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SIR पर ज्यूडिशरी में भी मतभेद? जस्टिस भुइयां के समर्थन में उतरे जस्टिस ओका, बोले- कुछ गलत नहीं
SIR विवाद के बीच रिटायर्ड जस्टिस अभय एस. ओका ने जस्टिस उज्जल भुइयां का समर्थन किया। जानिए SIR, मताधिकार और जजों की टिप्पणी पर उन्होंने क्या कहा।
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR (Special Intensive Revision) को लेकर चल रहा विवाद अब न्यायपालिका के भीतर सामने आ रही अलग-अलग राय तक पहुंच गया है। एक ओर 42 पूर्व न्यायाधीशों ने खुले पत्र के जरिए SIR और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का समर्थन किया है, वहीं सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज जस्टिस उज्जल भुइयां ने हाल ही में ऐसी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए थे।
जस्टिस भुइयां की टिप्पणी के बाद अब सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज जस्टिस अभय एस. ओका उनके समर्थन में सामने आए हैं। जस्टिस ओका ने कहा कि अगर किसी न्यायाधीश ने नागरिक के तौर पर लोकतंत्र और मताधिकार जैसे मुद्दे पर बात की है, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है।
'जस्टिस भुइयां ने कोई सीमा नहीं लांघी'
Live Law की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस ओका ने कहा कि जज भी एक नागरिक होता है और राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों के प्रति वह पूरी तरह उदासीन नहीं रह सकता। हालांकि, पद पर रहते हुए न्यायाधीशों को संयम बरतना जरूरी है। वे मीडिया के जरिए किसी खास मुद्दे पर अपनी राय नहीं रख सकते और न ही किसी लंबित मामले के गुण-दोष पर सार्वजनिक टिप्पणी कर सकते हैं।
लेकिन जस्टिस ओका के मुताबिक, यदि कोई न्यायाधीश किसी लॉ कॉलेज या अकादमिक मंच पर कानून के छात्रों से बातचीत कर रहा है, तो वह कानून के छात्र के तौर पर किसी कानूनी या संवैधानिक मुद्दे पर अपनी राय रख सकता है। शर्त यह है कि वह अपनी अदालत या किसी संवैधानिक अदालत में लंबित मामले के गुण-दोष पर टिप्पणी न करे।
जस्टिस ओका ने जस्टिस भुइयां के बयान का बचाव करते हुए कहा कि उन्हें नहीं लगता कि जस्टिस भुइयां ने अपनी न्यायिक सीमा पार की है। उनके मुताबिक, जस्टिस भुइयां ने युवाओं को वयस्क मताधिकार और लोकतंत्र में उसके महत्व के बारे में बताया था।
'एक नागरिक के तौर पर बोलने में कुछ गलत नहीं'
जस्टिस ओका ने कहा कि अगर कोई जज एक नागरिक के तौर पर किसी प्रक्रिया पर बात करता है, तो इसमें अपने आप में कोई गलती नहीं है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कोई मौजूदा जज अपनी अदालत या किसी अन्य संवैधानिक अदालत में लंबित मामले के गुण-दोष पर सार्वजनिक टिप्पणी नहीं कर सकता।
उन्होंने यह भी कहा कि कानून के छात्रों के साथ चर्चा के दौरान कोई न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट के किसी पुराने फैसले पर पुनर्विचार की जरूरत होने की बात कह सकता है। इसका यह अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए कि वही न्यायाधीश किसी न्यायिक कार्यवाही में भी उसी निष्कर्ष के साथ बैठेगा।
'लेक्स कॉन्सिलियम फाउंडेशन' की चर्चा में रखी राय
जस्टिस ओका ने ये बातें 'लेक्स कॉन्सिलियम फाउंडेशन' के फाउंडर-डायरेक्टर और पूर्व जज एडवोकेट जनरल नीलेन्द्र कुमार के साथ बातचीत के दौरान कहीं।
चर्चा की शुरुआत में जस्टिस ओका ने कहा कि उन्होंने जस्टिस भुइयां का भाषण ध्यान से पढ़ा है। उन्हें उसमें सुप्रीम कोर्ट में लंबित किसी मामले के गुण-दोष या SIR को लेकर अदालत द्वारा दिए गए किसी आदेश पर टिप्पणी नजर नहीं आई।
जस्टिस भुइयां ने SIR पर क्या कहा था?
जस्टिस ओका का यह समर्थन जस्टिस भुइयां के उस बयान के बाद आया है, जिसमें उन्होंने SIR जैसी किसी प्रक्रिया के जरिए लाखों भारतीय नागरिकों को मताधिकार से वंचित किए जाने की आशंका पर गंभीर चिंता जताई थी।
रविवार को NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में 19वीं जस्टिस बोध राज साहनी मेमोरियल मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन समारोह में बोलते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा था कि संविधान नागरिकों के दो वर्ग नहीं बनाता, एक ऐसा वर्ग जिसे वोट देने का अधिकार हो और दूसरा जिसे यह अधिकार हासिल न हो।
उन्होंने कहा था कि ऐसी प्रक्रिया, जो बड़ी संख्या में भारतीय नागरिकों को मतदान के अधिकार से वंचित कर सकती है, मूल रूप से मनमानी होगी और संवैधानिक व्यवस्था को नकारने के समान होगी। उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह की प्रक्रिया को सही ठहराने के लिए दी जाने वाली अलग-अलग दलीलें संवैधानिक सवाल को खत्म नहीं कर सकतीं।
SIR पर बढ़ती राजनीतिक और कानूनी बहस
SIR को लेकर पहले से ही राजनीतिक दलों के बीच तीखा विवाद चल रहा है। विपक्षी दल इसे मतदाता सूची से वैध मतदाताओं के नाम हटाए जाने की आशंका से जोड़ रहे हैं, जबकि चुनाव आयोग इसे मतदाता सूची को अधिक शुद्ध और विश्वसनीय बनाने की प्रक्रिया बता रहा है।
अब जस्टिस भुइयां की टिप्पणी और जस्टिस ओका के समर्थन ने इस बहस में न्यायिक स्वतंत्रता, जजों की सार्वजनिक अभिव्यक्ति और मताधिकार की संवैधानिक सुरक्षा जैसे सवालों को भी जोड़ दिया है।


