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11 दिन में 7 मुलाकातें, नरोत्तम मिश्रा से क्यों मिल रहे BJP के बड़े नेता? MP की सियासत में क्या है बड़ा संकेत?
नरोत्तम मिश्रा से 11 दिनों में बीजेपी के 7 बड़े नेताओं की मुलाकात ने मध्य प्रदेश की सियासत में अटकलें बढ़ा दी हैं। जानिए इन मुलाकातों का राजनीतिक मतलब और 2027 यूपी चुनाव से कनेक्शन।
MP Politics Narottam Mishra: मध्य प्रदेश की सियासत में इन दिनों पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। न विधायक हैं, न सरकार में कोई पद और न ही 2026 के दतिया उपचुनाव में बीजेपी ने उन्हें टिकट दिया। इसके बावजूद महज 11 दिनों में बीजेपी के सात बड़े नेता उनसे मुलाकात कर चुके हैं। इन मुलाकातों ने नरोत्तम मिश्रा की अगली राजनीतिक भूमिका को लेकर अटकलें तेज कर दी हैं। कयास लगाए जा रहे क्या उन्हें कोई बड़ी जिम्मेदारी मिलने वाली है? या दतिया चुनाव वाली उनकी नाराजगी दूर करने की कोशिश मात्र है?
1 सितंबर से 11 सितंबर के बीच नरोत्तम मिश्रा से मिलने वालों में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन, डिप्टी सीएम जगदीश देवड़ा, कैबिनेट मंत्री विजय शाह, प्रदेश प्रभारी डॉ. महेंद्र सिंह समेत कई नेता शामिल हैं।
11 दिन में नरोत्तम से 7 मुलाकातें
नरोत्तम मिश्रा की इन मुलाकातों का सिलसिला 1 सितंबर से शुरू हुआ।
1 सितंबर: क्षेत्रीय महामंत्री अजय जामवाल ने मुलाकात की।
1 सितंबर शाम: मंत्री कैलाश विजयवर्गीय नरोत्तम से मिले।
2 सितंबर: कैबिनेट मंत्री विजय शाह ने मुलाकात की।
3 सितंबर: नरोत्तम मिश्रा ने दिल्ली में बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन से मुलाकात की।
7 सितंबर: विधायक लखन पटेल उनसे मिले।
9 सितंबर: डिप्टी सीएम जगदीश देवड़ा ने मुलाकात की।
11 सितंबर: बीजेपी प्रदेश प्रभारी डॉ. महेंद्र सिंह ने नरोत्तम से मुलाकात की।
इन मुलाकातों ने इसलिए भी राजनीतिक महत्व हासिल किया है क्योंकि नरोत्तम मिश्रा फिलहाल किसी संवैधानिक या संगठनात्मक पद पर नहीं हैं।
नरोत्तम बोले- सभी से पुराने दोस्ताना रिश्ते
लगातार हो रही मुलाकातों को लेकर जब नरोत्तम मिश्रा से सवाल किया गया तो उन्होंने इसे सामान्य और दोस्ताना मुलाकात बताया। उनका कहना है कि वह करीब 30 साल विधायक रहे हैं और पांच बार मंत्री की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। ऐसे में बीजेपी के नेताओं के साथ उनके पुराने संबंध हैं।
2028 में अपनी भूमिका को लेकर भी नरोत्तम मिश्रा ने क्रिकेट का उदाहरण देते हुए कहा कि वह खुद को पार्टी का कार्यकर्ता मानते हैं। कप्तान जहां फील्डिंग करने को कहेगा, वह वहीं अपनी जिम्मेदारी निभाएंगे।
यानी उनका संदेश साफ है कि भूमिका का फैसला पार्टी करेगी और जिम्मेदारी जहां मिलेगी, वह वहां काम करेंगे।
हार के बाद भी खत्म नहीं हुई नरोत्तम की राजनीतिक उपयोगिता
2023 के विधानसभा चुनाव में दतिया से हार के बाद नरोत्तम मिश्रा की सक्रिय राजनीति को लेकर सवाल जरूर उठे, लेकिन बीजेपी संगठन में उनकी उपयोगिता खत्म नहीं हुई।
