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मुंबई पुलिस को क्यों नहीं मिल सकती लॉरेंस बिश्नोई की कस्टडी? टाइगर श्रॉफ केस में बड़ा कानूनी पेंच
टाइगर श्रॉफ फायरिंग केस में मुंबई पुलिस लॉरेंस और अनमोल बिश्नोई की कस्टडी क्यों नहीं ले सकती? जानिए गृह मंत्रालय के आदेश और BNSS की धारा 303 का पूरा कानूनी मामला।
Lawrence Bishnoi Custody: टाइगर श्रॉफ के घर के पास फायरिंग की घटना के बाद एक बार फिर लॉरेंस बिश्नोई गैंग की भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं। लेकिन इस मामले में सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि फायरिंग के पीछे किसका हाथ है, बल्कि यह भी है कि अगर जांच में गैंग का नाम सामने आता है तो मुंबई पुलिस उसके कथित सरगना लॉरेंस बिश्नोई और उसके भाई अनमोल बिश्नोई से पूछताछ कैसे करेगी? इसकी वजह कोई साधारण पुलिस प्रक्रिया नहीं, बल्कि केंद्रीय गृह मंत्रालय का वह आदेश है, जो दोनों भाइयों को जेल से बाहर ले जाने पर कानूनी रोक लगाता है।
सलमान खान के घर के बाहर फायरिंग से लेकर बाबा सिद्दीकी हत्याकांड और फिल्म निर्माता रोहित शेट्टी के आवास के बाहर गोलीबारी तक, बिश्नोई गैंग का नाम कई चर्चित मामलों में सामने आया है। हालांकि, टाइगर श्रॉफ फायरिंग मामले में अभी तक दोनों भाइयों को आरोपी नहीं बनाया गया है। ऐसे में उनकी कथित भूमिका और उनसे पूछताछ की संभावना को लेकर कानूनी स्थिति समझना जरूरी है।
गृह मंत्रालय के आदेश ने क्यों बढ़ाई मुंबई पुलिस की मुश्किल?
लॉरेंस बिश्नोई गुजरात की साबरमती जेल में बंद है, जबकि उसका भाई अनमोल बिश्नोई दिल्ली की तिहाड़ जेल में है। दोनों को जेल से बाहर लाने पर रोक लगाने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अलग-अलग आदेश जारी किए हैं।
- लॉरेंस बिश्नोई: अगस्त 2023 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सीआरपीसी की धारा 268 के तहत उसे जेल से बाहर ले जाने पर रोक लगाई थी। यह आदेश अगस्त 2024 में एक साल के लिए बढ़ाया गया और इसके बाद भी इसे सालाना आधार पर आगे बढ़ाया जाता रहा।
- अनमोल बिश्नोई: नवंबर 2025 में अमेरिका से भारत प्रत्यर्पित किए जाने के बाद उसके खिलाफ भी 5 दिसंबर 2025 को इसी तरह का आदेश जारी किया गया।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 303 अब इस तरह की पाबंदी का कानूनी आधार है। जब तक संबंधित आदेश प्रभावी हैं, तब तक अदालत से जारी सामान्य पेशी आदेश के आधार पर भी दोनों को जेल से बाहर लाना संभव नहीं होता।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि पुलिस उनसे पूछताछ ही नहीं कर सकती। जांच एजेंसी अदालत की अनुमति लेकर जेल के भीतर उनसे पूछताछ कर सकती है। कानूनी अड़चन मुख्य रूप से उनकी भौतिक कस्टडी लेने और उन्हें दूसरी जगह ले जाने को लेकर है।
क्या कहती है BNSS की धारा 303?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 303 के तहत केंद्र या राज्य सरकार किसी कैदी को उस जेल से बाहर ले जाने पर रोक लगा सकती है, जहां वह बंद है। यह प्रावधान कुछ खास परिस्थितियों में लागू किया जा सकता है।
इसके लिए तीन प्रमुख पहलुओं पर विचार किया जाता है:
1. कैदी जिस अपराध में बंद है, उसकी प्रकृति कितनी गंभीर है।
