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परिवार संभाला...बाबूलाल मरांडी के खिलाफ लड़ा चुनाव, ऐसी रही हेमंत की मां रूपी सोरेन की जिंदगी
Rupi Soren Profile: हेमंत सोरेन की मां रूपी सोरेन का निधन हो गया। उन्होंने 1999 में बाबूलाल मरांडी के खिलाफ लोकसभा चुनाव लड़ा था। जानें परिवार और सियासत से जुड़ी उनकी कहानी।
Image Source- Social Media
Rupi Soren Profile: झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मां और पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन की पत्नी रूपी सोरेन का बुधवार को निधन हो गया। 78 साल की रूपी सोरेन पिछले करीब 20 दिनों से रांची के हिल व्यू हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर में भर्ती थीं। सांस लेने में तकलीफ के बाद उन्हें 18 सितंबर को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। हालत गंभीर होने के बाद उन्हें वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया और बुधवार रात करीब 8:30 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली।
रूपी सोरेन को आम तौर पर लोग हेमंत सोरेन की मां और शिबू सोरेन की पत्नी के तौर पर जानते हैं, लेकिन उनकी अपनी भी एक राजनीतिक पहचान रही। उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ा था और परिवार के मुश्किल दौर में बच्चों की जिम्मेदारी भी संभाली। उनकी जिंदगी झारखंड के सबसे चर्चित राजनीतिक परिवार के उतार-चढ़ाव से भी जुड़ी रही।
शिबू सोरेन के संघर्ष में परिवार संभाला
रिपोर्ट्स के मुताबिक, रूपी सोरेन की पहचान सिर्फ एक राजनीतिक परिवार की सदस्य के तौर पर नहीं थी। शिबू सोरेन जब झारखंड आंदोलन और आदिवासी अधिकारों की राजनीति में सक्रिय थे, तब परिवार की जिम्मेदारी का बड़ा हिस्सा रूपी सोरेन ने संभाला।
एक पुराने विवरण के मुताबिक, शिबू सोरेन राजनीतिक गतिविधियों और आंदोलनों में काफी व्यस्त रहते थे। ऐसे में उनके तीन बेटों दुर्गा, हेमंत और बसंत और बेटी अंजलि की परवरिश में रूपी सोरेन की बड़ी भूमिका रही। परिवार के करीबी रहे लोगों ने भी बताया था कि उन्होंने घर और बच्चों की जिम्मेदारी संभाली।
यानी जिस परिवार की राजनीति बाद में झारखंड की सत्ता के केंद्र तक पहुंची, उसके शुरुआती संघर्ष में रूपी सोरेन की भूमिका घर को संभालने वाली महिला की रही।
1999 में बाबूलाल मरांडी के खिलाफ चुनाव
गौरतलब हो कि रूपी सोरेन खुद भी राजनीति में उतरी थीं। साल 1999 में जब झारखंड अलग राज्य नहीं बना था और यह इलाका बिहार का हिस्सा था, तब उन्होंने दुमका लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा।
उनका मुकाबला बीजेपी के बाबूलाल मरांडी से हुआ। यह मुकाबला बेहद करीबी रहा। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक बाबूलाल मरांडी को 2,01,141 वोट मिले, जबकि रूपी सोरेन किस्कू को 1,96,493 वोट मिले। यानी दोनों के बीच सिर्फ 4,648 वोट का अंतर रहा।
इस चुनाव में रूपी सोरेन की हार जरूर हुई, लेकिन इतने कम अंतर से हार ने दुमका की सियासत में इस मुकाबले को खास बना दिया। बाद में भी बाबूलाल मरांडी और सोरेन परिवार के बीच दुमका की राजनीति में मुकाबला बना रहा।
फिर विधानसभा चुनाव लड़ने की जताई थी इच्छा
रिपोर्ट्स के मुताबिक, 1999 के बाद रूपी सोरेन ने एक बार फिर चुनावी राजनीति में उतरने की इच्छा जताई थी। नवंबर 2024 की एक प्रोफाइल रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने खरसावां विधानसभा सीट से बीजेपी नेता अर्जुन मुंडा के खिलाफ चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर की थी।
रूपी सोरेन का मानना था कि अर्जुन मुंडा ने मुख्यमंत्री रहते हुए राज्य के लोगों के साथ न्याय नहीं किया। हालांकि बाद में उन्होंने खरसावां से चुनाव नहीं लड़ा। इसके बाद उनकी सक्रिय राजनीतिक भूमिका कम होती गई और वह परिवार पर ज्यादा ध्यान देने लगीं।
हेमंत के लिए हमेशा परिवार की मजबूत कड़ी रहीं
आपको बताते चलें कि रूपी सोरेन का रिश्ता सिर्फ हेमंत सोरेन की मां के तौर पर नहीं, बल्कि परिवार की उस सदस्य के तौर पर भी देखा जाता रहा जिसने मुश्किल दौर में परिवार को संभाले रखा।
2024 की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि हेमंत सोरेन और उनकी पत्नी कल्पना सोरेन किसी भी बड़े राजनीतिक या पारिवारिक मौके से पहले अपने माता-पिता से मिलने जाते थे। मुख्यमंत्री पद की शपथ जैसे अहम मौकों पर भी परिवार के वरिष्ठ सदस्यों का आशीर्वाद उनके लिए खास रहा।
वहीं हेमंत सोरेन ने भी एक पुराने इंटरव्यू में कहा था कि उम्र और स्वास्थ्य की वजह से उनके माता-पिता रोजमर्रा की राजनीतिक बातचीत में शामिल नहीं हो पाते थे और वह बेटे के तौर पर उनकी सेहत का ध्यान रखते थे।
पति की विरासत को आखिरी दौर तक संभाला
शिबू सोरेन के निधन के बाद भी रूपी सोरेन परिवार की महत्वपूर्ण सदस्य बनी रहीं। जून 2026 में जब शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण से सम्मानित किया गया, तब रूपी सोरेन ने राष्ट्रपति भवन में उनकी ओर से यह सम्मान ग्रहण किया था।
23 जून 2026 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें यह सम्मान प्रदान किया। उस दौरान शिबू सोरेन की बेटी अंजलि सोरेन और बहू कल्पना सोरेन भी मौजूद थीं।
यह उनके जीवन के आखिरी बड़े सार्वजनिक मौकों में से एक रहा, जब उन्होंने शिबू सोरेन की राजनीतिक विरासत का प्रतिनिधित्व किया।
20 दिन अस्पताल में रहीं, फिर दुनिया को कहा अलविदा
रिपोर्ट्स के मुताबिक, रूपी सोरेन पिछले कुछ समय से स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से जूझ रही थीं। 18 सितंबर को सांस लेने में तकलीफ के बाद उन्हें रांची के हिल व्यू अस्पताल में भर्ती कराया गया था। बुधवार को उनकी हालत और बिगड़ गई और उन्हें वेंटिलेटर सपोर्ट दिया गया। इसके बाद रात करीब 8:30 बजे उनका निधन हो गया।
उनके निधन के साथ सोरेन परिवार ने एक ऐसी सदस्य को खो दिया जिसने एक तरफ शिबू सोरेन के लंबे राजनीतिक संघर्ष के दौरान परिवार संभाला, तो दूसरी तरफ खुद भी चुनावी राजनीति में कदम रखा। 1999 में दुमका से बाबूलाल मरांडी के खिलाफ बेहद करीबी मुकाबला लड़ने से लेकर शिबू सोरेन की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ते देखने तक, रूपी सोरेन की जिंदगी झारखंड के सियासी इतिहास से गहराई से जुड़ी रही।


