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Jantar Mantar Protests History: जंतर-मंतर पर हुए कौन से बड़े आंदोलन? जानिए किनकी माँगें पूरी हुईं
Jantar Mantar Protests History: दिल्ली का जंतर-मंतर कभी खगोलीय वेधशाला था, आज विरोध प्रदर्शनों का बड़ा केंद्र है...
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Jantar Mantar Protests History: भारत के इतिहास में कुछ स्थान ऐसे हैं जिनका निर्माण किसी एक उद्देश्य के लिए हुआ, लेकिन समय के साथ उनकी पहचान बिल्कुल बदल गई। दिल्ली का जंतर-मंतर ऐसा ही स्थान है। लगभग तीन सौ वर्ष पहले इसका निर्माण सूर्य, चंद्रमा, ग्रहों और तारों की स्थिति जानने के लिए कराया गया था। उस समय यह भारतीय गणित, खगोल विज्ञान और स्थापत्य कला की उपलब्धियों का प्रतीक था। आज यही नाम देश में धरना, प्रदर्शन, जनांदोलन, राजनीतिक असहमति और नागरिक अधिकारों की आवाज उठाने वाले एक प्रमुख सार्वजनिक स्थल के रूप में जाना जाता है।
यहाँ किसान अपनी फसलों की कीमत माँगने आए, सैनिक अपनी पेंशन के लिए बैठे, महिलाओं ने सुरक्षा और न्याय की माँग की, खिलाड़ियों ने खेल संगठनों में जवाबदेही का सवाल उठाया, बेरोजगार युवाओं ने नियुक्तियों की माँग की और भ्रष्टाचार के विरुद्ध शुरू हुए एक आंदोलन ने देश की राजनीति में एक नए राजनीतिक दल के जन्म की परिस्थितियाँ पैदा कर दीं। लेकिन क्या जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने से सरकारें वास्तव में झुकती हैं? क्या यहाँ हुए सभी बड़े आंदोलन सफल हुए? किन आंदोलनों ने कानून बदलवाए, किनसे सरकारी फैसले बदले और किन आंदोलनों के बावजूद प्रदर्शनकारियों की मूल माँगें पूरी नहीं हुईं?
इन सवालों को समझने के लिए जंतर-मंतर के इतिहास को दो हिस्सों में देखना आवश्यक है। पहला, वैज्ञानिक वेधशालाओं का लगभग तीन सौ वर्ष पुराना इतिहास और दूसरा, दिल्ली के जंतर-मंतर का आधुनिक भारत में विरोध प्रदर्शनों के केंद्र के रूप में विकास।
1. भारत में जंतर-मंतर कहाँ-कहाँ हैं?
महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने अठारहवीं शताब्दी में भारत के पाँच नगरों में खगोलीय वेधशालाएँ बनवाई थीं। इनमें से चार आज भी मौजूद हैं, जबकि मथुरा की वेधशाला नष्ट हो चुकी है।
कनॉट प्लेस के निकट, संसद मार्ग क्षेत्र में स्थित। लगभग 1724 में निर्मित। आज ऐतिहासिक वेधशाला के साथ-साथ इसके आसपास का क्षेत्र विरोध प्रदर्शनों के लिए प्रसिद्ध है।
2. जयपुर का जंतर-मंतर
सिटी पैलेस के निकट। लगभग 1728 से निर्माण आरंभ हुआ। पाँचों वेधशालाओं में सबसे विस्तृत। वर्ष 2010 में यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल।
3. उज्जैन की वेधशाला
मध्य प्रदेश में शिप्रा नदी के निकट। उज्जैन प्राचीन भारतीय खगोल गणना का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।
4. वाराणसी का जंतर-मंतर
दशाश्वमेध घाट के निकट मानमंदिर भवन पर स्थित। यह गंगा तट पर स्थापित ऐतिहासिक खगोलीय उपकरणों के लिए प्रसिद्ध है।
5. मथुरा का जंतर-मंतर — अब अस्तित्व में नहीं
उत्तर प्रदेश के मथुरा में किले के परिसर में वेधशाला बनाई गई थी। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक यह नष्ट हो गई। आज इसके मूल उपकरण सुरक्षित नहीं हैं।
इन पाँचों वेधशालाओं का उद्देश्य एक ही था, लेकिन इनके उपकरणों के आकार, निर्माण और विन्यास में अंतर था। अलग-अलग भौगोलिक स्थानों से खगोलीय निरीक्षण करने पर गणनाओं की तुलना करना संभव होता था। यही कारण है कि जयसिंह ने एक ही नगर में बड़ी वेधशाला बनाने के बजाय अलग-अलग क्षेत्रों में वेधशालाएँ स्थापित कराईं।
1. जंतर-मंतर किसने बनवाया और इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी?
