक्टर किसी ऐसी मंजिल को मंजूरी दे रहा होगा जो नक्शे में है ही नहीं। कोई फायर ऑफिसर बिना साइट पर जाए एनओसी के पेपर पर साइन कर रहा होगा। कोई गरीब किसान यह सोचकर अपनी जान देने की तैयारी कर रहा होगा कि उसकी मौत के बाद मिलने वाले सरकारी मुआवजे से उसके परिवार का कर्ज उतर जाएगा। कोई मासूम बच्चा किसी कंस्ट्रक्शन साइट पर मौत के खुले गड्ढे के पास खेल रहा होगा।
यह सब सरकार को पता है, क्योंकि यह सारा डेटा उन्हीं रिपोर्टों में दर्ज है जिन्हें सरकार हर साल खुद छापती है। अब सवाल यह है कि क्या हमारा यह देश, हमारा यह समाज और हमारा यह सिस्टम इन मौतों को एक गंभीर समस्या मानता भी है या नहीं? या फिर हमने यह मान लिया है कि इस देश को चलाने और सुपरपावर बनाने के लिए गरीबों और आम नागरिकों की इन चंद सस्ती मौतों की कीमत चुकाना बेहद मामूली बात है? फैसला देश के नागरिकों और नीति-निर्माताओं को करना है।


