मायावती vs चंद्रशेखर आजाद! दलित राजनीति में छिड़ी सियासी जंग, बयानों से बढ़ी तकरार

Mayawati vs Chandrashekhar Azad: मायावती और चंद्रशेखर आजाद के बयानों के बाद दलित राजनीति में नई बहस छिड़ गई है। जानिए दोनों नेताओं के बीच बढ़ती सियासी दूरी और इसके राजनीतिक मायने।

Harsh Sharma
Published on: 10 July 2026 9:05 PM IST
मायावती vs चंद्रशेखर आजाद! दलित राजनीति में छिड़ी सियासी जंग, बयानों से बढ़ी तकरार
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MayawativsChandrasekharAzad: बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) प्रमुख मायावती ने दलित और वंचित समाज से एकजुट रहने की अपील करते हुए कहा कि उनके अधिकारों की सबसे बड़ी ताकत वोट है। उन्होंने बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के बताए रास्ते पर चलने की सलाह दी और कहा कि समाज को शांतिपूर्ण तरीके से लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल करना चाहिए। मायावती ने यह भी कहा कि चुनाव के समय कई संगठन और राजनीतिक दल समाज को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। ऐसे में लोगों को सोच-समझकर फैसला लेना चाहिए और किसी भी तरह के भ्रम में नहीं आना चाहिए।

चंद्रशेखर आजाद ने दिया जवाब

हालांकि मायावती ने किसी नेता का नाम नहीं लिया, लेकिन उनके बयान के बाद आजाद समाज पार्टी के प्रमुख और नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि जो लोग सड़क पर संघर्ष कर रहे हैं, उन्हें कमतर नहीं आंका जाना चाहिए। चंद्रशेखर ने कहा कि उनके कार्यकर्ता समाज के मुद्दों पर लगातार प्रदर्शन करते हैं, गिरफ्तारी देते हैं और अपने संसाधनों से आंदोलन चलाते हैं। उन्होंने कहा कि समाज के लिए केवल बयान देना काफी नहीं है, बल्कि जमीन पर उतरकर संघर्ष करना भी जरूरी है।

न्याय और संघर्ष को लेकर अलग सोच

चंद्रशेखर ने अपने संबोधन में कहा कि अन्याय के मामलों में केवल कानूनी प्रक्रिया का इंतजार करने के बजाय समाज के साथ खड़ा होना भी जरूरी है। उनका कहना था कि जब किसी पीड़ित के साथ गंभीर घटना होती है, तब तुरंत आवाज उठाना भी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है। उन्होंने मायावती के प्रति सम्मान जताते हुए कहा कि विचारों में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन समाज तय करेगा कि उसके हितों के लिए कौन अधिक सक्रिय है।

बीएसपी का लगातार घटता राजनीतिक प्रभाव

उत्तर प्रदेश में 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली बीएसपी का राजनीतिक प्रभाव पिछले कुछ वर्षों में लगातार कम हुआ है। 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का खाता नहीं खुला। इसके बाद 2017 के विधानसभा चुनाव और 2022 के चुनाव में भी पार्टी का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा। 2019 में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन के बावजूद बीएसपी को सीमित सफलता मिली। वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव में भी पार्टी कोई सीट जीतने में सफल नहीं हो सकी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लगातार चुनावी हार से पार्टी का जनाधार कमजोर हुआ है।

चंद्रशेखर आजाद का बढ़ता राजनीतिक दायरा

दूसरी ओर, चंद्रशेखर आजाद ने भीम आर्मी के जरिए अपनी पहचान बनाई और बाद में आजाद समाज पार्टी का गठन किया। उन्होंने दलित समाज से जुड़े कई मुद्दों पर आंदोलन किए और लगातार सक्रिय राजनीति में बने रहे। 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने नगीना सीट से जीत हासिल कर अपनी राजनीतिक मौजूदगी मजबूत की। इसके बाद भी वह विभिन्न राज्यों में पार्टी का विस्तार करने और सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय रहने की कोशिश कर रहे हैं।

दलित राजनीति में बदलते समीकरण

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति में अब नए समीकरण बन रहे हैं। एक ओर मायावती अपनी पारंपरिक राजनीतिक शैली के साथ आगे बढ़ रही हैं, जबकि दूसरी ओर चंद्रशेखर आजाद आंदोलन और जनसंपर्क के जरिए अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं।आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि दलित समाज किस नेतृत्व पर अधिक भरोसा जताता है। फिलहाल दोनों नेताओं की अलग-अलग रणनीतियों ने प्रदेश की राजनीति में नई चर्चा जरूर शुरू कर दी है।

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Harsh Sharma is a Content Writer at Newstrack.com.

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