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मिलेट्स के नाम पर सेहत का कारोबार! चिप्स, नूडल्स और बिस्कुट की पोषण गुणवत्ता पर सवाल
Millet Processed Food: मिलेट्स से बने चिप्स, बिस्कुट और नूडल्स की पोषण गुणवत्ता पर सवाल। जानें कैसे ज्यादा तेल, नमक, चीनी और प्रोसेसिंग से घट सकता है सेहत का लाभ।
Millet Processed Food: जिस मोटे अनाज को बेहतर पोषण, संतुलित भोजन और स्वस्थ जीवनशैली के विकल्प के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, उसी के नाम पर बाजार में बिकने वाले कई पैकेटबंद खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। ज्वार, बाजरा, रागी और अन्य मिलेट्स से तैयार चिप्स, बिस्कुट, नूडल्स, सूप तथा रेडी-टू-ईट उत्पादों को स्वास्थ्यवर्धक बताकर बेचा जा रहा है, लेकिन अत्यधिक प्रसंस्करण, परिष्करण और अतिरिक्त सामग्री के इस्तेमाल से इनके वास्तविक पोषण लाभ कम हो सकते हैं। हिमाचल प्रदेश के इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (आईजीएमसी), शिमला के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के चिकित्सक डॉ. अमित सचदेवा के एक शोधपत्र में इस समस्या की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है। शोधपत्र के संबंध में सामने आई जानकारी के अनुसार, मिलेट्स आधारित कुछ प्रसंस्कृत उत्पादों में फाइबर, खनिज और अन्य आवश्यक पोषक तत्वों की कमी तथा स्वाद और आकर्षण बढ़ाने के लिए अतिरिक्त तेल एवं फ्लेवर के इस्तेमाल पर चिंता व्यक्त की गई है।
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में मोटे अनाज को लेकर देशभर में जागरूकता बढ़ी है। संयुक्त राष्ट्र ने भारत के प्रस्ताव पर वर्ष 2023 को अंतरराष्ट्रीय मिलेट्स वर्ष घोषित किया था। इसके बाद मोटे अनाज की खेती, प्रसंस्करण, विपणन और उपभोग को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक प्रयास हुए। ज्वार, बाजरा, रागी, कोदो, कुटकी और सांवा जैसे अनाजों को पौष्टिक भोजन के विकल्प के रूप में नई पहचान मिली। बाजार में भी इसका असर दिखाई दिया और अनेक कंपनियों ने मिलेट्स से बने चिप्स, कुकीज, नूडल्स, नमकीन, ब्रेकफास्ट सीरियल और अन्य पैकेटबंद उत्पाद पेश किए। लेकिन अब सवाल यह है कि किसी उत्पाद में मिलेट्स का इस्तेमाल होना क्या अपने आप उसे स्वास्थ्यवर्धक बना देता है, या उसकी वास्तविक गुणवत्ता तैयार करने की प्रक्रिया और अन्य सामग्री पर भी निर्भर करती है?
