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क्या इसी सदी में खत्म हो सकती है मानव सभ्यता? लैंसेट की रिपोर्ट में AI और परमाणु युद्ध पर चेतावनी
New Delhi: लैंसेट आयोग की रिपोर्ट में AI के दुरुपयोग, परमाणु युद्ध और जैविक हथियारों समेत वैश्विक स्वास्थ्य के 17 बड़े खतरों की पहचान की गई है। जानिए विशेषज्ञों की चेतावनी।
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New Delhi: क्या मानव सभ्यता अपनी ही विकसित की गई तकनीकों के कारण अस्तित्व के संकट में पड़ सकती है? क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता, परमाणु हथियार और जैविक युद्ध की बढ़ती क्षमताएँ भविष्य में ऐसी तबाही पैदा कर सकती हैं, जिससे मानव समाज की मौजूदा व्यवस्था ही चरमरा जाए? चिकित्सा और सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल द लैंसेट से जुड़े एक नए आयोग की रिपोर्ट ने ऐसे ही सवालों को वैश्विक बहस के केंद्र में ला दिया है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का दुरुपयोग, परमाणु संघर्ष और जैविक हथियार मानवता के लिए अत्यंत गंभीर जोखिम पैदा कर सकते हैं। इनसे जुड़ी कुछ चरम परिस्थितियों में मानव सभ्यता के अस्तित्व तक पर संकट उत्पन्न होने की आशंका व्यक्त की गई है। हालाँकि, रिपोर्ट का आशय यह नहीं है कि इस सदी के अंत तक मानव सभ्यता का विनाश निश्चित है। ऐसे विनाशकारी परिणामों की संभावना को अत्यंत कम लेकिन संभावित प्रभाव को असाधारण रूप से गंभीर माना गया है।
'लैंसेट कमीशन ऑन ट्वेंटी-फर्स्ट सेंचुरी ग्लोबल थ्रेट्स टू हेल्थ' नामक आयोग ने वैश्विक स्वास्थ्य और मानव कल्याण के सामने मौजूद 17 प्रमुख खतरों की पहचान की है। इनमें परमाणु युद्ध, जैविक हथियार और एआई से संबंधित जोखिमों के अतिरिक्त जलवायु परिवर्तन, वायु प्रदूषण, प्राकृतिक महामारियाँ, बच्चों में कुपोषण, मोटापा तथा अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य और विकास सहायता में कटौती जैसे मुद्दे शामिल हैं। आयोग में शामिल 35 विशेषज्ञों ने इन चुनौतियों को केवल चिकित्सा संबंधी समस्याओं के रूप में नहीं, बल्कि मानव समाज की सुरक्षा, राजनीतिक स्थिरता, वैज्ञानिक प्रगति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से जुड़े व्यापक प्रश्नों के रूप में प्रस्तुत किया है। रिपोर्ट का मूल संदेश है कि दुनिया को केवल उन बीमारियों और आपदाओं से नहीं लड़ना चाहिए जो आज सामने हैं, बल्कि उन दुर्लभ किंतु विनाशकारी घटनाओं की रोकथाम के लिए भी तैयारी करनी चाहिए जिनका प्रभाव कई पीढ़ियों तक रह सकता है।
एआई का सबसे बड़ा खतरा केवल नौकरियाँ जाना नहीं, उसका विनाशकारी दुरुपयोग भी
कृत्रिम बुद्धिमत्ता को लेकर सार्वजनिक चर्चा सामान्यतः रोजगार, शिक्षा, सूचना, निगरानी और मानव निर्णयों पर उसके प्रभाव तक सीमित रहती है। लेकिन लैंसेट आयोग की चेतावनी इससे आगे जाती है। रिपोर्ट में एआई के ऐसे संभावित दुरुपयोग पर चिंता जताई गई है जो खतरनाक जैविक क्षमताओं के विकास या उनके इस्तेमाल को आसान बना सकता है। वैज्ञानिक अनुसंधान में एआई की सहायता से विशाल मात्रा में जानकारी का विश्लेषण, जैविक संरचनाओं का अध्ययन और जटिल समस्याओं के समाधान की गति बढ़ सकती है। यही क्षमता चिकित्सा अनुसंधान, नई दवाओं और रोगों की पहचान में लाभकारी हो सकती है, लेकिन इसके दुरुपयोग की संभावना भी सुरक्षा विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय है।
