स्कूल की किताबों में देशविरोधी कंटेंट! J&K सरकार का बड़ा आदेश, 7 दिन में रिपोर्ट तलब

J&K School Books Row: जम्मू-कश्मीर सरकार ने सरकारी और निजी स्कूलों के साथ-साथ कोचिंग सेंटरों को 7 दिन के भीतर सभी किताबों की जांच का आदेश दिया है। 'देशविरोधी' और अलगाववाद को बढ़ावा देने वाले कंटेंट पर सख्त कार्रवाई होगी। विवादित किताबों के बाद यह फैसला लिया गया है।

Aditya Kumar Verma
Published on: 10 July 2026 10:08 AM IST
J&K School Books Row
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J&K School Books Row: जम्मू-कश्मीर सरकार (Jammu & Kashmir Government) ने स्कूलों और कोचिंग संस्थानों में रखी किताबों को लेकर बड़ा और सख्त फैसला लिया है। प्रशासन ने कश्मीर और जम्मू डिविजन के सभी सरकारी और निजी स्कूलों के साथ-साथ कोचिंग संस्थानों को अपनी लाइब्रेरी और क्लासरूम में मौजूद नई और पुरानी सभी किताबों की गहन जांच करने का आदेश दिया है। इस आदेश का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी किताब में देशविरोधी, आपत्तिजनक या अलगाववाद को बढ़ावा देने वाली सामग्री मौजूद न हो। सरकार के इस फैसले के बाद राजनीतिक विवाद भी शुरू हो गया है और विपक्षी दलों ने इसे इतिहास मिटाने की साजिश बताया है।

सात दिन के भीतर पूरी करनी होगी जांच

स्कूल शिक्षा निदेशालय (Directorate of School Education) की ओर से जारी आदेश के अनुसार सभी स्कूलों और कोचिंग संस्थानों के प्रमुखों को सात दिन के भीतर जांच पूरी करनी होगी। इसके बाद उन्हें प्रमाणपत्र देना होगा कि उनके संस्थान में कोई भी आपत्तिजनक किताब मौजूद नहीं है।

आदेश में कहा गया है कि संस्थानों के प्रमुख अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाली लाइब्रेरी, स्टाफ रूम, क्लासरूम और कार्यालयों में रखी सभी नई और पुरानी किताबों की जांच करेंगे।

किन किताबों पर होगी कार्रवाई?

सरकार ने साफ किया है कि किसी भी किताब में ऐसा कंटेंट नहीं होना चाहिए जो धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाता हो, छात्रों के लिए अनुचित हो या जिससे राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुंचने की आशंका हो।

साथ ही सभी किताबों और अध्ययन सामग्री का नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (National Education Policy 2020-NEP 2020) के दिशा-निर्देशों के अनुरूप होना भी जरूरी होगा।

अगर जांच के दौरान कोई आपत्तिजनक किताब मिलती है तो स्कूल प्रमुखों को उस किताब का शीर्षक, लेखक, प्रकाशक, प्रकाशन वर्ष और उपलब्ध प्रतियों की संख्या सहित पूरी जानकारी तैयार कर वरिष्ठ अधिकारियों को भेजनी होगी। आदेश में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है।

2 विवादित किताबों के बाद शुरू हुआ मामला

यह पूरा विवाद समग्र शिक्षा अभियान (Samagra Shiksha Abhiyan) के तहत स्कूलों में वितरित दो किताबों के सामने आने के बाद शुरू हुआ।

इन किताबों में 'पर्सनैलिटीज एंड लीजेंड्स ऑफ जम्मू एंड कश्मीर' (Personalities and Legends of J&K), जिसके लेखक हिलाल अहमद और संतोष मीणा हैं, तथा 'ग्रेट पर्सनैलिटीज ऑफ जम्मू एंड कश्मीर' (Great Personalities of Jammu and Kashmir), जिसके लेखक डॉ. सुशांत गिरि हैं, शामिल हैं।

इन किताबों में जम्मू-कश्मीर को "भारत के कब्जे वाला कश्मीर" यानी आईओके (IOK) बताया गया था। साथ ही अलगाववादी मकबूल भट (Maqbool Bhat) जैसे लोगों को महिमामंडित करने का भी आरोप लगाया गया।