मिलेट्स का पोषण संबंधी महत्व लंबे समय से स्वीकार किया जाता रहा है। विभिन्न प्रकार के मोटे अनाजों में आहार फाइबर, प्रोटीन, कुछ आवश्यक खनिज और अन्य पोषक तत्व पाए जाते हैं। रागी को कैल्शियम के स्रोत के रूप में जाना जाता है, जबकि बाजरा और कुछ अन्य मिलेट्स में आयरन तथा दूसरे खनिज भी मौजूद होते हैं। हालाँकि, सभी मिलेट्स की पोषण संरचना एक जैसी नहीं होती। उनमें मौजूद पोषक तत्वों की मात्रा किस्म, खेती की परिस्थितियों, भंडारण और प्रसंस्करण के अनुसार बदल सकती है। इसलिए किसी भी मिलेट्स उत्पाद की वास्तविक पोषण गुणवत्ता का आकलन उसके नाम या पैकेट पर बने चित्र से नहीं, बल्कि उसकी सामग्री और पोषण संबंधी जानकारी के आधार पर किया जाना चाहिए।
आईजीएमसी के चिकित्सक डॉ. अमित सचदेवा के शोधपत्र के संबंध में उपलब्ध समाचार विवरण के अनुसार, सितंबर में रिसर्चगेट पर उपलब्ध कराए गए अध्ययन में मिलेट्स आधारित रेडी-टू-ईट उत्पादों के अत्यधिक प्रसंस्करण को लेकर चिंता जताई गई है। इसमें कहा गया है कि चिप्स, बिस्कुट, नूडल्स और अन्य तैयार खाद्य पदार्थ बनाने की प्रक्रियाओं के दौरान मिलेट्स के कुछ प्राकृतिक पोषक तत्व कम हो सकते हैं। विशेष रूप से अनाज की बाहरी परत हटाने, उसे अधिक परिष्कृत करने और कई चरणों की प्रसंस्करण प्रक्रिया से गुजारने पर फाइबर तथा कुछ खनिजों की मात्रा प्रभावित हो सकती है। हालाँकि, उपलब्ध विवरण में अलग-अलग उत्पादों के प्रयोगशाला परीक्षण, नमूनों की संख्या या पोषक तत्वों में कमी के प्रतिशत का उल्लेख नहीं है। इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि बाजार में बिकने वाले सभी मिलेट्स उत्पादों में आवश्यक पोषक तत्व समाप्त हो चुके हैं।
इस समस्या को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि साबुत अनाज और अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ में क्या अंतर होता है। किसी अनाज को साफ करना, सुखाना, पीसना या सामान्य तरीके से पकाना भी प्रसंस्करण की श्रेणी में आता है। लेकिन ऐसी सभी प्रक्रियाएँ हानिकारक नहीं होतीं। कई बार उचित प्रसंस्करण से अनाज का पाचन आसान होता है और कुछ पोषक तत्वों की शरीर में उपलब्धता बेहतर भी हो सकती है। दूसरी ओर, जब अनाज की बाहरी परत और अंकुर का बड़ा हिस्सा हटा दिया जाता है, तो उसके साथ फाइबर और कुछ पोषक तत्व भी कम हो सकते हैं। इसके बाद यदि उसी अनाज के परिष्कृत आटे में अधिक नमक, चीनी, वसा और स्वाद बढ़ाने वाले पदार्थ मिलाकर चिप्स या बिस्कुट तैयार किए जाते हैं, तो अंतिम उत्पाद की पोषण गुणवत्ता साबुत अनाज से काफी अलग हो सकती है।
बाजार में मिलने वाले मिलेट्स चिप्स इसका उदाहरण हो सकते हैं। यदि किसी उत्पाद में मिलेट्स का आटा इस्तेमाल किया गया है, लेकिन उसे अधिक तेल में तला गया है और उसमें नमक की मात्रा अधिक है, तो केवल मिलेट्स की मौजूदगी से उसे संतुलित आहार का बेहतर विकल्प नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार मिलेट्स बिस्कुट में अतिरिक्त चीनी और वसा की मात्रा अधिक हो सकती है। नूडल्स और रेडी-टू-ईट सूप में भी स्वाद तथा लंबे समय तक भंडारण की सुविधा के लिए विभिन्न सामग्री इस्तेमाल की जा सकती है। इन उत्पादों की स्वास्थ्य संबंधी गुणवत्ता का निर्धारण इस बात से होगा कि उनमें वास्तविक मिलेट्स कितना है, फाइबर और प्रोटीन कितने हैं तथा नमक, चीनी और वसा की मात्रा क्या है।
