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क्या ममता दोहरा रहीं थी मनमोहन सरकार की गलतियां? जानिए पश्चिम बंगाल की राजनीति का विश्लेषण
Mamata Banerjee Politics: क्या ममता बनर्जी दोहरा रही हैं मनमोहन सरकार की गलतियां? बंगाल की राजनीति का बड़ा विश्लेषण
Mamata Banerjee Politics in Hindi
Mamata Banerjee Politics: आपको लग सकता है कि प्रतियोगी परीक्षा और राजनीति का जिक्र एक साथ किया जाना ठीक नहीं है। लेकिन इन दोनो में समानता यह है कि राजनीति और प्रतियोगी परीक्षा, दोनों में सफलता उसकी दक्षता से अधिक सामने वाले की विफलता पर निर्भर करती है। वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी के सिंहासनारूढ़ होने में उनकी और भाजपा की दक्षता से बड़ा रोल तत्कालीन मनमोहन सरकार की विफलता का था। मोदी के दूसरे कार्यकाल का श्रेय उनके अपने कामकाज से अधिक विपक्ष के एकजुट न होने और कमजोर कांग्रेस की विफलता को जाता है।
ममता बनर्जी इन दिनों मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल के अंतिम दिनों की तरह ही गलतियां कर रही हैं। जिद और जुबान के चलते ममता एक ऐसे संजाल में फंस रही हैं, जिससे भाजपा का रास्ता खुलता है। ममता की मुसीबतें 2016 के विधानसभा चुनाव के कुछ दिनों बाद ही शुरू हो गई थीं। पिछले साल मोहर्रम के जुलूस की वजह से दुर्गा प्रतिमाओं के विसर्जन पर रोक, बालाकोट हमले पर केंद्र से सुबूत मांगना, श्रीराम बोलने वालों को जेल भेज देना ऐसे फैसले हैं, जो भाजपा की धर्म आधारित राजनीति को खाद-पानी देते हैं।
नरेंद्र मोदी के अभ्युदय का बड़ा कारण मनमोहन थे। उन्होंने लालकिले से दिये अपने भाषण में यह कहकर बहुसंख्यक समाज को निराश किया था कि देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का है। मनमोहन सिंह दंगा निरोधक बिल ड्राफ्ट कर रहे थे, जो बेहद क्रूर और बहुसंख्यक विरोधी था। उसी समय उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में हुए साम्प्रदायिक दंगे में बहुसंख्यकों की अनदेखी भी कांग्रेस नेताओं के रूख में साफ दिखी थी। एक तरफ जब नरेंद्र मोदी अपने लिए जगह तलाश रहे हों और यह संदेश भी साफ दे रहे हों कि उनकी सियासत में तुष्टिकरण के लिए कोई जगह नहीं है। तब मनमोहन सिंह द्वारा की गई ये गलतियां मोदी के लिए वरदान साबित हुईं।
इसी तरह जब दुनिया के पैमाने पर राष्ट्रवाद सियासत का सबसे मजबूत औजार बनकर उभर रहा हो तब भाजपा के खिलाफ उपराष्ट्रवाद का आह्वान ममता की उसी तरह की एक गलती है। डॉक्टरों की हड़ताल के सवाल पर उनका स्टैंड भी उनके हिंदू-मुसलमान रीति-नीति को ही प्रकट कर रहा था। डॉक्टर प. बंगाल के थे जबकि अपने मरीज के मर जाने पर अस्पताल में लोगों को इकट्ठा कर तोड़फोड़ कराने वाला शख्स अल्पसंख्यक समुदाय से आता था। लोगों को लगा कि शायद यही वजह है कि ममता डॉक्टरों के खिलाफ स्टैंड पर अड़ी रहीं। देशव्यापी चौतरफा दबाव से ऐसी घिरीं कि लोगों को लगने लगा कि विपक्षियों से मुकाबला करने में ममता ढीली पड़ रही हैं। ममता ने यहां तक कहा कि हड़ताली डॉक्टर बाहरी हैं जबकि इस्तीफा देने वाले हड़ताल करने वाले सबके सब बंगाल के ही थे।