2. कैदी को जेल से बाहर ले जाने पर सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ने की कितनी आशंका है।
3. ऐसा आदेश जारी करना व्यापक जनहित में कितना जरूरी है।
सरकारें आमतौर पर सुरक्षा जोखिम, कैदी के फरार होने की आशंका, संभावित हिंसा और कानून-व्यवस्था से जुड़ी चिंताओं का हवाला देती हैं।=
हालांकि, जांच एजेंसियों का तर्क है कि जेल के भीतर पूछताछ करने से जांच प्रभावित हो सकती है। वहां अधिकारियों की संख्या, पूछताछ की अवधि और अन्य आरोपियों के साथ आमने-सामने बैठाकर सवाल करने जैसी प्रक्रियाओं पर सीमाएं हो सकती हैं। इससे कथित आपराधिक नेटवर्क की कड़ियां जोड़ना मुश्किल हो जाता है।
बाबा सिद्दीकी हत्याकांड में भी सामने आया था यही कानूनी पेंच
बिश्नोई भाइयों की कस्टडी को लेकर मुंबई पुलिस और अदालत के बीच कानूनी पेच बाबा सिद्दीकी हत्याकांड में भी सामने आ चुका है।
12 अक्टूबर 2024 को महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री और एनसीपी नेता बाबा सिद्दीकी की मुंबई के बांद्रा ईस्ट इलाके में उनके बेटे जीशान सिद्दीकी के कार्यालय के बाहर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। पुलिस के मुताबिक, मामले में गिरफ्तार 27 आरोपियों ने अनमोल बिश्नोई के निर्देशों पर काम किया था। पुलिस ने अनमोल को इस मामले में वांछित आरोपी बताते हुए उसे कथित संगठित अपराध सिंडिकेट का प्रमुख बताया है। इस मामले में अनमोल की कस्टडी हासिल करने की कोशिश पर अदालत ने भी सवाल उठाए थे।
इस साल 3 जुलाई को बाबा सिद्दीकी की पत्नी ने अदालत में आवेदन देकर मांग की कि मुंबई पुलिस को तिहाड़ जेल में बंद अनमोल की कस्टडी लेने का निर्देश दिया जाए। उन्होंने पुलिस की कथित सुस्ती पर सवाल उठाए।
10 जुलाई को विशेष मकोका अदालत ने अनमोल को पेश नहीं किए जाने पर नाराजगी जताई। अदालत ने जांच अधिकारी को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा कि जब पुलिस खुद अनमोल को कथित सिंडिकेट का प्रमुख बता रही है, तो उसकी कस्टडी लेने के लिए प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए गए।
जवाब में पुलिस ने गृह मंत्रालय के आदेश का हवाला दिया। पुलिस के मुताबिक, इस आदेश के कारण अनमोल की भौतिक कस्टडी लेने पर स्पष्ट कानूनी रोक थी। जांच एजेंसी ने यह भी कहा कि प्रभावी जांच के लिए उसकी कस्टडी जरूरी है और इसके बिना आगे की जांच प्रभावित हो रही है।
इसके बाद जुलाई में दिल्ली की विशेष एनआईए अदालत ने गृह मंत्रालय के आदेश का हवाला देते हुए मुंबई पुलिस की ओर से जारी पेशी वारंट के जरिए अनमोल की कस्टडी देने से इनकार कर दिया।
यह मामला दिखाता है कि किसी आरोपी को वांछित घोषित करना और उसकी कस्टडी हासिल करना दो अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं।
सलमान खान फायरिंग केस में भी नहीं सुलझी कस्टडी की अड़चन
अप्रैल 2024 में सलमान खान के बांद्रा स्थित घर के बाहर हुई फायरिंग के मामले में भी अनमोल बिश्नोई का नाम सामने आया था। इस मामले में अनमोल ने खुद अदालत के सामने आत्मसमर्पण कर न्यायिक कार्यवाही में शामिल होने की मांग की थी। उसकी याचिका पर फैसला लंबित बताया गया है।
इस मामले में भी जेल से बाहर लाकर कस्टडी लेने की प्रक्रिया गृह मंत्रालय के आदेशों के कारण जटिल हो जाती है।