शोधपत्र से संबंधित विवरण में पाम ऑयल, कृत्रिम फ्लेवर और अधिक तापमान पर खाद्य पदार्थ तैयार किए जाने की प्रक्रिया का भी उल्लेख किया गया है। पाम ऑयल में संतृप्त वसा की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक होती है। यदि किसी व्यक्ति के संपूर्ण आहार में संतृप्त वसा की मात्रा अधिक हो, तो इससे हृदय संबंधी स्वास्थ्य जोखिम बढ़ सकते हैं। हालाँकि, किसी उत्पाद में पाम ऑयल की मौजूदगी मात्र से उसे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक घोषित करना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है। वास्तविक जोखिम सेवन की मात्रा, कुल आहार और अन्य स्वास्थ्य कारकों पर निर्भर करता है। इसी प्रकार खाद्य सुरक्षा मानकों के अंतर्गत स्वीकृत फ्लेवर का इस्तेमाल और किसी उत्पाद का अत्यधिक प्रसंस्कृत होना अलग-अलग प्रश्न हैं। सभी कृत्रिम फ्लेवर अपने आप असुरक्षित नहीं होते, लेकिन वे किसी खाद्य पदार्थ की पोषण गुणवत्ता बढ़ाने की गारंटी भी नहीं देते।
मोटे अनाज की पॉलिशिंग को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। अनाज को अधिक चमकदार, आकर्षक और एकसमान बनाने के लिए उसकी बाहरी परत हटाई जा सकती है। यदि यह प्रक्रिया अधिक मात्रा में की जाए, तो कुछ मिलेट्स में प्राकृतिक फाइबर और खनिजों की मात्रा कम हो सकती है। लेकिन पॉलिशिंग की सभी प्रक्रियाओं को रासायनिक या स्वास्थ्य के लिए खतरनाक कहना सही नहीं होगा। कई अनाजों में खाने योग्य भाग प्राप्त करने के लिए बाहरी कठोर छिलका हटाना आवश्यक होता है। सामान्य यांत्रिक प्रसंस्करण, अत्यधिक पॉलिशिंग और किसी अनधिकृत रासायनिक पदार्थ के इस्तेमाल में स्पष्ट अंतर है। उपलब्ध समाचार में किसी विशेष रसायन की पहचान या उसके इस्तेमाल की प्रयोगशाला पुष्टि नहीं दी गई है। इसलिए रासायनिक पॉलिशिंग के व्यापक दावे को स्वतंत्र जाँच के बिना स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।
इस पूरे मामले का एक महत्वपूर्ण आर्थिक पहलू भी है। बाजार में मिलेट्स आधारित अनेक पैकेटबंद उत्पादों को सामान्य खाद्य पदार्थों की तुलना में अधिक कीमत पर बेचा जाता है। उपभोक्ता अक्सर यह मानकर अतिरिक्त कीमत चुकाता है कि मिलेट्स से बना उत्पाद अधिक पौष्टिक होगा। लेकिन यदि उत्पाद में मिलेट्स की मात्रा सीमित हो और उसकी पोषण संरचना सामान्य चिप्स या बिस्कुट जैसी ही हो, तो अधिक कीमत चुकाने के बावजूद अपेक्षित स्वास्थ्य लाभ मिलना जरूरी नहीं है। यही कारण है कि खाद्य पदार्थों के विज्ञापन और पैकेजिंग में किए जाने वाले पोषण संबंधी दावों की पारदर्शिता महत्वपूर्ण हो जाती है।
खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण के नियमों के अंतर्गत पैकेटबंद खाद्य पदार्थों पर सामग्री और पोषण संबंधी आवश्यक जानकारी देना अनिवार्य है। उपभोक्ता को उत्पाद खरीदते समय सामग्री की सूची और पोषण तालिका देखनी चाहिए। विशेष रूप से यह समझना उपयोगी है कि मिलेट्स मुख्य सामग्री है या केवल थोड़ी मात्रा में मिलाया गया है। साथ ही प्रति 100 ग्राम उत्पाद में ऊर्जा, प्रोटीन, फाइबर, कुल वसा, संतृप्त वसा, चीनी और सोडियम की मात्रा का आकलन किया जा सकता है। दो उत्पादों की तुलना करते समय समान मात्रा के आधार पर पोषण जानकारी देखना अधिक उपयोगी होता है, क्योंकि कंपनियाँ पैकेट और सर्विंग का आकार अलग-अलग रख सकती हैं।