जंतर-मंतर का इतिहास महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय से जुड़ा है। उनका जन्म 1688 में हुआ था और वे आमेर के शासक थे। उन्होंने बाद में जयपुर नगर की स्थापना की। जयसिंह केवल शासक नहीं थे, उन्हें गणित, खगोल विज्ञान और वैज्ञानिक उपकरणों के अध्ययन में गहरी रुचि थी। उन्होंने भारतीय खगोलीय परंपराओं के साथ इस्लामी और यूरोपीय खगोल विज्ञान का भी अध्ययन कराया। उनका उद्देश्य खगोलीय गणनाओं को अधिक सटीक बनाना था।
उस समय ग्रहों की स्थिति, ग्रहण, समय और खगोलीय घटनाओं की गणना के लिए विभिन्न सारणियों का उपयोग किया जाता था। इनमें अंतर और त्रुटियाँ भी मिलती थीं। जयसिंह ने प्रत्यक्ष निरीक्षण के माध्यम से इन गणनाओं की जाँच करने की व्यवस्था विकसित की। इसके लिए उन्होंने विशाल पत्थर और चिनाई से बने उपकरणों का निर्माण कराया। ये उपकरण अपने समय की वैज्ञानिक समझ के अनुसार सूर्य और आकाशीय पिंडों की स्थिति मापने में सहायक थे।
जंतर-मंतर कोई मंदिर या धार्मिक अनुष्ठान स्थल नहीं था। यह एक वैज्ञानिक वेधशाला थी। इसके नाम में 'जंतर' का संबंध 'यंत्र' से और 'मंतर' का संबंध 'मंत्र' अथवा गणना के सूत्रों से जोड़ा जाता है। प्रचलित व्याख्या में इसका आशय गणना करने वाले यंत्रों से है।
यहाँ कई प्रकार के उपकरण बनाए गए। सम्राट यंत्र सूर्य की छाया से समय ज्ञात करने के लिए, जयप्रकाश यंत्र आकाशीय निर्देशांक समझने के लिए, राम यंत्र आकाशीय पिंडों की ऊँचाई और दिशा मापने के लिए तथा अन्य उपकरण ग्रहों और तारों की स्थिति जानने के लिए उपयोग किए जाते थे। जयपुर का विशाल सम्राट यंत्र दुनिया की प्रसिद्ध पत्थर-निर्मित धूपघड़ियों में शामिल है।
इन वेधशालाओं का महत्व केवल उनकी भव्यता में नहीं है। वे यह भी बताती हैं कि अठारहवीं शताब्दी के भारत में गणितीय ज्ञान, स्थापत्य कला और प्रत्यक्ष वैज्ञानिक निरीक्षण को जोड़कर बड़े पैमाने पर उपकरण तैयार किए जा रहे थे।
2. वैज्ञानिक वेधशाला से प्रदर्शन स्थल कैसे बना दिल्ली का जंतर-मंतर?
यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है। दिल्ली का ऐतिहासिक जंतर-मंतर और जंतर-मंतर के नाम से प्रसिद्ध प्रदर्शन स्थल पूरी तरह एक ही परिसर नहीं हैं। ऐतिहासिक वेधशाला एक संरक्षित स्मारक है, जबकि धरना-प्रदर्शन मुख्यतः उसके आसपास निर्धारित सड़क क्षेत्र में होते रहे हैं। दोनों की पहचान निकटता और प्रचलित नाम के कारण जुड़ गई है।
आजादी के बाद लंबे समय तक दिल्ली में बड़े राजनीतिक प्रदर्शन राजपथ, इंडिया गेट और बोट क्लब के आसपास होते थे। संसद तथा केंद्रीय सत्ता के प्रमुख संस्थानों के निकट होने के कारण इन स्थानों का विशेष राजनीतिक महत्व था। वर्ष 1988 में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में बोट क्लब पर विशाल किसान आंदोलन हुआ। किसानों ने कई दिनों तक वहाँ डेरा डाला। इस तरह के बड़े जमावड़ों से सुरक्षा, यातायात और प्रशासनिक व्यवस्थाओं से जुड़े सवाल उठे।
इसके बाद नई दिल्ली के अत्यंत संवेदनशील केंद्रीय क्षेत्र में विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिबंध और सीमाएँ बढ़ीं। 1993 के आसपास जंतर-मंतर का इलाका धरना-प्रदर्शनों के एक नियमित केंद्र के रूप में उभरने लगा। इसकी स्थिति ऐसी थी कि प्रदर्शनकारी राष्ट्रीय राजधानी में अपनी आवाज पहुँचा सकते थे, जबकि प्रशासन बड़े सरकारी परिसरों और संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा व्यवस्था बनाए रख सकता था।
धीरे-धीरे जंतर-मंतर देशभर के संगठनों के लिए एक परिचित पता बन गया। विभिन्न राज्यों से लोग दिल्ली आते, यहाँ बैठते, ज्ञापन देते, पत्रकार वार्ताएँ करते और अपनी माँगों को केंद्र सरकार तक पहुँचाने की कोशिश करते। कुछ आंदोलन कुछ घंटों तक चलते, कुछ कई दिनों तक और कुछ ने महीनों तक राष्ट्रीय चर्चा को प्रभावित किया।
3. जंतर-मंतर पर हुए बड़े आंदोलन : उनका इतिहास, माँगें और परिणाम
यहाँ एक सावधानी आवश्यक है। दिल्ली में हुए प्रत्येक बड़े आंदोलन को जंतर-मंतर का आंदोलन कहना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा। उदाहरण के लिए, 1988 का टिकैत किसान आंदोलन बोट क्लब पर हुआ था। अन्ना हजारे का पहला अनशन जंतर-मंतर पर हुआ, लेकिन उनका 2011 का दूसरा बड़ा अनशन रामलीला मैदान में चला। इसी तरह निर्भया आंदोलन का बड़ा हिस्सा इंडिया गेट और रायसीना हिल पर तथा 2020-21 के किसान आंदोलन का मुख्य धरना दिल्ली की सीमाओं पर हुआ। इन आंदोलनों का जंतर-मंतर से संबंध अवश्य रहा, लेकिन इनके अलग-अलग प्रदर्शन स्थलों का उल्लेख करना आवश्यक है।
पहला बड़ा राजनीतिक परिवर्तन : 2011 का अन्ना हजारे और लोकपाल आंदोलन
पाँच अप्रैल 2011 को सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर भ्रष्टाचार के विरुद्ध अनशन शुरू किया। यह वह समय था जब देश में राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़े कथित घोटालों, दूरसंचार स्पेक्ट्रम आवंटन विवाद और अन्य भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर व्यापक राजनीतिक बहस चल रही थी। आंदोलनकारियों की माँग थी कि एक ऐसा प्रभावी लोकपाल बनाया जाए जो उच्च पदों पर बैठे लोगों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामलों की स्वतंत्र जाँच कर सके।