जैविक हथियारों से संबंधित जोखिम का मूल प्रश्न यह है कि यदि अत्यधिक सक्षम तकनीकी प्रणालियाँ ऐसे व्यक्तियों या संगठनों के हाथों में पहुँच जाएँ जिनका उद्देश्य नुकसान पहुँचाना है, तो क्या वे पहले की तुलना में अधिक आसानी से खतरनाक जैविक गतिविधियों की योजना बना सकेंगे? रिपोर्ट इसी प्रकार के संभावित जोखिमों के प्रति सावधान करती है। इसका अर्थ यह नहीं कि वर्तमान एआई प्रणालियाँ अपने आप जैविक हथियार बना सकती हैं या किसी व्यक्ति के लिए ऐसी गतिविधि करना सरल और सुनिश्चित हो गया है। वास्तविक जैविक अनुसंधान में अनेक तकनीकी, भौतिक और संस्थागत बाधाएँ मौजूद रहती हैं। फिर भी, जैसे-जैसे एआई की क्षमताएँ विकसित होंगी, सुरक्षा व्यवस्था को भी उसके अनुरूप मजबूत करना आवश्यक होगा।
यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझना चाहिए। एआई स्वयं किसी एक उद्देश्य वाली तकनीक नहीं है। उसका उपयोग रोगों की पहचान, जलवायु अध्ययन, शिक्षा और वैज्ञानिक खोजों के लिए भी किया जा सकता है। खतरा मुख्यतः उन परिस्थितियों से उत्पन्न होता है जिनमें शक्तिशाली तकनीक का दुरुपयोग हो, उसकी सुरक्षा सीमाएँ अपर्याप्त हों या उसके प्रभावों की निगरानी प्रभावी ढंग से न की जा सके। इसलिए आयोग की चेतावनी एआई के विकास को रोकने के बजाय उसके सुरक्षित, जवाबदेह और नियंत्रित उपयोग की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
परमाणु युद्ध में विस्फोट से अधिक घातक हो सकती है उसके बाद की भुखमरी
परमाणु युद्ध का खतरा सामान्यतः विस्फोट, रेडिएशन और तत्काल होने वाली जनहानि से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन वैज्ञानिकों की चिंता इससे कहीं आगे जाती है। बड़े पैमाने पर परमाणु हथियारों का इस्तेमाल होने पर शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों में भीषण आग लग सकती है। इन आग से उत्पन्न कालिख वायुमंडल की ऊपरी परतों तक पहुँचकर सूर्य की रोशनी को पृथ्वी की सतह तक आने से रोक सकती है। ऐसी स्थिति में तापमान गिर सकता है, वर्षा के स्वरूप में बदलाव हो सकता है और कृषि उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। वैज्ञानिक इस संभावित परिस्थिति को परमाणु शीतकाल कहते हैं।
परमाणु शीतकाल का सबसे गंभीर परिणाम वैश्विक खाद्य व्यवस्था पर पड़ सकता है। यदि लंबे समय तक पर्याप्त धूप और अनुकूल तापमान उपलब्ध नहीं हुआ, तो गेहूँ, चावल, मक्का और अन्य प्रमुख फसलों का उत्पादन घट सकता है। पशुपालन और मत्स्य उत्पादन भी प्रभावित हो सकते हैं। परिणामस्वरूप खाद्यान्न की कीमतों में असाधारण वृद्धि, अंतरराष्ट्रीय व्यापार में व्यवधान और बड़े पैमाने पर भुखमरी जैसी स्थितियाँ पैदा हो सकती हैं। इस प्रकार परमाणु युद्ध में सीधे विस्फोट से बच जाने वाले करोड़ों लोगों का जीवन भी बाद में उत्पन्न खाद्य संकट से खतरे में पड़ सकता है।
लैंसेट आयोग के आकलन के अनुसार, परमाणु संघर्ष की रोकथाम के लिए प्रभावी कार्रवाई से वर्ष 2100 तक अनुमानित 13.3 करोड़ मौतों और 9.35 अरब स्वस्थ जीवन-वर्षों की संभावित हानि को टाला जा सकता है। यह कोई निश्चित भविष्यवाणी नहीं, बल्कि जोखिम और संभावित परिणामों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया मॉडल आधारित आकलन है।
जैविक हथियार और एआई का मेल क्यों चिंताजनक?
