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ITR Deadline 2026: 31 जुलाई के बाद ITR फाइल किया तो लग सकते हैं ये 5 बड़े झटके
ITR Deadline 2026: 31 जुलाई के बाद ITR फाइल करने पर लेट फीस, ब्याज, टैक्स रिफंड, पुरानी टैक्स रिजीम और लोन पर क्या असर होगा, जानें।
ITR Deadline 2026: 5 Major Consequences of Filing Income Tax Return After July 31
ITR Deadline 2026: अगर आपने अभी तक इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल नहीं किया है, तो 31 जुलाई का इंतजार करना भारी पड़ सकता है। कई लोग यह मानकर चलते हैं कि तय तारीख निकल जाने के बाद थोड़ा जुर्माना भरकर रिटर्न दाखिल किया जा सकता है। वास्तविकता यह है कि ITR की डेडलाइन चूकने का असर सिर्फ लेट फीस तक सीमित नहीं रहता। इससे टैक्स पर अतिरिक्त ब्याज देना पड़ सकता है, रिफंड पर मिलने वाला ब्याज हाथ से निकल सकता है, शेयर बाजार या कारोबार में हुए नुकसान को आगे ले जाने का अधिकार खत्म हो सकता है और कई मामलों में पुरानी टैक्स व्यवस्था चुनने का विकल्प भी नहीं बचता।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि अंतिम दिनों में पोर्टल पर अधिक ट्रैफिक की वजह से तकनीकी दिक्कतें भी आ सकती हैं। ऐसे में आखिरी समय का इंतजार करने के बजाय समय रहते रिटर्न दाखिल करना बेहतर विकल्प है।
डेडलाइन के बाद लगेगी लेट फीस
आयकर अधिनियम की धारा 234F के तहत तय समय सीमा के बाद ITR दाखिल करने पर लेट फीस देनी पड़ती है। जिन करदाताओं की कुल आय 5 लाख रुपये से अधिक है, उन्हें अधिकतम 5,000 रुपये तक की लेट फीस चुकानी पड़ सकती है। वहीं, 5 लाख रुपये तक की आय वाले पात्र करदाताओं के लिए यह राशि अधिकतम 1,000 रुपये है। यानी केवल कुछ दिन की देरी भी आपकी जेब पर अतिरिक्त बोझ डाल सकती है।
बकाया टैक्स पर हर महीने 1% ब्याज देना होगा
अगर आपके ऊपर टैक्स देनदारी बनती है और आपने 31 जुलाई तक रिटर्न दाखिल नहीं किया, तो आयकर अधिनियम की धारा 234A के तहत बकाया टैक्स पर हर महीने 1 प्रतिशत की दर से ब्याज देना पड़ सकता है। यह ब्याज 1 अगस्त से शुरू होकर रिटर्न दाखिल करने की तारीख तक जुड़ता रहता है। देरी जितनी ज्यादा होगी, ब्याज का बोझ भी उतना ही बढ़ेगा।
शेयर बाजार और बिजनेस में हुए नुकसान का नहीं मिलेगा फायदा
यह नियम खासकर शेयर बाजार में निवेश करने वाले और कारोबार करने वाले लोगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यदि आपने समय पर ITR दाखिल नहीं किया, तो शेयरों में हुए कैपिटल लॉस, बिजनेस लॉस या प्रोफेशनल लॉस को अगले वर्षों में कैरी फॉरवर्ड नहीं कर पाएंगे। इसका मतलब यह है कि भविष्य में इन नुकसान को मुनाफे से समायोजित कर टैक्स बचाने का अवसर समाप्त हो सकता है।
रिफंड के ब्याज में भी होगा नुकसान
कई कर्मचारियों और वेतनभोगी करदाताओं का TDS जरूरत से ज्यादा कट जाता है। जिसके कारण उन्हें आयकर विभाग से रिफंड मिलता है। आयकर अधिनियम की धारा 244A के तहत इस रिफंड पर ब्याज भी दिया जाता है। लेकिन यदि ITR दाखिल करने में देरी होती है, तो देरी की अवधि के लिए ब्याज का लाभ नहीं मिलता। यानी रिफंड तो मिलेगा, लेकिन उस पर मिलने वाली अतिरिक्त राशि कम हो सकती है।
पुरानी टैक्स रिजीम चुनने का मौका भी छूट सकता है
वर्तमान में नई टैक्स व्यवस्था डिफॉल्ट टैक्स रिजीम है। ऐसे करदाता जो पुरानी टैक्स व्यवस्था के तहत धारा 80C, 80D, HRA या अन्य टैक्स छूट का लाभ लेना चाहते हैं, उनके लिए समय पर रिटर्न दाखिल करना बेहद जरूरी है। कई मामलों में बिलेटेड रिटर्न दाखिल करने पर पुरानी टैक्स व्यवस्था चुनने का विकल्प उपलब्ध नहीं रहता। ऐसे में करदाता को नई टैक्स व्यवस्था के तहत ही टैक्स चुकाना पड़ सकता है।
लोन और वित्तीय प्रोफाइल पर भी पड़ सकता है असर
आज के समय में बैंक और वित्तीय संस्थान होम लोन, कार लोन, एजुकेशन लोन या बिजनेस लोन मंजूर करने से पहले पिछले दो से तीन वर्षों का ITR मांगते हैं। समय पर ITR दाखिल करने का रिकॉर्ड आपकी वित्तीय विश्वसनीयता को मजबूत बनाता है। यदि रिटर्न समय पर दाखिल नहीं किया गया, तो भविष्य में लोन प्रक्रिया के दौरान अतिरिक्त सवालों या देरी का सामना करना पड़ सकता है।
आखिरी समय में इन बातों का रखें ध्यान
ITR दाखिल करने से पहले Form 16, Annual Information Statement (AIS), Taxpayer Information Summary (TIS), Form 26AS और बैंक खाते की जानकारी का मिलान जरूर कर लें। सभी जानकारियां सही भरने के बाद रिटर्न का ई-वेरिफिकेशन करना भी जरूरी है। बिना ई-वेरिफिकेशन के ITR की प्रक्रिया पूरी नहीं मानी जाती।