इस आंदोलन से अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण, किरण बेदी और कई अन्य सामाजिक कार्यकर्ता जुड़े। प्रारंभिक अनशन ने कुछ ही दिनों में राष्ट्रीय स्तर पर समर्थन हासिल किया। दिल्ली के बाहर अनेक शहरों में भी प्रदर्शन हुए। नौ अप्रैल 2011 को सरकार ने लोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार करने के लिए सरकारी प्रतिनिधियों और नागरिक समाज के सदस्यों की संयुक्त समिति बनाने पर सहमति व्यक्त की। अन्ना हजारे ने अपना अनशन समाप्त कर दिया।
हालाँकि विवाद यहीं समाप्त नहीं हुआ। लोकपाल की शक्तियों, प्रधानमंत्री को उसके अधिकार क्षेत्र में लाने और जाँच संस्थाओं की स्वतंत्रता जैसे विषयों पर सरकार तथा आंदोलनकारियों के बीच मतभेद बने रहे। अगस्त 2011 में अन्ना हजारे का दूसरा बड़ा अनशन रामलीला मैदान में हुआ। यह आंदोलन राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया। इसके बाद आंदोलन के भीतर इस प्रश्न पर मतभेद पैदा हुए कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष केवल सामाजिक आंदोलन तक सीमित रहे या राजनीतिक दल बनाकर चुनावी व्यवस्था में प्रवेश किया जाए।
परिणाम : दिसंबर 2013 में संसद ने लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम पारित किया। यह आंदोलन की एक प्रमुख माँग से जुड़ा कानूनी परिणाम था, लेकिन आंदोलनकारियों के मूल जनलोकपाल प्रस्ताव की सभी व्यवस्थाएँ कानून में शामिल नहीं हुईं। 2012 में अरविंद केजरीवाल और उनके सहयोगियों ने आम आदमी पार्टी का गठन किया, जिसने बाद में दिल्ली की सत्ता हासिल की। इस तरह जंतर-मंतर पर शुरू हुए आंदोलन का प्रभाव कानून निर्माण के साथ-साथ राजनीतिक दलों की व्यवस्था तक पहुँचा।
दूसरा बड़ा आंदोलन : 2012 का निर्भया आंदोलन और महिला सुरक्षा कानूनों में परिवर्तन
16 दिसंबर 2012 की रात दिल्ली में एक युवती के साथ सामूहिक बलात्कार और गंभीर हिंसा की घटना हुई। इस अपराध ने पूरे देश को झकझोर दिया। पीड़िता को सार्वजनिक चर्चा में 'निर्भया' नाम दिया गया। घटना के बाद दिल्ली में छात्रों, महिलाओं, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों ने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन शुरू किए। इंडिया गेट, रायसीना हिल और जंतर-मंतर विरोध के महत्वपूर्ण केंद्र बने।
प्रदर्शनकारियों की माँग केवल दोषियों को सजा दिलाना नहीं थी। वे बलात्कार संबंधी कानूनों को अधिक प्रभावी बनाने, पुलिस व्यवस्था में सुधार करने, महिलाओं की शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई सुनिश्चित करने और सार्वजनिक परिवहन में सुरक्षा बढ़ाने की माँग कर रहे थे। इस आंदोलन में युवाओं की भागीदारी विशेष रूप से उल्लेखनीय थी। सामाजिक माध्यमों ने लोगों को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
केंद्र सरकार ने न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा की अध्यक्षता में एक समिति गठित की। समिति ने यौन हिंसा संबंधी कानूनों और संस्थागत जवाबदेही पर व्यापक सुझाव दिए। इसके बाद आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013 लागू किया गया। इसमें यौन अपराधों की कानूनी परिभाषाओं और दंड संबंधी प्रावधानों में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए। महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ी परियोजनाओं के लिए निर्भया कोष की स्थापना भी की गई।
परिणाम : इस आंदोलन के बाद भारत के आपराधिक कानूनों में महत्वपूर्ण संशोधन हुए। निर्भया मामले के चार दोषियों को मार्च 2020 में फाँसी दी गई। हालाँकि कानूनों में परिवर्तन और महिला सुरक्षा की वास्तविक स्थिति में सुधार दो अलग प्रश्न हैं। कानून बनने के बाद भी महिलाओं के विरुद्ध हिंसा, पुलिस की संवेदनशीलता और न्याय में देरी जैसी चुनौतियाँ बनी रहीं। इसलिए आंदोलन के परिणाम को केवल कठोर सजा तक सीमित करना उचित नहीं होगा।
तीसरा आंदोलन : 2014 में अरुणाचल प्रदेश के छात्र नीडो तानिया की मौत के विरुद्ध प्रदर्शन
2014 में अरुणाचल प्रदेश के 19 वर्षीय छात्र नीडो तानिया की दिल्ली में हुई मौत के बाद पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों के साथ भेदभाव और नस्ली टिप्पणियों का प्रश्न राष्ट्रीय चर्चा में आया। दिल्ली के जंतर-मंतर सहित विभिन्न स्थानों पर प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों ने दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई, पूर्वोत्तर के लोगों की सुरक्षा और नस्ली भेदभाव रोकने के लिए प्रभावी कानूनी तथा प्रशासनिक व्यवस्था की माँग की।
इस घटना ने दिल्ली और दूसरे महानगरों में रहने वाले पूर्वोत्तर राज्यों के छात्रों और कामकाजी लोगों के अनुभवों को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाया। केंद्र सरकार ने पूर्वोत्तर के लोगों से संबंधित चिंताओं का अध्ययन करने के लिए एम.पी. बेजबरुआ समिति गठित की। समिति ने सुरक्षा, शिकायत निवारण, पुलिस प्रशिक्षण और भेदभाव रोकने के उपाय सुझाए।