मानव इतिहास में संक्रामक बीमारियाँ अनेक बार विनाशकारी महामारियों का कारण बनी हैं। कोविड-19 महामारी ने भी दिखाया कि एक संक्रामक रोग स्वास्थ्य सेवाओं, अर्थव्यवस्था, शिक्षा और अंतरराष्ट्रीय आवागमन को कितनी व्यापकता से प्रभावित कर सकता है। लेकिन प्राकृतिक महामारी और जानबूझकर किए गए जैविक हमले के बीच महत्वपूर्ण अंतर है। प्राकृतिक महामारी किसी रोगजनक के प्रसार से उत्पन्न हो सकती है, जबकि जैविक हथियार का उद्देश्य रोग पैदा करने वाले कारकों का जानबूझकर नुकसान पहुँचाने के लिए इस्तेमाल करना होता है।
एआई के संदर्भ में चिंता यह है कि भविष्य में अत्यधिक उन्नत प्रणालियाँ वैज्ञानिक जानकारी के विश्लेषण और जटिल समस्याओं के समाधान की क्षमता को इतना बढ़ा सकती हैं कि उनके दुरुपयोग से जैविक सुरक्षा के सामने नई चुनौतियाँ उत्पन्न हों। यह जोखिम केवल प्रयोगशालाओं की सुरक्षा तक सीमित नहीं है। इसमें संवेदनशील वैज्ञानिक जानकारी तक पहुँच, अनुसंधान की निगरानी, अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन और संभावित दुरुपयोग की समय रहते पहचान जैसे प्रश्न भी शामिल हैं।
जैविक हथियार सम्मेलन के माध्यम से दुनिया ने जैविक हथियारों के विकास, उत्पादन और भंडारण पर प्रतिबंध लगाने की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाई है। लेकिन नई तकनीकों के विकास के साथ यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि जैविक अनुसंधान के वैध और लाभकारी उपयोग को बनाए रखते हुए उसके दुरुपयोग की संभावनाओं को सीमित किया जाए। लैंसेट आयोग की चेतावनी इसी व्यापक सुरक्षा चुनौती की ओर संकेत करती है।
केवल भविष्य की आपदाएँ नहीं, आज की बीमारियाँ भी मानवता के लिए बड़ा खतरा
रिपोर्ट की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें दुर्लभ किंतु अत्यधिक विनाशकारी घटनाओं के साथ उन समस्याओं को भी शामिल किया गया है जो आज लाखों लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही हैं। इनमें मोटापा, वायु प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, कुपोषण, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ और रोगाणुरोधी दवाओं के प्रति प्रतिरोध जैसी चुनौतियाँ शामिल हैं। इन खतरों की प्रकृति अलग-अलग है, लेकिन इनके परिणाम एक-दूसरे से जुड़े हो सकते हैं।
उदाहरण के लिए, जलवायु परिवर्तन से अत्यधिक गर्मी, सूखा, बाढ़ और कृषि उत्पादन में व्यवधान का जोखिम बढ़ सकता है। इससे खाद्य सुरक्षा प्रभावित हो सकती है और कमजोर आबादी में कुपोषण की समस्या गंभीर हो सकती है। दूसरी ओर, वायु प्रदूषण श्वसन तथा हृदय संबंधी बीमारियों का जोखिम बढ़ाता है। मोटापा और असंतुलित जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ स्वास्थ्य सेवाओं पर दीर्घकालिक दबाव पैदा करती हैं। रोगाणुरोधी प्रतिरोध के कारण सामान्य संक्रमणों का उपचार भी अधिक कठिन और महँगा हो सकता है।
