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शराब की दुकान में महिलाएं क्यों नहीं कर सकतीं काम? सोफी की लड़ाई के बाद हाईकोर्ट ने दिया बड़ा फैसला
Kerala Toddy Shop Women Employment: केरल हाईकोर्ट ने ताड़ी की दुकानों में महिलाओं की नियुक्ति पर रोक लगाने वाला नियम असंवैधानिक घोषित कर दिया। जानिए 49 वर्षीय सोफी कुंजुपालु की 28 सुनवाई वाली कानूनी लड़ाई की पूरी कहानी।
Toddy Shop Women Employment
Kerala Toddy Shop Women Employment: केरल की 49 वर्षीय सोफी कुंजुपालु की कहानी रोजगार के अधिकार और लैंगिक समानता (Gender Equality) की एक बड़ी मिसाल बन गई है। पति की मौत के बाद परिवार की जिम्मेदारी संभालने के लिए जब उन्होंने उसी ताड़ी की दुकान (Toddy Shop) में नौकरी मांगी, जहां उनके पति काम करते थे, तो उन्हें यह कहकर लौटा दिया गया कि कानून महिलाओं को ऐसी दुकानों में काम करने की अनुमति नहीं देता। सोफी ने इस फैसले को चुनौती दी और करीब दो साल तक कानूनी लड़ाई लड़ी। 28 सुनवाइयों के बाद केरल हाईकोर्ट (Kerala High Court) ने 5 अगस्त 2026 को महिलाओं की नियुक्ति पर रोक लगाने वाले नियम को असंवैधानिक (Unconstitutional) घोषित कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि महिलाओं की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन इसके नाम पर उन्हें रोजगार के अवसरों से वंचित नहीं किया जा सकता।
पति की मौत के बाद मांगी थी नौकरी, नियम का हवाला देकर किया इनकार
त्रिशूर जिले के पोंजनम की रहने वाली सोफी के पति के.जे. कुंजुपालु की 20 मई 2024 को मृत्यु हो गई थी। वह स्थानीय ताड़ी की दुकान में कर्मचारी थे। पति की मौत के करीब दो महीने बाद, जुलाई 2024 में सोफी ने अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) के आधार पर उसी दुकान में नौकरी मांगी। हालांकि, दुकान संचालक ने केरल आबकारी दुकान निस्तारण नियम, 2002 के नियम 7(37) का हवाला देते हुए उनका आवेदन खारिज कर दिया। इस नियम के तहत ताड़ी की दुकानों में किसी भी पद पर महिलाओं की नियुक्ति प्रतिबंधित थी। कुछ श्रमिक संगठनों ने भी उनकी नियुक्ति का विरोध किया।
इसके बाद सोफी ने अगस्त 2024 में केरल हाईकोर्ट का रुख किया। उनके सामने परिवार के भरण-पोषण की बड़ी चुनौती थी। उनकी बेटी चार्टर्ड अकाउंटेंसी (Chartered Accountancy) की पढ़ाई कर रही है, जबकि बेटा 12वीं कक्षा में है। केरल में ताड़ी की दुकानों के कर्मचारियों को बिक्री के आधार पर लगभग 35 हजार से 45 हजार रुपये तक मासिक वेतन मिलता है।
सरकार ने सुरक्षा का दिया तर्क, हाईकोर्ट ने नियम को बताया असंवैधानिक
मामले की सुनवाई के दौरान केरल सरकार ने दलील दी कि राज्य में कई ताड़ी की दुकानें दूरदराज के इलाकों में स्थित हैं। वहां महिलाओं को संभावित उत्पीड़न और असुरक्षित परिस्थितियों से बचाने के लिए नियुक्ति पर प्रतिबंध लगाया गया था। हालांकि, न्यायमूर्ति पी. गोपीनाथ ने सरकार की इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