परिणाम : घटना से जुड़े आपराधिक मामले में न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ी और प्रशासनिक स्तर पर कई सुझाव सामने आए। लेकिन नस्ली भेदभाव रोकने के लिए व्यापक अलग कानून बनाने की माँग तत्काल पूरी नहीं हुई। यह आंदोलन एक विशिष्ट अपराध से आगे बढ़कर भारत के भीतर सांस्कृतिक विविधता और नागरिकों के समान सम्मान का प्रश्न बन गया।
चौथा बड़ा आंदोलन : 2015 में पूर्व सैनिकों का 'वन रैंक, वन पेंशन' संघर्ष
जंतर-मंतर पर हुए आंदोलनों में पूर्व सैनिकों का 'वन रैंक, वन पेंशन' आंदोलन एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। लंबे समय से पूर्व सैनिकों की माँग थी कि समान रैंक और समान सेवा अवधि वाले सैनिकों की पेंशन में सेवानिवृत्ति की तारीख के आधार पर बड़ा अंतर नहीं होना चाहिए।
15 जून 2015 को पूर्व सैनिकों ने जंतर-मंतर पर क्रमिक अनशन शुरू किया। इसमें विभिन्न सैन्य सेवाओं से सेवानिवृत्त अधिकारी और जवान शामिल हुए। आंदोलनकारियों का कहना था कि देश की सेवा करने वाले सैनिकों के साथ पेंशन के मामले में न्यायसंगत व्यवहार होना चाहिए। यह माँग कई दशकों से उठती रही थी और राजनीतिक दलों के चुनावी वादों का भी हिस्सा बनी थी।
सितंबर 2015 में केंद्र सरकार ने वन रैंक, वन पेंशन लागू करने की रूपरेखा घोषित की। नवंबर 2015 में रक्षा मंत्रालय ने इसके कार्यान्वयन की अधिसूचना जारी की। इसके बावजूद आंदोलनकारियों के एक वर्ग ने पेंशन पुनर्निर्धारण की अवधि और अन्य तकनीकी प्रावधानों पर आपत्तियाँ दर्ज कराईं।
परिणाम : वन रैंक, वन पेंशन की व्यवस्था लागू हुई, लेकिन इसके स्वरूप पर पूर्व सैनिकों के विभिन्न संगठनों के मतभेद बने रहे। इस आंदोलन ने यह स्पष्ट किया कि किसी माँग को सिद्धांततः स्वीकार करना और आंदोलनकारियों द्वारा अपेक्षित सभी शर्तों पर उसे लागू करना एक समान बात नहीं है।
पाँचवाँ बड़ा आंदोलन : 2017 में तमिलनाडु के किसानों का असाधारण प्रदर्शन
मार्च और अप्रैल 2017 में तमिलनाडु के किसानों ने जंतर-मंतर पर लगभग चालीस दिनों तक प्रदर्शन किया। उनका आंदोलन सूखे, कृषि ऋण, फसल नुकसान और किसानों की आर्थिक कठिनाइयों से जुड़ा था। किसानों ने केंद्र सरकार से बड़े सूखा राहत पैकेज, कृषि ऋण माफी और कावेरी नदी के जल प्रबंधन से संबंधित व्यवस्थाओं की माँग की।
किसानों ने लगभग 40 हजार करोड़ रुपये के राहत पैकेज की माँग की थी। केंद्र की ओर से लगभग दो हजार करोड़ रुपये की राहत स्वीकृत होने की खबर आई, लेकिन प्रदर्शनकारियों ने इसे अपर्याप्त बताया। आंदोलन ने दक्षिण भारत के सूखा प्रभावित किसानों की कठिनाइयों को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया।
परिणाम : अप्रैल 2017 में किसानों ने आश्वासनों के बाद अपना प्रदर्शन स्थगित किया। बाद में उन्होंने तमिलनाडु में फिर आंदोलन किया। उनकी सभी मूल माँगें उस समय पूरी नहीं हुईं। कावेरी जल प्रबंधन से संबंधित संस्थागत व्यवस्था बाद में न्यायिक आदेशों और व्यापक अंतरराज्यीय विवाद की प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ी, उसे केवल इस धरने का परिणाम नहीं माना जा सकता।
छठा बड़ा आंदोलन : 2019 में नागरिकता संशोधन कानून के विरुद्ध प्रदर्शन
विरोध करने वालों का तर्क था कि नागरिकता के प्रश्न पर धर्म आधारित वर्गीकरण संविधान के समानता संबंधी सिद्धांतों के लिए चुनौती पैदा कर सकता है। दूसरी ओर केंद्र सरकार का कहना था कि कानून का उद्देश्य पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए निर्दिष्ट धार्मिक समुदायों के पात्र लोगों को नागरिकता प्राप्त करने का विशेष मार्ग उपलब्ध कराना है और इससे किसी मौजूदा भारतीय नागरिक की नागरिकता नहीं छीनी जाती।
परिणाम : विरोध प्रदर्शनों के बावजूद नागरिकता संशोधन अधिनियम वापस नहीं लिया गया। मार्च 2024 में इसके नियम अधिसूचित हुए और कानून के अंतर्गत नागरिकता प्रदान करने की प्रक्रिया शुरू हुई। इसलिए इसे ऐसी मिसाल के रूप में देखना चाहिए जहाँ व्यापक विरोध के बावजूद सरकार ने अपना मूल विधायी निर्णय बरकरार रखा।
सातवाँ बड़ा आंदोलन : 2021 की किसान संसद और तीन कृषि कानूनों की वापसी
2020 में केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए तीन कृषि कानूनों के विरुद्ध किसानों का व्यापक आंदोलन शुरू हुआ। इस आंदोलन का मुख्य केंद्र दिल्ली की सिंघु, टिकरी और गाजीपुर सीमाएँ थीं। किसान संगठनों का कहना था कि नए कानून कृषि मंडियों और न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था के भविष्य को प्रभावित कर सकते हैं। केंद्र सरकार का तर्क था कि इन कानूनों से किसानों को अपनी उपज बेचने के अधिक विकल्प मिलेंगे।
जुलाई 2021 में संसद के मानसून सत्र के दौरान किसान संगठनों ने जंतर-मंतर पर 'किसान संसद' आयोजित की। लगभग दो सौ किसानों के समूह को निर्धारित सुरक्षा व्यवस्थाओं के अंतर्गत वहाँ प्रदर्शन की अनुमति दी गई। किसान संसद का उद्देश्य यह संदेश देना था कि संसद में कृषि कानूनों पर बहस के साथ-साथ किसानों की आपत्तियों को भी गंभीरता से सुना जाना चाहिए।