आयोग ने इन खतरों की तुलना के लिए एक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य मापदंड का इस्तेमाल किया है, जिसे डिसएबिलिटी एडजस्टेड लाइफ ईयर्स अर्थात डीएएलवाई कहा जाता है। इसका अर्थ बीमारी, दिव्यांगता या समय से पहले मृत्यु के कारण खोए गए स्वस्थ जीवन-वर्षों से है। इस आधार पर यह समझने का प्रयास किया जाता है कि किसी खतरे के कारण मानव समाज कितने वर्षों का स्वस्थ जीवन खो सकता है और प्रभावी नीतियों से उस हानि का कितना हिस्सा रोका जा सकता है।
मोटापा और शिक्षा की कमी से संभावित नुकसान भी असाधारण
लैंसेट आयोग के आकलन में मोटापे से जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों का संभावित बोझ अत्यंत बड़ा पाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2100 तक प्रभावी नीतिगत हस्तक्षेप से मोटापे से संबंधित लगभग 23.1 अरब स्वस्थ जीवन-वर्षों की संभावित हानि टाली जा सकती है। इसी प्रकार शिक्षा के स्तर में सुधार से लगभग 16.1 अरब स्वस्थ जीवन-वर्षों की हानि रोकने की संभावना का अनुमान प्रस्तुत किया गया है।
ये आँकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि मानवता के सामने सबसे बड़ी चुनौतियाँ केवल युद्ध या नई तकनीकों से संबंधित नहीं हैं। भोजन की गुणवत्ता, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और सामाजिक असमानता भी आने वाली पीढ़ियों के जीवन को व्यापक रूप से प्रभावित कर सकती हैं।
विशेष रूप से शिक्षा का स्वास्थ्य से गहरा संबंध है। बेहतर शिक्षा से स्वास्थ्य संबंधी जानकारी तक पहुँच, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, परिवार नियोजन, रोजगार के अवसर और जीवन की परिस्थितियों में सुधार संभव हो सकता है। इसलिए शिक्षा को केवल आर्थिक विकास का साधन मानना पर्याप्त नहीं है; वह दीर्घकालिक सार्वजनिक स्वास्थ्य की भी महत्वपूर्ण आधारशिला है।
जलवायु परिवर्तन से अरबों स्वस्थ जीवन-वर्षों का नुकसान टाला जा सकता है
रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन को पहले से मौजूद गंभीर स्वास्थ्य संकट के रूप में देखा गया है। आयोग के अनुसार, यदि वैश्विक तापवृद्धि को लगभग 1.8 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखा जाए, बजाय इसके कि वह लगभग 4.4 डिग्री सेल्सियस तक पहुँचे, तो अत्यधिक गर्मी और वायु प्रदूषण जैसे मापे जा सकने वाले प्रभावों से होने वाली लगभग 1.89 अरब स्वस्थ जीवन-वर्षों की संभावित हानि रोकी जा सकती है।
यह अनुमान जलवायु परिवर्तन के सभी संभावित प्रभावों को समाहित नहीं करता। विस्थापन, सूखे से उत्पन्न सामाजिक अस्थिरता, मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव और दीर्घकालिक आर्थिक नुकसान जैसी अनेक समस्याओं का पूर्ण आकलन अधिक जटिल है। इसलिए वास्तविक नुकसान अनुमान से अधिक भी हो सकता है।
जलवायु परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उसका प्रभाव सभी देशों और समुदायों पर समान रूप से नहीं पड़ता। कम आय वाले परिवार, असुरक्षित आवासों में रहने वाले लोग, बच्चे, बुजुर्ग और पहले से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना कर रहे व्यक्ति अधिक जोखिम में हो सकते हैं। इस कारण जलवायु नीति और सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति को अलग-अलग देखने के बजाय एक-दूसरे से जोड़कर तैयार करने की आवश्यकता है।
भारत के लिए रिपोर्ट का क्या अर्थ है?