वर्ष 2011 में ताकतवर वामपंथी साम्राज्य को ढहा कर अपना प्रभुत्व कायम करने वाली ममता को सबक सिखाने के लिए आज जबकि राज्य की आबादी के विभिन्न तबके भाजपा के पीछे लामबंद हो रहे हैं, नगर पालिका से लेकर लोकसभा तक नेताओं के भाजपा का दामन थामने का सिलसिला है, यह बता रहा है कि भाजपा का प्रभुत्व कितनी तेजी से बढ़ रहा है। भाजपा की कार्यकर्ताओं की हत्या का सवाल हो या टीएमसी कार्यकर्ताओं के मरने का बवाल। यह दोनों ममता पर भारी पड़ रहे हैं।
प. बंगाल में रह रहे लोगों से बांग्ला सीखने की बात और भाजपा को केवल हिन्दी पट्टी की पार्टी बताने की ममता की सियासी चाल कामयाब नहीं हो रही है, क्योंकि भाजपा के मूल दल जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी प.बंगाल के थे। तुष्टिकरण की सियासत के चलते भद्रलोक वर्ग का बंगाली भी ममता के पीछे उतनी मजबूती से खड़ा नहीं दिखता है। विद्यासागर कालेज में मूर्ति के टूट जाने को बंगाली स्वाभिमान से जोड़ने की ममता की कोशिश भी परवान नहीं चढ़ पाई। पंचायत चुनाव में तृणमूल कार्यकर्ताओं पर व्यापक पैमाने पर लोगों को वोट देने से रोकने के मामले भी सामने आए। ममता तुष्टिकरण के अतिवाद पर चल निकलीं। नतीजतन, भाजपा खुद ब खुद विकल्प के रूप में दिखने लगी।
2014 के लोकसभा चुनाव में ममता को 34 और भाजपा को दो सीटें मिली थीं। 42 लोकसभा सीटों वाले इस राज्य में 2019 के चुनाव में भाजपा ने 18 सीटों पर कब्जा कर लिया, ममता को मात्र 22 सीटें मिलीं। विधानसभा चुनाव के लिहाज से नतीजों का विश्लेषण करें तो 2014 में भाजपा को सिर्फ 28 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त मिली थी। लेकिन इस बार 128 क्षेत्रों में कमल खिल गया। ममता की टीएमसी सिर्फ 158 विधानसभा क्षेत्रों में सिमट कर रह गई। ममता के लिए इससे बड़ी चुनौतीपूर्ण बात यह है कि जहां उसके पास 43.3 फीसदी वोट हैं, वहीं भाजपा की झोली में 40.3 फीसदी वोट गिर गए हैं। दोनो के बीच सिर्फ 18 लाख वोटों का अंतर है। भाजपा 60 सीटों पर मात्र चार हजार वोटों से हारी है।
फेनी के समय प्रधानमंत्री द्वारा बुलाई गई बैठक में ममता नहीं गई। प्रधानमंत्री का उन्होंने फोन नहीं उठाया। लेकिन उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक गए। उन्होंने प्रधानमंत्री की बातें सुनीं और राहत पैकेज का ब्लूप्रिंट पेश कर दिया। प्रधानमंत्री को पटनायक सरकार के कार्य की सराहना करनी पड़ी और आर्थिक सहायता भी मुहैया करानी पड़ी। पटनायक ने यह काम तब किया जब उसी के चंद दिनों पहले ही भाजपा ने उनकी सरकार को अपदस्थ करने के लिए सभी सियासी चालें चली थीं। लेकिन पटनायक फिर सत्ता पर काबिज हो गए। ममता को पटनायक से सबक लेना चाहिए। भारतीय संघ के स्वरूप के विरोध से उनकी छवि बंगाली मतदाताओं में भी नहीं सुधर रही है। राजनीतिक रूप से बंगाली बेहद जागरूक और सक्रिय होते हैं।
बंगाल के काफी हाउसों में आपको टेबलें खाली नहीं मिलेंगी। वहां बैठे लोग प.बंगाल और भारत तो छोड़िए लातिन अमरीका और उत्तर कोरिया जैसे मामलों पर बहस करते मिल जाएंगे। ममता जिस तरह सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर रही हैं उसका भी खमियाजा उन्हें भुगतना पड़ सकता है। और यह भी साफ हो उठा है कि तुष्टिकरण की सियासत में ममता भी मनमोहन सिंह की तरह ही बढ़ चली हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। मूलरूप से दिनांक 01.07.2019 को प्रकाशित।)