किसान संगठनों ने जंतर-मंतर पर प्रतीकात्मक संसदीय कार्यवाही आयोजित की। विपक्षी दलों के अनेक नेताओं ने भी आंदोलन के प्रति समर्थन व्यक्त किया। इससे किसान आंदोलन का मुद्दा संसद के बाहर और भीतर एक साथ चर्चा में बना रहा।
परिणाम : 19 नवंबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की। इसके बाद संसद ने कृषि कानून निरसन विधेयक पारित किया। हालाँकि यह परिणाम केवल जंतर-मंतर पर हुई किसान संसद से नहीं आया था। इसके पीछे एक वर्ष से अधिक समय तक चले व्यापक किसान आंदोलन, दिल्ली की सीमाओं पर धरनों, वार्ताओं, न्यायिक हस्तक्षेप और राजनीतिक परिस्थितियों की संयुक्त भूमिका थी। न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी जैसी अन्य माँगें बनी रहीं।
आठवाँ बड़ा आंदोलन : 2023 में महिला पहलवानों का धरना और कुश्ती महासंघ विवाद
जनवरी 2023 में देश के प्रमुख पहलवानों ने भारतीय कुश्ती महासंघ के तत्कालीन अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के विरुद्ध यौन उत्पीड़न और महासंघ के संचालन से संबंधित गंभीर आरोप लगाते हुए जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया। आंदोलन में विनेश फोगाट, साक्षी मलिक और बजरंग पूनिया जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीत चुके खिलाड़ी शामिल थे।
प्रारंभिक प्रदर्शन के बाद खेल मंत्रालय ने जाँच और प्रशासनिक हस्तक्षेप की व्यवस्था की। लेकिन पहलवानों ने आरोप लगाया कि उन्हें अपेक्षित न्याय नहीं मिल रहा है। 23 अप्रैल 2023 को उन्होंने फिर जंतर-मंतर पर धरना शुरू किया। प्रदर्शनकारियों की प्रमुख माँगों में प्राथमिकी दर्ज करना, आरोपों की निष्पक्ष जाँच और संबंधित पदाधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई शामिल थीं।
मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचा। अप्रैल 2023 में दिल्ली पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की। बाद में आरोपपत्र दाखिल हुआ। 28 मई 2023 को नए संसद भवन के उद्घाटन के दिन संसद की ओर मार्च करने की कोशिश कर रहे पहलवानों को पुलिस ने हिरासत में लिया और जंतर-मंतर का उनका धरना समाप्त हो गया।
इसके बाद मामला अदालत में चला। मई 2024 में अदालत ने कुछ आरोपों पर मुकदमा चलाने के लिए आरोप तय किए। नाबालिग पहलवान से संबंधित अलग मामले में पुलिस की समापन रिपोर्ट 2025 में स्वीकार हुई। तीन अगस्त 2026 को दिल्ली की एक अदालत ने छह महिला पहलवानों से संबंधित यौन उत्पीड़न के मुकदमे में बृजभूषण शरण सिंह और विनोद तोमर को बरी कर दिया। विनेश फोगाट ने फैसले के विरुद्ध उच्च न्यायालय में अपील करने की बात कही।
परिणाम : आंदोलन के बाद प्राथमिकी दर्ज हुई, जाँच हुई और मुकदमा चला, लेकिन निचली अदालत का अंतिम निर्णय आरोपियों के पक्ष में आया। आंदोलनकारी खिलाड़ियों की न्याय संबंधी मूल माँग और अदालत में आरोप सिद्ध होना दो अलग बातें हैं। इस मामले ने खेल संघों में शिकायत निवारण, महिला खिलाड़ियों की सुरक्षा और संस्थागत जवाबदेही को राष्ट्रीय चर्चा का विषय बनाया।
नौवाँ बड़ा आंदोलन : 2024 में नीट और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी के विरुद्ध छात्रों का प्रदर्शन
जून 2024 में नीट-यूजी परीक्षा के परिणामों और कथित अनियमितताओं को लेकर देशभर में विरोध हुआ। विद्यार्थियों और विभिन्न छात्र संगठनों ने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी की कार्यप्रणाली, परीक्षा की निष्पक्षता और उत्तरदायित्व पर सवाल उठाए। दिल्ली के जंतर-मंतर पर भी प्रदर्शन हुए। 27 जून को प्रदर्शन कर रहे कुछ संगठनों और पुलिस के बीच टकराव हुआ तथा प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया।
छात्र संगठनों की माँग थी कि परीक्षा में कथित गड़बड़ियों की स्वतंत्र जाँच हो, जिम्मेदार व्यक्तियों पर कार्रवाई की जाए और ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जिससे भविष्य में प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर प्रश्न न उठें। यह आंदोलन केवल मेडिकल प्रवेश परीक्षा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अन्य राष्ट्रीय परीक्षाओं में अनियमितताओं और पेपर लीक की घटनाओं पर भी व्यापक बहस शुरू हुई।
परिणाम : सरकार ने परीक्षा प्रणाली में सुधार की प्रक्रिया शुरू की और संबंधित मामलों में जाँच तथा न्यायिक कार्यवाही हुई। लेकिन नीट-यूजी 2024 की पूरी परीक्षा रद्द नहीं हुई। इस आंदोलन ने परीक्षा एजेंसियों की पारदर्शिता और छात्रों के अधिकारों के प्रश्न को राष्ट्रीय महत्व दिया।
दसवाँ बड़ा आंदोलन : 2026 का कॉकरोच जनता पार्टी और परीक्षा सुधार आंदोलन
2026 में जंतर-मंतर एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आया। इस बार आंदोलन का नेतृत्व मुख्यतः युवाओं और छात्रों के एक नए मंच, कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी), ने किया। इस मंच का नाम सर्वोच्च न्यायालय में युवाओं के संबंध में की गई एक टिप्पणी की प्रतिक्रिया में सामने आया था। सामाजिक माध्यमों पर शुरू हुई यह पहल बाद में संगठित विरोध प्रदर्शन में बदल गई।