भारत के संदर्भ में इस रिपोर्ट का महत्व विशेष रूप से व्यापक है। देश को एक साथ कई प्रकार की स्वास्थ्य और सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। वायु प्रदूषण, अत्यधिक गर्मी, असमान पोषण, मोटापा, डायबिटीज, संक्रामक रोग, रोगाणुरोधी प्रतिरोध और स्वास्थ्य सेवाओं तक असमान पहुँच जैसी समस्याएँ सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों के लिए महत्वपूर्ण हैं। दूसरी ओर, भारत की भौगोलिक स्थिति और परमाणु हथियारों से लैस पड़ोसी देशों की मौजूदगी के कारण क्षेत्रीय सुरक्षा और परमाणु जोखिम भी दीर्घकालिक रणनीतिक महत्व रखते हैं।
भारत के लिए एआई संबंधी चुनौती दोहरी है। एक ओर यह तकनीक स्वास्थ्य सेवाओं, दवाओं के अनुसंधान, कृषि, शिक्षा और आपदा प्रबंधन में नई संभावनाएँ पैदा कर सकती है। दूसरी ओर, इसके दुरुपयोग, डिजिटल सुरक्षा और संवेदनशील वैज्ञानिक क्षमताओं तक पहुँच को लेकर उचित सुरक्षा उपाय आवश्यक होंगे। इसी प्रकार जैविक सुरक्षा के क्षेत्र में रोग निगरानी, प्रयोगशालाओं की सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य अनुसंधान और आपातकालीन तैयारी को मजबूत करना महत्वपूर्ण है।
रिपोर्ट से भारत के लिए एक और महत्वपूर्ण संदेश निकलता है कि स्वास्थ्य सुरक्षा को केवल अस्पतालों और डॉक्टरों की संख्या तक सीमित नहीं रखा जा सकता। खाद्य सुरक्षा, शिक्षा, पर्यावरण, राष्ट्रीय सुरक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान और अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी स्वास्थ्य सुरक्षा के अभिन्न हिस्से हैं। भविष्य की किसी बड़ी आपदा से निपटने की क्षमता इस बात पर निर्भर करेगी कि ये व्यवस्थाएँ सामान्य परिस्थितियों में कितनी मजबूत और समन्वित हैं।
क्या मानव सभ्यता का अंत वास्तव में संभव है?
इस रिपोर्ट के संदर्भ में सबसे अधिक ध्यान आकर्षित करने वाला प्रश्न मानव सभ्यता के संभावित विनाश का है। वैज्ञानिक दृष्टि से यहाँ तीन अलग-अलग स्थितियों के बीच अंतर करना आवश्यक है। पहली स्थिति किसी बड़े संकट के कारण व्यापक जनहानि की है। दूसरी स्थिति में वैश्विक अर्थव्यवस्था, खाद्य व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं और राजनीतिक संस्थाओं का गंभीर विघटन हो सकता है। तीसरी और सबसे चरम स्थिति मानव प्रजाति के पूर्ण विलुप्त होने की है।
ये तीनों स्थितियाँ एक समान नहीं हैं। किसी विनाशकारी युद्ध या महामारी से सभ्यता को अत्यंत गंभीर नुकसान पहुँच सकता है, लेकिन इससे मानव प्रजाति का पूर्ण विनाश अनिवार्य नहीं हो जाता। लैंसेट आयोग ने परमाणु संघर्ष और एआई के दुर्भावनापूर्ण उपयोग को ऐसी श्रेणी में रखा है जिनमें अत्यंत चरम परिस्थितियों में मानव अस्तित्व को खतरा पहुँचाने की क्षमता हो सकती है। हालाँकि, ऐसी घटनाओं की संभावना कम मानी गई है और उनके भविष्य के परिणामों में व्यापक अनिश्चितता बनी हुई है।
