Shiv Sena Split: महाराष्ट्र में फिर सबसे बड़ी बगावत की आहट! अगर UBT में पड़ी टूट तो उद्धव ठाकरे क्या होगा?

Shiv Sena Split: महाराष्ट्र की सियासत में फिर बगावत की आहट तेज हो गई है। शिवसेना (UBT) में संभावित टूट और 'ऑपरेशन टाइगर' की चर्चाओं के बीच उद्धव ठाकरे की अगली रणनीति पर सबकी नजरें टिकी हैं। जानिए अगर सांसदों की बगावत हुई तो उद्धव ठाकरे और UBT के राजनीतिक भविष्य पर क्या असर पड़ेगा।

Harsh Srivastava
Published on: 17 Jun 2026 12:11 PM IST (Updated on: 17 Jun 2026 12:11 PM IST)
Shiv Sena Split: महाराष्ट्र में फिर सबसे बड़ी बगावत की आहट! अगर UBT में पड़ी टूट तो उद्धव ठाकरे क्या होगा?
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Shiv Sena Split: महाराष्ट्र की सियासत से इस वक्त की सबसे सनसनीखेज खबर सामने आ रही है. ऐसा लग रहा है कि सूबे की राजनीति में एक बार फिर इतिहास खुद को दोहराने जा रहा है. शिवसेना (यूबीटी) यानी उद्धव ठाकरे गुट के भीतर एक बार फिर बगावत की चिंगारी सुलग उठी है. चर्चा है कि एक गुप्त 'ऑपरेशन टाइगर' के तहत उद्धव गुट के सांसदों को तोड़ने की बड़ी पटकथा लिखी जा चुकी है. हालांकि, दिल्ली में आनन-फानन में बुलाई गई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में संजय राउत ने इन दावों को खारिज करते हुए विरोधियों को खुली चेतावनी दी है. लेकिन राजनीति में जो दिखता है, वो होता नहीं और जो होता है, वो आसानी से दिखता नहीं.

अगर यह बगावत हकीकत में बदलती है, तो उद्धव ठाकरे के पास क्या रास्ते बचेंगे? क्या एक बार फिर एकनाथ शिंदे उनके कुनबे में सेंध लगाने में कामयाब हो जाएंगे? आइए इस पूरी राजनीतिक उठापटक का बारीक और गहराई से विश्लेषण करते हैं.

संजय राउत की कसम और खुली चेतावनी

शिवसेना (UBT) में बगावत की अटकलें उस वक्त और तेज हो गईं जब खबरें आईं कि उद्धव गुट के कुछ सांसद मुंबई और दिल्ली में पार्टी की बैठकों से नदारद दिखे. माहौल बिगड़ता देख फायरब्रांड नेता संजय राउत ने नई दिल्ली में अपने आवास पर एक बेहद आक्रामक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई. उनके साथ लोकसभा नेता अरविंद सावंत और चीफ व्हिप अनिल देसाई भी मौजूद थे.

संजय राउत ने बेहद कड़े शब्दों में कहा:

"जिन्हें जाना है, वो सीधा इस्तीफा देकर जा सकते हैं. हमारे सभी सांसदों ने साईं बाबा, मां भवानी और अपनी मां की कसम खाई है कि वे पार्टी के साथ वफादार रहेंगे. इसके बाद भी अगर किसी ने पीठ में छुरा घोंपा या दगा किया, तो हम उसे छोड़ेंगे नहीं. यह हमारा 'ऑपरेशन वुल्फ' होगा जो विरोधियों को शिकार बनाएगा."

भले ही राजाभाऊ वाजे और संजय पाटिल जैसे सांसदों ने पाला बदलने की खबरों को अफवाह बताया हो, लेकिन अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि पर्दे के पीछे अभी भी शह और मात का खेल जारी है.

कब और क्यों हुई थी पहली बड़ी बगावत?

महाराष्ट्र में शिवसेना के टूटने का सिलसिला नया नहीं है, लेकिन सबसे बड़ा ऐतिहासिक झटका जून 2022 में लगा था. उस वक्त की बगावत ने पूरे देश को चौंका दिया था.

जून 2022 का संकट: उद्धव ठाकरे के बेहद करीबी माने जाने वाले एकनाथ शिंदे अचानक शिवसेना के करीब 40 विधायकों को लेकर पहले गुजरात के सूरत और फिर वहां से असम के गुवाहाटी चले गए थे.

बगावत की असली वजह: बागी गुट का आरोप था कि उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस और एनसीपी (शरद पवार) के साथ मिलकर 'महाविकास अघाड़ी' (MVA) बनाई, जो बालासाहेब ठाकरे की प्रखर हिंदुत्व विचारधारा के बिल्कुल खिलाफ थी. साथ ही विधायकों का आरोप था कि मुख्यमंत्री रहते हुए उद्धव उनसे मुलाकात नहीं करते थे और सारा फंड एनसीपी के मंत्रियों को जा रहा था.

नतीजा: इस बगावत के कारण उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था. बाद में चुनाव आयोग ने एकनाथ शिंदे गुट को ही 'असली शिवसेना' माना और पार्टी का पारंपरिक नाम और 'धनुष-बाण' का प्रतीक चिन्ह भी उन्हें सौंप दिया.

