TRENDING TAGS :
ममता के 3 बागी मुस्लिम सांसदों का बड़ा खेला! BJP-NDA को दिया ऐसा झटका...पलट गई पूरी सियासत
TMC Muslim Rebel MPs: पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा सियासी मोड़ आ गया है। ममता बनर्जी की टीएमसी से दूरी बनाने वाले यूसुफ पठान, अबु ताहिर खान और खलीलुर रहमान ने एनडीए बैठक से किनारा कर नया संकेत दिया है।
TMC Muslim Rebel MPs: पश्चिम बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य में एक बार फिर भारी घमासान देखने को मिल रहा है। राज्य की सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) से अलग होकर बगावती सुर अपनाने वाले 3 प्रमुख मुस्लिम सांसदों- यूसुफ पठान, अबु ताहिर खान और खलीलुर रहमान ने एनडीए गठबंधन की राह में बड़ा रोड़ा अटका दिया है। इन तीनों सांसदों ने दिल्ली में आयोजित एनडीए की महत्वपूर्ण बैठक में भाग न लेकर सियासी गलियारों में खलबली मचा दी है। यह लगातार दूसरा मौका है जब इन जनप्रतिनिधियों ने एनडीए के मंच से पूरी तरह दूरी बनाकर अपने स्वतंत्र रुख का स्पष्ट संकेत दिया है। इनके इस कदम से माहौल गरमा गया।
मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने पर जताया विरोध
इन बागी सांसदों का सबसे प्रखर विरोध राज्य में मस्जिदों के ऊपर लगे लाउडस्पीकरों को बलपूर्वक उतारे जाने की प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर है। सांसदों ने आरोप लगाया है कि स्थानीय पुलिस-प्रशासन की मदद से धार्मिक स्थलों से साउंड सिस्टम हटाए जा रहे हैं, जिससे मुस्लिम समाज के भीतर गहरा आक्रोश पनप रहा है। मुर्शिदाबाद से सांसद अबु ताहिर खान ने कड़े शब्दों में कहा कि मस्जिदों में अजान न हो पाने की स्थिति किसी रूप में स्वीकार्य नहीं है। इन्होंने सवाल उठाया कि यदि समाज की धार्मिक मान्यताओं पर चोट पहुंचेगी तो जनप्रतिनिधियों का शांत बैठना मुमकिन नहीं।
अमित शाह से मिलकर सौंपा संयुक्त पत्र
अपनी चिंताओं को लेकर यूसुफ पठान, अबु ताहिर खान और खलीलुर रहमान ने दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से सीधी मुलाकात की। इस दौरान सांसदों ने एक संयुक्त मांग पत्र सौंपा, जिसमें लिखा गया है कि वे ध्वनि प्रदूषण पर नियंत्रण से जुड़े देश के नियमों और सर्वोच्च अदालत के निर्देशों का पूरा सम्मान करते हैं। हालांकि, उन्होंने गृह मंत्री से पुरजोर अपील की कि इन नियमों को बिना किसी भेदभाव के निष्पक्ष और संवेदनशील तरीके से लागू किया जाए। इसके साथ ही, उन्होंने ट्रिब्यूनल के फैसलों में देरी और एसआईआर के मुद्दे पर भी केंद्रीय हस्तक्षेप मांगा।
बीजेपी में शामिल होने से इनकार
तीनों सांसदों ने दोटूक शब्दों में साफ कर दिया है कि वे अपनी जनता के हितों से कोई समझौता नहीं करेंगे। वे नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) का हिस्सा जरूर बने हैं, लेकिन उनका इरादा बीजेपी या एनडीए में शामिल होने का बिल्कुल नहीं है। सांसदों का कहना है कि वे अपने-अपने संसदीय क्षेत्रों के मतदाताओं के प्रति सीधे तौर पर जवाबदेह हैं। वे किसी भी ऐसे निर्णय का समर्थन नहीं कर सकते, जिससे उनके समाज के अधिकारों पर आंच आती हो। इन नेताओं ने दोहराया कि उनका रुख पूरी तरह जनहित से प्रेरित है।
विकास बैठक में मौजूदगी पर दिया अपना तर्क
एनडीए बैठक से दूर रहने वाले इन सांसदों को हाल ही में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की समन्वय बैठक में देखा गया था। इस पर उठ रहे सवालों का जवाब देते हुए नेताओं ने कहा कि प्रशासनिक बैठकों में जाना और किसी राजनीतिक गठबंधन का हिस्सा बनना दो अलग बातें हैं। उनका तर्क है कि संसदीय क्षेत्रों के विकास कार्यों, बजटीय मांगों और स्थानीय समस्याओं के समाधान के लिए सरकार से संवाद बनाए रखना उनकी संवैधानिक जिम्मेदारी है। इसी कारण वे विकास बैठक में शामिल हुए थे।
वोटरों की नाराजगी और दलबदल कानून का फंसा पेंच
सूत्रों के मुताबिक, इन सांसदों को अपने इलाकों में मतदाताओं के असंतोष का डर सता रहा है। सत्ताधारी दल से करीबी दिखने पर उनके स्थानीय समर्थक तीखे सवाल खड़े कर रहे थे, जिसके बाद इन्होंने एनडीए से दूरी बनाने का सख्त फैसला किया। इस राजनीतिक मोड़ का असर लोकसभा में दलबदल विरोधी कानून के तहत मिलने वाली कानूनी सुरक्षा पर भी पड़ सकता है। टीएमसी के 28 मूल सांसदों में से कम से कम 19 यानी 2 तिहाई संख्या बल जरूरी होता है। यदि ये 3 सांसद अलग रास्ता अपनाते हैं तो 20 सदस्यों वाले एनसीपीआई गुट का गणित बिगड़ सकता है।
मुर्शिदाबाद जिले की 3 सीटों का राजनीतिक समीकरण
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन तीनों सीटों का जनसांख्यिकीय ढांचा इस पूरे राजनीतिक फैसले का मुख्य कारण है। बहरामपुर, मुर्शिदाबाद और जांगीपुर- ये तीनों लोकसभा क्षेत्र मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद जिले में स्थित हैं। 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, पूरे जिले में मुस्लिम आबादी लगभग 66-67 प्रतिशत है। मुर्शिदाबाद सीट पर मुस्लिम आबादी करीब 2 तिहाई है, जांगीपुर में भी यह संख्या बहुमत के पास है, जबकि बहरामपुर में 50 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम मतदाता हैं। ऐसे में अपने सियासी वजूद को बनाए रखने के लिए सांसदों के पास यह स्टैंड लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।


