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क्या फिर सुनाई देगी कोलकाता की सड़कों पर ट्राम की घंटी? 70 पुराने मार्गों को बहाल करने की तैयारी
Kolkata News: 153 साल पुरानी कोलकाता ट्राम को पुनर्जीवित करने की तैयारी है। सरकार 70 पुराने मार्गों की बहाली और आधुनिक ट्राम चलाने की संभावनाएं तलाश रही है।
फोटो-सोशल मीडिया
Kolkata News: कभी कोलकाता की सड़कों की धड़कन रही ट्राम अब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। घोड़ों से खिंचने वाली गाड़ियों से शुरू हुआ उसका 153 वर्षों का सफर बिजली से चलने वाली आधुनिक ट्रामों तक पहुंचा, लेकिन बदलते यातायात, सड़कों पर बढ़ते वाहनों और लगातार बंद होते मार्गों ने इस ऐतिहासिक सवारी को लगभग हाशिये पर पहुंचा दिया। अब पश्चिम बंगाल की भाजपा सरकार इसे नया जीवन देने की तैयारी कर रही है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की सरकार ने करीब 70 पुराने ट्राम मार्गों की बहाली और आधुनिकीकरण की संभावनाओं का अध्ययन शुरू कराया है। सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) के जरिए इस व्यवस्था को विकसित करने की योजना है। ऑस्ट्रेलिया और बेलारूस की कंपनियों ने भी परियोजना में रुचि दिखाई है। सरकार चाहती है कि ट्राम केवल पर्यटन का आकर्षण बनकर न रह जाए, बल्कि आधुनिक परिवहन व्यवस्था का हिस्सा बने और उसकी घंटी फिर से कोलकाता की सड़कों पर सुनाई दे। 
1873 में घोड़ों से खिंचने वाली ट्राम से शुरू हुआ था सफर
कोलकाता में ट्राम का इतिहास 24 फरवरी 1873 से शुरू होता है। उस दिन सियालदह से आर्मेनियन घाट के बीच लगभग 3.9 किलोमीटर लंबे मार्ग पर घोड़ों से खिंचने वाली पहली ट्राम चली थी। यह भारत की शुरुआती संगठित शहरी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्थाओं में से एक थी। हालांकि, आर्थिक और परिचालन संबंधी कठिनाइयों के कारण उसी वर्ष 20 नवंबर को सेवा बंद करनी पड़ी। सात वर्ष बाद नवंबर 1880 में ट्राम ने फिर वापसी की। उसी वर्ष कलकत्ता ट्रामवेज कंपनी का गठन लंदन में हुआ। वर्ष 1882 में भाप से चलने वाली ट्राम का प्रयोग शुरू हुआ, लेकिन वास्तविक परिवर्तन बिजली के इस्तेमाल से आया। 27 मार्च 1902 को एस्प्लेनेड से खिदिरपुर के बीच विद्युत चालित ट्राम का परिचालन शुरू हुआ। इसके बाद एस्प्लेनेड से कालीघाट तक भी बिजली वाली ट्राम चलने लगी। धीरे-धीरे शहर के बाजार, रेलवे स्टेशन, दफ्तर, शैक्षणिक संस्थान और आवासीय इलाके ट्राम नेटवर्क से जुड़ गए। 
कभी 450 ट्रामों का बेड़ा, आज गिने-चुने मार्गों तक सीमित सेवा
बीसवीं सदी के मध्य तक कोलकाता की ट्राम सार्वजनिक परिवहन की महत्वपूर्ण व्यवस्था बन चुकी थी। वर्ष 1943 में कोलकाता और हावड़ा का संयुक्त ट्राम नेटवर्क लगभग 68 किलोमीटर तक फैल गया था। वर्ष 1960 में कलकत्ता ट्रामवेज कंपनी के पास लगभग 450 ट्राम कारें थीं। सुबह काम पर जाने वाले कर्मचारी, बाजारों में सामान बेचने वाले छोटे कारोबारी और स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थी बड़ी संख्या में इनका इस्तेमाल करते थे। लेकिन बाद के दशकों में बसों, निजी कारों, मेट्रो और अन्य वाहनों के विस्तार के साथ ट्राम का नेटवर्क सिमटने लगा। कई मार्गों पर पटरियां हटा दी गईं, जबकि कुछ पर परिचालन बंद हो गया। हाल के वर्षों में श्यामबाजार से एस्प्लेनेड और गरियाहाट से एस्प्लेनेड जैसे चुनिंदा मार्गों तक ही सेवा सीमित रह गई। कभी शहर की आवश्यकता रही यह सवारी धीरे-धीरे उसकी स्मृति बनती चली गई। 
70 पुराने मार्गों का सर्वे, राइट्स तैयार कर रहा पुनरुद्धार की योजना