छह जून 2026 को जंतर-मंतर पर सीजेपी का प्रदर्शन शुरू हुआ। इसका प्रमुख मुद्दा नीट-यूजी परीक्षा में कथित पेपर लीक, परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा था। आंदोलनकारियों ने परीक्षा सुधार, प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मुकदमों की वापसी और परीक्षा विवाद से संबंधित आत्महत्या के मामलों में प्रभावित परिवारों को मुआवजा देने की माँग भी उठाई।
इस आंदोलन में सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की भागीदारी और उनके अनशन ने भी ध्यान आकर्षित किया। 20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों ने संसद की ओर मार्च करने का प्रयास किया। इस दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच गंभीर टकराव हुआ। पुलिस ने अवरोधक तोड़ने और पथराव के आरोप लगाए, जबकि आंदोलनकारियों ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए। घटना में पुलिसकर्मियों और प्रदर्शनकारियों के घायल होने की खबरें आईं।
इसके बाद सरकार और आंदोलनकारियों के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत हुई। 25 जुलाई 2026 को धर्मेंद्र प्रधान ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिया। सरकार ने प्रल्हाद जोशी को शिक्षा मंत्रालय का दायित्व सौंपा। सीजेपी ने 49 दिनों से चल रहे अपने आंदोलन को समाप्त करने की घोषणा की। संगठन के अनुसार सरकार ने मुकदमों की वापसी, मुआवजे और परीक्षा सुधारों पर आश्वासन दिए थे।
परिणाम : शिक्षा मंत्री का इस्तीफा हुआ, परीक्षा एजेंसी में प्रशासनिक परिवर्तन हुए और आंदोलन समाप्त हुआ। हालाँकि सभी आश्वासनों का पूर्ण कार्यान्वयन उसी समय हो गया था, ऐसा मानना सही नहीं होगा। आंदोलन से जुड़े आपराधिक मामलों पर बाद में भी कानूनी विवाद बने रहे। सितंबर 2026 में सर्वोच्च न्यायालय ने जुलाई के प्रदर्शन से जुड़े सामान्य प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध पूर्व प्राथमिकी निरस्त करते हुए कुछ विशिष्ट व्यक्तियों की भूमिका की नई जाँच का रास्ता खुला रखा। नौ अक्टूबर 2026 को एक अन्य याचिका में स्वतंत्र जाँच का निर्देश देने से भी न्यायालय ने इनकार किया।
यह आंदोलन इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि उसने दिखाया कि सामाजिक माध्यमों पर उभरा एक मंच किस प्रकार वास्तविक धरना-प्रदर्शन, राजनीतिक वार्ता और प्रशासनिक निर्णयों से जुड़ सकता है।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने का अधिकार और अदालतों का हस्तक्षेप
जंतर-मंतर का इतिहास केवल आंदोलनों का नहीं, बल्कि प्रदर्शन के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच कानूनी संघर्ष का भी इतिहास है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्वक, बिना हथियार एकत्र होने का अधिकार देता है। लेकिन ये अधिकार पूर्णतः निरंकुश नहीं हैं। कानून के अंतर्गत सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा और अन्य वैध आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
2017 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने जंतर-मंतर क्षेत्र में लगातार होने वाले धरनों से ध्वनि प्रदूषण, कचरे और स्थानीय निवासियों को होने वाली परेशानियों के आधार पर प्रदर्शन गतिविधियों पर रोक लगाने का आदेश दिया। इसके बाद प्रदर्शनकारियों को वहाँ से हटाया गया। इससे यह बहस शुरू हुई कि क्या राजधानी में नागरिकों के लिए एक स्थापित विरोध स्थल को पूरी तरह बंद करना उचित है।
मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा। जुलाई 2018 में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जंतर-मंतर और बोट क्लब जैसे स्थानों पर विरोध प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध स्वीकार्य नहीं है। न्यायालय ने सरकार को ऐसी व्यवस्था बनाने को कहा जिससे शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार और आसपास रहने वाले नागरिकों के अधिकारों के बीच संतुलन बना रहे।
इस निर्णय का महत्व केवल जंतर-मंतर तक सीमित नहीं था। इसने एक व्यापक संवैधानिक प्रश्न उठाया कि लोकतंत्र में नागरिकों को असहमति व्यक्त करने के लिए सार्वजनिक स्थान किस सीमा तक उपलब्ध होने चाहिए। दूसरी ओर यह भी स्वीकार किया गया कि प्रदर्शन का अधिकार अन्य नागरिकों के आवागमन, सुरक्षा और शांतिपूर्ण जीवन के अधिकारों को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकता।
आज भी जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए पुलिस अनुमति, निर्धारित समय, संख्या और सुरक्षा संबंधी शर्तें लागू हो सकती हैं। किसी विशेष प्रदर्शन की अनुमति मिलना या न मिलना उस समय की प्रशासनिक तथा कानूनी परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
कितने आंदोलनों की माँगें पूरी हुईं और कितनों की नहीं?
