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एनआरसी, कृषि कानून और धर्मेंद्र प्रधान, तीन बड़े मौके जब मोदी सरकार को झुकना पड़ा
Dharmendra Pradhan Resign: एनआरसी, तीन कृषि कानून और धर्मेंद्र प्रधान से जुड़े घटनाक्रमों के जरिए जानिए मोदी सरकार के बड़े राजनीतिक फैसलों और उनके प्रभाव का विश्लेषण।
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Dharmendra Pradhan Resign: भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली नरेंद्र मोदी सरकार को एक ऐसी सरकार के रूप में देखा जाता है जो अपने फैसलों पर अडिग रहती है और राजनीतिक दबाव के बावजूद पीछे नहीं हटती। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में तीन ऐसे बड़े अवसर आए हैं जब केंद्र सरकार को व्यापक जनदबाव, राजनीतिक परिस्थितियों और चुनावी गणित के चलते अपने रुख में बदलाव करना पड़ा। राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) का मुद्दा, तीन कृषि कानूनों की वापसी और अब केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा - ये तीन घटनाएं इस बात का संकेत देती हैं कि लोकतंत्र में जनमत और राजनीतिक दबाव अंततः सरकारों को अपने फैसलों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर सकते हैं।
अलग हालात लेकिन समानता भी
इन तीनों मामलों में हालात अलग अलग थे लेकिन एक समानता रही। वो यह कि जब विरोध व्यापक हुआ, विपक्ष ने मुद्दे को लगातार चढ़ाए रखा, अदालतों और सिविल सोसायटी की सक्रियता बढ़ी तथा चुनावी नुकसान की आशंका गहराई, तब केंद्र सरकार ने अपने शुरुआती रुख में बदलाव किया।
एनआरसी का मसला
सबसे पहले राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी एनआरसी का मुद्दा सामने आया। 2019 में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के साथ जब राष्ट्रीय स्तर पर एनआरसी लागू किए जाने की चर्चा तेज हुई तो देश के अनेक हिस्सों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए।विरोध की तीव्रता बढ़ने के साथ सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर एनआरसी लागू करने के मुद्दे को आगे नहीं बढ़ाया। बाद में ये मुद्दा गायब ही हो गया।
कृषि कानून
दूसरा और सबसे बड़ा उदाहरण तीन कृषि कानूनों का है। सितंबर 2020 में संसद से पारित कृषि कानूनों को सरकार ने कृषि सुधारों की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया था। सरकार का दावा था कि इन कानूनों से किसानों को खुले बाजार में बेहतर कीमत मिलेगी और कृषि क्षेत्र में निजी निवेश बढ़ेगा। लेकिन पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और देश के अन्य हिस्सों के किसानों ने इन कानूनों का जोरदार विरोध किया। हजारों किसान दिल्ली की सीमाओं पर लगभग एक साल तक डटे रहे। इस आंदोलन में कई किसानों की मौत हुई, अनेक दौर की बातचीत हुईं, सुप्रीम कोर्ट ने कानूनों के अमल पर रोक लगाई।
आखिरकार नवंबर 2021 में गुरु नानक जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की। इसके बाद संसद ने कानूनों को औपचारिक रूप से निरस्त कर दिया। इसे मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का सबसे बड़ा राजनीतिक यू-टर्न माना गया।
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा
अब तीसरा उदाहरण केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के रूप में सामने आया है। पिछले कई महीनों से शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता और विशेष रूप से नीट परीक्षा से जुड़े विवादों को लेकर देशभर में असंतोष बढ़ रहा था। राजधानी दिल्ली सहित विभिन्न राज्यों में छात्र संगठनों ने आंदोलन तेज किया। संसद के भीतर और बाहर विपक्ष लगातार शिक्षा मंत्री की जवाबदेही तय करने की मांग करता रहा।
आंदोलन के लगातार बढ़ने, न्यायपालिका की सख्त टिप्पणियों, विपक्ष के बढ़ते दबाव और व्यापक जनचर्चा के बीच अंततः धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। यह फैसला केवल एक मंत्री का इस्तीफा नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे सरकार द्वारा बढ़ते राजनीतिक दबाव को स्वीकार करने के रूप में भी देखा जा रहा है।
राजनीतिक संदेश
इन तीनों घटनाओं का राजनीतिक संदेश भी महत्वपूर्ण है। विपक्ष ने इन तीनों घटनाओं को अपनी राजनीतिक जीत के रूप में प्रस्तुत किया है। वहीं भाजपा का तर्क रहा है कि लोकतंत्र में जनता की भावनाओं का सम्मान करना ही एक जिम्मेदार सरकार की पहचान है और यदि किसी नीति के क्रियान्वयन में कठिनाइयां सामने आती हैं तो उसमें संशोधन करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है।