उपराज्यपाल ने लिया सख्त एक्शन

विवाद सामने आने के बाद उपराज्यपाल मनोज सिन्हा (Manoj Sinha) ने सख्त कार्रवाई करते हुए आठ शिक्षा अधिकारियों को निलंबित कर दिया।

सरकार ने दोनों विवादित किताबों को वापस मंगाने का फैसला लिया। इसके साथ ही पूरे केंद्र शासित प्रदेश के सभी शिक्षण संस्थानों में किताबों का ऑडिट कराने के आदेश भी जारी कर दिए गए।

शिक्षा मंत्री सकीना इत्तू (Sakina Itoo) ने इस पूरे मामले को बड़ी साजिश बताया और कहा कि स्कूलों में ऐसी किताबें पहुंचाने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

यूएपीए के तहत दर्ज हुआ मामला

विवादित किताबों के प्रकाशकों और लेखकों को ब्लैकलिस्ट (Blacklist) कर दिया गया है। पुलिस की काउंटर इंटेलिजेंस विंग (Counter Intelligence Wing) ने गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (Unlawful Activities Prevention Act-UAPA) के तहत मामला दर्ज किया है।

इसके अलावा जम्मू में प्रकाशक के ठिकानों पर छापेमारी भी की गई है।

विपक्ष ने फैसले पर उठाए सवाल

किताबों की स्क्रीनिंग के आदेश पर विपक्षी दलों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस (National Conference-NC) के सांसद आगा सैयद रूहुल्लाह मेहदी (Aga Syed Ruhullah Mehdi) ने इस फैसले को बेहद चिंताजनक बताया। उन्होंने कहा कि लाइब्रेरी का उद्देश्य ज्ञान को सुरक्षित रखना होता है, न कि राजनीतिक नैरेटिव तय करना। उनका कहना था कि किताबों को हटाने से इतिहास नहीं मिटता बल्कि इससे अकादमिक शोध कमजोर होता है और वैचारिक नियंत्रण के नाम पर अकादमिक स्वतंत्रता की बलि नहीं दी जानी चाहिए

वहीं पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (People's Democratic Party-PDP) के नेता वहीद उर रहमान पारा (Waheed Ur Rehman Para) ने इसे सामूहिक यादों को मिटाने की कोशिश बताया। उन्होंने कहा कि यह पाठ्यक्रम से इतिहास मिटाने की साजिश है और इससे आने वाली पीढ़ियों की अपने अतीत को समझने और सवाल पूछने की क्षमता प्रभावित होगी।

NCPCR तक पहुंचा मामला

इस पूरे विवाद के बीच लीगल रिसर्च और पब्लिक पॉलिसी के क्षेत्र में काम करने वाले संगठन रिसर्च एंड एडवोकेसी ग्रुप (Research and Advocacy Group-RAAG) ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (National Commission for Protection of Child Rights-NCPCR) का दरवाजा भी खटखटाया है।

संगठन का कहना है कि सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी में आतंकियों या अलगाववादियों का महिमामंडन करने वाली किताबें बच्चों को उपलब्ध कराना केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि बच्चों के अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है। संगठन ने इसे शिक्षा का अधिकार कानून (Right to Education-RTE) और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के भी खिलाफ बताया है।

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आदित्य कुमार वर्मा उत्तर प्रदेश के पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 8 वर्षों से अधिक का अनुभव प्राप्त है। उन्होंने भारतीय राजनीति, अपराध, स्वास्थ्य और मानवीय सरोकारों से जुड़ी खबरों की व्यापक रिपोर्टिंग की है। उनके पास मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन (MJMC) की डिग्री है और वे रिपोर्टर, एंकर तथा सब-एडिटर जैसे महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके हैं। साथ ही वो उत्तर प्रदेश की राजनीति, शासन-प्रशासन और नौकरशाही व्यवस्था की गहरी समझ रखते हैं। पत्रकारिता के अलावा उन्हें पुस्तकों का अध्ययन, लेखन, कविता-लेखन और पाठ और यात्राएं करना विशेष रूप से पसंद है। विभिन्न संस्कृतियों और समाजों को करीब से जानने-समझने की उनकी रुचि ने उनके दृष्टिकोण को व्यापक बनाया है, जिसका सकारात्मक प्रभाव उनकी लेखन शैली और रिपोर्टिंग में भी देखने को मिलता है।

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