यानी मुंबई में अलग-अलग चर्चित आपराधिक घटनाओं की जांच के दौरान बिश्नोई भाइयों से पूछताछ की जरूरत महसूस होने के बावजूद पुलिस को कानूनी पाबंदियों का सामना करना पड़ रहा है।
पहले भी आतंकवाद के मामलों में लागू हो चुका है ऐसा आदेश
जेल से बाहर ले जाने पर रोक लगाने वाले प्रावधानों का इस्तेमाल पहले भी संवेदनशील मामलों में किया गया है।
मई 2013 में महाराष्ट्र सरकार ने 26/11 मुंबई आतंकी हमलों के आरोपी जबीउद्दीन अंसारी उर्फ अबू जुंदाल को अदालत में पेश करने पर रोक लगाने के लिए सीआरपीसी की धारा 268 के तहत आदेश जारी किया था। सरकार ने मामले की संवेदनशीलता को इसका आधार बताया था।
अबू जुंदाल ने बॉम्बे हाईकोर्ट में इस आदेश को चुनौती देते हुए अदालत में उपस्थित रहने और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार की दलील दी थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने मामले की संवेदनशील प्रकृति को देखते हुए आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। उसे जेल से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सुनवाई में शामिल होने की अनुमति दी गई।
दूसरी ओर, ऐसे आदेशों को अदालतों में चुनौती भी दी जा सकती है। कुछ मामलों में अदालतों ने पर्याप्त कारण नहीं होने पर कैदियों की आवाजाही पर लगाई गई पाबंदियों को हटाया है।
गुजरात सरकार ने भी 2014 में कैदियों की आवाजाही को प्रतिबंधित करने से संबंधित दिशा-निर्देश जारी किए थे। इनमें आरोपी के आचरण, अपराध की गंभीरता और सुरक्षा संबंधी पहलुओं पर विचार करने के साथ मुकदमे की शीघ्र सुनवाई सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया था।
टाइगर श्रॉफ फायरिंग केस में क्या होगा?
टाइगर श्रॉफ से जुड़े फायरिंग मामले में सोशल मीडिया पर सामने आए एक कथित जिम्मेदारी के दावे में लॉरेंस बिश्नोई गैंग का नाम शामिल बताया गया है। इससे पहले फरवरी 2026 में फिल्म निर्माता रोहित शेट्टी के आवास के बाहर हुई फायरिंग के बाद भी इसी तरह के दावे सामने आए थे।
हालांकि, सोशल मीडिया पर किसी गैंग के नाम से जिम्मेदारी लेने का दावा अपने आप में उसकी संलिप्तता का प्रमाण नहीं है। टाइगर श्रॉफ मामले में उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, अभी तक लॉरेंस या अनमोल बिश्नोई को आरोपी नहीं बनाया गया है।
यदि जांच में बिश्नोई गैंग की भूमिका सामने आती है और दोनों भाइयों से पूछताछ जरूरी होती है, तो मुंबई पुलिस को गृह मंत्रालय के प्रभावी आदेशों और अदालत की अनुमति के दायरे में ही आगे बढ़ना होगा।
यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा कानूनी पेंच है: पुलिस किसी आरोपी को जांच में शामिल करना चाहती है, लेकिन उसे जेल से बाहर लाकर कस्टडी में लेने का रास्ता सरकारी आदेश से बाधित है। ऐसे में जांच एजेंसी के सामने जेल के भीतर पूछताछ, अदालत से अनुमति और कानूनी आदेशों को चुनौती देने जैसे विकल्प बचते हैं।
फिलहाल, टाइगर श्रॉफ फायरिंग मामले में बिश्नोई भाइयों की भूमिका को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। जांच में सामने आने वाले साक्ष्य और संबंधित कानूनी आदेश ही तय करेंगे कि मुंबई पुलिस उनके खिलाफ आगे क्या कदम उठा सकती है।