अदालत ने कहा कि महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर उनके लिए रोजगार के सभी अवसर बंद कर देना उचित और आनुपातिक (Proportionate) उपाय नहीं है। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह महिलाओं के लिए सुरक्षित कार्यस्थल सुनिश्चित करे, ताकि वे अपनी पसंद का व्यवसाय चुन सकें। हाईकोर्ट ने नियम 7(37) को संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 का उल्लंघन मानते हुए निरस्त कर दिया। ये अनुच्छेद समानता के अधिकार, लैंगिक भेदभाव से सुरक्षा, व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता और जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े हैं।
अदालत ने सोफी के अनुकंपा नियुक्ति के दावे पर भी निर्देश दिया कि प्रतिबंधित नियम को लागू किए बिना उनके मामले पर विचार किया जाए।
केरल में 4,324 ताड़ी की दुकानें, करीब 21 हजार कर्मचारी
केरल ताड़ी श्रमिक कल्याण निधि बोर्ड के अध्यक्ष एन.वी. चंद्रबाबू के मुताबिक, राज्य में कुल 4,324 ताड़ी की दुकानें हैं, जहां लगभग 21 हजार कर्मचारी काम करते हैं। इनमें करीब 200 महिलाएं सफाई जैसे कामों से जुड़ी हैं। हालांकि, ताड़ी की बिक्री और दुकान के प्रबंधन जैसे कामों में महिलाओं की भागीदारी लगभग न के बराबर रही है।
बोर्ड के अनुसार, सोफी बिक्री या प्रबंधन से जुड़े पद पर काम करने वाली राज्य की पहली महिला बन सकती हैं। इसके अलावा केरल में एक महिला ताड़ी निकालने का काम भी करती हैं। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद अब महिलाओं के लिए ताड़ी की दुकानों में बिक्री और प्रबंधन जैसे कामों के अवसर खुल सकते हैं।
विदेशी शराब की दुकानों में महिलाओं की नियुक्ति पर भी हट चुकी है रोक
केरल हाईकोर्ट का यह फैसला पहली बार नहीं है, जब अदालत ने महिलाओं को शराब कारोबार से जुड़े रोजगार में शामिल होने से रोकने वाले नियम को खारिज किया है। साल 2017 में भी हाईकोर्ट ने विदेशी शराब की दुकानों में महिलाओं की नियुक्ति पर रोक लगाने वाले समान प्रतिबंध को निरस्त कर दिया था।
मौजूदा मामले में अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के 'अनुज गर्ग बनाम होटल एसोसिएशन ऑफ इंडिया' (Anuj Garg vs Hotel Association of India) मामले में दिए गए सिद्धांतों का भी सहारा लिया। इस मामले में सुरक्षा के नाम पर महिलाओं को रोजगार से बाहर रखने की नीति की संवैधानिक समीक्षा की गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी कारोबार पर सरकार का विशेष नियंत्रण होने का मतलब यह नहीं है कि उसमें महिलाओं को केवल उनके लिंग के आधार पर नौकरी से रोका जा सकता है।
विरोध के चलते पहले छोड़नी पड़ी थी नौकरी, अब फिर शुरू किया काम
सोफी को इससे पहले भी अदालती हस्तक्षेप के बाद करीब दो महीने तक ताड़ी की दुकान में काम करने का मौका मिला था। हालांकि, श्रमिक संगठनों के विरोध के चलते वह नौकरी जारी नहीं रख सकीं। अब नवंबर की शुरुआत में उनके ताड़ी की दुकान में दोबारा काम शुरू करने की खबर सामने आई है।
सोफी की यह लड़ाई केवल एक नौकरी पाने तक सीमित नहीं है। इस फैसले ने रोजगार के समान अवसर (Equal Employment Opportunities) और महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों से जुड़ी अहम बहस को सामने रखा है। अदालत का संदेश साफ है कि महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार और नियोक्ताओं की जिम्मेदारी है। सुरक्षा के नाम पर उनके लिए रोजगार के दरवाजे बंद करना इसका समाधान नहीं हो सकता।