जंतर-मंतर पर हुए सभी प्रदर्शनों का कोई एक आधिकारिक, संपूर्ण सफलता-असफलता अभिलेख उपलब्ध नहीं है। इसलिए यहाँ चर्चा किए गए दस प्रमुख आंदोलनों का तुलनात्मक सार देना अधिक उचित है।
इस सार से एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है। आंदोलन की सफलता का अर्थ हर मामले में एक जैसा नहीं होता। किसी आंदोलन से कानून बन सकता है, किसी से कानून वापस हो सकता है, किसी से मंत्री का इस्तीफा हो सकता है, किसी में केवल जाँच शुरू होती है और किसी आंदोलन का तत्काल कोई ठोस नीतिगत परिणाम नहीं निकलता। कई बार आंदोलनों का सबसे स्थायी प्रभाव सार्वजनिक चेतना और राजनीतिक विमर्श पर पड़ता है, जिसे किसी एक सरकारी आदेश से नहीं मापा जा सकता।
क्या जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने से सरकार पर वास्तव में दबाव पड़ता है?
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करना अपने आप में किसी माँग के स्वीकार होने की गारंटी नहीं है। किसी आंदोलन का प्रभाव कई बातों पर निर्भर करता है, जैसे उसकी माँग कितनी स्पष्ट है, उसमें कितने लोग भाग ले रहे हैं, क्या उसे दूसरे राज्यों से समर्थन मिल रहा है, क्या उसके पक्ष में पर्याप्त तथ्य और कानूनी आधार हैं, सरकार उससे बातचीत करती है या नहीं और क्या आंदोलन लंबे समय तक अपना संगठन बनाए रख पाता है।
अन्ना हजारे के आंदोलन में भ्रष्टाचार के विरुद्ध पहले से मौजूद जनअसंतोष एक राष्ट्रीय अभियान में बदल गया। पूर्व सैनिकों के आंदोलन में एक लंबे समय से लंबित माँग पर सरकार ने कार्यान्वयन की अधिसूचना जारी की। किसान आंदोलन में जंतर-मंतर की किसान संसद एक बड़े राष्ट्रव्यापी संघर्ष का हिस्सा थी। पहलवानों के आंदोलन में प्राथमिकी और न्यायिक प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन अदालत का निर्णय प्रदर्शनकारियों की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं आया। सीएए विरोध में व्यापक प्रदर्शन हुए, फिर भी कानून वापस नहीं हुआ।
इन उदाहरणों से समझा जा सकता है कि जंतर-मंतर मुख्यतः किसी मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर सामने लाने और सत्ता से संवाद अथवा टकराव का सार्वजनिक मंच उपलब्ध कराता है। उसका वास्तविक परिणाम आंदोलन के व्यापक सामाजिक, राजनीतिक, प्रशासनिक और कानूनी संदर्भ में निर्धारित होता है।
जंतर-मंतर पर छोटे और लंबे धरनों का अनकहा इतिहास
जंतर-मंतर की पहचान केवल बड़े नेताओं और राष्ट्रीय समाचारों में छाए आंदोलनों से नहीं बनी। इसके इतिहास का एक दूसरा पक्ष उन सामान्य नागरिकों से जुड़ा है जो अपने व्यक्तिगत या सामूहिक संघर्षों को लेकर दिल्ली आते रहे। इनमें वेतन न मिलने की शिकायत करने वाले कर्मचारी, नियुक्ति की प्रतीक्षा में बैठे अभ्यर्थी, जमीन अधिग्रहण से प्रभावित परिवार, न्याय की माँग करने वाले पीड़ित, सरकारी नीतियों के विरोध में आए संगठन और अपने राज्यों से संबंधित समस्याओं को केंद्र सरकार तक पहुँचाने की कोशिश करने वाले लोग शामिल रहे हैं।
कुछ प्रदर्शनकारी अपने साथ फाइलों के बंडल, अदालतों के आदेश और वर्षों पुराने पत्राचार लेकर आते थे। कई लोगों के लिए जंतर-मंतर पर बैठना किसी बड़े राजनीतिक आंदोलन का हिस्सा बनना नहीं था, बल्कि अपनी बात सार्वजनिक रूप से कहने का अंतिम उपलब्ध उपाय था। 2017 में जंतर-मंतर से प्रदर्शनकारियों को हटाए जाने के समय प्रकाशित एक विस्तृत रिपोर्ट में ऐसे लोगों की कहानियाँ दर्ज की गई थीं, जो वर्षों से न्याय की तलाश में धरना दे रहे थे।
