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‘बाप की यूनिवर्सिटी है क्या?’ FIR के बाद इमरान मसूद का खुला चैलेंज, बोले- जितनी मर्जी कर लो FIR हम…
Jamia Imran Masood Row: जामिया विवाद में एफआईआर के बाद इमरान मसूद ने कहा, ‘जामिया क्या उनके बाप की यूनिवर्सिटी है?’ उन्होंने कहा कि जितनी मर्जी एफआईआर कर लो, छात्रों से मिलने जामिया जरूर जाएंगे।
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Jamia Imran Masood Row: जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी (Jamia Millia Islamia University) में छात्र संघ चुनाव (Students’ Union Election) बहाल करने की मांग को लेकर चल रहा विवाद अब और बढ़ता नजर आ रहा है। रविवार को यूनिवर्सिटी प्रशासन की शिकायत पर दिल्ली पुलिस (Delhi Police) ने कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी (Imran Pratapgarhi), इमरान मसूद (Imran Masood) समेत अन्य नेताओं के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज की। हालांकि, एफआईआर दर्ज होने के बाद भी इमरान मसूद पीछे हटने के मूड में नहीं हैं।
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने साफ कर दिया है कि वह छात्रों से मिलने जामिया जरूर जाएंगे। उनका कहना है कि उन पर चाहे जितनी एफआईआर दर्ज कर दी जाएं, उन्हें छात्रों से मिलने से कोई नहीं रोक सकता।
‘जितनी मर्जी FIR कर लो, हम जाएंगे’
इमरान मसूद ने जामिया जाने को लेकर बेहद आक्रामक अंदाज में अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि वह छात्रों से मिलने जामिया जाएंगे और उन्हें कोई रोक नहीं सकता। उन्होंने कहा, ‘जामिया क्या उनके बाप की यूनिवर्सिटी है? कैसे नहीं जाने देंगे मुझे, मिलने नहीं देंगे हमें अपने बच्चों से। जितनी मर्जी एफआईआर कर लो। हम जाएंगे।’
इमरान मसूद के इस बयान के बाद जामिया का छात्रसंघ चुनाव (Students’ Union Election) विवाद और ज्यादा राजनीतिक हो गया है। एक तरफ यूनिवर्सिटी प्रशासन की शिकायत पर नेताओं के खिलाफ पुलिस कार्रवाई हुई है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस नेता ने साफ कर दिया है कि वह छात्रों से मिलने के अपने फैसले से पीछे नहीं हटेंगे।
खरगे के बयान पर भी सियासत तेज
इस पूरे विवाद के बीच कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे (Mallikarjun Kharge) के बयान को लेकर भी राजनीतिक माहौल गरमा गया है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) इस मुद्दे को लेकर देश भर में मल्लिकार्जुन खरगे के खिलाफ विरोध प्रदर्शन (Protest) करने की तैयारी में है।
इमरान मसूद ने इस मामले में मल्लिकार्जुन खरगे का बचाव किया है। उन्होंने बीजेपी पर पलटवार करते हुए कहा कि बीजेपी के नेता भी इसी तरह की भाषा का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में उन्हें भी उसी तरह का जवाब मिलेगा। इमरान मसूद के इस बयान से साफ है कि जामिया विवाद अब सिर्फ यूनिवर्सिटी परिसर तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसे लेकर कांग्रेस और बीजेपी के बीच राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है।
करीब दो दशक बाद छात्रसंघ चुनाव का रास्ता खुला
दरअसल, जामिया मिलिया इस्लामिया में करीब दो दशक बाद छात्रसंघ चुनाव (Student Union Polls) कराने का ऐलान किया गया है। सोमवार को यूनिवर्सिटी प्रशासन की ओर से इस संबंध में आदेश जारी किया गया। आदेश के मुताबिक छात्रसंघ के संविधान (Students’ Union Constitution) को मंजूरी मिलने के 15 दिनों के भीतर चुनाव कराए जाएंगे।
यूनिवर्सिटी की ओर से चुनाव कराने की बात सामने आने के बाद छात्रों के बीच लंबे समय से चली आ रही मांग को लेकर उम्मीद जरूर बनी है। हालांकि, अभी एक अहम सवाल बना हुआ है कि छात्रसंघ के संविधान को मंजूरी आखिर किस तारीख को मिलेगी।
संविधान की मंजूरी पर टिकी चुनाव की तारीख
यूनिवर्सिटी प्रशासन के आदेश में चुनाव की समयसीमा को छात्रसंघ के संविधान की मंजूरी से जोड़ दिया गया है। यानी चुनाव कराने से पहले संविधान को मंजूरी मिलना सबसे जरूरी कदम है। अभी संविधान को मंजूरी देने की निश्चित तारीख तय नहीं होने के कारण चुनाव कब होंगे, इसे लेकर पूरी तस्वीर साफ नहीं हुई है।
प्रशासन ने 15 दिनों की समयसीमा जरूर बताई है, लेकिन यह समयसीमा संविधान को मंजूरी मिलने के बाद ही शुरू होगी। यही वजह है कि छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग कर रहे छात्रों के बीच अभी भी चुनाव की वास्तविक तारीख को लेकर सवाल बने हुए हैं।
पहले भी परिसर में हो चुके हैं प्रदर्शन
छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग को लेकर हाल के दिनों में जामिया परिसर (Jamia Campus) में प्रदर्शन भी हुए हैं। छात्रों की ओर से लंबे समय से चुनाव बहाल करने की मांग उठाई जा रही थी। इसी बीच यूनिवर्सिटी प्रशासन का ताजा आदेश सामने आया है।
अब एक तरफ प्रशासन ने करीब दो दशक बाद छात्रसंघ चुनाव कराने का रास्ता खोलने का ऐलान किया है, वहीं दूसरी तरफ इसी मुद्दे को लेकर नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने और कांग्रेस नेताओं के बयानों से विवाद और गहरा गया है।
इमरान मसूद के बयान ने इस पूरे मामले को और सुर्खियों में ला दिया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि एफआईआर से वह छात्रों से मिलने का अपना फैसला नहीं बदलेंगे। वहीं चुनाव की प्रक्रिया अब छात्रसंघ के संविधान को मंजूरी मिलने पर निर्भर है। ऐसे में जामिया में छात्रसंघ चुनाव को लेकर छात्रों की मांग, यूनिवर्सिटी प्रशासन का फैसला और राजनीतिक दलों की सक्रियता आने वाले दिनों में इस विवाद को और अहम बना सकती है।