क्या दोबारा सेंध लगा पाएंगे एकनाथ शिंदे?

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस बार का निशाना विधानसभा नहीं बल्कि लोकसभा है. संसद के नियमों के मुताबिक, दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) से बचने के लिए किसी भी पार्टी के कुल सांसदों में से दो-तिहाई (2/3) सांसदों का एक साथ टूटना जरूरी है.

शिवसेना (UBT) का मौजूदा गणित

संख्या

लोकसभा में कुल सांसद

9

कानूनन दलबदल से बचने के लिए जरूरी संख्या (2/3)

6

अगर 6 से कम सांसद टूटे तो

संसद सदस्यता रद्द हो जाएगी


सूत्रों के मुताबिक, शिंदे गुट इसी 6 सांसदों के जादुई आंकड़े को छूने की कोशिश में है ताकि बिना सदस्यता गंवाए इस गुट का विलय शिंदे की शिवसेना में कराया जा सके. अगर शिंदे गुट इस आंकड़े को हासिल कर लेता है, तो यह उद्धव ठाकरे के लिए अब तक का सबसे घातक प्रहार साबित होगा.

अगर फिर बगावत हुई तो क्या होगा?

इस संभावित टूट के दूरगामी राजनीतिक परिणाम होंगे, जो न सिर्फ महाराष्ट्र बल्कि राष्ट्रीय स्तर की राजनीति को भी प्रभावित करेंगे:

संसद में कमजोर होगी विपक्षी आवाज: लोकसभा में उद्धव गुट के सांसदों की संख्या घटने से दिल्ली के सियासी गलियारों में उनका रसूख बेहद कम हो जाएगा.

शिंदे गुट की असली पहचान पर मुहर: अगर उद्धव के चुने हुए सांसद भी शिंदे के साथ चले जाते हैं, तो जनता के बीच यह संदेश जाएगा कि जमीनी स्तर के कार्यकर्ता और नेता एकनाथ शिंदे को ही असली 'शिवसेना प्रमुख' स्वीकार कर चुके हैं.

आगामी चुनावों पर असर: इस टूट से कार्यकर्ताओं का मनोबल पूरी तरह टूट सकता है, जिसका सीधा नुकसान 'महाविकास अघाड़ी' गठबंधन को उठाना पड़ेगा.

अब उद्धव ठाकरे के पास क्या विकल्प बचे हैं?

अगर यह बगावत हो जाती है, तो उद्धव ठाकरे पूरी तरह से अलग-थलग पड़ जाएंगे. ऐसी स्थिति में उनके पास बेहद सीमित रास्ते होंगे:

कानूनी लड़ाई और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा: उद्धव एक बार फिर कोर्ट का रुख कर सकते हैं और व्हिप के उल्लंघन के आधार पर बागी सांसदों को अयोग्य ठहराने की मांग कर सकते हैं. हालांकि, पुराने अनुभवों को देखते हुए कानूनी प्रक्रिया में काफी लंबा वक्त लग सकता है.

सहानुभूति (Sympathy Card) का सहारा: उद्धव ठाकरे जनता के बीच जाकर 'विक्टिम कार्ड' खेल सकते हैं कि कैसे उनके पिता की बनाई पार्टी को बार-बार धनबल और सत्ता के दम पर लूटा जा रहा है. 2024 के लोकसभा चुनाव में इस कार्ड ने उनके लिए काम किया था.

युवा सेना और नए चेहरों पर दांव: पुराने और बुजुर्ग नेताओं के जाने के बाद उद्धव अपने बेटे आदित्य ठाकरे की अगुवाई में पूरी पार्टी का कायाकल्प कर सकते हैं और बिल्कुल नए, युवा चेहरों को जमीन से उठाकर नेतृत्व सौंप सकते हैं.

क्या खत्म हो जाएगा उद्धव ठाकरे का राजनीतिक करियर?

सबसे बड़ा और अहम सवाल यही है कि क्या उद्धव ठाकरे का राजनीतिक वजूद अब खतरे में है?

देखा जाए तो यह उनके जीवन का सबसे कठिन दौर है. पार्टी का नाम गया, निशान गया, सत्ता गई, विधायक गए और अब अगर सांसद भी चले जाते हैं, तो ठाकरे ब्रांड की चमक फीकी पड़ सकती है. लेकिन राजनीति में किसी का भी करियर इतनी आसानी से खत्म नहीं होता. बालासाहेब ठाकरे के नाम का जादू आज भी महाराष्ट्र के सुदूर गांवों और मुंबई की चॉलों में रहने वाले कट्टर 'मराठी मानुष' के दिलों में बरकरार है.

उद्धव ठाकरे का राजनीतिक भविष्य अब इस बात पर निर्भर करेगा कि वे इस संकट से घबराकर घर बैठ जाते हैं या फिर एक सच्चे 'बाघ' की तरह सड़क पर उतरकर जनता के बीच नए सिरे से संघर्ष शुरू करते हैं. महाराष्ट्र की जनता हमेशा से संघर्ष करने वाले नेताओं के साथ खड़ी रही है, ऐसे में उद्धव की अगली रणनीति ही उनका भविष्य तय करेगी.

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