इस दृष्टि से जंतर-मंतर की एक विशेषता है। यहाँ एक तरफ राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक और सामाजिक संगठन अपनी माँगें उठाते रहे हैं, दूसरी ओर ऐसे व्यक्ति भी आते रहे हैं जिनकी शिकायतें स्थानीय प्रशासन से शुरू होकर वर्षों की कानूनी और सरकारी प्रक्रिया में उलझ गई थीं। उनके संघर्ष अक्सर राष्ट्रीय समाचार नहीं बनते, लेकिन वे इस स्थान की सार्वजनिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
जंतर-मंतर का ऐतिहासिक और लोकतांत्रिक महत्व
जंतर-मंतर के इतिहास में एक रोचक निरंतरता दिखाई देती है। अठारहवीं शताब्दी में यह आकाश को समझने के लिए बनाया गया था। वहाँ खड़े विशाल उपकरण समय, दिशा और आकाशीय पिंडों की गति का अध्ययन करते थे। आधुनिक भारत में इसी नाम से पहचाना जाने वाला स्थान नागरिकों की माँगों, असहमति और सार्वजनिक बहस का केंद्र बन गया।
लेकिन इस परिवर्तन को केवल प्रतीकात्मक संयोग मानना पर्याप्त नहीं होगा। राजधानी में प्रदर्शन के लिए निर्धारित सार्वजनिक स्थानों की उपलब्धता स्वयं लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। संसद, सरकार और न्यायपालिका जैसे संस्थानों तक हर नागरिक की सीधी पहुँच संभव नहीं होती। ऐसे में सार्वजनिक धरना-स्थल नागरिकों और संस्थाओं के बीच एक प्रकार के दृश्य संवाद का माध्यम बनते हैं। वे सरकार को किसी निर्णय के लिए बाध्य नहीं करते, लेकिन शिकायतों को सार्वजनिक चर्चा में लाने का अवसर देते हैं।
इसके साथ कुछ कठिन प्रश्न भी जुड़े हैं। क्या केवल दिल्ली पहुँच सकने वाले नागरिकों की आवाज अधिक सुनी जाती है? क्या छोटे संगठनों और संसाधनहीन लोगों को उतनी ही सार्वजनिक जगह मिलती है जितनी बड़े राजनीतिक संगठनों को? क्या शांतिपूर्ण विरोध के लिए पर्याप्त स्थान उपलब्ध हैं? क्या प्रशासनिक प्रतिबंध समान रूप से लागू होते हैं? और क्या मीडिया केवल उन्हीं आंदोलनों को महत्व देता है जिनमें बड़ी संख्या, प्रसिद्ध चेहरे या नाटकीय घटनाएँ मौजूद हों?
जंतर-मंतर का इतिहास इन प्रश्नों को भी सामने लाता है। किसी प्रदर्शन का महत्व केवल उसमें उपस्थित भीड़ से निर्धारित नहीं होता। कभी कुछ व्यक्तियों की माँग एक बड़े सार्वजनिक प्रश्न को जन्म देती है, जबकि कभी बहुत बड़ा प्रदर्शन भी तत्काल नीति परिवर्तन नहीं करा पाता।
निष्कर्ष : जंतर-मंतर की तीन सौ वर्षों की यात्रा
दिल्ली का जंतर-मंतर लगभग तीन सौ वर्षों में भारत के दो अलग-अलग ऐतिहासिक अनुभवों का प्रतीक बना है। पहले यह खगोलीय गणना और वैज्ञानिक जिज्ञासा का केंद्र था। फिर उसके आसपास का क्षेत्र आधुनिक भारत में विरोध प्रदर्शन और नागरिक असहमति के महत्वपूर्ण स्थलों में शामिल हो गया।
इसकी राजनीतिक यात्रा में अन्ना हजारे का लोकपाल आंदोलन, निर्भया के लिए न्याय की माँग, पूर्व सैनिकों की पेंशन का संघर्ष, तमिलनाडु के किसानों की आर्थिक कठिनाइयाँ, नागरिकता कानून का विरोध, किसान संसद, महिला पहलवानों का धरना और प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता को लेकर छात्रों के प्रदर्शन जैसे अनेक अध्याय शामिल हैं। इनमें कुछ आंदोलनों के बाद कानून बने, कुछ कानून वापस हुए, कुछ सरकारी फैसले बदले, कुछ मामलों में न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ी और कुछ आंदोलनों की मूल माँगें पूरी नहीं हुईं।
जंतर-मंतर का महत्व इस बात में नहीं है कि वहाँ बैठने वाले प्रत्येक प्रदर्शनकारी की माँग पूरी हो जाती है। उसका महत्व इस बात में है कि नागरिकों को राष्ट्रीय राजधानी में अपनी शिकायत, असहमति और माँग सार्वजनिक रूप से रखने का एक पहचाना हुआ स्थान मिलता है।
जिस जगह के नाम का संबंध कभी यंत्रों और गणनाओं से था, उसी नाम से आज भारतीय लोकतंत्र की बहसों, संघर्षों और सार्वजनिक आकांक्षाओं का इतिहास भी जुड़ा हुआ है। यही जंतर-मंतर की ऐतिहासिक विशिष्टता है।