पश्चिम बंगाल सरकार ने ट्राम नेटवर्क की व्यवहार्यता, आधुनिकीकरण और विस्तार के अध्ययन का जिम्मा सरकारी परिवहन परामर्श कंपनी राइट्स (RITES) को सौंपा है। परिवहन विभाग ने 28 सितंबर 2026 को इस अध्ययन के लिए औपचारिक कार्यादेश जारी किया। राइट्स की टीम पुराने मार्गों, मौजूदा पटरियों, डिपो, रखरखाव सुविधाओं और संभावित यात्री संख्या का अध्ययन कर रही है। राज्य के परिवहन मंत्री अर्जुन सिंह ने लगभग 70 पुराने मार्गों के पुनरुद्धार की संभावनाएं तलाशने की बात कही है। योजना में एस्प्लेनेड-खिदिरपुर मार्ग की बहाली के साथ साल्ट लेक, न्यू टाउन और राजारहाट जैसे विकसित इलाकों तक विस्तार भी शामिल है। कालीघाट और दक्षिणेश्वर मंदिरों को जोड़ने वाले संभावित ट्राम कॉरिडोर पर भी विचार हो रहा है। हालांकि, सभी 70 मार्गों पर सेवा दोबारा शुरू करने का अंतिम निर्णय अभी नहीं हुआ है। यह अध्ययन की व्यवहार्यता, लागत और यातायात संबंधी निष्कर्षों पर निर्भर करेगा। 
विदेशी कंपनियों की दिलचस्पी, लेकिन ट्राम का मालिकाना सरकार के पास रहेगा
राज्य सरकार ट्राम को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाने के लिए पीपीपी मॉडल पर विचार कर रही है। प्रस्ताव के अनुसार, पटरियों, डिपो और अन्य बुनियादी ढांचे का स्वामित्व सरकार के पास रहेगा, जबकि निजी भागीदार परिचालन, रखरखाव और आधुनिकीकरण में सहयोग कर सकेंगे। ऑस्ट्रेलिया और बेलारूस की कंपनियों ने इसमें रुचि दिखाई है। परिवहन विभाग का इरादा राइट्स की सिफारिशों का अध्ययन करने के बाद इच्छुक कंपनियों से औपचारिक प्रस्ताव आमंत्रित करने का है। आधुनिक वातानुकूलित ट्रामों, बेहतर सिग्नलिंग और नई तकनीक के विकल्पों पर विचार किया जा रहा है। बैटरी आधारित संचालन की संभावनाएं भी भविष्य की योजना का हिस्सा हो सकती हैं। हालांकि, निवेश की राशि, निजी भागीदारों की जिम्मेदारी और परिचालन शुरू होने की निश्चित समयसीमा अभी तय नहीं है। 
ट्राम को बचाने के लिए तीन दशक से चल रहा आंदोलन
ट्राम का नेटवर्क सिमटने के बावजूद कोलकाता में इसे बचाने की मांग लगातार उठती रही है। कलकत्ता ट्राम यूजर्स एसोसिएशन के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य लगभग तीन दशक से इसके संरक्षण और पुनरुद्धार के लिए अभियान चला रहे हैं। संगठन का तर्क है कि ट्राम को शहर में यातायात जाम का कारण बताकर उसकी उपयोगिता को कम करके आंका गया, जबकि यह कम प्रदूषण वाला सार्वजनिक परिवहन है। एसोसिएशन के एक सर्वेक्षण में 98 प्रतिशत प्रतिभागियों ने ट्राम संरक्षण के पक्ष में राय दी थी। हालांकि, इस सर्वेक्षण को पूरे कोलकाता की जनसंख्या का प्रतिनिधि जनमत नहीं माना जा सकता। ट्राम समर्थकों का कहना है कि आधुनिक पटरियों, बेहतर यातायात प्रबंधन और मेट्रो से समन्वय के साथ यह व्यवस्था शहर के परिवहन में फिर महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। 
क्या आधुनिक कोलकाता में फिर सफल हो पाएगी ट्राम?
ट्राम के पुनरुद्धार की सबसे बड़ी चुनौती उसकी आर्थिक व्यवहार्यता और यातायात व्यवस्था के साथ सामंजस्य है। पुरानी पटरियों की मरम्मत, विद्युत आपूर्ति, आधुनिक डिब्बों की खरीद और सुरक्षित सिग्नलिंग में पर्याप्त निवेश करना होगा। सड़कों पर दूसरे वाहनों के साथ चलने वाली ट्राम को जाम का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए व्यस्त मार्गों पर अलग या संरक्षित ट्राम कॉरिडोर विकसित करने की आवश्यकता का भी मूल्यांकन करना होगा। पर्यावरण की दृष्टि से विद्युत चालित ट्राम का लाभ यह है कि परिचालन के दौरान उससे सीधे धुएं का उत्सर्जन नहीं होता। हालांकि, उसकी समग्र पर्यावरणीय उपयोगिता बिजली के स्रोत, यात्री संख्या और परिचालन दक्षता पर निर्भर करेगी।
कोलकाता की ट्राम केवल लोहे की पटरियों पर दौड़ने वाला यातायात का साधन नहीं रही है। उसने ब्रिटिश शासन, स्वतंत्रता आंदोलन, आजादी और आधुनिक महानगर के विकास का लंबा दौर देखा है। इसकी ऐतिहासिक पहचान को सुरक्षित रखने के लिए एस्प्लेनेड में 'स्मरणिका' ट्राम संग्रहालय जैसे प्रयास भी किए गए हैं। लेकिन वास्तविक चुनौती स्मृतियों को संग्रहालय तक सीमित रखने के बजाय ट्राम को फिर उपयोगी बनाना है। 153 साल पुरानी यह व्यवस्था अब एक नए मोड़ पर खड़ी है। सरकार की पुनरुद्धार योजना यदि जमीन पर उतरती है तो कोलकाता अपनी ऐतिहासिक पहचान को सुरक्षित रखते हुए आधुनिक और पर्यावरण-अनुकूल सार्वजनिक परिवहन का एक नया उदाहरण प्रस्तुत कर सकता है। 