लोकसभा चुनाव से पहले उन्हें बीजेपी की 'न्यू जॉइनिंग टोली' का प्रदेश संयोजक बनाया गया था। नरोत्तम के मुताबिक, उनके नेतृत्व में 2.58 लाख से ज्यादा लोगों ने बीजेपी की सदस्यता ली, जिनमें करीब 90 फीसदी कांग्रेस से जुड़े लोग थे।
इसके बाद 2024 में राज्यसभा के लिए भी उनका नाम चर्चा में रहा, हालांकि पार्टी ने दूसरे नेताओं को मौका दिया। 2025 में बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष की दौड़ में भी उनका नाम प्रमुख दावेदारों में था, लेकिन यह जिम्मेदारी भी उन्हें नहीं मिली।
फिर 2026 के दतिया उपचुनाव में बीजेपी ने उन्हें टिकट नहीं दिया। पार्टी ने आशुतोष तिवारी को मैदान में उतारा, लेकिन वह चुनाव हार गए। इसके बाद नरोत्तम की राजनीतिक भूमिका को लेकर सवाल और गहरे हो गए।
अब 2027 यूपी चुनाव से जोड़ा जा रहा है कनेक्शन
नरोत्तम मिश्रा की ताजा सक्रियता को कुछ राजनीतिक जानकार 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से भी जोड़कर देख रहे हैं। यूपी चुनाव में ब्राह्मण वोट बैंक बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में पार्टी के वरिष्ठ ब्राह्मण नेताओं की भूमिका और सक्रियता पर स्वाभाविक रूप से नजर है।
इसी राजनीतिक संदर्भ में उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले दिनेश शर्मा को राज्यपाल बनाए जाने को भी कुछ विश्लेषक ब्राह्मण राजनीतिक समीकरण से जोड़कर देख रहे हैं।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि नरोत्तम मिश्रा को लेकर बीजेपी ने कोई औपचारिक फैसला कर लिया है। फिलहाल पार्टी की तरफ से उनकी अगली भूमिका को लेकर कोई घोषणा नहीं हुई है।
क्या यह शक्ति प्रदर्शन है या संगठन की तैयारी?
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक गिरिजाशंकर के मुताबिक, बीजेपी में फिलहाल किसी बड़े राजनीतिक उलटफेर की संभावना नहीं दिखती। उनका मानना है कि पिछले करीब दो दशकों से पार्टी में बड़े फैसले हाईकमान स्तर पर होते हैं और संगठनात्मक अनुशासन के कारण नेता सार्वजनिक तौर पर गुटबाजी या असंतोष जाहिर नहीं करते।
ऐसे में नरोत्तम मिश्रा से नेताओं की लगातार मुलाकात को सीधे किसी सत्ता संघर्ष से जोड़ना जल्दबाजी होगी। लेकिन यह जरूर संकेत देता है कि दतिया की चुनावी हार के बावजूद नरोत्तम मिश्रा की राजनीतिक प्रासंगिकता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
खासकर 2027 में उत्तर प्रदेश और उसके बाद 2028 में मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव को देखते हुए बीजेपी में वरिष्ठ नेताओं की उपयोगिता और सामाजिक समीकरण दोनों अहम होने वाले हैं।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नरोत्तम मिश्रा सिर्फ बीजेपी के पुराने नेताओं के साथ दोस्ताना मुलाकातें कर रहे हैं, या पार्टी उन्हें जल्द ही कोई नई जिम्मेदारी देने की तैयारी में है? आने वाले दिनों में होने वाली उनकी अगली मुलाकातें इस सियासी पहेली के कुछ और पत्ते खोल सकती हैं।