मिलेट्स का एक महत्वपूर्ण लाभ यह है कि इन्हें विविध प्रकार के पारंपरिक और आधुनिक भोजन में शामिल किया जा सकता है। बाजरे की रोटी, ज्वार की रोटी, रागी का दलिया, मिलेट्स की खिचड़ी और अन्य कम प्रसंस्कृत व्यंजन संतुलित आहार का हिस्सा बन सकते हैं। यदि इनके साथ दाल, सब्जियाँ, दही या अन्य प्रोटीन स्रोत शामिल किए जाएँ, तो भोजन की पोषण गुणवत्ता बेहतर बनाई जा सकती है। लेकिन यह भी ध्यान रखना चाहिए कि मिलेट्स अपने आप सभी पोषक आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं करते। स्वस्थ आहार के लिए खाद्य पदार्थों में विविधता और उचित मात्रा दोनों आवश्यक हैं।
मोटे अनाज को लेकर मधुमेह के मरीजों में भी विशेष रुचि दिखाई देती है। कई लोग यह मान लेते हैं कि मिलेट्स से बना कोई भी उत्पाद रक्त शर्करा के लिए बेहतर होगा। वास्तविकता इससे अधिक जटिल है। किसी खाद्य पदार्थ का रक्त शर्करा पर प्रभाव उसके प्रकार, प्रसंस्करण, पकाने के तरीके, मात्रा और साथ खाए गए अन्य खाद्य पदार्थों पर निर्भर करता है। साबुत या कम प्रसंस्कृत मिलेट्स और अत्यधिक परिष्कृत मिलेट्स आटे से बने मीठे बिस्कुट का प्रभाव एक जैसा नहीं होगा। इसलिए मधुमेह के मरीजों के लिए केवल पैकेट पर मिलेट्स लिखा होना पर्याप्त आधार नहीं है।
इस मुद्दे का संबंध भारत की कृषि और पोषण नीति से भी है। मोटे अनाज कम पानी की उपलब्धता वाले क्षेत्रों में खेती के महत्वपूर्ण विकल्प हो सकते हैं और कई किस्में स्थानीय कृषि परिस्थितियों के अनुकूल होती हैं। इनके उत्पादन तथा उपभोग को प्रोत्साहित करने से किसानों के लिए बाजार के अवसर बढ़ सकते हैं और खाद्य विविधता को समर्थन मिल सकता है। लेकिन यदि मिलेट्स की बढ़ती लोकप्रियता का लाभ मुख्यतः अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के विपणन तक सीमित रह जाए, तो पोषण सुधार का व्यापक उद्देश्य कमजोर पड़ सकता है। इसलिए किसानों से लेकर उपभोक्ताओं तक पूरी खाद्य शृंखला में गुणवत्ता और पारदर्शिता बनाए रखना आवश्यक है।
शिमला से सामने आई यह शोध संबंधी जानकारी एक बड़े प्रश्न की ओर ध्यान आकर्षित करती है। क्या भारत में स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थों के नाम पर किए जाने वाले व्यावसायिक दावों की पर्याप्त जाँच हो रही है? क्या उपभोक्ताओं को स्पष्ट रूप से बताया जाता है कि किसी उत्पाद में वास्तविक मिलेट्स कितना है और प्रसंस्करण के बाद उसमें कौन-से पोषक तत्व किस मात्रा में बचे हैं? क्या स्वास्थ्य के नाम पर अधिक कीमत वसूलने वाली कंपनियों के दावों का नियमित परीक्षण होता है? इन सवालों का उत्तर खाद्य नियामकों, उत्पादकों और स्वतंत्र शोध संस्थाओं के स्तर पर खोजा जाना चाहिए।
इस पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि मिलेट्स स्वास्थ्यवर्धक आहार का उपयोगी हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन मिलेट्स से बना हर पैकेटबंद उत्पाद अपने आप स्वास्थ्यवर्धक नहीं हो जाता। अनाज की वास्तविक गुणवत्ता, प्रसंस्करण की मात्रा, अतिरिक्त तेल, नमक और चीनी तथा अंतिम उत्पाद की पोषण संरचना ही तय करेगी कि वह शरीर के लिए कितना उपयोगी है। उपभोक्ता के लिए सबसे जरूरी सावधानी यह है कि वह पैकेट पर लिखे आकर्षक दावों के बजाय उसके भीतर मौजूद सामग्री और पोषण संबंधी जानकारी को प्राथमिकता दे।