इसी कारण रिपोर्ट को मानवता के अंत की निश्चित भविष्यवाणी के रूप में प्रस्तुत करना गलत होगा। यह एक जोखिम आकलन है, जिसका उद्देश्य संभावित खतरों की गंभीरता समझना और उनके विरुद्ध समय रहते नीतिगत कार्रवाई को प्रोत्साहित करना है।
सरकारों को क्या करना चाहिए? आयोग ने सुझाई तीन प्राथमिकताएँ
आयोग ने वैश्विक नेतृत्व के सामने तीन प्रमुख दिशाएँ रखी हैं। पहली, ऐसी स्वास्थ्य प्रणालियों का विकास जो महामारियों, पर्यावरणीय आपदाओं और अन्य बड़े संकटों का सामना करने में सक्षम हों। दूसरी, वैज्ञानिक अनुसंधान और नई तकनीकों में निवेश बढ़ाना, ताकि गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के समाधान और संभावित आपदाओं की रोकथाम के बेहतर साधन विकसित किए जा सकें। तीसरी, उभरते खतरों की नियमित निगरानी और उनके जोखिम का मूल्यांकन मजबूत करना।
आयोग के सह-अध्यक्ष प्रोफेसर क्रिस्टोफर जे. एल. मरे, जो वाशिंगटन विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन के निदेशक हैं, ने इस बात पर जोर दिया है कि विभिन्न खतरे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसलिए उनसे निपटने के लिए अलग-अलग और असंबद्ध प्रयासों के बजाय व्यापक रणनीति आवश्यक है।
रिपोर्ट को 11 अक्टूबर 2026 को बर्लिन में आयोजित विश्व स्वास्थ्य शिखर सम्मेलन के दौरान प्रस्तुत किया गया था। इसका आकलन 204 देशों और क्षेत्रों के आँकड़ों तथा संभावित भविष्य के विभिन्न परिदृश्यों पर आधारित है।
मानवता के भविष्य का फैसला तकनीक नहीं, उसके इस्तेमाल और हमारी नीतियाँ करेंगी
लैंसेट आयोग की रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष भय पैदा करना नहीं, बल्कि भविष्य की आपदाओं को रोकने की मानवीय क्षमता पर ध्यान केंद्रित करना है। परमाणु हथियार मनुष्यों ने बनाए हैं, एआई का विकास मनुष्य कर रहा है और जैविक अनुसंधान की दिशा भी मानवीय निर्णयों से निर्धारित होती है। इन तकनीकों से जुड़े जोखिमों को कम करने के लिए वैज्ञानिक सावधानी, प्रभावी नियमन, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता होगी।
इसके साथ ही दुनिया को उन समस्याओं की उपेक्षा भी नहीं करनी चाहिए जो आज ही करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही हैं। जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, कुपोषण, मोटापा और स्वास्थ्य असमानता जैसी चुनौतियाँ किसी भविष्य की कल्पना नहीं, बल्कि वर्तमान की वास्तविक समस्याएँ हैं। इनका समाधान भी आने वाली पीढ़ियों के स्वस्थ जीवन के लिए उतना ही आवश्यक है जितना किसी बड़े परमाणु या जैविक संकट की रोकथाम।
लैंसेट की चेतावनी का वास्तविक अर्थ यह है कि मानव सभ्यता का भविष्य पहले से निर्धारित नहीं है। अत्यंत विनाशकारी घटनाओं की संभावना भले ही कम हो, लेकिन उनके परिणाम इतने गंभीर हो सकते हैं कि उनकी अनदेखी करना उचित नहीं होगा। दुनिया के सामने चुनौती केवल नई तकनीकें विकसित करने की नहीं, बल्कि इतनी समझदारी और जिम्मेदारी विकसित करने की भी है कि वही तकनीकें मानवता के विनाश के बजाय उसके सुरक्षित भविष्य का आधार बनें।


